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Tuesday, 10 December 2019

*(पुरानी कविता है ,जिसमे भगीरथ के सिर से निकली धार को निर्मल अविरल बहने दो की अपील है)*

(पुरानी कविता है ,जिसमे भगीरथ के सिर से निकली धार को निर्मल अविरल बहने दो की अपील है)
कैलाश पर बैठे ध्यानस्थ 
सर्पों को गले में धारण 
किये भभूत मले शरीर 
में 
जटाओं में 
भागीरथी की स्वच्छ धारा 
को बर्फीले साम्राज्य 
के घमंड रहित 
सम्राट 
गण , भूत , पिचास 
से घिरे 
डर भय जिनके 
पैरों पर गिर कर
अपने को लोप 
कर देते है
त्रिशूल  गाढे 
तीसरी आंख 
को बन्द 
किये 
अर्द्ध नेत्रों से  संसार 
के जड़ चेतन के ज्ञाता
डमरू 
के स्वामी
आकाश पाताल
समेत सम्पूर्ण सृष्टी 
के रक्षक 
को क्या हमारे जैसे
तुच्छ 
स्वार्थी प्रकृति के भक्षक 
शिव की जटाओं से 
निकली स्वच्छ 
जल की 
धारा 
से बनी गंगा 
को भी अपनी 
निकृष्ट 
स्वार्थी 
नियत और सीरत से 
लील कर 
अपनी कलुषित 
मानसिकता
के अनुसार 
मैला कर देने
वाले
बर्फ के साम्राज्य 
को भी खत्म करने 
को आतुर 
अपने को शिव भक्त 
कह कर
गर्वान्वित अनुभव करते
शिवरात्रि 
पर
आडम्बर कर
प्रसन्न करने 
का ढोंग करते
नहीं थकते
झूट स्वार्थ
लालच 
से भरा 
क्या शिव की अर्चना कर सकेगा
भोले को भोला समझ 
भांग धतुरा सुल्फा 
शिव का भोग समझ 
अपनी स्वार्थ की 
पूर्ति करता है
जो 
अपने आराध्य 
के सिर से 
निकली जल धार 
को नहीं साफ़ रख 
सका 
वो क्या शिव की अर्चना करेगा
अब तो वो शिव की तीसरी आंख से भी डरता नहीं
क्या शिव खोलेंगे अपनी
तीसरी आंख 
नहीं 
क्योंकि
आदमी ने स्वयं अपनी
मौत का 
सामान जुटा 
जो लिया है
जल जंगल जमीन 
समेत सब कुछ लील 
कर 
क्या हो सकेगी 
शिव अर्चना
हाँ अभी भी 
किसान , मजदूर 
वनवासी समेत वो सभी जो 
मानव और प्रकृति 
की सेवा में
लगे है
शिव की मूर्ति 
नहीं 
उनके 
पास प्रतिक 
को ही शिव 
समझ 
पूरी तन्मयता 
से सजीव को करते है
स्मरण
उनके निश्चल प्रेम 
को भी देख नहीं 
खोलता शिव 
अपनी तीसरी आंख
मानव की 
नीचता को देख
वो तांडव करने को तैयार 
है
लेकिन वो शिव है
अवसर देना
क्षमा करना 
उनका स्वाभाव है
वो भोले है 
लेकिन भोले नहीं
कुछ ऐसा करें की 
न खुले उनकी 
तीसरी आंख
एक क्षण 
में स्वाहा हो 
जायेगा 
हमारे स्वार्थ का
साम्राज्य
शिव की अर्चना 
उसकी जटा 
से निकली  
धारा अविरल 
निर्बाध 
बहने दो
शिव नहीं कहता
की उनकी तरह कैलाश 
पर रहो 
लेकिन 
ऐसा मत करों की 
कैलाश 
पर ही संकट 
आजाये
संभव है 
कुछ इस तरह 
उसकी अर्चना 
हो सकती
है
शायद......
रमेश मुमुक्षु

पुरानी कविता है ,जिसमे भगीरथ के सिर से निकली धार को निर्मल अविरल बहने दो की अपील है)

*(पुरानी कविता है ,जिसमे भगीरथ के सिर से निकली धार को निर्मल अविरल बहने दो की अपील है)*
कैलाश पर बैठे ध्यानस्थ 
सर्पों को गले में धारण 
किये भभूत मले शरीर 
में 
जटाओं में 
भागीरथी की स्वच्छ धारा 
को बर्फीले साम्राज्य 
के घमंड रहित 
सम्राट 
गण , भूत , पिचास 
से घिरे 
डर भय जिनके 
पैरों पर गिर कर
अपने को लोप 
कर देते है
त्रिशूल  गाढे 
तीसरी आंख 
को बन्द 
किये 
अर्द्ध नेत्रों से  संसार 
के जड़ चेतन के ज्ञाता
डमरू 
के स्वामी
आकाश पाताल
समेत सम्पूर्ण सृष्टी 
के रक्षक 
को क्या हमारे जैसे
तुच्छ 
स्वार्थी प्रकृति के भक्षक 
शिव की जटाओं से 
निकली स्वच्छ 
जल की 
धारा 
से बनी गंगा 
को भी अपनी 
निकृष्ट 
स्वार्थी 
नियत और सीरत से 
लील कर 
अपनी कलुषित 
मानसिकता
के अनुसार 
मैला कर देने
वाले
बर्फ के साम्राज्य 
को भी खत्म करने 
को आतुर 
अपने को शिव भक्त 
कह कर
गर्वान्वित अनुभव करते
शिवरात्रि 
पर
आडम्बर कर
प्रसन्न करने 
का ढोंग करते
नहीं थकते
झूट स्वार्थ
लालच 
से भरा 
क्या शिव की अर्चना कर सकेगा
भोले को भोला समझ 
भांग धतुरा सुल्फा 
शिव का भोग समझ 
अपनी स्वार्थ की 
पूर्ति करता है
जो 
अपने आराध्य 
के सिर से 
निकली जल धार 
को नहीं साफ़ रख 
सका 
वो क्या शिव की अर्चना करेगा
अब तो वो शिव की तीसरी आंख से भी डरता नहीं
क्या शिव खोलेंगे अपनी
तीसरी आंख 
नहीं 
क्योंकि
आदमी ने स्वयं अपनी
मौत का 
सामान जुटा 
जो लिया है
जल जंगल जमीन 
समेत सब कुछ लील 
कर 
क्या हो सकेगी 
शिव अर्चना
हाँ अभी भी 
किसान , मजदूर 
वनवासी समेत वो सभी जो 
मानव और प्रकृति 
की सेवा में
लगे है
शिव की मूर्ति 
नहीं 
उनके 
पास प्रतिक 
को ही शिव 
समझ 
पूरी तन्मयता 
से सजीव को करते है
स्मरण
उनके निश्चल प्रेम 
को भी देख नहीं 
खोलता शिव 
अपनी तीसरी आंख
मानव की 
नीचता को देख
वो तांडव करने को तैयार 
है
लेकिन वो शिव है
अवसर देना
क्षमा करना 
उनका स्वाभाव है
वो भोले है 
लेकिन भोले नहीं
कुछ ऐसा करें की 
न खुले उनकी 
तीसरी आंख
एक क्षण 
में स्वाहा हो 
जायेगा 
हमारे स्वार्थ का
साम्राज्य
शिव की अर्चना 
उसकी जटा 
से निकली  
धारा अविरल 
निर्बाध 
बहने दो
शिव नहीं कहता
की उनकी तरह कैलाश 
पर रहो 
लेकिन 
ऐसा मत करों की 
कैलाश 
पर ही संकट 
आजाये
संभव है 
कुछ इस तरह 
उसकी अर्चना 
हो सकती
है
शायद......
रमेश मुमुक्षु

Wednesday, 4 December 2019

इन विभागों की ड्यूटी क्या है?

इन विभागों की ड्यूटी क्या है?
डी डी ए का मूल काम है, किसानों की जमीन अधिग्रहित करके रेजिडेंशियल  और कमर्शियल यूनिट बनाये। आप सब को आश्चर्य होगा , डी डी ए की करीब 1300 एकड़ भूमि पर करीब 4 वर्ष पूर्व तक कब्जा हो चुका था। कैसे और क्यों कब्जा हुआ? इसका एक मात्र कारण है। जिम्मेदारी का अभाव, विभाग के  भीतर समन्वय की कमी, टेंडर के मकड़ जाल में फंसी व्यवस्था और प्रलोभन को नकारा  नही सकते। आजतक डी डी ए ने जितने इंफोर्समेंट  के नोटिस निकाले होंगे, उनमे से आधे से कम भी किर्यान्वयन की प्रक्रिया में आ जाते तो न तो जमीन पर कब्जा होता ,और न ही बिल्डिंग विरूप होती। 
नियम ताक पर रख कर कोई विभाग काम करेगा ,तो चीज़े बिगड़ ही जाती है। दूसरी ओर दबंग लोग भी विभाग को कमजोर बनाते है। अपनी मर्जी से कुछ   ही कब्जा कर लो और गैरकानूनी निर्माण कर लो। अधिकारी को तिलक लगाने से लेकर धमकी तक चलती है। एक बार नियम टूट जाये तो लोग उसका लाभ उठा लेते है। बहुत से मेहनती और ईमानदार अधिकारी भी होते है। जिनकी बात हम लोग भी कम करते है। 
इसमें मैं सिविल  सोसाइटी की कुछ कुछ जिम्मेदारी की बात करूंगा। बहुत बार बहुत से लोग विभाग को केवल गलत ही कहते है। उससे जो लोग मेहनती और ईमानदारी से काम करते है,उनके नैतिक साहस और सेल्फ रेस्पेक्ट पर कुप्रभाव पड़ता है। काम होते है, बहुत धीमे धीमे ,ये डी ङी ए की कमी है।
इनको स्वयं ही रोजमर्रा देखना चाहिए कि कौन सा रोड टुटा है। कहाँ पर रिपेयर करना है। ये उनकी रोजमर्रा की ड्यूटी है। लेकिन लिखने के बावजूद भी काम लंबित रहता है। इसलिए जनता परेशान होकर इनको बुरा भला कहती है।
इनको एक गैंग टीम बनानी चाहिए। आप बहुत से लोगो को याद होगा, रेलवे और सड़क के लिए भी एक गैंग टीम हुआ करती थी। रेलवे में तो अभी  ही है। ये टीम रोज खुद ही देखती रहे और समय रहते ही ठीक करती रहे ,तो सड़क और कुछ भी खराब ही न हो।
ये इनके ही काम होते है। रेसिडेंट्स को   खाली मेहनत करनी पड़ती है। 
ऐसे ही एम सी डी की कहानी है।।उनको डी डी ए से हैंडओवर हुआ है। वो ही टेंडर और लटकाना। आपस में ब्लेम गेम। काम इतना धीमे होता है की आदमी अधीर हो उठता है।ये भी उनके रोजमर्रा के काम है। एम सी डी में लोग पार्षद को बोलते है। पार्षद उनके काम  को करवाने के लिए विभाग को यहाँ वहां भेजता है। स्टाफ भी इसका आनंद लेते है।" साब ने वहां भेज दिया ,कर तो रहा हूँ।" पुराने घाघ उनके टोटका दे जाते है, वो सिखाते है, " *काम करियो मत फली फोडियो मत* *do nothing look buzy*
कुछ पुराने घाघ सिखाते है, *किसी काम को मना नही करना* हां साब करता हूँ। एक टोटका सरकारी काम में पुरातन समय से चल रहा है। *अफसर के अगाड़ी और घोड़े के पिछाड़ी कभी मत जाओ।*  मजे की नौकरी करें। 
कुछ ईमानदार और कर्मठ लोग विभाग को चलाते है। अब रही टेंडर और उससे जुड़ी कहानी ,ये जग जाहिर है। 
*विभाग को एक रेकी या गैंग टीम बनानी होगी ,जो रोजमर्रा पूरे इलाके की देख रेख करे। ये टीम रिपेयर का सामान लेकर चले। जिसमें सड़क, सिविल,बिजली, हॉर्टिकल्चर सभी शामिल हो ,छोटी छोटी रिपेयर रोजमर्रा होती रहे यो चीज़े खराब ही न हो।*
*एम सी डी को प्रति दिन कूड़ा उठाने ही  ही है। सुविधा और जुर्माना टीम एक साथ रूटीन में चले।*
ये ही एक मात्र तरीका है। कुछ पॉइंट ऐसे है, जो मैं 2007 से देख रहा हूँ। आजतक काम नही हुआ। हो सकता है, डी डी ए उसको भूल ही गया हो,उनको रिकॉर्ड में खोजना होगा।
स्टाफ की कमी  भी आड़े आती है।
बाकी फिर कभी।
रमेश मुमुक्षु
4.11.2019

Friday, 29 November 2019

सेक्टर 4 द्वारका के तिरस्कारपूर्ण कचरे का रुदन.

सेक्टर 4 द्वारका के तिरस्कारपूर्ण कचरे का रुदन.
कचरे के जन्मदाता मानव तेरे से अज्ञानी इस धरती पर कोई नही। जिस कचरे के सामने जाने से  तू नाक सिकोड़ के चलता है। वो कभी तेरी रसोईघर की शान था। तेरे फ्रिज की शोभा और तेरी जीभ के स्वाद का  द्योतक। महामूर्ख जब तू गांव में बसता था ,तेरे पुरखे जो की अक्षरज्ञान से दूर थे ,उनके आस पास कचरा होता ही नही था। वो फलों के छिलके को ,बची कुछ सब्जी के पत्ते और डंठल को अपने पशु को से देता था ,या एक स्थान पर रख दिया करता था। जो अगले एक साल में खाद बन जाती थी। 
तेरी अक्ल ने ही प्लास्टिक पैदा किया।मुझे याद है तू किस तरह कुप्पा सा फूल गया था।प्लास्टिक को तूने अमर बनाने की कोशिश की और वो कोशिश तेरे जी का जंजाल बन गया। प्लास्टिक भी मुक्ति चाहता है। उसमें सब कुछ मिलकर तड़प तड़प के जान देते है। उनको सांस लेने की जगह नही मिलती। कितनी बार निरीह प्राणी उसको निगल कर दर्दनाक मौत मरते है। 
मूढ़मते जैविक अवशेष कूड़ा नही होता। तू  पार्क बनाता है और पतझड़ को कोसता है। पतझड़ खाद की ओर जाने की यात्रा है। बसंत से नए पत्तों यात्रा का आरंभ होता है।  महामूर्ख पत्तों  से खाद निर्मित होती है। किसी जंगल में जाकर  सीख जहां कुछ भी कचरा नही होता। प्रकृति सब कुछ अपने आँचल में समा लेती है।
हे एम सी डी के कर्णधारों शीघ्रता से मेरा तर्पण करो । मुझे अलग करो ताकि में अगली योनी में प्रवेश कर सकूं। घर से बचे कुछ जैविक खजाने को उसके उचित स्थान तक पहुंचा दो ,ताकि वो समय से खाद में परिवर्तित हो सके। जो आज सूखा पत्ता है कभी वो कोंपल के रूप में अस्तित्व में आया होगा। फिर रंग बदलता हुआ, हरा एवं पीला होता हुआ , सूखने लगा होगा। सूख कर वो अपने जन्मदाता पेड़ में खाद का रूप लेकर अपने अस्तित्व को पेड़ की नई कोंपलों और बीजो के रूप में आहूत कर डालता है। मूर्ख वो कूड़ा नही  होता कूड़ा तेरे दिमाग में भरा है। इसलिए तूने सारी वैविध्यपूर्ण पूर्ण धारा को कचरा घर बना दिया है। जो भी तूने लोभ से बनाया, वो तेरा ही काल बनकर तुझे लील लेने को आतुर है। तू अपने को स्वयंभू समझने लगा। प्लास्टिक और रासायनिक खाद आज तेरे लिए काल बन कर तेरे अस्तित्व को  चुनौती दे रहे है और तू ठगा सा अगल बगल झांक रहा है। हज़ारों वर्ष तू भी प्रकृति की चाल चलता रहा। अभी एक  शताब्दी के आस पास तूने प्रकृति की लय ही बिगाड़ने का काम किया है। तस्वीर तेरे सामने है। धरती जीतने  जीतने वाले एक बटन दबाकर तू अपने अस्तित्व को मिटा सकता है। लेकिन तू चिंता न कर तू कचरे से ही मर लेगा।
जल, वायु और समस्त दूषित कर कर दिया है। तू दूषित हवा और पानी से ही मर सकता है। एक पल ऑक्सीजन न मिले तो तेरा धरती से लोप ही हो जाये और तू अपने को विश्व विजयी समझता है।
धरती एक है ,तूने इसको अपनी खंडित सोच से खंड खंड कर डाला। लेकिन प्रकृति की चाल को रोकना तेरे बूते की बात नही। अभी दुनियां मुझे कचरा समझ कर घृणा करता है। ये तेरे भीतर छिपी गंदगी का परिचायक है। अगर तू घर से ही अलग अलग गीला सूखा कर ले ,तो कचरे के ढेर क्यों लगे? अब कचरा बढ़ गया तो  नए नए महंगे तरीके खोजों और उलझते रहो। अब तो चेत जा नही तो  फिर कब चेतेगा। अब झेल मेरे इस अवस्था से निकलने वाली गैसों और लीचट को , सूंघ बदबू और अपने पवित्र पावन शरीर को नाना बीमारियों का घर बना ले। जब हम प्रकृति में थे, उस वक्त तितलियां और मधु मक्खियों शहद बनाती थी। अब हमारी तूने ऐसी गत कर दी ,अब हमारे इस मिक्स कचरे में विषैले तत्व और विषाणु पैदा होंगे ,जो तुझे आराम से जीने नही देंगे।  तू अपनी मौत खुद ही मरेगा और अपनी गलती से ही सब कुछ झेलने को मजबूर होगा। हम तो कचरा बन झेल ही रहे है। ओ एम सी डी के कर्णधारों मेरा तर्पण करो।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष ,हिमाल 
29. 11.2019

द्वारका सेक्टर 5 आशीर्वाद चौक के सामने के कब्जे पर निर्मित हो रहे धर्मिक स्थल की आत्म व्यथा

द्वारका सेक्टर 5 आशीर्वाद चौक के सामने  कब्जे  पर निर्मित हो रहे धर्मिक स्थल की आत्म व्यथा
हे टैक्स पेयर्स मानव तूने मुझे डी डी ए की जमीन पर सेक्टर 5 मार्किट ठीक आशीर्वाद चौक पर ,एस डी एम सी के बेंच के सामने स्थापित करने का घोर पाप किया है। न तो तूने इस जमीन की गुणवत्ता की खोज की और न ही वास्तुशास्त्र के नियमों का पालम किया। बस पुरानी मूर्तियों के सहारे नुक्कड़ के मंदिर की स्थापना की कोशिश भूमि पर कब्जे के लिए की ,जो तेरा एक तरीका बन गया है। मुझे मालूम है ,हे मूर्ख मानव तेरे पुरखे धार्मिक स्थान की स्थापना के लिए भूमि का चयन करते थे ,वो भी दोषरहित भूमि का । तदनुसार प्रतिमा की विधिसंवत प्राणप्रतिष्ठा का अनुष्ठान संपन्न होता था। लेकिन ये तो कब्जे की जमीन है। भूमि के मालिक डी डी ए को  इसकी चिंता नही की उनकी मिल्कियत पर ये ये मानव कब्जा कर रहा है। हे डी डी ए तुझे अभी भी जिम्मेदारी का अहसास नही ,तेरी 1300 एकड़ अधिग्रहित  कृषि  भूमि पर कब्जा हो चुका है। 
 एस डी एम सी ने  यहां पर बेंच लगवा दिए। मानव की कमजोरी से बने विभाग ठीक उसके जैसे ही कार्य कर रहे है।
*विनती* मेरी भद्र समाज से करबद्ध विनंती है, मेरे को इस कब्जे की भूमि से तुरंत हटवा दो। वरना ये मानव मुझे इतना फैला देगा कि मैं हमेशा के लिए कैद हो जाऊंगा।
मुझे स्थापित करना ही है तो कब्जे की भूमि पर नही , बल्कि लीगल जमीन पर अपने पुरखों की तरह धार्मिक विधिनुसार करो।
हे    मार्किट एसोसिएशन   के पदाधिकारियों,   निगम के पार्षदों , उच्च  डी डी ए के उच्चाधिकारियों  ,  अपने मेठों को कहे कि कब्जे को पक्का करने की बजाए ,सही रिपोर्ट रिपोर्ट विभाग को दें। मुझे मुक्ति दो ताकि तेरे पाप तनिक कम हो सकें।
रमेश मुमुक्षु

Saturday, 16 November 2019

पेड़ की आत्मकथा

पेड़ की आत्मकथा
मेरे मनुष्य भाई तूने दुनिया में कमाल ही कर दिया। जब मैंने होश संभाला तो  मैं खेतो के बीच खुश था। उस वक्त शांति ही शांति थी। तू भी मेहनत करता था। मेरी छाया में तूने दशकों गुजार दिए थे। मेरे पास पक्षी हमेशा रहते थे। हवा भी दूर से ही हाथ हिला देती थी। मुझसे मिलकर हवा दूर बह जाती थी। वर्षा तो धीमे धीमे मुझसे बातें करती रहती थी। बेलों के गले में घंटियां संगीत सुनाती थी। हल बेल में तेरे प्राण बसते थे। चारों और रंग बिरंगी तितली उड़ती कितनी सूंदर लगती थी। लहलहाते खेतों से बातचीत
होती थी। सरसों के फूलों पर मधुमखियों की कतारें गुनगुनाती उड़ती रहती थी और मेरी डालियों पर छत्ते बनाकर  शहद का आनंद देती थी। धुंधलका होते ही सब ओर शांति और नीरवता छा जाती थी। मेरी सेहत भी कितनी अच्छी रहती थी।
लेकिन देखते ही देखते सब कुछ बदल गया। खेत खत्म हो गए। सारे मेरे साथी पेड़ और झाड़ियां खत्म कर दी गई। कितने हमारे साथी कीट पतंग और पक्षी आज न जाने कहाँ पर खो गए। शाम होते ही मेरे गीदड़ साथी आ जाते थे।  अब कही खो गए। मेरे जन्म से ही मैंने शांति ही देखी थी। लेकिन ये मानव न जाने क्या क्या बनाता चला गया। सब ओर कंक्रीट के जंगल उग गए। सड़क और उनपर शोर मचाती गाड़ियां रात दिन गुजरती है। आकाश में गिद्ध की जगह आजकल हवाई जहाज उड़ते है।
पहली बार जब इन सब की आवाज सुनी थी ,तो कितना डर लगता था। लेकिन अब सब एक जैसा ही हो गया। हवा इतनी दुःखी और बीमार रहने लगी है। मज़े की बात है ,ये मानव ही है,जिसने हवा को बीमार किया है। अब खुद ही मास्क लगाकर घूमता है। कितनी बार शरीर छोड़ने का मन करता है। लेकिन मेरी  जड़ों की साथी  मिट्टी अकेली न पड़ जाए। इसलिए जिंदा हूँ। एक तरफ सड़क और गाड़ी और दूसरी ओर सीमेंट की बिल्डिंग। बस अब तो पुराने दिन याद करना ही हुआ।हवा नही, पानी नही और जो है,वो दूषित है। मेरे नीचे कोई नही आराम करता । अब केवल धुप  से बचने के लिए अपनी गाड़ी खड़े करते है। गाड़ी भी उदास खड़ी रहती है। क्या जीवन है,इसका दौड़ते रहे और ढोते रहो? 
  आजकल  सूरज भी कही खो गया लगता है। चांद की चमक भी धूमिल होती गई है। अजीब है,ये मानव पहले बनाता है,फिर आपस में झगड़ता है। सांस तक नही ले पाता है। लेकिन सब कुछ गंदा करता है। मैं अभी कितनी उम्र का हो गया हूँ, लेकिन अभी मुझे ये मानव जिसने मेरी छाया में कड़कती धूप में कितना आराम किया , भूल ही गया लगता है। ये सब कुछ भूल गया । हवा और पानी की मिठास और खुशबू ,ये अब नही रखता है,याद। जिस डाल पर बैठा है,उसको ही काट रहा है। मुझे याद नही आता कि पहले गंदगी भी होती थी। जो भी फेंकता था ,वो खाद बनती जाती थी। कितना मूर्ख है,पहले पन्नी पन्नी को देख खुश हो जाता था। अब पन्नी के नाम से भी डरता है। कितने मेरे साथी बिचारे पन्नी के कारण ही जान धो बैठे। मैं इसके ही मुँह से सुनता था " बोये बीज बाबुल का ,फल काहे को होये" । 
अभी मिट्टी के लिए , कीट पतंग और कुछ पक्षी के लिए जिंदा रहना ही होगा। खुद ही बिगाड़ता  करता है, खुद ही रोता है। खुद ही गंदा करता है और खुद ही साफ करने के लिए शोर भी करता है। अभी तो एक और अचरज की बात सुनी है, उस दिन मैना बता रही थी कि अब ये आप जैसे बूढ़े पेड़ों को उखाड़ कर कही  और भी लगा देता है। मुझे सुनकर डर भी लगा। भला ये मेरी जड़ों को उखाड़ कर मुझे कही और गाड़ देगा। कैसा दुष्ट मानव है, खुद कहता फिरता है,अपनी जड़ों को मत काटों , नही तो जीवित नही रह सकोगें। लेकिन हमारी जड़ों को उखड़ते हुए ,इसको कोई भावना नही रही। जब ये खुद का भला नही सोच सकता तो भला हम जैसे पेड़ों का भला क्या सोचेगा? ये तो शुक्र है,कुछ हम से प्रेम करने वाले मानव है। इसी कारण इस पर अंकुश है। अभी हवा को दूषित करके हम पेड़ों की याद इसको आ रही  है। लेकिन "अब पछताए क्या होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत", इसके मुख से ही सुनता आया हूँ।ये खुद ही अपने शोर शराबे से परेशान है।
आधी रात से भोर होने तक कुछ शांति मिलती है। सुबह होते ही , फिर चिल्ल पो आरम्भ। इसकी माया को देख हंस लेता हूँ। रात होने लगी है, सुस्ता लूँ , अभी रात होने के  साथ पक्षी भी आते  होंगे। जब तक जीवन है, देखते है ,ये सब और करता हूँ ,याद बचपन की ,जो  न जाने कहाँ पर पीछे छूट गया है।
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष, हिमाल
15.11.2019

Thursday, 31 October 2019

सरकारी स्कूल में आई क्रांति:दिल्ली सरकार को सादुवाद

सरकारी स्कूल में आई क्रांति:दिल्ली सरकार को सादुवाद
एक समय था कि दिल्ली में सभी बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। लेकिन कालांतर में सरकारों स्कूल पिछड़ते चले गए। निजी स्कूल की रफ्तार इतनी  तेज हुई कि सरकारी स्कूल बन्द करने के कगार पर पहुँच गए। सरकारी स्कूल  के सुधार की बात घाटे का सौदा बन कर रह गई। सरकारी स्कूल को सभी लगभग भूलने लगे थे। यहां तक माहौल बन गया था कि लोग अपने बच्चों को गुस्सा करते हुए कह देते कि अगर कहना नही माना तो सरकारी स्कूल में डाल देंगे, बच्चा डर जाता था।  सरकार भी सरकारी स्कूलों को प्राइवेट हाथ देने का मन बना चुकी थी। 
लेकिन वर्तमान दिल्ली सरकार ने एक डेड इन्वेस्टमेंट को एक मिशन ही बना डाला। सरकारी स्कूल को सुधारना और इसके बारे में सोचना भी एक बड़ा चैलेंज ही था। सरकारी स्कूल को ठीक करने का अर्थ है ,शुद्ध रूप से आम आदमी के लिए कुछ ठोस और बड़ा कदम। सरकारी स्कूल में थोड़ा बहुत कमाने वाला भी नही पढ़ाना पसंद करता है। वो  बच्चों को गाली मोहल्लों के निजी स्कूल में पढ़ाना चाहता है। लेकिन श्री केज़रीवाल और मनीष जी ने दिल्ली के सरकारी स्कूल की काया ही पलट दी। टूटे फूटे और कभी साफ न रहने वाले स्कूल आज निजी स्कूल जैसे लगने लगे है। सम्पूर्ण गुणवत्ता पर एक मिशन की तरह दिल्ली सरकार जुटी है। स्कूल की बिल्डिंग से लेकर पढ़ाई एवं अन्य एक्टिविटी ने स्कूल को पूरी तरह बदल दिया और काया पलट हो गई। स्कूल की साज सज्जा से लेकर बच्चों को खुश रहने की बातें, तोतोचान ,जापानी  विश्व विख्यात उपन्यास में वर्णित बातों को जमीन पर लाने जैसा लगता है। सच में ये आप सरकार के साहस और मिशन का परिचायक ही है। पिछले पांच वर्षों में एक सपना साकार करने जैसा ही है। तरह तरह के स्कूल ,जैसे स्कूल ऑफ एक्सीलेंस जैसा प्रयोग देखते ही बनता है। अभी बहुत आम आदमी के बच्चे इन स्कूलों में जाते है, उनके स्वयं के जीवन में  परिवर्तन आने  लगा है। माहौल में परिवर्तन धीमे धीमे ही आता है। लेकिन दिशा और दशा के लिए दिल से धन्यवाद तो निकलता ही है।।
खेलों के लिए विश्व स्तरीय मैदान एक बड़ा कदम है। घुमनहेड़ा में हॉकी का आधुनिक मैदान बच्चों के खेल में आमूलचूल परिवर्तन का परिचायक सिद्ध होगा। 
मनीष जी और अरविंद जी ने ऐसा किया जैसे चंगेज़ आत्मतोफ के लघु उपन्यास " पहला अध्यापक "के टीचर दुष्यन ने किया । उस उपन्यास में रूसी क्रांति के बाद शिक्षा के विकास और संवर्धन के लिए दूरदराज में स्कूलों की स्थापना की और किर्गिस्तान के कुरकेव गांव में स्कूल की स्थापना की कहानी और स्टेपी मैदान में दूर दिखते टीले पर दो पॉप्लर के पौधों के रोपने के संग स्कूली शिक्षा का आरम्भ करने जैसा कुछ इन दोनों ने किया है। ऐसा काम सपना देखने वाले ही कर सकते है।
मैंने भी व्यक्तिगत रूप से सन 2000 में ठीक सरकारी स्कूल सुधार पर एक सपना बुना था। एक विस्तृत दस्तावेज तैयार किया था। हस्तक्षर अभियान भी आरम्भ किया ,लेकिन चरितार्थ नही हो सका। इसको मैं व्यक्तिगत विफलता ही समझूंगा। इसलिए भी दिल्ली सरकार के कदम को मैं अपने सपने को साकार होते हुए ,महसूस करता हूँ।  मेरे सपने को ,जो दिल्ली सरकार ने 14  वर्षों बाद साकार करना आरम्भ किया और 2019 तक ये मूर्त रुप भी लेने लगा है। जब मैं  अपने सपने की बात करता हूँ तो ये वो है ,जो हमने साकार करने की सोची ही नही ,आरम्भ भी किया था। लेकिन अंजाम तक नही जा सकें। संभव है, ऐसा सपना बहुत से लोगो ने देखा होगा। सपना देखते ही उसको साकार रुप देने में समय नही लगाना चाहिए। सपना एक व्यक्ति नही बहुत से व्यक्ति देखते है। जो पहल करता है, वो चरितार्थ भी करता है। 
दिल्ली सरकार ने कितनो के  सपने पूरे किए होंगे। ये चिंतन का विषय है। 
इस तरह स्कूल को सपने की तरह उभार देना , दिल्ली सरकार की बहुत बड़ी सफलता है। पूरा देश इस बात को  सिद्धान्त रूप से स्वीकार करता है।  बहुत कुछ अच्छा भी नही होगा। लेकिन जब एक आमूलचूल परिवर्तन होता है ,तो थोड़े कुछ पड़ाव समय के साथ यात्रा में शामिल होते रहते है। जिन्होंने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की है, उनको अपने सरकारी स्कूल को याद करना चाहिए। आज पुनः वहां पर  जा कर वो सारे पल स्मृतिपटल पर उभर आएंगे। मेरे जैसे केवल कक्षा में गप्प मारने वाले तो बहुत कुछ याद रखते ही है। टीचर की धुनाई, डंडा, मुक्का, मुर्गा और डेस्क पर खड़े होना ,कौन भूल सकता है। उस पर घर वालो का कहना " मास्टरजी शैतानी करे ,तो हड्डी फसली एक कर देना" । टीचर के नामकरण , मौका मिलते ही स्कूल से फुटक जाना ,कभी कोई भुला नही सकता।
 अंत में महान कवियत्री महादेवी वर्मा की लाइन याद हो उठी
 " चिर सजग आंखे उनींदी 
आज कैसा व्यस्त ताना ,
जाग तुझको दूर जाना", 
अभी दिल्ली सरकार की यात्रा जारी है। उम्मीद है ,जल्दी सरकारी स्कूल की ओर जनता का पॉजिटिव रुख आएगा, इस बात से  इंकार नही किया जा सकता, ऐसा मुझे विश्वास है। टूटते और बिखरते हुए  सपने को साकार करने के लिए ,दिल्ली सरकार,  तमाम एस एम सी टीम एवं  टीचर्स को सादुवाद ।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400