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Wednesday, 15 July 2020

शहरी विकास: जिसकी लाठी उसकी भैंस। द्वारका उपनगर के संदर्भ में

शहरी विकास: जिसकी लाठी उसकी भैंस
द्वारका उपनगर के संदर्भ में
हम सबको याद ही होगा , जब द्वारका उप नगर ,जिसको पपन कलां प्रोजेक्ट कहा जाता था, आरम्भ हुआ ,उस वक्त एक भी पेड़ द्वारका उप नगर में नही था। अधिगृहित होने से पूर्व ये सब कृषि भूमि थी,कितने ही गांवों की। शहर और महानगर बनते है ,कृषि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता जाता है।  मधु विहार के पास एक पीपल का बड़ा पेड़ था, उसके नीचे ही बस स्टॉप हुआ करता था। नाले के ऊपर सिंगल रोड़ हुआ करती थी। जो लोग अपनी घोड़ा गाड़ी में चलते है, वो शायद न भी जानते हो। 
मेरे कितने पहचान वालों के फ्लैट द्वारका में  निकले ,लेकिन जंगल में कौन जाए , या तो बेच दिया ,या कहीं और मिले कोशिश में लग गए। यहां के डीलर और बिल्डर बोला करते थे कि अभी मेट्रों आने को है, कुछ बहुत पुल बनेंगे। डाबड़ी, एयरपोर्ट , विकास पूरी को जोड़ा जाएगा। साध नगर होते एक सीधा रास्ता जुड़ेगा। ये एशिया का सबसे  बड़ा उप-नगर है। स्पोर्ट काम्प्लेक्स और न जाने क्या क्या होगा। पालम फाटक पर फंसें सभी द्वारका वासी दुआ करते थे कि कब पुल बनेगा और हम सब घर जा सकेंगे। मैं तो बस वाला था, अभी भी हूँ, 3 से 4 घंटे भी कई बार फंसा। साउथ कैम्पस पुस्तकालय  में दिमाग घिसने जाने में घंटों फाटक पर लटके रहो और सरकार से लेकर सबको कोसते राहों। उस वक्त ठेला और BMW एक साथ फाटक पर फंसें किस्मत को कोसते रहते थे। तभी खबर मिली की पालम पर फ्लाई ओवर ब्रिज बनेगा ,तो सभी फंसने वाले उस शुभ दिन का इंतजार करने लगे।लेकिन जिन्होंने पालम कॉलोनी आदि में कभी जमीन ली थी और जो कुछ पैसा पानी रहा था,  प्राइम लोकेशन वाला प्लाट लिया होगा ,उनके लिए ये विनाश ही लगता था। लेकिन पब्लिक इंट्रेस्ट के नाम पर सब कुछ हो सकता है, खुद को लाभ हो ठीक,  नुकसान हो तो गलत ।  खेर,  द्वारका के लोगों के लिए वरदान सिद्ध हुआ। 
 मेट्रों ने सही अर्थों में द्वारका में लोगों को आकर्षित किया था। मेट्रो के साथ ही द्वारका लाइम लाइट में आ गया। 
अभी भी द्वारका के बड़े बड़े ग्रुप ,संस्थाएं द्वारका से निकासी की कितनी ही योजनाओं के लिए डी डी ए के आला अधिकारियों से मिलते हुए, फ़ोटो शेयर करते है। 
बात पालम फ्लाई ओवर की हो रही थी। कॉलोनी के बीच से निकला और को लोग बिल्कुल सटे हुए रहते है, उनके जीवन में शोर और न रुकने वाला शोर स्थाई हो गया है ।कभी किसी छोटे से रेलवे स्टेशन की रेलवे कॉलोनी में बाहर सो कर इसका आनंद लो। ट्रैन सरपट निकल जाती है, लेकिन जो पहली बार सोते है, उन्हें लगता है कि ट्रैन ऊपर तो नही आ रही। 1995 में महारष्ट्र के किसी छोटे से स्टेशन की कॉलोनी में बाहर सो कर मैंने ये अनुभव लिया था । लेकिन जो रहते है, उनको आदत पड़ जाती है।
विकास की आधुनिक अवधारणा एक का विकास और दूसरे के विनाश से ही सम्भव है।नांगल के पुल से नांगल की सारी कॉलोनी दिन रात के शोर में रम गए होंगे ,शायद। अब दूसरा उपाए भी क्या होगा? आजकल को लोग द्वारका एक्सप्रेसवे में रहते है, उनको भी सरकार और डीलर कहते रहते है कि बस थोड़ा सा रह गया ,फिर द्वारका से जुड़ जाएगा। 10 मिनट लगेंगे। ये हर प्रोजेक्ट की कहानी है। अब ये बात केवल चंडू खाने की ख़बर है कि सच, डाबड़ी नाले को कवर करने में जानबूझ कर देरी की गई, ताकि गुरुग्राम का तेजी से विकास हो। ऐसा बहुत बार होता है। एक समय था कि दिल्ली के गांव वाले डरते थे कि उनकी जमीन पर जे जे कॉलोनी न आ जाये। अभी पशुओं के शमशान घाट की चर्चा हो रही थी। द्वारका में आवाज उठी कि द्वारका में नही कहीं और ले जाओ। बामडोली गांव के पास की बात हुई ,तो वहां पर भी विरोध होना ही था। ये इसलिए होता है ,क्योंकि जनता से सरकार संवाद नही करती। सब गोल दूसरे के पाले में सरका दो, हम बच जाए। ये लालच और दूसरे की परवाह न करना , विकास की आधुनिक सोच का अभिन्न अंग है।
लेकिन जिन कॉलोनी में रसूखदार  लोग रहते है, वो अपने हिसाब से प्रोजेक्ट तैयार करवा लेते है। आप सभी बसंत गांव के आधे अधूरे पुल को झेल ही चुके होंगे। असल में वेस्ट एंड के रसूखदार  लोगों,  ने अपनी ओर पुल बनने ही नही दिया, जिससे एक मूर्खतापूर्ण प्रोजेक्ट बना और वर्षों सभी ने झेला। आई आई टी दिल्ली ने भी कई उपाए बताए ,लेकिन सब जनता के पैसों की बर्बादी ही थी। आई आई टी जैसे संस्थान बहुत बार जैसा सरकार चाहे अध्ययन कर लेते है। अभी फिर उस पुल को बनाना ही  पड़ा। जहाँ पर प्रभावित करनें वाले लोग रहते है, वहां पर मेट्रों जमीन के भीतर से गई। कभी कभी एक व्यक्ति ही पूरे प्रोजेक्ट को प्रभावित कर देता है।
अक्सर मैंने देखा कि प्रोटेस्ट करने में ये ख्याल रखा जाता है कि माइक किसके हाथ में रहेगा। सीधी बात है कि कौन उस दिन का नेता  होगा। मुझे याद है, एक वर्षपूर्व   गुरुग्राम में अंडरपास को लेकर प्रोटेस्ट था। मुझे भी कुछ मित्र  वाले ले गए। काफी लोग थे, नारे लग रहे थे। मेरे भीतर भी चिपको का नारा कुलांचे भरने लगा। सुंदरलाल बहुगुणा जी एवं चंडी प्रसाद भट्ट जी ने पेड़ बचाने के लिए इस नारे का शंखनाद पैदल चल के वर्षों तक किया ,जिसका परिणाम वन अधिनियम और न जाने कितने कानून और एक अलग से पर्यावरण विभाग और बाद में मंत्रालय की स्थापना हुई। स्वर्गीय एन डी जुयाल ,जिनकी 93 वें वर्ष 18 मार्च  को ,उनके ट्रस्ट  "द हिमालयन ट्रस्ट"  की स्थापना के दिन हुई। उन्होंने ही पर्यावरण विभाग की स्थापना की , जुयाल जी IMF ,भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन , के अध्य्क्ष और त्रिशुल   चोटी पर पहले भारतीय पर्वतारोहण दल की अगुवाई भी की। उनके भीतर चिपको और टेहरी बांध आंदोलन से हिमालय संरक्षण की बात स्थापित हो गई। इन आंदोलनों में शामिल होने वाले लोग विकास और विनाश की अवधारणा के मर्म को समझते थे। बहुत बार प्रोटेस्ट बहुत कुछ न  समझे ही होता है। बस अधिक लोग चाहिए।
इसलिए प्रोटेस्ट करने से पहले गहन अध्ययन और उसका विकल्प क्या है, ये जानना ,जरूरी और पहली शर्त है।
बात गुरुग्राम के प्रोटेस्ट की है।चिपको का नारा दिल से निकलता है। मीडिया की निगह तो जानी ही थी।  उन्होंने अधिक जगह दे दी तक  कुछ लोग मीडिया में कवरेज कम होने पर व्याकुल हो उठते है। शायद वो प्रोटेस्ट नारों में उलझ कर रह गया। 
जहां तक सरकारों का संबंध है, अभी भी गुप  चुप ही सब काम करती है।किसी प्रोजेक्ट की चर्चा अगर वहां पर रहने वालों से कर ली जाए और उनसे भी फीड बैक लिया जाए तो कितनी बातें साफ हो जाये ।  हालांकि कुछ लोग अपने स्वार्थ ,नाम और कितनी बार लाभ के लिए भी प्रोटेस्ट आदि का सहारा ले लेते है। इसलिए प्रोटेस्ट के लिए एक सतत सिलसिला चलना जरूरी है। 
किसी परियोजना का विरोध क्यों किया जाए ,इसका एक तुलनात्मक अध्ययन हो और संभव हो तो एक विकल्प भी दिया जाए तो बेहतर हो। सरकार को प्रोजेक्ट करना है । जो विरोध करते है, वो भी बहुत बार जिद कर देते है। दोनों का विरोध कितनी बार नाक का विषय बन जाता है। द्वारका में ही भारत वंदना पार्क को सरकार प्लाट कहती है। कुछ लोग जंगल कहते है। सरकार इसका लाभ के लिए उपयोग करना चाहती है, कुछ लोग कहते है,इसको पड़े रहने दो। दोनों किसी  भी बिंन्दू पर एक साथ नही आ सकते। 
सरकार ने DPR में लिखा है कि यहां पर सैंकड़ों गाड़ियों की पार्किंग होगी ,इसका अर्थ है कि भीड़ बढ़ेगी। इस पर चर्चा होनी चाहिए। सरकार और लोगों के बीच कोई बिंन्दू साफ नही हो पाते। फिर प्रोटेस्ट लगातार नही हो सकते। लेकिन इन पर गहन अध्ययन करके ही किसी बिंन्दू पर विस्तार से विरोध होना चाहिए। इसका पता ही नही चलता। अचानक कॉल होती है, कल सुबह किसी पॉइंट पर आना है। किसलिए , विरोध के लिए। अक्सर प्रोजेक्ट आरम्भ होने के साथ ही विरोध होने से सरकार उलझा देती है। 
दुनियां भर के लोग नजफगढ़ झील में आने वाले , विदेशी मूल के पक्षी देखने जाते है। उन सब का कहना है कि इस झील को सरकार वेटलैंड बना दें। लेकिन ताज्जुब है,उसके बगल में रह रहे गांव वाले इस झील में गुरुग्राम से निकलने वाले सीवर के पानी को करीब 20 वर्षों से झेल रहे है। पानी गांव की जमीन पर इकट्ठा रहता है। ये कभी साबी और साहिबी नदी थी। ये एक बड़ा गेप है, जिसका बिल्डर लॉबी लाभ उठा लेती है। जो प्रभावित होगा , उसको लाभ समझ आता है,  भले भविष्य के लिए विनाशकारी ही क्यों न हों। 
हम कोशिश करते है कि एक हमारे यहाँ से प्रोजेक्ट हेट और कहीं ओर ले जाया जाए। कहाँ पर ले जाया जाए ,इसका भी खाका हो तो प्रोटेस्ट में वजन रहता है।  
सरकार को हर बिंन्दू पर चर्चा के लिए तैयार रहना चाहिए। प्रोजेक्ट की सभी डिटेल ऑनलाइन डाल देनी चाहिए। प्रभावित लोगों से लंबा संवाद करना चाहिए। प्रोजेक्ट में पेड़ आदि को कैसे बचाया जा सकें, इस पर लंबी चर्चा की जा सकती है। वर्षो पहले भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के अतिरिक्त भूमि अधिग्रण पर कोई नीति नही थी। उस समय कितने ही लोगों ने सरकार को सुझाव दिए। मुझे भी अवसर मिला और बहुत से सुझाव के साथ एक बिंदु था कि प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ही कई गुणा अधिक पेड़ लगने चाहिए। पेड़ लगने के बाद ही प्रोजेक्ट शुरू हो। लेकिन आज भी एक साथ ही सब कुछ शुरू होता है। 
अंत में द्वारका उप नगर एक योजनाबद्ध तरीक़े से बनाया गया है। सरकार को चाहिए कि कोई भी प्रोजेक्ट जो भीड़ बढ़ाये , हवा दूषित करें, ध्वनि प्रदूषण बढ़ाये, पानी की किल्लत करें ,नही लाना चाहिए। मैँ तक कहता हूँ, दिल्ली में अभी किसी नए प्रोजेक्ट की जरूरत नही है। दिल्ली की carrying capacity (वहन क्षमता) करीब समाप्त हो चुकी है। लेकिन सेंट्रल विस्टा जैसे 20000 करोड़ के प्रोजेक्ट लगाना अभी उचित नही,लेकिन सरकार के तरकस में बहुत से तर्क वितर्क से लैस तीर होते है।जेब में नही दाने अम्मा चली भुनाने ,अब सरकार तो सरकार है। किस की सुनेगी। लेकिन ठोस आधार पर बात रखी जाए तो क़ुछ प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है। पर्यावरण संरक्षण, पेड़ बचाओ की समझ बहुत गहरी न होने पर बात को मजबूती से नही रखा जा सकता है।   लेकिन इन सब पॉइंट्स पर चर्चा हो और हो सकें तो जनता की टास्क फोर्स बने जो उपरोक्त बिंदु पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करें ताकि सरकार के सामने रखा जा सकें। लेकिन एक बात मैं जरूर कहूंगा  कि अनाधिकृत कब्जे और निर्माण रेसिडेंट्स की कमजोरी है। इसका लाभ सरकार उठा रहती है। श्री चंडी प्रसाद भट्ट जी ने द्वारका में ही कहा था कि आंदोलन अंर्तप्रेरित ,स्वस्फूर्त और शांतिपूर्ण ठोस अध्ययन के साथ ही किया जाए।द्वारका में बहुत जानकर और अनुभवी लोगों से उनके अनुभव का लाभ उठाया जाए। किसी प्रोजेक्ट का विरोध करें और कहें कि यहां पर नही ,दूसरी जगह ले जाया जाए ,ये भी बिना विकल्प और ठोस आधार के कहने से प्रोटेस्ट कमजोर पड़ता है। द्वारका के लिए एयरपोर्ट के कारण भी प्रदूषण होता है, इस पर भी हमको फ़ोकस करना ही चाहिए। मुझे याद है  कि श्री एस के मालिक और अखिलेश पांडेय ने इस बात को उठाया तो इनका ही विरोध होने लगा। लेकिन अभी इस बात को स्वीकार किया जा रहा है।  इस लिए सभी विकल्पों पर बिंदुबार चर्चा और गहन अध्ययन करना जरुरी है। जो भी ऊपर लिखा है,ये हम सभी जानते है। लेकिन फिर भी इन सब पर अगर गहन चर्चा कर ली जाए तो उचित ही हो और एक आधार द्वारकावासियों के लिए तैयार रहे, जिससे द्वारका को हमेशा ही संरक्षित किया सकें । द्वारका में भीड़, प्रदूषण बढ़ाने, जल संकट को गहराने वाले प्रोजेक्ट नही चाहिए, ये केवल कभी कभी प्रोटेस्ट करने के साथ एक वैकल्पिक दस्तावेज और प्रोजेक्ट की बारीक से बारीक जानकारी हाथ में रहे तो ही सफलता की थोड़ी उम्मीद है। इस बात से इंकार नही किया जा सकता है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष ,हिमाल 
9810610400
14.7.2020
ramesh_mumukshu@yahoo.com

Friday, 10 July 2020

चिंतन करना होगा कि कैसे पनपते है,ये डॉन

चिंतन करना होगा कि कैसे पनपते है,ये डॉन
विकास दुबे जैसे लोग पनप कैसे जाते है?  
कौन है ,जो इनको शरण देते है? 
कैसे ये AK 47 रखते है ? 
इसको पकड़ने पुलिस आई तो ,पुलिस वालों ने ही दुबे को सूचित किया। 
जो पुलिस वाले मारे गए ,वो उनके ही सहकर्मियों द्वारा मारे गए। पुलिस कभी एनकाउंटर करने नही जाती, वो हो जाता है। 
इसके माध्यम से हम सभी को अपने आस पास ऐसे कौन से लोग है, जो पुलिस और किसी विभाग से नही डरता। किस नेता और बाहुबली का उसको संरक्षण होता है। 
बेहतर हो कि केस बने और कोर्ट  से सजा मिले। बहुत से ऐसे लोगों को विगत में भी सजा मिली है,जो रसूख वाले लोग रहे है।
ऐसे लोगों का पनपना कानून की कमजोरी ही होती है। ताकतवर आदमी कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करता है।
ऐसे लोग धीरे धीरे ताकतवर बनते चले जाते है। जब व्यवस्था तय करने लगे कि कौन डॉन बनेगा और कब उसका खत्मा होगा तो समझो व्यवस्था न्याय पूर्ण काम नही कर सकेगी। ऐसे लोगों से बहुत से राज खोले जा सकते है। लेकिन ,जो लोग 8 पुलिस कर्मी को मार दें और सीना ठोक कर सामने आ जाये। उसको कोई डर नही है। सम्भव है, उसको ट्रेप में लिया हो। लेकिन ऐसा विगत में भी होता रहा है। होना नही ,चाहिए ,लेकिन ऐसा कदम उठ जाता है,या हो जाता है। 
पुलिस और व्यवस्था ,नेता आदि को ऐसे बदमाशों को पनपने ही न दिया जाए। इस पर हम सब को गहन चिंतन करना ही होगा। हमारे आंखों के सामने जो लोग गैरकानूनी काम सीना ठोक कर लेते है। ऐसे लोग ही दुबे बनने लगते है। आजकल ट्रेंड चला है कि गैरकानूनी निर्माण आदि के ठेके के पैकेज में सभी विभागों को मैनेज करना भी शामिल है। मेरे इस आशय को सभी संमझ गए होंगे। ये ही लोग विभाग और नेता द्वारा संरक्षण प्राप्त करता करता ताकतवर बन जाता है। सभी दलों और विचार धारा के अलग अलग डॉन होते है। जिसका  अवसर मिले वो रास्ता साफ करता रहता है। अगर हम अपने चारों और नज़र दौड़ाए तो बहुत कुछ सामने आता जाएगा। बहुत से लोग ऐसे होते है, जिनको लोग डॉन कहते है, लेकिन उनकी शिकायत करने की किसी की हिम्मत नही होती क्योंकि विभाग वाले उनके पास आते जाते है। इसलिए विकास दुबे जैसों को पनपने ही नही देना चाहिए।
*नोट* एक बात तय है कि बिना किसी वरदहस्त और संरक्षण के बदमाश इतना बड़ा नही बन सकता।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल 
9810610400

Sunday, 14 June 2020

हम नही सुधरेंगें चाहे कुछ भी हो कोरोना संकट पर एक विचार

हम नही सुधरेंगें चाहे कुछ भी हो कोरोना संकट पर एक विचार
# बाइक पर दो से तीन कितनी बार बिना मास्क चलेंगे।
# भीड़ करेंगे ,गप्प करेंगे मास्क के बिना
# हम प्याला होंगे , किसी के घर मास्क को दुर रख ,बच्चों की  परवाह किये बिना, मधुशाला गाएंगे।
# दुकान पर डिस्टेंस किसको याद है, अब कोई पुलिस वाला हूटर नही बाजयेगा।
#गली मोहल्ले में मेला लगा है।
# रात के पंछी अभी भी रात को 9 बजे के बाद निकल जाते है,बेरोकटोक। 
# कर्फ्यू पास चस्पा करके कितने तो मार्च से ही आंखों में धूल झोंक रहे है। 
# इतने ही केस आते जा रहे है,उतना ही लोग फ्री घूम रहे है। पार्क सेहत बनाने के लिए भरे जा रहे है। किसी को फिक्र नही।
# मौत का तांडव होने को है,लेकिन राजनीति अभी भी गर्म है। कोरोना कभी केजरी, कही मोदी कभी योगी, कभी उद्धव , कभी फलाना ढिमकना हो रहा है। 
# अफसोस  है , देश केअस्पताल में  1लाख पर 58 बेड 
बंगला देश 87 बेड
चीन         434
रूस          805
भारत कुल बेड 7 लाख 14000
ICU  35700 कुल सरकारी अस्पताल में।
इसमें किसी  पार्टी की सरकार नही ,सभी बराबर के जिम्मेदार है।सभी  पार्टी वर्णसंकर है, मतलब *कहीं की ईंट कहीं को रोड़ा भागमती ने कुनबा जोड़ा।*  कभी किसी ने  पार्टी और  संघटन द्वारा  स्वास्थ्य पर आंदोलन और चक्का जाम की बात सुनी है। इसमें सभी कसूरवार है। हम सोचते हीनही इस बारे में। 
# दुनियां में 10 लाख पर टेस्ट की स्थिति 
भारत         3462
USA          64335
स्पेन            95308
रूस            119793
ब्रिटेन           82299
 इटली           70063     
पेरू              36185
जर्मनी           51916
चीन के यूहान में एक दिन में 14 लाख जांच करवाई थी।
ये देश भारत से 20 गुणा अधिक टेस्ट करवा रहे है। अब खुद ही हिसाब लगा ले कि अगर 20 गुणा टेस्ट हम करते तो आज कितने पॉजिटिव केस हो सकते थे। कितनों की मौत हो सकती थी। 
# ये हमारी हकीकत है। ये किसी भी पार्टी की प्राथमिकता नही रही। अगर किसी पार्टी की सरकार ने काम नही किया तो दूसरी पार्टी ने कौन सा झंडा गाड़ दिया। कभी उपरोक्त बातों पर आंदोलन और चक्का जाम नही हुआ।
# देश में मेडिको इन्शुरन्स , सरकारी स्वास्थ्य कार्ड धारक बहुत कम होंगे। करीब 80% लोग भगवान भरोसे है। खुद ही नीम हकीम से इलाज़ करवाते है। सभी किस्म की दवा में मिलावट और स्टेरॉइड मिला कर देने वाले पिचास खूब मिलते है। अभी भी देश में  20  से 50  किलोमीटर से दूर डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल है,जहां पर भी इलाज़ की उम्मीद नही होती।  
# अब बताओ कोरोना से कैसे बचें । पहले दूसरे लॉक डाउन में पुलिस का  हूटर सुन दौड़ जाते थे। पिछवाड़ा सेक दिया मशहूर हुआ था। अब ऐसे निकलते है, जैसे कोरोना है ही नही। 
# बुरा न मानों बहुत से लोग केवल लठ के ही यार है। हम लोग मार्च से ही पॉकेट के गेट पर पहरा देते है। अभी तक लड़ाई का अंदेशा रहता है। हमारे यहां पर गेट पर ड्यूटी देने के लिए दो हमले भी हो गए। लेकिन अभी भी कुछ लोगों पर अंतर नही पड़ा। 
# खुद ही हम नही मानते कानून और जो बताया जाता है। आदत ही नही। 
# शराब की दुकान में भीड़ ने रिकॉर्ड तोड़ दिया ,ट्रैफिक जाम आम हो गया। 

# जब मरीज एक न था 
लक्षण रेखा खींची गई
अब मरीज चहुं ओर है
रोक टोक कछु न भई 
कैसा गड़बड़ झाला रे 
ये कैसा गड़बड़ झाला 
कोरोना ने कैसे भैय्या
सबको जाल में डाला
सबको जाल में डाला 
किस पर दोष मढ़े 
इस हमाम में भैय्या 
सभी औंधे पड़े ,औंधे पड़े। 
# इसलिए अपनी जान खुद ही बचाएं।
सावधानी हटी दुघर्टना घटी।
#अगर 15 लाख खींसे में है और किसी नेता के करीबी है ,तो भी बच के रहो,ये कोरोना है,जिसने अमेरिका चीन नही बख्शे , परमाणु बम भी इसका बाल बांका भी नही ,तो किसी को नही बख्शेगा। 
*ये हेकड़ी मूछों पर मरोड़ , सीना फुला के चलना, ऐंठ के घूरना सब धरा रह जायेगा। इसलिए सभी भेद भाव भूल कर साथ में आकर खुद बचो और औरों को बचाओं। ये ही मूल मंत्र है।जिंदा रहे तो भिड़ते रहेंगे,पूरा जीवन ,यहीं करते आ रहे है, सदियों से ,अब हो सकता है ,कुछ ऐंठन कम हो जाये ,कोरोना के कारण। ये तो देखना ही है।
विनीत
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल 
9810610400
13.6.2020

Saturday, 16 May 2020

लॉक डाउन और द्वारका पुलिस

*लॉक डाउन और द्वारका पुलिस*
22 तारीख से ही सुबह बीट वाले,श्री वीरेंद्र और कप्तान  की हूटर की आवाज एक आदत सी बन गई है। दिन भर कितनी बार बीट वाले  चक्कर लगाते रहे। माइक लेकर समझाते रहे कि  लोग कोरोना से बचे और घर पर रहे। डी एम श्री राहुल सिंह जी श्री अन्टो अल्फोन्स ,डीसीपी द्वारका पुलिस भी रह रह कर कोरोना संबंधी अपडेट देते रहते है। एक नया संबंध प्रशासन और जनता के बीच  उभर कर आया। पुलिस समेत द्वारका में जनता ने भी इस बारे में अच्छी पहल की।  इस्कॉन ,दिल्ली सरकार, छोटी सी खुशी, द्वारका फोरम, द्वारका फेडरेशन, अनहद ,ट्रेवल्स, आर एस एस , एक मुठ्ठी ट्रस्ट और द्वारका पुलिस के मनीष मधुकर डीसीपी आफिस के , डीसीपी श्री अन्टोअल्फोन्स अतिरिक्त अतिरिक्त डीसीपी श्री मीणा जी एसीपी श्री राजेन्द्र सिंह  ,एसीपी एवं सभी एस एच ओ राशन और खाना बांटने  में लगे रहे। इस सब के बीच एक  दिन राशन बांटने के संदर्भ में श्री संजय जी एस एच ओ द्वारका नार्थ ने अच्छी बात कही कि" राशन वितरण के लिए उतावलापन ठीक नही। कहाँ कितना देना है, किसको देना है, इसका भी ख्याल रखना है।" आरम्भ में भावना बलवती होती है। धीमे धीमे कुछ लोग ही रह जाते है। भोजन और सामग्री देने वाले। कुछ अलग भी होता हुआ ।  हमारी पॉकेट में एक बुजुर्ग महिला ने पीसीआर बुला ली कि उनके पास जो पंखा है,खराब हो गया। गर्मी बढ़ गई है , पंखा चाहिए। बीट के श्री कप्तान सिंह , लग गए मदद के लिए। यहाँ तक भी पुलिस ने मदद करने की कोशिश की। ये सब द्वारका में होता रहा। बुजुर्ग लोगों के यहां भी पुलिस गई। ये सब इसलिए कि हम लोग कोरोना से बचे। हमारी पॉकेट स्टूडियो अपार्टमेंट की RWA और रेडिडेंट्स ने सुबह 7 बजे से रात्रि 1 बजे तक गेट पर तन्मयता से ड्यूटी दी। इस दौरान बाहर से आने वालों से जूझते रहे। ये भी एक बड़ा कदम रहा। नेता भी लगे रहे। सबका नाम मैं जनता ,कोई भूल हो तो , क्षमा करें। ये सब द्वारका को सुरक्षित रखने के लिए।  वैसे BSES ,MCD को भी नही भूल सकते है।पॉकेट के गार्ड, सफाई वाले, फ़ूड सप्लाई वाले भी लगे है। डीसीपी और अन्य बड़े अधिकारी व्यक्तिगत रूप से भी लोगों से मिले ,ये भी होता रहा द्वारका के भीतर। खाना बांटने में छोटी सी खुशी का काम अलग रहा। श्रीमती नामिता  चौधरी बताया कि उन्होंने 50 वालंटियर चुने और सभी ने अपने खाने के साथ एक खाना अतिरिक्त बनवा लिए। प्रतिदिन गार्ड रूम से उनके वर्कर्स खाना लेकर उपयुक्त जगह खाना बांट आते थे। ये भी अलग प्रयोग रहा। श्रीमती माधुरी वर्षांय ने दिल्ली सरकार के माध्यम से राशन, खाना आदि बांटने में बहुत मेहनत कर रही।है।डीसीपी आफिस में कार्यरत श्री मनीष मधुकर जी जो द्वारका पुलिस द्वारा विभिन्न इवेंट्स करवाने में हमेशा दिख पड़ते है। द्वारका जिले बेस्ट सिक्योर्ड सोसाइटी, शतप्रतिशत वेरिफिकेशन , परख ऐप , कम्युनिटी पोलिसिंग में उनका रोल अहम रहा, कम्युनिटी पोलिसिंग व्हीकल, सामुदायिक कियोस्क सेक्टर 10 मार्किट, मेगा रन जैसे द्वारका पुलिस के विभिन्न कार्यो में  सबसे आगे दिखाई देते रहे। अभी कोरोना संकट में भी इन्होंने राशन एवं कम्युनिटी किचन में भी दिखाई पड़े। इन सब कामों में उनके ऊपर डीसीपी श्री अन्टो अल्फोन्स जी प्रोत्साहन रहा। श्रीमती सुधा सिन्हा ने भी डी एम श्री राहुल सिंह एवं डीसीपी द्वारका पुलिस से समय समय पर इंटरव्यू लेकर द्वारका की जनता को जागरूक किया। श्री राजेन्द सिंह एसीपी द्वारका रेसिडेंट्स के जबाव भी बखूबी देते रहे और उपयुक्त जानकारी भी देते रहे। इसके बीच श्री राज दत्त गहलोत उप महापौर अपने हाथ से विभिन्न कॉलोनियों को सैनिटाइज करते दिखे,ये भी नज़ारा अलग ही था। 
*विशेष* सबसे अधिक योगदान मेडिकल स्टाफ का रहा। जो सीधे ही इस संकट से जूझ रहे है। उन सबको तो सलाम करना ही है। लेकिन लोगों की अज्ञानता की बात जरूर करूँगा। हमारे पॉकेट में दो नर्स जो वेंटेश्वर हॉस्पिटल में है, उंनको क्वारंटाइन किया गया। कुछ लोगों को लगा। ये तो कोरोना पोसिटिव है। ये बहुत ही मूर्खतापूर्ण बात थी।हमने उंनको समझाया कि अपने मन से कुछ भी बात करनी ,हमेशा घातक परिणाम को जन्म देती है। मेरा खुद का HIV AIDS के लोगों के साथ काम करके अनुभव हुए। कुछ लोग मुझे भी बोल देते थे कि तू तो इनके साथ काम करता है, तुझे दूर रहना चाहिए। ये मुझे अभी अनुभव हुआ। अगर किसी के घर या पड़ोस में भी पॉजिटिव निकल जाए तो पैनिक नही होना। उसका सामना करना है। जो भी जानकारी और सावधानी है,उसके अनुसार ही करना है।वायरस केवल वायरस होता है, उसका धर्म, जात, क्षेत्र आदि कुछ नही होता। बस सबसे पहला और अंतिम सत्य है, उससे दूर रहना। अचरज की बात है, कुछ लोग इस बात को समझते ही नही, उंनको इस संकट में भी केवल अपने आनंद और इधर उधर जाने का उतावलापन होता है। उनका कहना है कि उंनको कुछ नही होगा। जबकि दिन रात WHO समेत सरकार प्रचार कर रही है कि किसी को संक्रमण हो जाये ,तो उसको क्षति न  भी हो लेकिन वो फैला सकता है। इसको आने ही नही देना है।  इस बात की गांठ मार लो। सावधानी हटी दुर्घटना घटी।
इस बीच एक अविश्वसनीय घटना पूरे विश्व में लोग देख रहे है। आजकल नीला आकाश इस बात का पुख्ता सबूत है कि पर्यावरण मूल रूप में स्वछ ही रहता है। ये हमारे विकास के गलत मॉडल का परिणाम है। साफ हवा का आनंद हम सब ले रहे है। बिना किसी आंदोलन और प्रोटेस्ट के भी सब कुछ स्वछ हो चुका है। पेड़ों के पत्ते भी साफ और चमकीले दीख पड़ते है।दूर तक साफ दिखाई पड़ रहा है। ये अद्भुत नजारा दशकों बाद देखने को रहा है। ये एक नया आयाम दुनियां को देगा और एक रिफरेन्स की तरह इसका इस्तेमाल करना होगा।
इस पोस्ट को 6 मई  को लिख लिया था। लेकिन पोस्ट आज कर रहा हूँ। आगे विस्तार से लिखूंगा।
रमेश मुमुक्षु
9810610400
16.5.2020

Sunday, 8 March 2020

होली मुबारक

(होली मुबारक )
2.3.2018 
यमुना मैली गंगा मैली 
मैली सबरी नदियां
मैले पोखर जोहड़ मैले
मैले होते सागर  सबरे 
मैला होता सागर तट
पिघल रहा हिमालय 
भैया पिघल रहे है 
दोनों पोल 
मैली कुचैली 
यमुना जल में 
 कैसे कान्हा खेले 
होली 
कैसे मारे भर पिचकारी 
काला काला पानी 
राधा है जाएगी कारी
कान्हा के रंग में डूबे बिना 
है जाएगी राधा कारी 
राधा है जाएगी कारी
रूठ गई राधा कान्हा से 
दूर रहो यमुना के तट 
से 
बदबू से भरी बयार बहे
कैसे जाए यमुना के पार
पहले कान्हा साफ करो 
द्वापर की यमुना को लाओ 
निर्मल जल शीशे सा दमके 
फिर खेलूंगी होली 
फिर से उठाओ अपनी उंगली
 सुदर्शन चक्र फिर से चलाओ
 यमुना गंगा स्वछ बनाओ
फिर खेलेंगे जल संग होली 
पिचकारी भर भर मारेंगे 
भिगो भिगो के खेले होली
नीले जल को देखे कान्हा
 बीत गया एक पूरा युग 
बहुत हुआ अब नही चलेगा 
ठान लिया मैंने मन में
नीले जल में खेलेंगे होली 
भिगो भिगो के खेले होली 
होली होली होली होली 
नीले रंग की आई होली 
यमुना गंगा झांक रही है
नभ को देखो निहार रही है
अब खेलेंगे होली कान्हा 
अब खेलेंगे होली ।
रमेश मुमुक्षु

मुझे होना है औरत

(विश्व महिला दिवस )
8.3.2018 
(मुझे होना है औरत)
हाँ वो घूरता है 
जिस्मखोरों की तरह 
आंख में उसके शैतानी 
झांकती है
बस हो गया अब घूरना और 
छेड़ने का सिलसिला औरतों 
का जिस्म 
किसी की जागीर नहीं 
उसका भी अपने पर पूरा 
हक है
मना करना उसको भी आता 
है 
लेकिन अब तक उसने 
केवल चुप्पी ही साधी
अब बहुत हुआ 
चुप चाप रहने की सजा 
अब नहीं सह सकेंगे
हम छुना चाहते है
आकाश को 
स्वयं और बेरोकटोक
नुक्कड़ पर खड़े 
होकर बात करने का 
मज़ा अब हम भी लेंगे
मन करेगा तो अकेले दूर तक 
चलने का 
तो चलेंगे 
अकेले 
डर ही रोकता है
मंजिल तक जाने को
ठिठक जाने का सिलसिला अब 
तोडना है
बिंदासपन और 
घूमने का मज़ा अब आएगा।
रात के चाँद का मज़ा 
लेना हमारा भी हक है
बालकनी पर खड़े रहने 
का मज़ा हम क्यों न लें
छत पर घूमने को तरसना 
अब नहीं होगा
चाय के नुक्कड़ पर
करेगे गप शप और 
राजनीति पर बहस
क्योंकि अब मर्ज़ी से 
डालेंगे वोट
ऐसा भी नहीं कि
हम औरत होना छोड़ 
दे लेकिन केवल औरत 
ही बने किसी की 
मोहताज़ नहीं
प्रेम से कोई बोल ले 
चल ले साथ
केवल साथ
सहज और स्वभाविक 
जो औरत को औरत
और मर्द को मर्द बनाता है
औरत को गुलाम और मर्द को 
मालिक बनाने का 
घेरा तोडना है
हाँ  तोडना है 
अपने चारों और 
का घेरा जो 
हमें गुलाम बनाता खुद का 
चलों अब खुली हवा में
घूम आये 
देख ले दुनिया का फेलाव 
और आगोश में भर ले
आज़ादी के पल 
जो केवल एक कदम दूर है
केवल एक कदम दूर
रमेश मुमुक्षु

Tuesday, 3 March 2020

संवाद को बचाना है । 3 मार्च 2017 फेसबुक की पोस्ट

(संवाद को बचाना है) 3 march 2017 facebook ki post.
पिछले  वर्षो से यकायक देश के  आम नागरिक  इतना अधिक सजग हो गया कि अब लोग ही सब फेंसले स्वयं ही कर लेने को आतुर है। युवा का गुस्सा जब किसी के द्वारा संचालित होता है तो वो कुछ भी कर गुजरने को आतुर होता है। ये आज तक दुनियां के सामने मजबूरी है कि सीमा , सेना  दुश्मन और सुरक्षा एक साथ रहते है। मानवता ने अभी भी एक साथ रहना पूरी तरह नहीं सीखा इसलिए अपने को बचाना और दुश्मन को मारने की दुधारू तलवार की नौक पर जीवन चल रहा है। पूरी मानवता इस न ख़त्म होने वाले मानव के संघर्ष को आज तक झेल रही है । आजतक सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध और उससे उपजी घृणा और संताप को मानव कभी नहीं भुला सका। लेकिन उसी वक्त बुद्ध की निर्मल बयार ने उस भयानक त्रासदी को लम्बे कालखंड के लिए शांति की धारा की और मोड़ दिया। दुनियां ने इतिहास में युद्धों का शोर और चीत्कार सुनी और आकाश के विस्तार में उनकों गुम होते देखा है। विश्व युद्ध की याद अभी भी लोगो के जहन में है ही। इन विश्व युद्धों में केवल मानवता की हार ही हुई थी। हिटलर का पागलपन लोगो को याद ही है   मानव मूल रूप से अपने अस्तित्व की रक्षा के प्रति सजग रहा है। लेकिन मानव ने अपने उद्विकास की यात्रा में एक साथ रहना भी सीखा लिया है।
मानव ने विभिन्न विचारों को सुनना भी सीख लिया है। जो मानव की बड़ी उपलब्धि है। लेकिन मानव में  समय समय पर विभिन्न विचारो के प्रति दुश्मनी का भाव आता रहता है। एक मानव की कमजोरी है की किसी एक बात से ही हम पुरे देश जाति और धर्म के दुश्मन बन सकते है। विगत में ऐसे उद्धरण हमारी यादों में है। इसलिए आदमी ने संवाद का आपस में बात करने का एक माध्यम बनाया। संवाद और किसी बात पर आपस में विरोध के बावजूद भी बात करना। इसी तरह विभिन्न संसथान मानव ने खड़े किये ताकि व्यक्तिगत रूप से निर्णय न लेकर संस्थान अपने नियम के अनुसार आगे बड़े। अभी एक लड़की ने अपने विचार व्यक्त किये चारों और ऐसा माहौल बन गया की कोई भी अपनी समझ में गलत सही है का निर्णय लेकर आम आदमी ही कुछ कर देने को तैयार है ।  देश में अफरातफरी का माहौल ऐसे ही बन जाता है। आज़ादी की इतनी गहन बहस की अचानक जरुरत आन पड़ी। अचानक हम केवल नेशनल और एंटी नेशनल में बंट गए लगते है। अभी जनरल रावत ने किसी सैनिक के द्वारा कोई शिकायत की बात पर सोशल मीडिया पर कुछ कहने पर रोक की बात कही वही गृह राज्य मंत्री की सैनिक का विडियो अपलोड कर देता है। उस लड़की को क्या क्या कहा दिया। अगर कोई भी कुछ कहता है तो उसके लिए हमने प्रावधान रखे है। उसके तहत कार्यवाही करें और बहस करें। 
इन बातों से देश कमजोर होता है। सबसे बड़ी बात है की हम लोग किसी भी घटना को कैसे समझ कर उसपर क्या प्रतिक्रिया दें, ये जरुरी बात है। हम अगर संवाद को ही ख़त्म कर देंगे तो क्या रहेगा शेष। अचरज का विषय है कि हमारी सोच और विवेक किसी एक विचार और घटना के आधार पर ही संचालित हो सकती है। हम सब जानते है , देश में वोट की राजनीति हमेशा ही रही है। बहुत कुछ हमेशा ही अच्छा हुआ हो ऐसा भी नहीं। लेकिन ये सब उद्विकास की प्रक्रिया है। ऐसा हमेशा ही होगा। लेकिन संवादहीनता किसी भी काल के लिए सबसे खतरनाक स्थिति हो सकती है। इससे ही देश को बचाना है। भावना भड़काना मानव की कमजोरी है  किसी एक बात को इतना ऊँचा ले जाया सकता है की आपस में संवाद हीनता की स्थिति पैदा हो जाये।
सारे मुद्दे कही छिप जाते है। हालाँकि हमारे देश में लोकतंत्र की ताकत है ही। हम सबका फर्ज है की संवाद को खत्म करने के किसी भी प्रयास का विरोध करें। अपनी बात रखे। उस लडकी को जिसने भी नुक्सान पहुचानें की बात कही उसका विरोध करना हम सबका फ़र्ज़ है। बात होने दो। केवल प्रचार और सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से ऐसा माहौल न बन जाये जिससे आपस में ही संवादहीनता पैदा हो जाये। देश केवल सेना से ही सुरक्षित नहीं होता । वो सुरक्षित होता है संवाद और आपसदारी से । विभिन्न विचार को स्वीकार करके आगे जाने में। देश  द्रोह की परिभाषा सड़कों पर तय मत होने दो। वर्ना मौका परस्त ऐसी परिस्तिथियों से लाभ उठा सकते है। ऐसा एक बार नहीं बार बार हुआ है।
किसी भी देश की ताकत उसका संवाद ही है। देश इतना कमजोर नहीं है कि हम संवाद को ही ख़त्म करने को अमादा हो जाये। 
नफरत को दिमाग में हावी मत होने दो। नफरत आदमी को स्वयं ही नष्ट कर सकती है। आदमी ने इतिहास में कितनी बार इस घृणा और नफरत से मानवता का नुक्सान किया है । ऐसा करने से पहले हमेशा संवाद को रोकने का प्रयास किया गया है। 
बाकी देश मजबूत संवाद से बनता है। ये आदमी ने अपनी लम्बी यात्रा में सीखा है। 
रमेश मुमुक्षु