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Friday, 20 September 2019

चल यार टहल आये तनिक

                चल यार टहल आये तनिक
ये अकेला वाक्य आदमी के भीतर स्फूर्ति और ताजगी ले आता है।लेकिन ये जीवन से दूर हो गया। ये वाक्य बचपन में रोजमर्रा होता था। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ,ये सब तिरोहित होते चले गए। किसी दोस्त के साथ किसी भी उम्र में ये वाक्य एक जैसा अहसास देता है। इसके लिए जीवन की औपचारिकता दूर करनी होती है। नुक्कड़ पर तनिक खड़े होने की आदत को कायम रखना होता है। स्ट्रेस दूर करने के सैंकड़ो नुस्खे मिलते है। लेकिन ये अकेला सदियों पुराना नुस्खा है। करना कुछ नही, बस अपने दोस्त और जो आपके करीब है,उसके साथ ही चलना है। समय भी बहुत नही खर्च होता। कभी बाजार जाना हो तो साथ पैदल ही हो लिए। लेकिन उस वक्त जो आनंद का स्राव होगा ,वो ठीक वैसा ही होता है, जो बचपन में प्राइमरी स्कूल।में होता होगा। 80 साल की उम्र मैं भी अगर दो दोस्त मिलते है ,तो उनका अहसास बचपन वाला ही होता है। कभी सुना होगा दो बुजुर्ग कहते है कि वो लड़का जो साथ पढ़ता था,आजकल कहाँ पर है। बचपन का अहसास मनुष्य के भीतर अगर जीवित रहेगा तो वो जीवन में बोर नही हो सकता। साथ टहल आने का सबसे बड़ा आनंद क्या है, अकेलापन दूर होता है। कुछ टहलने से सेहत भी बनी रहती है। नयापन महसूस होता है। लेकिन आजकल ये सब करीब जीवन से तिरोहित होता गया है। कभी दोस्त एक दूसरे से बिना मिले नही रहते थे। लेकिन उम्र के साथ ये अहसास हम खुद हो खत्म करने लगते है। आपस में रूटीन में गपशप करना भी काफी हद तक आनंद देता है। जीवन में स्ट्रेस लगे तो मित्रों के साथ टहल आये, नुक्कड़ पर चाय गटक ली और गपशप कर ली,फिर देखों स्कूल के समय का आनन्द आएगा। इसके लिए पैदल चलने का सबसे अधिक आनंद होता है।
कुछ कहेंगे का  समय कहाँ पर है। लेकिन अगर हम अपने पूरे 24 घंटे के हिसाब को एक बार दुबारा से देंखे तो पाएंगे कि कितना समय जिसको हम व्यस्त कहते है, आराम से निकाल सकते है। कभी कभार कहीं  दूर घूमने भी जा सकते है। नैनीताल ,शिमला जैसी जगह दो दिन के लिए चले गए।खुल के गपशाप करली। जितना भी स्ट्रेस पाला हुआ है, छू मंतर हो जाएगा। लेकिन चल यार टहल आये तनिक के लिए आदमी वर्षो तक समय नही निकाल पाता। जिनके पास लक्ष्य है, ये उनके लिए भी जरूरी है। कितने व्यस्त हो जाओ,लेकिन हर व्यक्ति के दिल के किसी कोने में ये अहसास होता ही है, बस जरूरत है, उसको जीने की। वो लोग जो बोर होते है, उनको अकेलापन महसूस होता है। वो इसलिए जीवन में आता है क्योंकि ये अहसास जब जीवन से हम दूर कर देते है।
इसलिए एक बार करके देख लो यारों बचपन का अहसास उभर के लौट आएगा। फिर मन कहेगा " चल यार टहल आये तनिक"
रमेश मुमुक्षु
9810610400

Saturday, 13 April 2019

क्या नज़फगढ़ झील को वेटलैंड घोषित किया जाएगा ताकि गंगा यमुना भी संरक्षित हो सकें

(क्या नजफगढ़ झील को वेटलैंड घोषित किया जायेगा ताकि गंगा और यमुना भी संरक्षित रह सकें)
अभी 26 मार्च 2019 को Original Application 153 of 2014, Execution Application No. 16 of 2019 INTACH Indian National Trust for Art and Cultural Heritage  के NGT  एक्सक्यूशन  अप्लिकेशन नो. 16 ऑफ 2019 , की दिल्ली और हरियाणा के मुख्यसचिव  को डायरेक्शन दी गई ,जिसके तहत दोनों से एक्शन टेकन रिपोर्ट मांगी गई ,कि नजफगढ़ झील को वेटलैंड अधिसूचित करने संबंध क्या प्रगति हुई है।
INTACH की याचिका के द्वारा ही पिछले साल दिल्ली सरकार और हरियाणा सरकार को झील को वेटलैंड के रूप में अधिसूचित करने के निर्देश दिए गए थे। हरियाणा सरकार की ओर से  एक ब्रीफ डॉक्यूमेंट केंद्रीय पर्यावरण , वन एवं वायु परिवर्तन मंत्रालय को झील को अधिसूचित हेतू प्रेषित किया गया। लेकिन इसी बीच वेटलैंड(कंसर्वशन एंड मैनेजमेंट )रूल्स, 2017 के कारण अब राज्य को ही वेटलैंड को अधिसूचित करना होगा।   NGT की डायरेक्शन तक ये अधर में अटका हुआ है।
नजफगढ़ झील का पानी का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता था।  वर्तमान में नज़फगढ़ झील हरियाणा के खेड़की माजरा ग्राम ,गुरुग्राम में स्थित है। जिसका कुल क्षेत्रफल 120. 80 हेक्टेयर है। जो latitude 28 डिग्री 30'10'N और 76 डिग्री 56'39" E में अवस्थित है।साहिबी नदी अरावली पर्वत ,राजस्थान के जीतगढ़ और मनोहरपुर ,जिला जयपुर से निकलती है। साहिबी नदी अपनी बहुत से सहायक नदियों की धारा से एक बड़ी नदी का रूप लेकर अलवर और कोटपूतली में बहती है। रिवाड़ी में मानसून के दौरान बड़ा पानी स्रोत बनाती है। हालांकि अभी पानी कम होता गया है।
मानसून में ही दिल्ली की ओर नजफगढ़ एक बहुत बड़ी पानी की झील बनाती है। वही से एक छोटे नाले कब रूप में यमुना में समाहित होती है। एक तरह से नजफगढ़ झील और नाले को साहिबी की धारा कह सकते है। लेकिन कालांतर में इसके संरक्षण न करके अभी ये मात्र  गंदा नाला ही रह गया है।
नजफगढ़ झील साहिबी नदी के अतिरिक्त   गुरुग्राम , रोहतक जिला एवं  दक्षिण पश्चिम जिले से भी पानी एकत्रित होता है और ये सब मिला कर नजफगढ़ झील का कैचमेंट एरिया करीब 906 वर्ग किलोमीटर बनता है।
इस तरह नजफगढ़ झील एक बहुत समृद्ध और विस्तृत पानी का स्रोत दिल्ली और हरियाणा के लिए हो सकता था।
मुगल दरबार में फारस के कुलीन मिर्ज़ा नजफ़ खाँ के नाम पर नजफगढ़ झील पड़ा।
पिछले 7 दशक में इस पूरे नजफगढ़ झील के कैचमेंट क्षेत्र में बाढ़ भी आई । 1958,1964, 1978, 1985 एवं 1996 आई ,जो इसके जल संग्रहण क्षेत्र का परिचायक है।1964 एवं 1977 की बाढ़ इसके बंद के पार चली गई थी, जिससे दिल्ली के शहरी इलाके लगभग 100  दिन से अधिक पानी में डूबे रहे।
नजफगढ़ झील को चौड़ा करने से पहले ये पूरा क्षेत्र लगभग पूरे साल पानी से भरा रहता था।  इसको लोकल बोली में ढहर कहते थे। इस झील के आस पास गांव में घूमते हुए किसी स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि यहां पर अंग्रेज़ पक्षियों के शिकार के लिए ही आते थे। नजफगढ़ झील में सारी जमीन निजी जमीन है। इसलिए मानसून के बाद जब पानी वाष्पीकृत होता था ,तो लोग जमीन पर खेती करते थे। बहुत अधिक उपजाऊ जमीन है,यहाँ पर।  वर्षों बाढ़ देखने के कारण यहां के स्थानीय लोग इससे निदान चाहते थे। साहिबी नदी अपने साथ कितनी ही छोटी छोटी जल धारा लेकर एक बड़ा कैचमेंट एरिया बनाती थी। अंग्रेज़ो के समय 1886 में यहां नजफगढ़ झील से यमुना तक 51 किलोमीटर तक एक नाला खोदा गया, जिसको सही साहिबी नाला भी कहा जाता था। उससे पहले प्राकृतिक तरीके से पानी यमुना तक बहा करता था। 1964 में इसको नज़फगढ़ नाला कहा गया।
नजफगढ़ झील का पूरा क्षेत्र निजी भूमि ही है।  जब कभी मानसून के बाद पानी उतरता होगा तो लोग खेती कर लिया करते थे। पहले जब नज़फगढ़ झील के बीचों बीच तटबंध  नही बना था तो दिल्ली के गांव भी नज़फगढ़ झील के हिस्से थे। एक बहुत विस्तृत और न खत्म होने वाला प्राकृतिक जल स्रोत था, लेकिन समय रहते इस पर दूरदृष्टि पूर्ण कार्य नही किये जाने के कारण ,इस पर संकट आ ही गया।
नज़फगढ़ झील ब्रिटिश काल से ही।पक्षी विहार और शिकार दोनों के लिए जाना जाता था। अंग्रेज़ यहां पर डेरा जमाये रहते थे।
आज भी ये झील प्रवासी पक्षियों के लिए उपयुक्त स्थान है।कभी नज़फगढ़ झील में साइबेरियन क्रेन भी देखा गया था। आज इसको बर्ड्स पैराडाइस कहा जाता है। दिल्ली में करीब 400 बर्ड्स पाई जाती है।जिसमे 25% माइग्रेटरी प्रवासी पक्षी है। अकेले नज़फगढ़ के झील के क्षेत्र में 200 के करीब पक्षियों की प्रजाति पाई जाती है। जिनमे से गरेटर फ्लेमिंगो करीब 9 महीने रहता है।3 बया बर्ड की प्रजाति यहां पर मिलती, ब्लैक ब्रेस्टेड वीवर, लार्ज फ्लॉक ऑफ ब्लैक टेल गोडविट,, ब्लैक नेक्ड स्टोर्क, पेंटेड स्ट्रोक, सारस क्रेन एवं ब्लैक फ्रैंकोलिन समेत बहुत से पक्षी मिलते है।इन पक्षियों को संरक्षित करना जरूरी है  ताकि ये प्रवासी पक्षी आते रहे । अगर नज़फगढ़ झील को संरक्षित किया जाते तो पक्षी प्रेमियों के लिए ये एक पैराडाइस ही कहा जा सकता है।
लंबे समय से ही ग्रामीण लोग बाढ़ से निजात पाने की मांग करते रहे थे। उसी कारण तटबंध  निर्माण से हरियाणा और दिल्ली के बॉर्डर में झील बंट गई। दिल्ली के हिस्से में गुमहानहेड़ा,  राउता,झटीकरा, जैनपुर, शिकारपुर आदि में तटबंध के कारण झील में पानी लगभग समाप्त हो गया। हालांकि 1964, 1978 और 1995 की बाढ़ ने बंध के पार आकर 100 दिन से अधिक पानी जमा रहा।  अभी दक्षिण पश्चिम जिला और गुरुग्राम में पानी विशेषकर भूजल खतरे के निशान आ गया है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने अकेले गुरुग्राम के करीब 600 से छोटे बड़े  जल स्रोत खत्म कर दिए।   गुरुग्राम में 1990 के बाद बड़े स्तर पर शहरीकरण ने पैर पसारे दिए है। जिसके कारण जल स्रोत पर बहुत प्रतिकूल  असर पड़ा।
गुरुग्राम में वन क्षेत्र 2010 तक 10 प्रतिशत होना था और 2020 तृक 20 प्रतिशत लेकिन अभी 6 प्रतिशत ही रह गया है।
दूसरी ओर दिल्ली के डी डी ए के जोनल प्लान एल लो लाइन एरिया में ग्राम राउता, गुमहानहेड़ा, जैनपुर, शिकारपुर, एवं झाटीकरा की करीब 890 एकड़ जमीन पर झील के रूप में विकसित करने की संभावना है। जो एक ओर बड़ा जल स्रोत हो सकता है ,दूसरी ओर एक पर्यटन के दृष्टिकोण  एक बड़ी धनराशि अर्जन स्रोत हो सकता है।  हालांकि ये संभव नही लगता क्योंकि इतनी बड़ी धनराशि क्षतिपूर्ति के ये देना आसान नही। लेकिन भविष्य को देखते हुए ,जबकि जल स्रोत लगभग खत्म हो चुके हो, सरकार को इस बड़े कदम को उठाना ही चाहिए। भले इसके लिए बड़ी धनराशि क्यों न खर्च हो जाये।
INTACH के श्री मन्नू भटनागर और उनकी टीम ने लंबे समय से नज़फगढ़ झील के  संरक्षण के ये ठोस प्रयास किये । उनके अनुसार एक झील इस क्षेत्र के लिए बहुत ही बेशकीमती जल स्रोत है।  उन्होंने इस पर अध्ययन करके और ठोस काम करके कुछ ठोस सिफारिश भी की है झील के समाधान हेतू:
# एरिया जो कंटूर 209 में आता है, को स्थायी जल स्रोत घोषित किया जाए।
#झाटीकरा पुल पर रेगुलेटर निर्मित किया जा सकें ,ताकि जल स्तर को 208-209 mamsl तक नियंत्रित किया जा सकें।
#चूंकि ये जमीन पर बिल्डिंग नही बनेगी ,इसलिए किसानों को क्षतिपूर्ति फंक्शनल प्लान फ़ॉर वाटर रिचार्ज इन एनसीआर और संभावित नार्थ इंडिया कैनाल एंड ड्रेनेज एक्ट के माध्यम से किसानों की क्षतिपूर्ति की जाए। कंटूर 209 की जमीन को लीज पर देने की संभावना देखी जा सकती है।
#दिल्ली की ओर बहुत सी ग्राम सभा की जमीन तटबंध  आस पास बिखरी हुई है, उसको एक साथ एकत्रित कर उसके बदले डिप्रेशन एरिया में दे दी जाए।
#झील क्षेत्र HFL तक नेचुरल कनजरवेशन जोन NCZ NCRPB 2012 की नीति के तहत इसको वेटलैंड रूल्स 2010और अभी 2017के अंतर्गत वेटलैंड घोषित किया जाए।
#इस क्षेत्र में कोई भी निर्माण वर्जित हो HFL एरिया में ।
#गंगा नोटिफिकेशन 7 अक्टूबर 2016 के अंतर्गत गंगा और उसकी सहायक नदियों के बेसिन पर कोई भी निर्माण पूर्णतः वर्जित है। चूंकि ये साहिबी नदी , जो की गंगा की एक ट्रिब्यूटरी , नज़फगढ़ झील उसका ही विस्तारित जल क्षेत्र है। इसके संरक्षण का सीधा असर यमुना और गंगा दोनों के संरक्षण पर पड़ेगा।
# दिल्ली की ओर तटबंध को भी खुला रखा जाए ताकि पानी  सहज रूप से फेल सके।
# प्रदूषित जल को बादशाह पुर  ड्रेन के पानी को झील में जाने से पहले ही साफ कर लिया जाए ताकि नज़फगढ़ झील और यमुना के जल की प्रदूषण से बचाया जा सके और साथ ही भूजल को भी संक्रमित होने से बचा लिया जाए।
# कुछ हद  तक दोनों राज्यों को झील के निकट भूजल निकासी की नियंत्रित  अनुमति दी जाए कुछ आय अर्जित हो सकें।
#झील का पश्चिम एरिया पक्षी अभयारण्य घोषित किया जाए और नज़फगढ़ झील कनजरवेशन & मैनेजमेंट बोर्ड स्थापित किया जाए एनसीआर प्लानिंग बोर्ड, दिल्ली एवं हरियाणा  के तहत ।
#जमीन के दाम अधिक है , इसलिए दोनों राज्यों को रेवेन्यू शेयरिंग और PPP मोड के तहत कार्य करना होगा।
इसके अतिरिक्त डेटिल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) भी तैयार करनी चाहिए।
*नज़फगढ़ वाटर वे का प्रस्ताव*
एक बार अगर झील का पानी साफ हो जाए तो नज़फगढ़ झील को एक वाटर वे की तरह विकसित किया जा सकता है। ये यमुना तक करीब 51 किलोमीटर है ,जिसमे 38 नाले गिरते है ,वजीराबाद तक। वज़ीराबाद  बैराज से ओखला बैराज तक ये वाटर वे बन सकता है। NGT के निर्देश के अनुसार नदियों और नालों में  पानी के प्रवाह को बाधित नही किया जा सकता है।
वाटर वे से लोगो को नदी की यात्रा का अवसर मिलेगा और नज़फगढ़ नाला जो सबसे अधिक प्रदूषित जल यमुना में प्रभावित करता है। उससे भी यमुना के प्रदूषण को दूर किया जा सकता है।
अंत में ये एक गंभीर मुद्दा है। विकास केवल नगर उप  नगर बनाकर नही होता। विकास जल ,जंगल ,जमीन और प्रकृति और मानव के जीवन को खतरे में डाल कर नही किया जा सकता है। इस विषय में आगे आने वाली पीढ़ी को संरक्षित और पर्यावरण को बचाकर प्रदान करना है।ढासा रेगुलेटर को पार कर बाढ़सर गांव में जहां पर बरसात का पानी गले तक रहा करता था। अभी वहीं पर AIIMS की स्थापना कर दी गई।। बहुत से बिल्डर चाहते है कि कीमती जमीन पर नए प्रोजेक्ट आने चाहिए। कम लोगो को माइग्रेटरी बर्ड्स की चिंता नही। जल स्रोत संरक्षण की गहरी सोच नही। अभी ये सब बचाया जा सकता है, अगर दोनों राज्यों की सरकार भविष्य की पीढ़ियों के लिए सोचें तो।
2017 में इंटेक  INTACH के द्वारा NGT में नज़फगढ़ झील को वेटलैंड के रूप में अधिसूचित किया जाए। NGT ने इसको वेटलैंड स्वीकार किया था।
2017 के बाद आजतक नज़फगढ़ झील  को वेटलैंड के रूप में अधिसूचित किया जाए। इस बेच वेटलैंड रूल्स 2017 आ गया, जिसके अनुसार राज्य ही स्वयं से वेटलैंड को अधिसूचित करेंगी।
लेकिन इसमें कुछ भी प्रगति नही हुई। इस कारण  INTACH ने एक्सएक्यूशन एप्लीकेशन  फ़ाइल की और पुनः NGT ने दिल्ली सरकार और हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव को ATR जमा करने के निर्देश दिए है।  अब देखना है कि दोनों सरकार नज़फगढ़ झील के संरक्षण के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।
इसके चारों ओर निर्माण अपने पैर पसार रहा है। वो ऐसा करके भविष्य की पीढ़ियों के लिए घोर जल संकट को आमंत्रित कर रहे है। INTACH के प्रयास की सराहना होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त लेफ्टिनेंट कर्नल एस एस ओबरॉय की याचिका भी नज़फगढ़ झील को वेटलैंड घोषित करने की भी NGT में फ़ाइल हुई थी। कुछ पक्षी प्रेमी भी इसको संरक्षित करने में लगे है। आशा है, हम सभी को इस जल के बड़े स्रोत को और हज़ारों माइग्रेटरी पक्षियों के आश्रयस्थल को बचाना ही होगा।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400

Friday, 5 April 2019

*नष्ट होते पर्यावरण संरक्षण की आशा: सरला बहन

(नष्ट होते पर्यावरण संरक्षण की आशा: सरला बहन)
जंगल में जानवरों को भेजने की जगह खेतों में चारा लगाओ। छोटे पेड़ बचाओ। पत्तियां न तोड़ो ,पेड़ों से प्रेम करो, प्रकृति की चाल के साथ चलो। पर्यावरण संरक्षण शब्द की रचियता और जिन्होंने अपना पूरा जीवन प्रकृति में  आत्मसात करके जिया और प्रकृति पर आने वाले संकट के प्रति सचेत  किया और दर्शन भी विश्व को प्रदान किया। शोर से दूर हिमालय के आगोश में शांत वातावरण में विश्व पर्यावरण के संरक्षण पर गहन चिंतन और मनन करने वाली सरला बहन के जन्मदिन 5 अप्रैल को  उनकी कहीं और लिखी एक एक बात मार्ग दर्शक की तरह विकास की सही दिशा की ओर आज  ही इशारा करती है।
गांधी जी ने कुछ सोच कर सरला बहन  को को कौसानी भेजा होगा। उनको  सरला बहन में एक बड़ी संभावना दिखी होगी। सरला बहन ने सच कौसानी से ही स्त्री शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और जय जगत को सिद्ध करने के लिए अपना जीवन आहूत किया।
प्रथम विश्व युद्ध की विभीषिका और पागलपन को देख उन्होंने शांति और अहिंसा का मार्ग खोजने की अपनी यात्रा में गांधी जी को एक अडिग
पड़ाव ही नही मंजिल के रूप में पाया। युद्ध और विकास के उफनते उन्मांद और युद्ध रोमांस से दुनिया विनाश की उस नाव में  बैठी हुई है, जिसका चप्पू उनके हाथ के नियंत्रण से बेकाबू होने के कगार पर होता जा रहा है। प्रकृति की अपनी एक  चाल होती है। सतत और निरंतर ,कोई जल्दबाजी नही ,उतावलापन नही जीत और हार की रेस से परे केवल चलते जाना ही है। गांधी ने इस चाल को अनुभव किया और उसकी चाल और उससे निकल रहे संगीत को समझा और उसकी चाल में कदम मिलाकर ग्राम स्वराज्य का मॉडल निर्मित किया। शिक्षा की  नई तालीम में इन सब को पिरो दिया। प्रकृति ने जो दिया है, उसकी चाल के साथ सतत चला जा सकता है।  प्रकृति के इर्द गिर्द ही मानव अपना विकास कर सकता है। मानव अस्तित्व के लिए प्रकृति का विनाश नही अपितु संरक्षण ही मंत्र हो सकता है। शिक्षा  प्रकृति के अनुसार होनी चाहिए , उसके विरुद्ध नही। प्रकृति के परे कोई मार्ग हो ही नही सकता।
गांधी के जीवन दर्शन और जीवन ने ये सब एक सूत्र में सरला बहन ने विश्व को प्रदान किया। विश्व युद्ध की विभीषिका को देख कैथरीन, उनका असली नाम, संमझा की युद्ध जीतने वाला और युद्ध हारने वाला दोनों ही हारते है। केवल मानव के भीतर दम्भ और दूसरे को हराने का उन्माद जो विनाश का पर्याय है ,ही जीतता है। ।आज ये सब हमारे सामने चरितार्थ हो रहा है।
सरला बहन के जन्मदिन पर उनकी हिमदर्शन की धार पर बैठना और प्रकृति के संरक्षण की गहन चिंतन करना मानव को एक दिशा प्रदान करता है। लक्ष्मी आश्रम का सतत परिवेश आज  ही एक आशा प्रदान तो करता ही है। हालांकि विश्व में बेतरतीव भागता विकास सब कुछ लील लेने को अंधी दौड़ में चारो ओर भाग रहा है। उसकी अंधी दौड़ को रोक पाना संभव नही है।लेकिन गांधी के ग्राम स्वराज्य में अभी भी गांव को गांव बनाने की दिशा और मार्ग संरक्षित है। पुरखों की सतत और मेहनत के परिचायक खेत और गांव आज भी मानव सभ्यता को अमरता प्रदान करने की असीम क्षमता है।
सरला बहन ने लक्ष्मी आश्रम को एक मॉडल के रूप में विकसित किया। ये गांधी का ही जीवित मॉडल है। दूसरी और हिमदर्शन कुटीर को चिंतन स्थली के रूप में सरला बहन ने विश्व को प्रदान किया।
आज विकास के बेतरतीव मॉडल को मानव ही नही वन्य प्राणियों की सहज और नीरव जीवन शैली को भी प्रभावित किया है। विकास की तुरत गति ने सतत गति को बाधित ही किया है। वन्य प्राणियों का जंगल से बाहर आना इसका संकेत है। पर्यावरण संरक्षण ही इसका एक मात्र समाधान हो सकता है।
विश्व में जल संकट का गहराता भयावह रूप प्रकृति की चाल को बाधित करने वाले  तुरत विकास का ही परिणाम है। मुट्ठी भर लोग दुनियां को तेजी से भागना चाहते है, इस भागमभाग में वो न जाने किस मंजिल को छूना चाहते है और पूरी मानव जाति को इस चाल में अपने अंधकूप में झोंकना चाह रहे है। ये आज प्रकृति के विनाश से संमझा जा सकता है। जब महानगर की चकाचौंध में सांस लेना कठिन हो जाती है, उस वक्त सब बेमानी लगता है। खाने के स्वाद में तेजी से आये बदलाव , विश्व में पिघलते ग्लेशियर, भारत में गंगा नदी समेत सारी नदियों को नालों में परिवर्तित होते देख प्रकृति की सतत चाल को समझना भी कहाँ  रह गया  है, संभव।
ये सब सहसा सरला बहन के जन्मदिन पर याद हो चला। कृत्रिम शोर से दूर प्रकृति के संगीत के साथ कैसे सुरताल मिल कर चला जा सकता है। ये सरला बहन के जीवन दर्शन और उनकी यादों में आज भी कौसानी के लक्ष्मी आश्रम और उनकी चिंतन स्थली हिमदर्शन में खोजा जा सकता है, बस प्रकृति की चाल के संग चलने मात्र से , जंगल के संगीत में सराबोर हुए, आज भी तमाम कोलाहल के बावजूद भी पक्षियों  का कलरव ध्यान खींच ही लेता है। हिमालय की बर्फानी चोटियां अपनी ओर आकर्षित आज भी करती है। घाटियों से आती हवा एक संगीत ही तो है। घने जंगल में अनहद का संगीत तनिक एकाग्र होने  से सुना जा सकता है। आज भी सूर्यास्त की लालिमा , रात का  सन्नाटा , चन्द्रमा का प्रकाश अपने होने का अहसास छोड़ ही जाता है। ये सब सतत और निरंतर ही है। तुरत विकास की अवधारणा से ये कब तक रहेगा, इस पर चिंतन तो करना ही होगा ,ये तय है।
*रमेश मुमुक्षु*
अध्यक्ष, गांधी पीस फाउंडेशन, दन्या, अल्मोड़ा, उत्तराखंड
9810610400

Wednesday, 14 November 2018

अवनि की मौत/नरभक्षी/ निवाला बने लोग: एक विमर्श

(अवनि की मौत/नरभक्षी/निवाला बने लोग: एक विमर्श )
किसी जंगल के बीच गांव में जब कभी शाम के धुंधलके में कोई बाघ/ शेर/तेंदुआ गांव  में दिख जाए तो गांव में दहशत का माहौल बन जाता है। अगर किसी इलाके में नरभक्षी बाघ आदि की आहट भी हो जाये तो पूरा इलाका ही डर में समा जाता है। शाम होते ही छोटे बच्चों को घर से बाहर नही निकलने देते है। कुछ समय पूर्व मैं  उत्तराखंड के अपने कार्यक्षेत्र में रात विरात आ जाता था, लेकिन अभी सोचना पड़ता है।
जब नरभक्षी जानवर कभी किसी बच्चे और बड़ो को उठाकर निवाला बना लेता है,  तो डर और गुस्सा आना स्वाभाविक है। अभी इसी वर्ष उत्तराखंड के किसी गांव में रात करीब 8 बजे एक परिवार शादी से लौटा तो उनका बच्चा गाड़ी से उतरा और तनिक सड़क पर आगे चला गया और कुछ गई क्षण में बच्चा सड़क से गायब हो  गया। गांव के लोग समझ गए। उन्होंने रात को ढूंढ मचा दी तो उस बच्चे का अध खाया शरीर मिला। वो लोग केवल शादी के लिए गांव आये थे। इस घटना से उस परिवार पर क्या असर हुआ होगा और उस ओर इलाके में दहशत और गुस्से का माहौल बन गया।
ऐसा ही होता है , जंगल के आस पास रहे है ,ग्रामीणों के साथ। ग्रामीण कभी भी बाघ आदि को मारना नही चाहते लेकिन ऐसी परिस्थिति में उनके पास क्या विकल्प होगा? जिसका अबोध बच्चा बाघ अपना निवाला बना ले तो परिवार क्या करें?
अभी अवनि बाघिन  की मौत ने देश को झकजोर दिया। उसके प्रति लोगों की चिंता और दुःख सोशल मीडिया में छाया रहा। लेकिन अवनि के द्वारा मारे गए 8 से अधिक लोगों की मौत का जिक्र भी नही हुआ। किसी ने भी उन मासूम लोगों की मौत के प्रति संवेदना प्रदर्शित की। इस बात का औचित्य समझ नही आया। जिन लोगों को अवनि ने निवाला बनाया उनके परिवार वालों पर क्या गुजरी होगी। ये भी हमको नही भूलना है।
वन विभाग और ग्रामीणों के बीच ये विवाद चलता ही रहता है। विकास की दौड़ ने जंगलो की शांति और नीरवता नष्ट कर दी। बाघ की  प्रजाति रात्रिचर है। उसका अपना इलाका होता है। सड़क, निर्माण, रिसोर्ट, चमक दमक, घोड़ा गाड़ी, चार धाम जैसे प्रोजेक्ट ने जंगलो के आस पास सब कुछ डिस्टर्ब हो गया। हेलीकॉटर टूरिस्ट से भी जंगल की शांति भंग होती है।
महानगर में रहने वालों को अपने जीवन की आपाधापी से बचने के लिए पहाड़ और जंगल ही चाहिए।
लोगो ने शहरों की शांति भंग करके जंगल में एक तरह से कब्जा ही कर किया। शहरीकरण से कचरा भी बढ़ गया। जंगली जानवरों की फूड हैबिट पर भी असर हुआ है। एक दूसरे के इलाकों में घुसपैठ से वन्य प्राणी और मानव की सहज सरल जीवन में व्यवधान तो आया ही है। उत्तराखंड में नरभक्षी गुलदार द्वारा काफी लोगों को निवाला बना चुके है।
वैसे जंगली जानवर और मानव का टकराव हमेशा ही रहा है।  इसको समझना होगा कि कैसे इसको कम से कम किया जा सकते है। सोशल मीडिया में अवनि के बारे में ट्रॉल्लिंग और मैसेज वायरल होना सही था। लेकिन जो लोग अवनि के निवाला बने उनकी भी सुध लेनी थी।
लाइक ,थम और शेयर करने वालो को गांव में दहशत से जी रहे ,ग्रामीणों के डर को भी समझना ही होगा। एक बात को  नही भूलना चाहिए ,हम लोग मच्छर को मारने के लिए रेपलेंट इस्तेमाल करते है। चूहे , कॉक्रोच समेत जो भी मनुष्य को तंग करें , उससे बचने के उपाय करता ही है। बाघ समेत सभी जंगली जानवर को संरक्षित करना हमारा कर्तव्य है ,लेकिन मानव की सुरक्षा पुख्ता करने के साथ। कुछ ठोस कदम उठाने ही होंगे:
1. सबसे पहले वन विभाग को तुरंत टेक्नोलॉजी से  सुज्जाजित करें ताकि नरभक्षी जानवर ,बाघ आदि को जिंदा ही पकड़ सके।
2. ग्रामीणों की रक्षा भी सरकार के लिए चुनौती हो और उसको भी बचाने के लिए जो भी तकनीक व विशेषज्ञता उसको वन विभाग में उपलब्ध करवाना जरूरी है।
3. देश के सारे वनों के कब्जे युद्ध स्तर से हटवाये  जाए। वर्तमान में वनों की भूमि पर कब्जे हो रखे है। इससे से भी वन्य प्राणी का इलाका कम हुआ है और मानव हस्तक्षेप बढ़ गया है।
4. बाघ समेत सारे जंगली जानवरों की मूवमेंट को रूटीन चेक किया जाए।
5. नरभक्षी बाघ की मूवमेंट के लिए  ग्रामीणों से मिलकर सुरक्षा कवच बनाया जाए।
6. सरकार को भी वन विभाग में अगर कर्मचारी कम है तो ग्रामीणों को प्रशिक्षित कर इस काम में तैनात करें।
7. नरभक्षी के डर को कम करने के लिए पिंजरा , मचान, डिटेक्टर अगर हो तो और घात लगाने की तैयारी पुख्ता हो।
8. कोशिश हो कि जान से न मारा जाए ,लेकिन ग्रामीण की सुरक्षा भी हर कीमत पर पुख्ता और चाक चौबंद रहे।
9. टाइगर फ़ूड चेन का केंद्र है। वन विभाग और ग्रामीणों को एक साथ फूड चेन को संरक्षित करने में पहल करनी होगी।
10. वन विभाग, वन पंचायत, ग्राम सभा, ग्रामीण, अन्य सभी जिलास्तर के विभाग एक टास्कफोर्स को तैयार रखे।
आशा है , हम सब मिलकर  इस बारे में ठोस कदम उठा कर सम्पूर्ण वनप्रदेश और एनिमल हैबिटेट को संरक्षित करेंगे।  IIPCC के उपाध्यक्ष श्री एल गोर कहते है कि " अगर  किसी भी प्राणी का एक विशिष्ट  नेचुरल हैबिटेट होता है, अगर वो नष्ट हो जाये तो वो प्राणी भी नष्ट हो जाता है क्योंकि वो अपने से उस विशिष्ट नेचुरल हैबिटेट को पुनर्जीवित और सृजित नही कर सकता "। इस बात को सदैव याद रखना  ही होगा।
प्लीज अपने विचार जरूर दीजियेगा।

(रमेश मुमुक्षु)
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400

Sunday, 4 November 2018

वायु का मानव को संदेश

(वायु का मानव को संदेश)
मैं वायु हूँ , शुद्ध, निर्मल और मंद मंद बहना मेरा स्वभाव है। कभी कभी तीव्र और प्रचंड रूप से भी बहती हूँ। दुनियां के सभी जीव मेरे कारण ही जीवित है। एक पल भी मैं बहना बंद कर दूं तो जीव का अस्तित्व ही समाप्त हो जाये। लेकिन बहना मेरा स्वभाव ही है।मैं बहुत से कण और धूल अपने साथ ले कर बह सकती हूँ। वो भी कभी कभी। लेकिन ये मानव इतना मूर्ख है कि इसको अहसास ही नही कि वो इतने खरनाक रसायन, तत्व मेरे आंचल में भर रहा है। वो भूलता है कि  मेरी भी क्षमता है। पहले ये मानव बहुत कम प्रदूषण मेरे आँचल  में फेंक दिया करता था। लेकिन अभी तो ये दिन रात केवल अपने सुख और मूर्खता के पोषण के लिए इसके जीवन के आधार को ही नष्ट करने को उतारू है।
ये अपना विवेक खो गया है। जैसे जैसे तापमान कम होने लगता है, मैं इतनी प्रदूषण को कैसे साथ लेकर बह सकती हूँ। धीमी और जमीन का सहारा तक लेना होता है। कितने जीव भी मर जाते है। अचरज का विषय है कि ये स्वयं ही उपदेश देता हैं कि सुबह उठ कर लंबी सांस लो ताकि प्राण वायु से शरीर स्वस्थ और निर्मल बने। लेकिन इसने मुझे इतना प्रदूषित कर दिया की अब कह रहा है कि सुबह सांस संबंधी  योगा मत करो। सांस गहरा मत लो।
हे, मानव तू महामूर्ख है। अपनी ही बनाई गंदी दुनिया में केवल तू खुद ही उलझ गया।जल, जंगल ,जमीन तो तू नष्ट करने में लगा है और अब मुझे भी इतना प्रदूषित कर देगा कि घुट घुट कर अपना अस्तित्व ही न समाप्त कर 

ले ।
तूने कभी सोचा है, मेरे  निर्मल , भारहीन स्वभाव को कष्ट होता होगा। अब तो मेरे लिए भी बहना भी दूभर हो गया है। कितनी बार तो सूर्य की किरणें भी जमीन और मानव के शरीर को छूने असमर्थ हो जाती है। तूने कुछ भी नही छोड़ा। कभी सोचती हूँ रुक ही जाऊँ ,लेकिन मानव ही अकेला नही है और भी जीव है, उनके लिए बहना है। अंधे दम्भ में डूबे हुए ,कुछ देर चिंतन कर ले और कितना जहर मेरे  आँचल में उड़ेलेगा।अब तो अचंभा सा लगता है कि मास्क पहने लगा है कि प्रदूषित वायु शरीर में न प्रवेश करें।
इतना बज्र मूर्ख और असंवेदनशील है कि पहले खुद ही मुझे दूषित करने में लगा रहेगा और भी खुद ही वायु साफ करने के तरीके खोजता है। खुद ही प्रदूषण का उत्पादित करता है और फिर उसको शुद्ध करने के उपाए सोचता है। पहले मुझे दूषित करने के साधन आविष्कृत करेगा और फिर साफ करने की खोज करेगा।  मेरे प्रचंड रूप का अंदाज़ा मानव को पूरी तरह नही है, एक क्षण में मैं इसको तिनके की तरह उड़ा सकती हूँ।लेकिन मेरा स्वभाव विनाश नही बल्कि जीवन  है। लेकिन मूर्ख मानव तू खुद ही अपनी जान के पीछे पड़ा है। जब तू जानता है, फिर भी ,तू ऐसी ऐसी चीज़े बनाता है कि प्रदूषण इतना भर देगा कि स्वयं सांस लेना तुझे दूभर होगा। प्लास्टिक, रबर और कितने रसायन तूने मेरे आँचल में भर दिए। जल भी दुःखी है, भूमि भी उकता गई। तुझे इतना कुछ प्रकृति से मिला ,जिसको तू अनंत काल तक उपयोग कर सकता था।  लेकिन तुझे चैन और आराम नही। एक दम तू सब कुछ कर लेना चाहता है। सबको अपनी मुट्ठी में कसना चाहता ही।तू भूलता है, अगर मैं बहना छोड़ दूं तो कितने पल का होगा तेरा जीवन और तेरा अस्तित्व , ये तू खुद ही जानता है, लेकिन मानता नही।
अब भी समय है , चेत जा , वरना मुझे क्या जो मेरे आँचल में उड़ेलेगा ,वो ही तुझे लेना होगा।  तू ही सदियों से कहता आया है, बोयें बीज बबूल का तो आम कहाँ से होए। कुछ तो याद कर और तनिक रुक कर सोच और प्रकृति को शुद्ध ही रहने दे। तेरे प्रदूषण से प्रकृति को कोई अंतर नही होने वाला बस तेरा अस्तित्व नही रहेगा। सरीसृप तक लोप हो गए, तू भी कब तक रहेगा। ये तय है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष , हिमाल
9810610400

4.11.2024 पहली बार

22.11.2024.2024