भारत माता की जय का सत्य
बच्चा जीवन भर माँ के अंचल में अपने को सुरक्षित पाता है। वो माँ से खेलता भी है, कभी नाराज़ भी होता है, उसको माँ को जय माँ की जय नहीं बोलना पड़ता क्योंकि वो तो माँ की गोद में ही है। यकायक भारत माता की जय की बात ऐसी लग रही है कि जैसे लोग अचानक नींद से जागे और कुछ भूला याद आगया। जैसे माँ को 24 घंटे जय नहीं करना पड़ता क्योंकि उसके अंचल में ही तो है सब। बल्कि जो दूर रहता है, उसको बार बार याद करना होता ही। आदमी ने भारत माता की याद न की होती तो देश के कभी के टुकड़े हो जाते। याद उसे करते है ,जिसे भूले हो। कैसे माँ का ख्याल किया जाता है, माँ की सेहत, उसके कपडे लत्ते, उसका ख्याल । ठीक ऐसे ही भारत माता का ख्याल करो। भारत माता का शरीर पूरा देश है। नदी, नाले, सागर पहाड़, हिमालय और जल , जंगल जमीन। कभी सोचा है , हमने अपनी माता के पवित्र शरीर के साथ कितना अन्याय किया है। उसका निर्ममता से दोहन किया है। उसकी धमनियों को जो नदी के रूप में है, गन्दा किया है।माँ भी बच्चे को स्तन में दूध न होने पर प्रेम से हटा देती है। पहला निवाला बच्चे को देती है। बच्चा शैतानी करे तो भी वो उसको दुलार करती है। क्या हमने माँ का सम्मान किया है और कर रहे है। माँ तो अपने शरीर और मन को बच्चे के लिए हमेशा न्योछावर करती है। लेकिन हमने उसके प्रेम और दुलार को कभी सम्मानित नहीं किया। उसको दुखी करके उसकी जय जय करना क्या उसके दुःख और पीड़ा को भर पायेगा , जो उसके बच्चों ने दी है। माँ छोटी छोटी बातें कहती और समझती है ताकि बच्चा सेहत मंद हो। जब उसको लगता ही कि अब बालक को दूध नहीं कुछ ठोस देना है, वो दूध भी छुड़वा देती है। ठीक वैसे ही देश की माँ रूपी शरीर के प्रति वहां के नागरिक का कर्तव्य है कि देश के कानून और नियमो का पालन करे ताकि भारत माता का शरीर सेहत मंद और खुश रहे। इतना कुछ , दोहन के बाद भी वो ममता में चूर बच्चे को आशीर्वाद ही देती है। इसलिए उसकी जयकरने से पहले उसका सम्मान और उसकी ममता का गाला न घोटो उसका ख्याल करो । उसको जयकार नहीं प्रेम की आस होती है, वो अपने बालक से दो मीठे शब्द सुनना चाहती है।क्या हम ऐसा कर पा रहे है? ये हम सब को सोचना है इसलिए देश के संविधान, जल , जंगल , जमीन और सभी नागरिको का आपस में ख्याल करे और कानून का पालन करे ताकि माँ की गोद भी सुरक्षित रहे ताकि उसकी गोद में हम सब सुरक्षित रहे। उसे उसकी जय कार से नहीं , दो शब्द प्रेम के बोलने है। क्या हम दो शब्द प्रेम के बोल पा रहे है? ये हम सब को सोचना है। भारत माता की जय, जननी जन्म भूमि की जय, वंदे मातम , सलाम , नमस्ते , राम राम ,हेल्लो हुड मॉर्निंग क्या अंतर है। अगर हम माँ की सेवा और प्रेमो के दो शब्द बोल गए , इतना ही चाहिये माँ को।
रमेश मुमुक्षु
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Tuesday, 20 March 2018
भारत माता की जय का सत्य (पुराना लेख)
(गांय की आत्मकथा डाबड़ी के कूड़ेदान से)
(गांय की आत्मकथा डाबड़ी के कूड़ेदान से)
हम निरीह प्राणी
डाबड़ी का कूड़ा दान
ही
लगता है
हमारा
भाग्य बन चुका है
धूप हो या कोई भी
मौसम
कूड़े से खाना ढूंढना
और कूड़ा ही खाना
बन चुकी हमारी
नियति
वैसे ये नया नही
दशकों से होता आया
है
पॉलिथीन में बंधा
बदबूदार कूड़ा
खाना
कितनी बार कोई
पैनी चीज़ और ब्लेड
भी आ
जाता है
अनाज और घास की खुशबू
हम भूल चुके है
कितनी बात तो सड़ा हुआ
मांस
भी आ जाता है
और न जाने क्या क्या
ये आदमी विचित्र है
कितनी बार ले आता ही
पूरी और घी लगी रोटी
खिला कर फ़ोन
करेगा कि मिल गई गांय
फिर चला जाएगा
हमारी बुजुर्ग गायें बताती थी
खेतों और गांव की कथाएँ
हरा चारा खाना
खूब मचलाना और घास के
बड़े मैदान पर
घूमकर चरना
ये सब अब ख्याब बन गया
है
सुना है गौशाला बन गई
लेकिन हमारा भाग्य कहाँ
हमें तो डाबड़ी के कूड़े दान में
ही रह कर पेट पालना है
शाम को हमारा पालने वाला आता है
हमारे सूखे थनों से दूध
निकाल लेता है
शरीर में नही ताकत तो क्या
निकले है दूध
ये मानव नही समझता
हमे तो
खेत खलियान ही
भाता है
सूखा चारा घास खली और हरे चारे
के साथ
खेतों और घास के चारागाह
जहा हम पूरे
दिन उछलते कूदते
खाते पीते लौट आते थे
किसान नहलाता
कितना अच्छा लगता
था
कभी पानी
कभी चारा
चलता रहता था
लेकिन अभी
सब कहीं खो गया
बुजुर्ग बताते थे
हमें आवाज़ से डर लगता था
लेकिन हमारा जीवन तो डाबड़ी के कूड़े दान पर ही चलता
है
जहां पर चारो और गाड़ी ही गाड़ी
शोर ही शोर
रोज कुछ बच्चे भी आते
है
जो कूड़ा बीनते है
छोटे छोटे मैले कुचले बालक
फूल से बालक
दिल रोता है
जब वो किसी कूड़े से उठा कर खा लेते है
दुबले पतले कांतिहीन चेहरे
कूड़ा ही इनका जीवन
बन चुका है
कितना झगड़ जाते है
कुछ टूटा फूटा मिल जाता
है
कूड़ा बीनते बीनते
कितनी बार
लोग कहते है कि
गांय तो अभी पूरी भी नही
खाती
ओ अनजान मानव
जिसकी नियति कूड़ा ही हो
वो क्या जाने
पूरी हलवा
हमें कुछ नही चाहिए
बस खेत गांव
लौटा दो
हीरा मोती
दुलारी
कदली
सोनी
जैसे नाम होते थे
गले में घुंघरू
माथे पर तिलक
किसान कितना सहलाता था
अब तो मैले कुचैले बच्चे हमारे बछड़ो को
पीट देते है
हमेशा गाली ही देता है
दिन ढलता है
रात आती है
लेकिन भाग्य नही बदलता
डाबड़ी के कूड़ेदान
पर ही लगता है
जीवन थम गया
बदबू और पॉलीथिन तक ही जीवन सिमट गया
आंतों में अटक कितनी हमारी
बहनें मर जाती है
कहते है
हम पालतू है
लेकिन नही ये सच नही
हमारा भाग्य तो डाबड़ी के कूड़े दान पर ही
कट जाएगा
लो आ गए मैले कुचैले बालक
कचरे का बदबूदार बोरा
छोटी सी पीठ पर लटकाए
ठीक हमारी तरह डाबड़ी के
कूड़ेदान में कूड़ा बीनेंगे और
गली गलौज
कर किसी कूड़े में से निकली बोतल से कुछ पी लेंगे
कभी इनके हाथ सन जाएंगे किसी डायपर से
कभी हाथ कट जाएंगे
फिर वही कूड़े दान
के पास
ये
सिगरेट की चांदनी के
ऊपर रख
जला कर कुछ सूंघेंगे और
झूम उठेंगे
सच डाबड़ी के कूड़े दान
और हम सब
गांय ये सब देखते रहते है
एक कचरे की दुनियां
बदबू से भरी
हमारे भाग्य मे बधी
हमारा घर डाबड़ी का
कूड़े दान .....
रमेश मुमुक्षु
Sunday, 18 March 2018
स्टीफेन हॉकिन्स को समर्पित
💐स्टीफन हॉकिन्स को
समर्पित💐
(यात्रा ब्लैक होल तक)
बचपन से मुझे ब्रह्मांड में
दूर एक बिंदु दिखता था
जो
मुझे लगता था
कि
निगल जाएगा
कायनात को
जो एक ही बिंदु
में सिमट रहा है
मुझे डरा देता था
किसी बात को समझना
मेरे लिए
कठिन ही था
और
किसी की बात को मैं समझा
नही पाता था
मेरे संगी साथी मुझे दिखते ही नही थे
दिन रात बह्मांड , गुरुत्वाकर्षण, मेग्नेटिक आकर्षण और नाभिकीय बिंदु
मुझे
चैन से बैठने नही देते थे
जब मैं सुनता ईश्वर एक है तो मुझे
लगता की
अनेक
क्या हुआ
क्यों
एक
अधिक बड़ा होता है
एक और अनेक मेरे मस्तिष्क को जैसे
फोड़ ही देंगे
मेरा सिर फोड़ने का मन होता
मेरे साथी खेल में खुश रहते
मुझे खेलना ही नही आता था
बस पूरी
कायनात
मुझे अपनी ओर खींचती लगती
उम्र बड़ी मैंने आइंस्टीन को पढ़ा
तो मुझे लगा की
मैं ही अकेला
नही
सिर फोड़ने वाले मुझे से पहले भी रहे है
मुझे एक और डर सताता रहता
कोई मुझे मार देगा
परन्तु मुझे जीने की बहुत गहरी इच्छा थी
मुझे उस बिंदु को खोजना था
जो मुझे तंग किये था
यकायक मुझे लगने लगा
मेरा सारा शरीर मुझसे
कही छूट रहा है
मैं शरीर को थाम नही पा रहा हूँ
अपनी बीमारी सुन मुझे मौत का अहसास
हमेशा ही रहा
लेकिन मेरे दिमाग में
उथल पुथल
जारी थी
मस्तिष्क के भीतर
भी
एक ब्रह्मांड है
अरबों न्यूरॉन की चक्कर
लगाती
दुनिया जो एक दूसरे
को संदेश देते है
बिग बैंग और ब्लैक होल
मुझे
दिन रात घुमाते
मुझे लगता कैसे हुई ब्रह्मांड की उत्पत्ति
क्या था वो महाविस्फोट
हबल का रेड शिफ्ट कही
रुकेगा
कोई होगा
स्पेस लिमिट का कोई बिंदु
अल्बर्ट आइंस्टीन के प्रकाश की यात्रा का कही अंत होगा
प्रकाश से तेज कुछ चलेगा
क्या हम फैल रहे है
या
किसी बिंदु में सिमटने के लिए फैल है
क्या हमारा ईश्वर इसको संचालित कर रहा है
क्या ये सतत चलने वाला
खेल है
क्यों आइंस्टीन नही मानते थे
कि
कुछ भी केवल बाहर ही छिटक सकता है विस्फोट के बाद
अगर ऐसा ही होता तो
बिग बैंग क्यों होता
महाविस्फोट से पूर्व क्या था
चंद्रशेखर लिमिट के आगे
काले धब्बे ही होंगे
महाशून्य
निपट काला
मुझे ताज्जुब हुआ
कि उस महाशून्य में प्रकाश भी समा जाता है
मैं ओर भी घबरा जाता
यूरेका यूरेका कहने का मन होता
लेकिन मेरा शरीर जैसे केवल मेरे मस्तिष्क को रखने के लिए
ही बना था
ब्लैक हाल के करीब
में जितना जाता उतना ही
मुझे आदमी ही हेंकड़ी पर तरस आता
आदमी मुझे केवल एक चूहे सा लगता
जो गड्डा खोद कर रहने के लिए स्पेस बनाता है
लेकिन मिट्टी से एक छोटा पहाड़ बना देता है
पहाड़ खोदता है तो गड्डा बना डालता है
एक दिन ये सिलसिला रुकेगा
क्या मैं थ्योरी ऑफ एवरीथिंग का सूत्र खोज सकूँगा
मानव एक यात्रा पथ पर
है
मानव कछुए की पीठ
पर सवार
पृथ्वी से बहुत आगे निकल गया है
क्या एक ही महाशून्य होगा कि अनगिनत
तारे की मौत क्योंकर होती है
सूर्य का भी अंत होगा
तारे की मौत उसके कोर का ठंडा होना होता है
घनत्व का अंतहीन बढ़ना ब्लैक होल की शर्त है
सब कुछ इतनी तेजी से
भीतर और भीतर
सघनता से एक बिंदु में समाहित होना
किसी
महाविस्फोट की पूर्व स्थिति ही तो है
थ्योरी ऑफ एवरीथिंग ही समझा सकती है
ब्रह्मांड की उत्पत्ति के राज
मानव की ताकत
उसके गोले की और आने
और टकराने वाले
उल्का पिंड से अधिक नही है
क्या होगा पृथ्वी का अंत
क्या छोड़ना होगा इस गोले को
क्या होगा ऐसा कोई गोला जहां जीवन होगा
क्या ब्रह्मांड की उत्पत्ति का रहस्य जान सकेगा
मानव
नैनो तकनीक से खोज सकेंगे
इन उलझे सवाल
पृथ्वी को अगर हम संभाल नही सकें
तो बढ़ता तापमान मानव का अंत कर देगा
ये तय है
क्या महाविस्फोट से बड़ा है
हमारा एटम बम
पृथ्वी को मानव अपने हाथ से खत्म करने को तुला है
घर तो बदल सकेंगे
लेकिन क्या बदल सकेंगे
अपनी पृथ्वी को
जी सकेंगे
किसी और ग्रह और तारे पर
मानव की सारी खोज
और
विकास का एक ही सूत्र है
गड्डा खोद कर वो पहाड़ बनाता है
और पहाड़ खोद कर गड्डा बनाता है
अब तय करना है
पृथ्वी पर रहना है
कि
कहीं अंतहीन ब्रह्मण्ड के किसी गोले पर जाना है
फिर ब्लैक होल मुझे घूर रहा है
अपने भीतर समाने को
इतना भीतर की
प्रकाश भी घनत्व में
लोप हो जाएगा
आदमी की हेंकड़ी और उसकी ताकत सूक्ष्म अति सूक्ष्म ब्लैक होल के सामने नगण्य है
या है ही नही
इसलिए चूहा बनना है
कि
कायनात की चाल
के साथ
उसके संगीत
रिदम का आनंद लेना
है
अभी महाविस्फोट से
उत्पन्न लहर की खोज
भी मानव को करनी है
लेकिन ये चूहे के
विकास से नही होगा
पृथ्वी के संसाधन स्वच्छ
और
निर्मल है
सतत है
निरंतर है
इसकी चाल के साथ
ही दूर तक
यात्रा संभव है
महाविस्फोट
से पहले
ब्लैक होल में
अस्तित्व
हीन होने से पहले
ये तय है
ये सोचना ही होगा .....
रमेश मुमुक्षु
Thursday, 1 March 2018
भारत में पर्यावरण की बदहाली
(भारत में पर्यावरण की बदहाली )
भारत विश्व पर्यावरण परफॉरमेंस में 180 राष्ट्रों में 177 वे स्थान पर लुढ़का , केवल बंगला देश और दो छोटे देश ही भारत से नीचे है। पाकिस्तान , नेपाल और श्रीलंका भी भारत से ऊपर के पायदान पर टिके है। चीन तो बहुत ही ऊपर है।
इतना नीचे होने की जिम्मेदारी केवल किसी सरकार की अकेली नही हो सकती। इसके लिए पूरा देश ही जिम्मेदार है ।
भारत महान देश है, इसका इतिहास गौरवपूर्ण था, भारत विश्व गुरु था और रहेगा , गंगा की एक बूंद मरते हुए व्यक्ति का तर्पण कर देती है, यमुना किनारे कृष्ण और गोपियों के रास भारत के इतिहास गौरव है, गीता समस्त ज्ञान का एक मात्र अंतिम ग्रन्थ है, वेदों में विश्व का सम्पूर्ण ज्ञान निहित है। शांति मंत्र पढ़ते पढ़ते युग बीत गए । भारत ने ही पूरे विश्व को ज्ञान दिया ।
भारत में गंदगी को देख घृणा होती है। गंदा उठाने वाले भी तय कर दिए। सफाई की पराकाष्ठा वाले विश्वगुरु देश में आदमी की परछाई से भी हम अस्पृश्य हो जाते थे । छुआछूत ये ऊंचा वो नीचा हमारी विशेषता है।
एक दूसरे पर दोषारोपण करना हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। पर निंदा और अपने मुंह मिट्ठू बनने में हम माहिर है। कोई 70 साल का , कोई 1000 साल का , कोई जाति का , कोई धर्म का , कोई अंग्रेज़ का, सबसे बड़ा पश्चिमी सभ्यता का । अपने को ऐसा दिखाना की सब कुछ हमसे निकला है। इन सब पर मैं टिप्पणी नही करूँगा।
इन सब का कुल जोड़ है कि भारत के पर्यावरण की बदहाली दुनिया में 180 देशों की सूची में 177 नंबर पर है। शुक्र है बांग्लादेश हम से नीचे है। पाकिस्तान और नेपाल भी हम से ऊपर है। चीन तो बहुत ही ऊपर है।
ये सरकारों का नही ,क्योंकि सरकार हमारी होती है और हमसे होती है। हम लोग कानून तोड़ने के मास्टर है। कब्जा करना, अवैध निर्माण, अवैध माइनिंग, कहीं भी आग लगा देते है। उद्योग धंधों में निकलने वाले कचरे का कोई पुख्ता इंतजाम हमने नही किया। घुस और ले देकर कर लो हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। इसमें पूरा देश जिम्मेदार होता है। ईमानदार की कद्र नही। आज ध्यान से देखने पर कड़वी सच्चाई सामने आती है कि समाज में ईमानदार लोगों की हालत ठीक नही। उनको आदर्श के रूप में नही देखा जाता। ये बात अपने आस पास ध्यान से देखो। जो लोग ले दे कर की संस्कृति पर विश्वास करते है , उनकी सेटिंग ऐसी होती है कि उनको पूरा सिस्टम सलाम करता है। दिल से न भी करे, लेकिन दिखावे में सही। मैं नही कहता कि अपने ईमानदारी के जज्बे को बदलो , क्योंकि ईमानदारी जज्बा है जो सिर उठा कर जीना सिखाता है। लेकिन कानून तोड़ने वाले पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर देते है। इसका प्रभाव बुरा होता है। हम केवल मौके का लाभ उठाते है। कानून को ले दे कर चलाने में विश्वास करते है तो सब कुछ कभी ठीक नही चल सकता। कहीं मकान बना लो , कैसा भी निर्माण कर लो। निकासी हो ,या न हो , बस कर लो देख लेंगे। ये हम सबका स्वभाव बन गया । चूंकि एक बड़ी जनसंख्या ऐसा सोचती और करती है ,तो व्यवस्था कहाँ से पनप सकती है।
इन सब के कारण हम दुनियां में इतने नीचे का पायदान पर है। अभी भी कोई अगर छाती पीटता है तो बहस का मुद्दा नही , यमुना किनारे खड़े हो कर यमुना को निहार ले । ऋषिकेश के वानप्रस्थ आश्रम जो राम झूला में स्थित है, उंसके बगल में एक नाला बहता है, जो पवित्र नदी ,जो कैलाश की जटाओं से निकलती है, मिल जाता है। कुछ दूर ही शाम को आरती भी होती है।
बस ऐसा ही सब और है। दिल्ली को हो ले , दिल्ली के पास अपना कोई पानी नही है। लेकिन निर्माण पर जोर है। दिल्ली में ऊर्जा की खपत पड़ती जा रही है। इसका दुष्प्रभाव हिमालय और उसकी नदियों पर ही पड़ेगा।
अभी वर्षों से बर्फ पानी कम होता जा रहा हैं , इस वर्ष तो ऊँचाई वाले क्षेत्र बिना बर्फ रह गए। लेकिन कोई चर्चा नही। जिनके पास मोटा जुगाड़ वो तो हजारों रुपए देकर पानी भी पी लेते है। फ़ोन किया पानी हाज़िर। ये लोग शुद्ध खाना भी लेते है।
लेकिन एक आम आदमी खतरनाक केमिकल का सेवन कर रहा है। मिलावट भी हमारा राष्ट्रीय चरित्र बनाता आया है।
नेता और बुद्धिजीवी उल्टे सीधे आंकड़े देकर कुछ भी कहते है। लोग जिस बात से खुश वो ही कहेंगे।
नदी साफ नदी से ही नही होती अपितु पूरी कचरा निस्तारण की पुख्ता व्यवस्था से ही होती । अपने आस पास नज़र घुमा कर स्वयं ही अवलोकन कर ले ,हकीकत सामने आ जायेगी। देश की नदी की सफाई उस देश की सच्चाई स्वयं बोलती है। दिल्ली में यमुना एक गंदे नाले के रूप में बह रही है। साफ हवा केवल ईमानदार व्यवस्था से ही संभव है। सतत और सबको एक सूत में पिरो कर ही विकास आगे बढ़ेगा तो ही हमारा स्थान ऊंचा होगा , नही तो बांग्लादेश से भी नीचे लुढक सकते है, वो दिन दूर नही । देश भाषण , दुष्प्रचार , भ्रामक आंकड़ों, दोषारोपण से नही साफ होगा। इस मिशन में कानून की स्थापना से शुरुवात करनी है। अगर कानून कब्जे को गैरकानूनी कहता है , तो इसका पालन होना ही चाहिए। ये एक बिंदु है , इसके अतिरिक्त कितनी चीज़े है , जिनके कारण देश गंदगी और वायु प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित है।
उपरोक्त बातों में कोई गलत नही है , ये सब सच्ची बात है। बस इनकी और फोकस करने मात्र से शुरुवात हो सकेगी। प्राकृतिक संसाधन संरक्षित रहे , केवल इस मिशन से ही देश आगे बढ़ सकता है। नदी और सभी स्रोत साफ और स्वच्छ रहे , ये राष्टीय मिशन होना चाहिए। जब कोई हमारा बड़बोलापन सुनकर यमुना और अन्य नदियों को देखता होगा , तो कथनी और करनी सामने आ जाती है। इस गैप को ही दूर करने का सबसे पहले मिशन लेकर आगे बढ़ना ही।
अगर देश को साफ रखना है तो।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
Friday, 23 February 2018
सतत विकास या तुरत विकास : अविलंब निर्णय करना ही होगा
(सतत विकास या तुरत विकास :अविलंब निर्णय करना ही होगा।)
देश में नीरव मोदी प्रकरण पर हो हल्ला मचा है। सभी और इसी की चर्चा है। ये कुछ दिन रहेगा और फिर जल्दी ही मीडिया से आउट हो जाएगा।
फिर कोई और खबर पर देश आंदोलित हो जाएगा।
लेकिन इस वर्ष जिस बात को खबर बनाना चाहिए ,उस पर बात भी नही हुई। हिमालय क्षेत्र में इस साल दिसंबर और जनवरी में बर्फ और वर्षा नही हो सकी। दिसंबर से अभी हाल के महीनों में जंगल में आग लगी थी। बर्फ और वर्षा का न होना और सर्दी के मौसम में राष्ट्रीय चेतावनी की खबर बननी थी। हिमालय में बर्फ और वर्षा कोई बड़ी खबर नही बनी। प्रधानमंत्री को कहना चाहिए था कि ये एक अलार्म है भविष्य में पर्यावरण पर घोर संकट का। लेकिन ये ब्रेकिंग न्यूज़ नही। इसका एक कारण है कि कौन कहता है ,पानी की कमी है। दो कदम उतरो और पानी खरीद लो। फ़ोन किया पानी हाज़िर । जल ,जंगल और जमीन के प्रति हमारे दिल में कोई संवेदना नही है। हादसा खबर है , अभी कोई बादल फट जाए और नुकसान हो जाये , तो खबर है। लेकिन किसी आपदा में खेत खलियान और पेड़ जैसे उत्तराखंड के चुखटिया विकास खंड के बसरखेत में 2013 में खेत, अखरोट के 150 से अधिक पेड़ों का बहना , कोई खबर नही।
बर्फ और वर्षा का का न होना कोई खबर नही। लोकल स्तर पर तो खबर होती ही है। लेकिन प्रधानमंत्री और पर्यावरण मंत्री की और से एक चेतावनी की बात तो होनी ही थी। लेकिन वो नही हुई।
हर्षद मेहता , केतन पारिख, जिग्नेश शाह, तेलगी अब नीरव मोदी आएंगे । खबर की सुर्खी बनेगी । आम आदमी इनके नाम से एक दूसरे से बिना बात उलझेंगे। फिर नई खबर होगी।
अभी न्यूज़ थी कि हिमालय क्षेत्रों विशेषकर उत्तराखंड में बड़े भूकम्भ की संभावना है। लेकिन इस पर चर्चा नही। अभी चारधाम पर पेड़ों का कत्लेआम हो रहा है। कोई खबर नही। भैरों घाटी में भी देवदार के बेशकीमती वृक्ष काटे जा रहे है। पर्यावरण पर इसका क्या प्रभाव होगा ? इस पर सरकार की और से कोई खबर नही
आदमी का पूरा जीवन तीन चीज़ो पर निभर है, जल जंगल और जमीन । स्वछ जल , स्वछ हवा पर संकट है , इस पर कोई देश में सरकार की और से चिंता नही।कितने लोग है ,जो पानी पीते है ओर उनके मन में उस पानी के स्रोत को बचाने की चिंता यकायक होती होगी।
ये सब नेचुरल साईकल है। लेकिन आदमी के विकास से इस पर क्या प्रभाव पड़ा , इस पर तो राष्ट्रीय स्तर की चिंता होनी चाहिए। पेड़ लगाना एक विकल्प है, लेकिन पेड़ो को बचाना भी उससे अधिक जरूरी है। उच्च हिमालय में मानवीय गतिविधि पर शिकंजा कसना ही होगा। बुग्याल , ग्लेशियर और बांज, देवदार जैसे बेश कीमती वनों को बचाना जरूरी है। हिमालय बचाना केवल हिमालय के लोगो की चिंता नही होनी चाहिए। ये पूरे देश को ही सोचना होगा। पर्यावरण एक चिंता का विषय होना ही चाहिए। चारधाम से यात्रा से अधिक जरूरी है ,पर्यावरण संरक्षण। जिसको लगे वो पैदल भी जा सकता है। लेकिन धार्मिक स्थल पर घूमने की इच्छा है ताकि मरने से पूर्व दर्शन हो जाये। इस अपने स्वार्थ ने ही पहाड़ तोड़ डाले। हेलीकॉटर पर बैठ दर्शन करने की लालसा नीरव, शांत और घने जंगल में रह रहे खगचर की कौन सोचे।
बिजली और पानी खूब खर्च करो ,क्या अंतर पड़ता है। हिमालय की किस को पड़ी। जरूरत हुई तो कितने ही पंचेश्वर बना सकते है। अब तो राजनीति ने लोगो को दो हिस्सों में बांट दिया। विकास के नाम पर स्वयं ही उलझे है और दूसरी और विकास मज़े से विनाश के पौधे लगा रहा है। कितनी बड़ी विडंबना है कि विकास विनाश की खेती कर रहा है और हम विकास की शराब में डूबे मदमस्त अपनी जड़ों को स्वयं ही काटते देख जिंदाबाद करने में तल्लीन है।
पर्यावरण संरक्षण से बड़ा की मुद्दा नही हो सकता। जल जंगल और जमीन है तो धार्मिक स्थल, ईमानदारी , बेईमानी , नेतागिरी, घोड़ा गाड़ी , सब चलेगा । लेकिन अगर जल जंगल और जमीन पर संकट हुआ तो क्या उपरोक्त तमाशा रहेगा ? ये गंभीर सोच का विषय है। विकास की शराब नही विकास का जल ग्रहण करो जो हमारे भीतर उतर शीतलता प्रदान करे न की नशा और उन्माद से कुत्ते की तरह जो हड्डी चबाता है और उसके स्वयं के मसूड़ों से खून को चाट कर उल्लास करता है।
हिमालय और समस्त भारत के प्राकृतिक स्रोतों का संरक्षण ही एक मात्र मिशन होना चाहिए। एक बात कभी नही भूलनी चाहिए। ये है तो दकियानूसी लेकिन इसमें सार तो है ही। अगर जल और स्वच्छ हवा मिले एक शर्त पर की विकास को तिरोहित करना होगा । क्या ये स्वीकार है? अधिकांश इसको बेवकूफी ही समझेंगे। इसको ऐसे समझो कि जब आदमी के पास धन अधिक हो जाता है तो वो क्या करता है। सबकी इच्छा होती है कहीं दूर एक घर या फार्म हो ताकि शुद्ध हवा और पानी का आनंद आ सके। छोटा सा खेत हो और जैविक कृषि हो।
मुझे लगता है , मेरी दकियानूसी बात के ये एक सटीक उत्तर है।
सब कुछ रहे लेकिन सतत विकास के साथ जो स्थाई और टिकाऊ है। सतत विकास शराब नही पानी पीता है। ये विकास धरती की छाती को फोड़ कर तबाही नही करता। ये सोच समझ कर आगे बढ़ता है। ये उच्च हिमालय को बिल्कुल छेड़ना भी नही चाहता। लेकिन मदिरा से मस्त विकास हिमालय को भी नेस्तनाबूद करने में हिचकी भी नही लगा।
अब निर्णय करना है कि सतत विकास की तुरत विकास। सतत विकास जल जंगल जमीन के बगल से धीमे धीमे आगे बढ़ेगा ताकि हैमिंग बर्ड भी विचलित न हो। तुरत विकास हाथी को भी एक और धकेल आगे बढेगा , ताबड़तोड़ बिना कुछ सोचे। सतत विकास आंखों को पूरी तरह खोले चारों और देख आगे बढेगा। लेकिन तुरत विकास आंखों में पट्टी बंधे बिना देखे तेजी से आगे बढ़ेगा। सतत विकास चिरस्थाई और टिकाऊ है। जबकि तुरत विकास क्षणभंगुर और अस्थाई है। सतत विकास में लय है , तुरत विकास में केवल शोर है बिना किसी लय के। सतत विकास सबके साथ हाथ मिलाकर और छू कर हंसता खेलता चलता है। तुरत विकास इसको पटक उसको हटा सबको दबाते और दबाता हुआ दिशाहीन दौड़ता है ।
कभी हिमालय सहित सभी खेतों को ध्यान से अवलोकन करो एक लय दिख पड़ेगी। रहट से पानी संगीत सा लगता था। बेलों के गले में घुंगरू आनंद देते थे।इन्ही से प्रेरित होकर विकास को चलाना था। इनको खत्म करके नही ,इनके साथ ही चलना था। इनको हटाना और खदेड़ना नही था ,बल्कि इनके स्थान को ग्रहण करना था। सतत विकास धीमे धीमे सबके साथ चलता है। तुरत विकास अकेला घमंड से सीना फुला कर धीमे नही तेजी से चलता है और भागता है। सतत विकास रात में विश्राम करता है, जबकि तुरत विकास रात दिन शोर और तोड़ फोड़ करता है । सतत विकास का लंबा इतिहास है। इसका उद्विकास दीर्घकालीन प्रक्रिया से हुआ है। तुरत विकास का इतिहास 150 वर्ष मान लो। इतने और इससे कम अरसे में ही सदियों से चली आरही प्रकृति की लय को बिगाड़ दिया।
अब निर्णय आसान होगा सतत विकास और तुरत विकास में। एक पल रुक कर सोचा ही जा सकता है क्योंकि सतत विकास की यात्रा अनन्त है , जबकि तुरत विकास की यात्रा का अंत उंसके साथ ही चलता है। सतत विकास का भी अंत होगा लेकिन एक नवसृजन के साथ । लेकिन तुरत विकास नवसृजन की संभावना को भी कुचल देगा।
अब निर्णय की घड़ी आ गई । अब तो चेतना ही होगा तुरत तुरत की जगह सतत को अंगीकार करने का। बिना अतिरिक्त विलंब क्योंकि अभी भविष्य में नवसृजन की संभावना सतत विकास की आशा में चिंतित है।
अब चेतना ही होगा , ये तय है।
रमेश मुमुक्षु
9810610409
Sunday, 18 February 2018
पकोड़े का सच
पकोड़े का सच
कभी मित्रों सरोजिनी नगर मार्किट , द्वारका सेक्टर 6,10 और 4 और 5 की मार्किट और सभी रोड साइड समोसे, ब्रेड पकोड़े, अंडे, कुल्चे बेचते हुए रेहड़ी के पास किसी नुक्कड़ की दुकान पर चाय पीने बैठ जाओ। कितनी ही बार अचानक हड़कंप मच जाता है ,इनके भीतर। सभी अपने सिलिंडर ,समान ,गैस का चूल्हा उठा कर कही छिपाने लगते है। चाय पीने वाला एक पल घबरा भी जाये कि कोई डॉन या उघाई करने वाला आ गया। इधर उधर निगाह घुमाने पर सच समझ आता है। एक NDMC या MCD का ट्रक आता है, उनमे कर्मचारी ऐसे आते है ,जैसे इराक में अमरीकी सैनिक आ गये हो और जान बचाओ हो गई। हम बचपन से सुनते आए है ,कमेटी वाले आ गये। हमें 10 साल की उम्र से ज्ञान है कि ये कमेटी आएगी और इनका सामान ले जाएगी ,ये उनके पास जाएगा , कुछ लेन देन करेगा , फिर दुकान चालू। सरोजिनी नगर जहां पर ब्लास्ट हुआ , वहां पर पूरी मार्किट ही गैरकानूनी तरीके से दशकों से चल रही है। वहां पर भी ये ही तमाशा आये दिन चलता है। ऐसा ही नेहरू प्लेस में भी देखने को मिलता है।
ये चूहे बिल्ली का खेल लगातार चलता है। और तो और नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक के पीछे भी चलता है जहां पर मोदी, राजनाथ और जेटली बैठते है। 26 जनवरी, 15 अगस्त के दिन अथवा रुट लगा हो तो इनकी दुकान अलग लगती है। ये रेहड़ी और झाबड़ी वाले बहुत बड़ी तादाद में दिल्ली के फुटपात, सर्विस लेन, सड़क की किनारे अपना धंधा करते है। लोग भी इनसे खाना पसंद करते है। अगर आपको सफाई, छोटी जगह हम नही खाते, ये सेहत के लिए ठीक नही, गंदा रहते है, जैसे सिंड्रोम नही है तो आप नुक्कड़ की चीज़ों का आनंद ले ही लेते हो। गोलगप्पे वाला ऐसे उचक और झुक कर जो गोलगप्पे निकलता है। सच मुँह में पानी आ ही जाता है। बचपन में इमली, लाल इमली, टाटरी, आम पापड़, कच्ची इमली , बर्फ का गोला, बेर , अमरक, संतरे और सफेद दूध की गोली हम सब ने खाई है , उन्होंने भी जिनको उपलिखित सिंड्रोम आज है। बचपन में चुलबुली और बद्री का खोमचा अभी भी स्कूल के बाहर लगता था। मुच्छल के गोलगप्पे और जमुना काले काले रा की आवाज अभी भी बचपन में ले जाती है। खेर, हो सकता है , ये गंदे, सस्ता माल , गंदी क्वालिटी के बनाते होंगे। लेकिन नुक्कड़ की दुकान पर चाय और मट्ठी खाने का आनंद कुछ और ही है। कुछ आइटम केवल नुक्कड़ पर मिलते है जैसे लड्डू गरमे, मोठ कचोरी, उबले अंडे आदि। लेकिन एक बात तो थी ,ये सब खाने की चीज़े पेड़ों के पत्ते से बने दोनों और पत्तल पर ही दिया करते थे। राजेश खन्ना की फ़िल्म अमर प्रेम समोसे पत्तो में लिपटे होते थे।ये सब 40 वर्ष से अधिक उम्र वाले याद कर सकते है। अब तो विकास की उड़ान के संग समझदारी और शिक्षा के बढ़ने के के कारण, ये सब प्लास्टिक और थेर्मोकोल में परिवर्तित हो गया जो पर्यावरण के लिए कितना घातक है। एक बात दीगर थी और है कि नुक्कड़ बहस के अड्डे भी होते है।
पकोड़ा भी इनका ही हिस्सा है। एक और सभी छोटे दुकान और रेहड़ी लगाने वालों पर संकट है क्योंकि बड़े ब्रांड लाइन में लगे है। अब प्रधान मंत्री और अमित शाह ने क्या और क्यों बोला ये तो वो ही जाने क्योंकि उन्होंने साफ कर ही दिया था कि ये चुनाव के झुमले ही होते है 15 लाख आएंगे वाले बयान पर। ये जुमले बचपन से सुनते आए है। नेता भी बचपन में तो ये सब खाते ही होंगे । लेकिन अभी उम्र बढ़ गई, गैस, अफारा, शुगर, मोटापा , हाई ब्लड प्रेसर ने जीभ के स्वाद पर विभिन्न दवाईयों का नाका लगा दिया तो क्या कहे। कही किसी रेहड़ी में गरम जलेबी और पकोड़ा उतरता हुआ देखने पर निगाह चली जाती तो है ही , लेकिन मन और जीभ तो लपलपाती है, पर ऊपर लिखे डर हसरतों के उठने से पहले ही गाला घोंट देते है।
बात पकोड़े की हो रही थी। अब पकोड़े वाला क्या कमाता है और क्या नही ,लेकिन उसके साथ पूरे प्रशासन की पो बारह ही रहती है। पुलिस का डंडा , mcd और ndmc का चालान ये शब्द सभी ने सुने होंगे। ये कानूनी ड्रामा दशकों से चल रहा है। इन सब के बीच मोदी जी और अमित शाह जी पकोड़े बेचना आसान नही। इनसब के हिस्से फिक्स है। ये डिजिटल सिस्टम से भी अधिक मुस्तेद है। इन सब को जो झेल ले ,तो ही पकोड़े बेच सकता है।मोदी जी को सोचना चाहिए , अगर पढ़ा लिखा कर भी बच्चा पकोड़ा ही बेचेगा ,तो पड़ेगा क्यों ? उन्होंने सच ही कहा कि नौकरी तो है ही नही। पकोड़े बेचना सबके बूते की बात नही।स्कूल की फीस इतनी अधिक हो गई है कि पढ़ाना कठिन हो चला है। खेती में पलायन हो रहा है। आज 15 लाख से 25 लाख तक बच्चे पर खर्च हो जाता है, जब कहीं बच्चा कुछ करने लायक बनता है। बेरोजगार तो डॉक्टर और इंजीनियर भी है, तो क्या ये सभी पकोड़े बेचेंगे ?इतना पढ़ा लिखा कर भी कोई केवल पकोड़े बेचे ,तो वो व्यवस्था में कमी है।
कोई पढ़ लिख कर फ़ूड इंडस्ट्री में जाये ,उसका लीगल आउटलेट हो ,तो सही है। बच्चों को मां पाप पैसा और अपनी नींद की परवाह किये बिना पढ़ाते है केवल इसलिए नही की वो नौकरी न मिले तो पकोड़ा ही बेचे।
ये सब दिल्ली में बाहर से आकर धंधा करने आते है। जो अधिकतर खेतीहर मजदूर होते है। एक भी मध्यवर्गीय परिवार से नही आता। ये बात नेता को सोचनी और समझनी चाहिए।
सरकार की ये जिम्मेदारी है कि पढ़े लिखे बेरोजगार को रोजगार देने की गारंटी दे। अब मोदी जी अमित शाह को पसंद करने वाले भी सोचे आपका बच्चा कोई उच्च शिक्षा से आया हो तो क्या आप बेरोजगारी से बेहतर पकोड़े का ठेला लगवाना पसंद करेंगे?
इसलिए कितनी बार नेता की बात गधे की लात का कोई एतबार नही ,कही भी चल जाये।
लेकिन ये बात सारी सरकारों पर ही लागू होती रही है, होती रहेगी।
इन सब को देखते हुए , मोदी जी ने अपने दिल की बात कह दी। इसका सीधा अर्थ है, जब आप नौकरी की बात करेंगे तो ऐसा ही सुनने को मिलेगा। अब निर्णय आपके ऊपर है। इनको कहना था कि स्वरोजगार बने तो उचित होता। देश में पकोड़े का धंधा और दूसरी और रामदेव जी पकोड़े और चाय पीने को वर्जित कहते है। प्राकृतिक चिकित्सा में ये सब वर्जित है। अब ये पकोड़ा बेचना भी सेहत के लिए घातक हो गया।
ये ऊपर ,कमेटी जो सामान उठाती है ये सभी धंधों पर लागू है, इनके नाम और ओहदे बदल जाते है जैसे इनकम टैक्स, सेल टैक्स आदि आदि। भगदड़ का तरीका और लेन देन की परंपरा अलग है। ये सब कमेटी वाले मुंशी प्रेमचंद की कहानी नामक का दरोगा के मुख्य पात्र है। जब ये वाले लोग आते है तो ये देखने लायक होते है। इनके चेहरे पर एक खास तरह का रोब होता है। खासतौर पर कमेटी वाले , ये ऐसे लगते है जैसे रणबांकुरे युद्ध भूमि में उतार आये हो। लेकिन ये जनता है ये सब जानती है।
चाय गुडकने का टाइम हो गया , फिर लिखने की उड़क लगेगी तब तक इस पर विचार करना एक नागरिक बन कर पिछलग्गू नही।
रमेश मुमुक्षु
9810610409
Thursday, 15 February 2018
रोहतांग पास यात्रा के बहाने
1991 में मेरे मित्र फोटोग्राफर कलाकार राजीव आनंद, कवि हरिप्रकाश त्रिपाठी और दार्शनिक मित्र राकेश पांडेय के साथ मनाली से रोहतांग पास ट्रेक का प्लान बन गया। दिल्ली से लोकल स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से मनाली पहुंचे चंडीगढ़ के आगे पहाड़ों का आनंद लेते हुए । 1991 में ही सड़क पर इतनी गाड़ियों थी कि हमे लगा ,आगे यहां क्या होगा? हम लोगो ने मिट्टी का तेल लिया। अपने स्टोव को चेक कर लिया। खाने पीने की सब्जी आदि ली। हमारे रकसैक में करीब 20 से अधिक किलो समान होता था। पिण्डरी में तो 28 किलो सामान ले गए थे । मनाली से पैदल ही जाना था । भीड़ बहुत थी। उस वक्त हमने सोचा कि मनाली में तो आना बेकार हो गया । इतनी गाड़ियां सड़क पर है। उंसके बाद अभी करीब 10 साल पहले मैं 2007 में मनाली गया तो 1991 की हमारी चिंता की याद आगई।
मैंने एक बगल के गांव वाले से 2007 में पूछा तो उसने बताया कि अब बर्फ और वर्षा समय पर नही होती। भीड़ बढ़ गई है। ये किसान ने 10 साल पहले बताया था। अब क्या हाल है, ये अंदाज़ा लगाना कठिन है।
सोलंग नाला हमारा पहला पड़ाव था , कितना सुंदर और एकांत । सौंदर्य और नीरवता से ओत प्रोत। 1991 में हमने वहीं पर टेंट पिच कर दिए। लेकिन अभी उसकी नीरवता कही खो गई। हम लोग अगले दिन ढूंढी गए क्योंकि वही से हमें रोहतांग जाना था। लेकिन रास्ता बर्फ से बंद था। 1991 में अच्छी बर्फ गिरती थी। जून के मध्य तक भी गस्ते बंद थे। ढूंढी में रात ठंडी और भालू आदि की आशंका से भरी भी। अगले दिन ब्यास कुंड जहां से ब्यास नदी की एक धारा उद्गमित होती है, ट्रेक का बना ही लिए।
सबसे पहले एक छोटा लेकिन भयानक ग्लेशियर पार करना था। रास्ता करीब एक फ़ीट का रहा होगा। नीचे ब्यास नदी का प्रचंड प्रवाह इशारा कर रहा था कि मेरे आगोश में आये तो वैकुण्ठ भेज दूंगी।। खैर जवानी की जिद मौत को कहाँ समझती है। निकल गए उस पार। कोई आइस एक्स नही, जूते भी लोकल और रस्सी भी कोई नही। खैर, ब्यास कुंड से पहले लंबा ग्लेशियर था और ब्यास कुंड में तो बर्फ का साम्राज्य ही था। अब 2018 में बर्फ को तरस रहे है। लौटते हुए हरी प्रकाश और राकेश पांडेय ग्लेशियर से वापस आये और मैं नदी के ऊपर एक पेड़ का ताना जो दोनों किनारे पर लगा रखा था , उस पर बैठकर कर पर किया। नीचे ब्यास नही का तीव्र प्रवाह जो चटटानों पर ऐसे टकरा रहा था ,मानो उनको तोड़ देना चाह रहा हो। और उस दिन शाम को रोमांच भरी यात्रा से लौट कर ढूंढी आगये और ढूंढी से सोलंग नाला आकर रहे। उंसके बाद सोलंग नाला होते हुए कोठी पहुंचे। कोठी जहां से पीरपंजाल रेंज दिखाई पड़ती है। टेंट पिच किये स्टोव में खाना मिलकर बनाया।
चौथे दिन हम लोग कोठी से पलचान जहां पर ब्यास कुंड से ब्यास नदी की एक धारा और दूसरी रोहतांग से एक धारा का संगम है। हमे रहला होते हुए मढ़ी तक ट्रेक करना था। सड़क गुलाबो होती हुई ,मढ़ी पहुचती है।
रहला फॉल के सामने बैठ कर हमने खाना खाया , नही भूल सकते है। उंसके बाद कठिन चढ़ाई के बाद मढ़ी पहुंचे। चारों और केवल बर्फ ही बर्फ। सड़क पर जमी बर्फ काट ली गई थी। वहां पर स्कीइंग की प्रतियोगिता चल रही थी।
अगले दिन पांचवे दिन रोहतांग जाना था। हमे बताया गया कि बिजली के खम्बों के साथ बर्फ के ऊपर रास्ता बना है, चलते रहो। वहां से सात किलो मीटर बर्फ पर चलना था। बीच में कभी कभी सड़क आती थी। सड़क के दोनों और करीब 18 से 20 फ़ीट तक बर्फ काटी गई थी। हम रोहतांग से पहले बर्फ ऊंचे गलियारे के बीच चल रहे थे।
गस्ते में एक बुजुर्ग मिले। प्रोफेसर थे, लेकिन वो अकेले ही ट्रेक करते थे। उनका पड़ाव रोहतांग से आगे चंद्रताल था। उन्होंने कहा कि अकेले घूमने का अलग का आनंद होता है। उन्होंने एक बात कही, मुझे अभी तक याद है। " एक निरंजन, दो सुखी तीन में झगड़ा चार दुखी" उन्होंने अपनी यात्राओं के जीवंत किस्से बताए। उनका साथ रोहतांग तक था। उनको आगे खोखसर तक जाना था।
रोहतांग से पहले तक ही सड़क कटी थी। खैर हमने बर्फ के ग्लेशियर का रोहतांग पास पर आनंद लिए । रोहतांग के आगे बौद्ध संस्कृति है और मनाली की और हिन्दू संस्कृति। ये दर्रा दोनों को जोड़े है। उंसके बाद मढ़ी आ गये। मढ़ी से नीचे रहला होते हुए कोठी करीब 21 किलोमीटर ट्रेक किया। उस दिन याद है, दाल चावल बनाने का सोच रहे थे। लेकिन थकान बहुत थी। सबने ढूंढा लेकिन दाल नही मिली, जो दिल्ली पहुंच कर मिली तो थकान की शिद्दत याद आ गई। खैर, रात भर टिप टिप वर्षा होती गई। रात टेंट में गुजरी और छठवें दिन पैदल ही कोठी के पुल से जहां बहुत गहरी घाटी है , जिसको गोर्ज कहते है , देखने का दृश्य है, हुए टूटे फूटे मनाली पहुंचे और बस पकड़ दिल्ली की राह पकड़ी।
सच चारों और केवल बर्फ जून 1991 की बात है।
अभी पर्यावरण की हालत सब के सामने है। दिल्ली और महानगर की जिंदगी से तंग आकर पहाड़ जाओ और वहां पर भी भीड़ अधिक होना और बर्फ नदारद । अभी फरवरी 2018 के दिन बर्फ का इंतजार है। अभी हाथ ठिठुरने वाली ठंड इतिहास में कही गुम हो गई। उन दिनों बाबा सहगल का एक रेप ठंडा ठंडा पानी लोक प्रिय हुआ था। उसको ही गाते रहे गस्ते भर। सभी मित्रों के चेहरों की खाल जल गई थी और चेहरे काले पड़ गए थे।
वो दौर था कि निकल जाते थे ,बिना किसी तेल के, केवल सरसों का तेल ही सब काम कर लेता था। चेहरे की किसको परवाह कोई क्रीम भी होती होगी।। बस एक जिद और उत्साह रहता था कि ट्रेक करना है। ढूंढी से ब्यास कुंड ट्रेक में हम लोग कितने ही किलोमीटर बर्फ पर चले। कुछ भी सुविधा नही होती थी , बस चलना है , पहुंचना है।
ये सब जगह सोलंग नाला, ढूंढी, ब्यास कुंड, कोठी, रहला फॉल , मढ़ी सभी खूबसूरत और नीरवता पूर्ण स्थल थे, जिनके कारण लोग कुछ अलग अनुभव करने आते थे। लेकिन अभी ये सब भीड़ भाड़ में तब्दील हो गए है। अभी तो बुग्याल तक भी मस्ती के स्थल बनाने के ख्वाब है।
3000 मीटर के ऊपर तो किसी तरह के निर्माण और लोगों की आवाजाही काम होनी चाहिए। अधिक लोगों से सब कुछ डिस्टर्ब हो जाता है।
पैदल ट्रेक की आदत से ये कुछ बच सकता है। ट्रेक के लिये सेहत और मन मजबूत करना पड़ता है।
पहाड़ की खूबसूरती केवल इसलिए नही है कि भोग करें। उसकी खूबसूरती पर्यावरण के घटक है। जल स्रोतों के उद्गम स्थल । हिमनद और वनों से उद्गमित होती है, नदियां जो पृथ्वी को जल से सींचती है। बर्फ केवल मस्ती के लिए नही बल्कि जल स्रोत है।
किसी जगह को केवल घूम कर ही थोड़ा बहुत समझा जा सकता है। जब तक पैर नही टूटेंगे दमखम नही होगा , तब तक क्या आनंद आएगा। मढ़ी से सात किलो मीटर बर्फ में रोहतांग तक जाने का आनंद आज भी रोमांच और उत्साह भर देता है।
अभी 2016 में पांचवी बार रूप कुंड ट्रेक किया था। लेकिन पिछले वर्ष 2017 में जोशीमठ से ऊपर पांगरचुला ट्रेक में फ्रैक्चर हो गया। फ्रैक्चर के बाद कुल 15 किलोमीटर नीचे आने के कारण अभी घुटने घायल है।
लेकिन उच्च हिमालय को संरक्षित करना हम सबकी जिम्मेदारी है। कम से कम उंसके संरक्षण की सोच तो रखे। विकास विकास रहे विनाश न हो। ये नई पीढ़ी को समझ लेना ही होगा। फुर्र से कही पहुंचने का प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। अम्बानी सहित दुनियां के धनकुबेर मोबाइल और कुछ भी बना सकते है।लेकिन औस की एक बूंद क्या बना पाएंगे? औस की एक बूंद पर्यावरण के अस्तित्व की गवाह है। उसको आने दो। अगर वो कही छिप गई तो सब कुछ ताश के पत्तों सा बिखर जाएगा और इतिहास में खोजना भी कठिन होगा कि औस का न होना कितना घातक हो सकता है। भयानक है लेकिन सत्य। कैलाश को भी हम ऐश गाह बनाने को आतुर है। अपने आराध्य शिव को तबाह करके क्या मना सकेंगे शिव रात्रि ?,ये तो सोचना ही होगा। विष तो पीना ही होगा अगर अमृत को संरक्षित करना है ,तो।
दुनियां के घुमक्कड़ों के आदर्श
राहुल संकृत्यायन ने बचपन में सुना था कि "सैर कर दुनियां की गाफिल जिंदगानी फिर कहाँ , गर जिंदगानी रह गई तो नौजवानीननबब फिर कहाँ"।
खैर, धुन लग गई तो लिखने लगा स्मार्ट फ़ोन पर चिपक गया। अब चाय की हुडक होने लगी। फिर कभी विस्तार से तो पुस्तक में ही लिखा जा सकेगा। लिखने को इतना है कि उम्र कम लगती है।
रमेश मुमुक्षु
9810610400