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Friday, 25 February 2022

विश्व शांति और आणविक हथियार: क्या कुछ बदला है?

विश्व शांति और आणविक हथियार: क्या कुछ बदला है?
रूस : 6225 आणविक हथियार
अमेरिका: 5550
चीन: 350
फ्रांस: 290
यू के : 225
पाकिस्तान: 165
भारत:  160
इजराइल : 90
नार्थ कोरिया : 40
रूस की जनसंख्या करीब 14 करोड़ , देश का क्षेत्रफल 1 करोड़ 71 लाख वर्ग किलोमीटर , 
अमेरिका की जनसंख्या 32 करोड़ देश का क्षेत्रफल 98 लाख वर्ग किलोमीटर , 
चीन की 1 अरब 40 करोड़ , क्षेत्रफल 95 लाख वर्ग किलोमीटर,
भारत जनसंख्या 1 अरब 35 करोड़ ,क्षेत्रफल 32 लाख वर्ग किलोमीटर 
पहले तीन देशों का क्षेत्रफल , जनसंख्या आणविक हथियार बहुत ही अधिक है।
रूस और अमेरिका के पास विश्व के सबसे अधिक आणविक हथियार है।
इनके बाद चीन आता है  , जिसके पास 350 ही है। इतने आणविक हथियार वर्तमान दुनियां के पास है।  जापान में दो बम छोड़े गए, वो थे ,लिटिल बॉय और फेट बॉय ,जिस कारण करीब 2 लाख जनसंख्या मारी गई।
लिटिल बॉय एटम बम 15 किलोटन था। अभी  अमेरिका के ट्राइडेंट 455 kt Submarine Launch Ballistic Missiles 
रूस के पास एस एस , 800 kt Intercontinental Ballistic Missile . सामान्य भाषा में कहें तो विश्व एक बटन दबाने से ही नष्ट हो सकता है । जब 15 और 22 किलोटन बमों ने 2 लाख तक लोगों को मार दिया और अब इनकी मारक क्षमता  की तुलना ही नही की जा सकती है। लेकिन आज भी मनुष्य मनुष्य के विरुद्ध कुछ कुछ करता है।  आदिम प्रवृति अपनी बेसिक स्टिंक्ट आजतक  नही बदल सका है। स्वाभाविक प्रवृति/ प्रकृति में आज भी संघर्ष पाया जाता है। इसी का उद्विकास पत्थर के हथियार से आणविक हथियारों तक पहुँच गया। पत्थर मार कर दुश्मन को भागना या हराना और आणविक हथियार से दुश्मन को परास्त करना मूलतः एक ही है। हम लोग अगर हिसाब लगाएं तो आपस में मनमुटाव, मतभेद , बुराई आदि में लगे रहते है। आजकल चुनाव का सीजन है, हम सब देख सकते है। होड़ लगी रहती है कि किसकी कितनी बुराई करें। ये हम जैसे आम लोगो से लेकर सभी मनुष्यों में पाया जाता है।  कभी जानवरों को लड़ते, घुर्राते हुए देखों और मनुष्यों को लड़ते देखों तो एक जैसा ही लगता है। विश्व की सभी इतिहास, कहानी और सभी मीडिया में हिंसा का अपना अपना पक्ष ही दिखता है। 
लेकिन मानव विकास में इसकी उद्विकास की यात्रा में धर्म, आध्यत्म,  संगीत, कला,
 के समस्त रूप दर्शन और आत्मचिंतन जैसे मार्ग खोजे ताकि मानव के भीतर संघर्ष और दुश्मनी जैसी प्रवृति को कम करके अहिंसा, शान्ति एवं सहअस्तित्व व सतत विकास के मार्ग पर अनंतकाल तक मानव यात्रा करता रहे। लेकिन उसके संघर्ष के बीज अब पेड़ बन चुके है। 
एक बटन पूरी मानव जाति को नष्ट कर सकता है। ये विकास और मानव विकास की  कुल पूंजी है। आश्चर्य की बात है कि मनुष्य हिंसा नही करना चाहता। लेकिन आपसी विश्वास आजतक पूरी तरह नही पनप सका। अचानक डर जाना, अचानक हाथ उठ जाना ,ये आदिम भय और वृति आज भी हमारे भीतर मौजूद है।इसी की पराकाष्ठा आणविक हथियार है। 
एक विचार ऐसा भी है कि आणविक हथियार है,  तो तीसरा विश्व युद्ध नही होगा। इस विचार के कारण आणविक हथियार दुनियां में बढ़ते ही  जा रहे है।  शांति हथियार के बिना संभव नही। ये विचार और अवधारणा विश्व को आणविक खतरे में धकेल रहा है। आजतक हम युद्ध से हुए जान माल का नुकसान लगाते  है, लेकिन  युद्ध से पर्यावरण पर कितना घातक असर होगा, इसका आकलन नही करते। 
आणविक हथियार मानव में मौजूद बुराई या उसकी प्रवृति का का परिणाम है।  अंगुलिमाल ने  बुद्ध को बोला कि ठहर ,बुद्ध ने प्रत्युत्तर में बोला कि मैं तो ठहर गया तो  तू कब ठहरेगा । मानव जाति कब ये स्वयं से कहेगी ? देखना हैं , ये कब होगा।
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
25.2.2022

Saturday, 29 January 2022

💐निगाहें दूर घाटी तक चली जाती है💐

💐निगाहें दूर घाटी तक चली 
जाती है💐

कमरे का किनारा 
जो राह 
देखता है कोई 
आयेगा 
झुरमुटों  से होता रास्ता 
रुका हुआ सा लगता है 
अभी अभी हवा के झोंको ने पेड़ो को 
तड़पा  दिया है 
वहीँ लाल मुहँ वाली चिड़िया ठीक 
समय पर पेड़ के तने से निकली 
सूखी डाली पर कुछ गा रही हैं 
संभव है वह कुछ याद दिल रही हो 
निगाहें दूर घाटी तक चली 
जाती हैं 
सीढ़ीनुमा खेत नीचे चले जाते 
छोटी नदी तक 
नीचे नदी तक 
लेकिन पानी संगीत सुनाता रहता है 
बादल  आसमान 
में धीमे धीमे 
हिमालय की ओर जा रहें  है 
जैसे कोई संदेशा ले जा रहें  हैं
यकायक ढांप लिया 
सूरज को जिसमे कम ही सही
धुप की तपिस अचानक कहीं दुबक गई 
ठण्ड का अहसास होने लगा है 
सिहरन सी हो जाती है बदन में
तभी बादल ने फिर से सूरज को छोड़ दिया 
सारी घाटी धूप से रोशन हो गई 
दूर पहाड़ी रास्तों पर बोझा
उठाये स्त्रियाँ 
जीवन का सच्चा चित्र
 उपस्थित  करती हैं 
जंगलों में 
लकड़ियाँ बीनती
 स्त्रियों के गले से 
झरते गीत प्रकृति का सच्चा राग ही तो है 
दूर घाटी  में स्थित गाँव से 
कुत्तों के भोंकने के आवाज़ किसी अजनबी 
के आने को संकेत होती है 
शाम के  
के धुंधलके
 में जानवरों
 को हांकते बालक 
सूरज की पीली
 धूंप और  उड़ती 
 धूल में कितने 
 खूबसूरती लगते है 
दूर पर्वतों के 
ढालों पर कोई 
बूढा कमर
 में छतरी लटकाए  
हाथ में डंडा 
लिए बकरियों 
को चराते
 आज भी दीख
 पड़ता है
मानव के सबसे
 पुरातन उद्योग को
जारी रखते हुए 
पहाड़ो में स्थित 
मंदिरों में 
ढोल और दुदुम्भी की 
आवाज़ संगीत की 
पराकाष्टा ही तो है 
अचानक पर्वत
 की चोटियों
 पर पहुँचते ही 
सामने कोई झरना 
दीख पड़ता है 
जो सच स्वप्न सा 
लगता है. 
फूलो पर मंडराती 
तितलियाँ , मधुमखियाँ
 सुमधुर संगीत छेड
देती है 
दूर तक फैले जंगलों की 
चादर में 
छितराए रंग 
आँखों को 
स्थिर कर देते है
ठंडी हवाएं 
धीमे धीमे 
बहने लगती है 
तन को छु
 निकल जाती है 
दूर विस्तार की 
यात्रा पर 
दोपहर होते ही 
झींगुर अपनी 
तान छेड
देता है 
अभी अभी 
पक्षियों का झुण्ड कोलाहल 
करता जंगल में इधर उधर उड़ता 
दूर निकल गया है 
चांदनी रात में 
सब कुछ चांदनी  से भर 
जाता है 
उस वक्त चाँद पर 
कही कोई 
भुला भटका 
बादल का 
टुकड़ा उसकी 
खूबसूरती को बडा
देता है 
फिर निगाहे कमरे के किनारे 
में अटक जाती है 
जहाँ झुरमुटों के बीच से 
सुना रास्ता गुजरता है 
जो आज कुछ
ज्यादा  सुना लग
 रहा है….
रमेश कुमार मुमुक्षु 
1999  धरमघर, हिमदर्शन कुटीर , पिथौरागढ़, उत्तर प्रदेश (उत्तराखंड)

Wednesday, 26 January 2022

🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳 गणतंत्र दिवस के दिन आत्मचिंतन

🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
गणतंत्र दिवस के दिन आत्मचिंतन
26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ और हम सब भारत के नागरिक घोषित हुए । एक आदमी भले  भूमिहीन मजदूर हो उसके पास किसी भी नेता , जो भले बाहुबली हो, चुनाव में हराने की ताकत है।  
*लेकिन मैं भारत का नागरिक हूँ , मैँ किसी को वोट दूँ, ये मेरा अधिकार है। मेरी मर्जी , लेकिन  क्या मैं वास्तव में देश, संविधान, धर्म, जाति, धन की ताकत, शराब , घोड़ा गाड़ी, प्रलोभन  की परवाह न करने अपने विवेक  और पूरी समझ से मत का प्रयोग करता हूँ?* 
 अगर ऐसा है कि राजनैतिक दलों को इतना बेतहासा खर्च क्यों करना पड़ता है? 
 चुनाव खर्च की बानगी देखें। लोक सभा का पार्टी का खर्च ,जो चुनाव आयोग की वेब साइट पर दिया गया है। मैं केवल कांग्रेस और बीजेपी का ही खर्च दे रहा हूँ।
2009            
कांग्रेस  : 3 अरब 69 करोड़ 
बीजेपी : 2 अरब 80 करोड़
2014
कांग्रेस : 5 अरब 14 करोड़
बीजेपी : 7 अरब 14 करोड़
2019  
कांग्रेस : 8 अरब 20 करोड़ 
बीजेपी :  12 अरब 64 करोड़
 ये वो खर्च है, जो पार्टी ने चुनाव आयोग में  लिखित दिया है। 
*नोट: रोड शो, विभिन्न रैली , पैसा, शराब, टिकट खरीदने के लेन देन,  का खर्च चुनाव खर्च नही माने जाते।*
आज तक भी सभी राजनैतिक दलों ने अपने खर्च का ब्यौरे  जमा ही नही किये है।
*चुनाव आयोग चुनाव करवाने  का सरकारी खर्च बहुत बड़े स्तर पर होता है।*
73 साल बाद भी वोटर को लैपटॉप, मोबाइल, साईकल, स्कूटी, पीछे के दरवाजे से भी प्रलोभन दिया जाता है। मतदान से पूर्व काल रात्रि के खेल हम सब जानते है।
ये हमारा रिपोर्ट कार्ड है। 
आज 26 जनवरी 2022 के दिन हम वोटर अपने अधिकार , जो संविधान ने आज़ादी मिलते ही हम भारत के नागरिक होने के नाते प्रदान,  उसका सदुयोग करना हमारे शुद्ध रूप से अधिकार में है।
" *डॉ अंबेडकर की चेतावनी* 
*मैं* संविधान की अच्छाईयां गिनाने नहीं जाऊंगा क्योंकि मेरा मानना है कि 'संविधान कितना भी अच्छा क्यों ना हो वह अंतत: खराब सिद्ध होगा, यदि उसे अमल / इस्तेमाल में लाने वाले लोग खराब होंगे। वहीं संविधान कितना भी खराब क्यों ना हो, वह अंतत: अच्छा सिद्ध होगा यदि उसे अमल / इस्तेमाल में लाने वाले लोग अच्छे *होंगे*"
लेकिन हम सब स्वतंत्र एवं गणतंत्र भारत के नागरिक है, लंबे संघर्ष के बाद हमने ये सब हासिल किया और आगे हम देश को और उसके समस्त प्राकृतिक संसाधनों को अक्षुण्ण रखते हुए , देश को आगे ले जाएंगे। 
सभी को गणतंत्र दिवस की बधाई।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
👏 *( कुछ लोग मेरे लंबा लिखने से नाराज़ हो जाते है,लेकिन वो भी मेरे प्रिय है)*

Thursday, 13 January 2022

लोहड़ी दो भइ लोहड़ी दो

लोहड़ी दो भइ लोहड़ी दो
70 के दशक में हम लोग पांचवी से आठ में पढ़ने वाले और कुछ छोटे भी करीब 8 से 10 बच्चें घर घर जाते थे , गाना गाते थे:-
सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन बेचारा हो
दुल्ला भट्टी वाला हो, दुल्ले ती विआई हो,
शेर शकर पाई हो, कुड़ी दे जेबे पाई हो,
कुड़ी कौन समेटे हो, चाचा गाली देसे हो
चाचे चुरी कुटी हो, जिम्मीदारा लूटी हो,
जिम्मीदार सुधाये हो, कुड़ी डा लाल दुपटा हो, 
कुड़ी डा सालू पाटा हो, सालू कौन समेटे हो,
आखो मुंडियों ताना ‘ताना’, बाग़ तमाशे जाना ‘ताना’,
लोहड़ी दो लोहड़ी
उस वक्त कोई पांच पैसे , दो पैसे दे दिया करते थे।बच्चें मिशन की तरह सब के घर जाते थे, क्या जोश होता था, उमंग से भरे घूमते थे ।  पैसा मिलने पर  रेवड़ी, ग़जक, गुड़ की पट्टी और मूंगफली खरीद कर  लेकर आनंद लेते थे। ये सब खरीद कर बच्चे चुंगा भी लेते थे। चुंगा सबसे आकर्षित होता था।
कोई शर्म नही, जिझक नही। जब कोई कुछ नही देता ,तो बच्चें खीझ में बोलकर कर रफू चक्कर हो जाते थे हुक्का जी हुक्का, ये घर बुख्खा
कोई झगड़ा नही, बस ये वर्षो चला।  उस वक्त बड़े स्तर पर पंजाब के लोग  ही आग जलाकर लोहड़ी मानते थे, लेकिन आनंद सब लिया करते थे।  बचपन के दिन यकायक याद आ गए। दोस्त अब नाती पोते वाले हो चले है। शायद उनको याद है कि नही, कुछ इन खूबसूरत यादों को छिपाने भी चाहते ,लेकिन ये पत्थर की लकीर पर अंकित यादें है, इन पर समय की परत चढ़ सकती है, लेकिन मिट नही सकती। मुझे विश्वास है,ये पढ़ कर  वो मंजर याद आ ही जायेगा। बेतरतीब स्वेटर, जूतों में झांकते झरोखे, रंग बिरंगी चप्पल , कई बार नंगे पैर सड़क पर ऐसे चलते थे कि बादशाह हो , मित्रों एक क्षण के किये बचपन के निकट जाने का आनंद ये चंद शब्द दे ही देंगे, ये तय है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
13.1.2022

Saturday, 8 January 2022

कोरोना और मानव का दम्भ

कोरोना और मानव का दम्भ
कर लो दुनियां मुट्ठी में, सारी दुनियां मेरे कदमों पर झुकती है, मैं चाहूं तो दुनियां को झुका सकता हूँ , जैसी बातें और भड़के मानव का स्वभाव है। 
पत्थर के हथियार से  पृथ्वी को नष्ट करने वाले शस्त्र मानव ने मानव को मारने के लिए बना लिए  है।
पृथ्वी को अपने आधीन करने की जिद उसको और  भी दम्भी बना देती है। लेकिन मानव में पैदा हुए ,कुछ लोग जो प्रकृति के इतना करीब खुद को पाते थे, वो उसकी लय और स्पंदन को महसूस कर लिया करते थे। उन्होंने मानव को चेताया कि तू सब कुछ कर सकता है ,लेकिन प्रकृति को जीत नही सकता। जीतने के बाद भी तू केवल हारेगा ,ये तय है। 
आज मानव के पास जानकारी, ताकत, तकनीक सभी है, लेकिन अदृश्य सूक्ष्म या अतिसूक्ष्म जीव से वो सहमा ही नही, बल्कि भयभीत है। कोविड नाम दिया है, उसका, पिछले वर्ष तो पूरा विश्व बिल्कुल एक तरह से दुबक ही गया था। उस वक्त मानव को यकायक ज्ञान हुआ कि उसने सुंदर और स्वच्छ प्रकृति को अपने विकास के दंश से कितना दूषित कर दिया है।
जब 21 दिन में विषाक्त हवा साफ हो गई थी, आकाश साहस नीला हो चला था। पेड़ों के पत्ते साफ और अपने वास्तविक रंग में दिखने लगे थे।
उस वक्त मानव की सारी विकास की यात्रा जैसे ठहर ही गई,लगती थी। कोविड ने मानव को दिखा दिया कि डर और अनुशासन क्या होता है।  कोविड को केवल अनुशासन और खास व्यवहार से जीता जा सकता है। लेकिन मानव की जिद और हठधर्मिता उसको हारा हुआ स्वीकार  नही करती है। कितने लोग दुनियां को  छोड कर चले गए है। लेकिन उसके बावजूद मानव सब कर रहा है, जिसके कारण उसको जान से भी हाथ धोना पड़ रहा है। कोविड ही नही ,बल्कि प्रदूषण से भी वो जूझ रहा है। केवल इसलिए की  मानव प्रकृति की लय को अपने अनुसार मोड़ना  चाहता है।  लेकिन ये केवल उसका भ्रम है।  सूक्ष्म जीव ने फिर उसको स्मरण दिला दिया कि  प्रकृति से वो बड़ा नही, उसका एक हिस्सा मात्र है।  
कोविड को जीतना बहुत आसान है, मास्क, दूरी और संक्रमण से बचाव। ये आदत में डालना ही होगा। कोविड पुनः याद करवा रहा है कि विकास की यात्रा हो, लेकिन नीला आकाश, शुद्ध हवा, शीशे की तरह पारदर्शी बहता जल, कचरा रहित विश्व, शांति और आनंद के साथ सहअस्तित्व को अपने भीतर जीवित रखने का अहसास , मानव को चिरायु बना सकता है। हालांकि मानव ने खुद को तबाह करने के सारे इंतजाम कर लिए है।
इसलिए कोविड निर्देश और  व्यवहार को आदत बना ले और उपरोक्त बातों को अपने जीवन में उतार लें अगर प्रकृति की आगोश में सदा रहना है तो.....
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
8.1.2021

Tuesday, 16 November 2021

अवैध निर्माण/ नाजायज़ कब्जा और जनप्रतिनिधि द्वारा रुकवाने की पहल: क्या होती है?

अवैध निर्माण/ नाजायज़ कब्जा और जनप्रतिनिधि द्वारा रुकवाने की पहल: क्या होती है?
भारत में जब भी कोई जनप्रतिनिधि चुनाव जीत कर आते है तो वो निम्न शपथ लेता है। 
*'मैं, अमुक, ईश्वर की शपथ लेता/ हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा, मैं संघ ....के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात, या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा।'*
क्या कभी किसी जनप्रतिनिधि ने सरकारी जमीन पर कब्जे, अवैध निर्माण आदि को शुरू से ही रुकवाने का भरसक प्रयास किया है?  जनता जब अवैध निर्माण और कब्जा करती है, क्या वो नेता से पूछते है?  नेता कभी अपने चुनाव क्षेत्र में अधिकारियों से कब्जे और अवैध निर्माण रुकवाने जैसी कोई मीटिंग लेता है। जबकि सरकारी काम, जैसे कोई भी विकास कार्य करने हो तो हम सब नागरिक जनप्रतिनिधियों के पास क्यों जाते है? जनप्रतिनिधि का काम मुख्य तौर पर विधायिका का काम होता है।  क्रियान्वयन का काम कार्यपालिका का होता है। लेकिन हम सफाई जैसे काम के लिए भी पार्षद को कहते है, जबकि एक पूरा विभाग इस काम के लिए है। 
जनप्रतिनिधि कभी कब्जा और अवैध  निर्माण को नही रुकवाते पाए जाते है ,बल्कि अगर अवैध निर्माण तोड़ा जाता है तो बहुत बार उसको रुकवाने का काम जरूर करते देखे  जाते  है। उनके करीबी ये सब आसानी से कर लेते है। जनप्रतिनिधि को भी उनके काम करने ही होते है।  
ये हम सब देखते है। 
अगर आप अधिकारियों से पूछो तो वो इस बात को दबी आवाज में कहते है। लेकिन बहुत से अधिकारी अपनी कार्यकारणी शक्ति का उपयोग करें,  तो जनप्रतिनिधि केवल उसका तबादला करवा सकते  है। इसलिए अगर कोई कनिष्ठ अभियंता अड़ जाए  तो उसका केवल तबादला होगा, या उसको किसी प्रकार का नुकसान किया जा सकता है। लेकिन उसको उसके काम से रोका नही जा सकता है। ये पक्का है।
इसी तरह आर डब्ल्यू ए भी पूर्ण रूप से गैर राजैतिक संस्था होती है, लेकिन अफसोस की बात है , कितनी बार ये किन्ही दलों और नेताओं के अनुसार ही संचालित होते है, जबकि इनकी भी शक्ति बहुत अधिक होती है। लेकिन कुछ छोटी छोटी मदद और पहचान के चलते ये अपनी शक्ति का उपयोग नही कर सकते। 
इसलिए व्यवस्था को मजबूत और  अक्षुण्ण रखना है तो जनप्रतिनिधि का चुनाव बहुत मांयने रखता है। हम देश के नागरिक है और वो हमारे द्वारा चुना प्रतिनिधि होता है। हम उसके नागरिक नही है। 
जिलाधिकारी, निगम के उपायुक्त,  पुलिस के एस पी/ डी सी पी एक आम आदमी और जिस तरह इनके पास शक्ति होती है, आम जन के लिए ये अभी भी बहुत बड़े अधिकारी  , जिनसे वो कभी मिल नही सकते, या मिलना आसान नही होता।  लेकिन वो भी अपनी शक्ति का अधिक उपयोग नही कर पाते। डी एफ ओ/डी एम/ एस पी/ अधिशाषी अभियंता / एस डी एम के पास शक्ति है। लेकिन फिर भी कब्जे और अवैध निर्माण होते है। जनप्रतिनिधि और ये सभी उच्च अधिकारी सभी शपथ लेते है। ग्रामप्रधान भी शक्ति शाली होता है। लेकिन क्या इन सभी की मीटिंग के एजेंडे में कभी उनके कार्यक्षेत्र में नाजायज़ कब्जे और अवैध निर्माण शामिल है? 
लेकिन हम आम नागरिक को भी वो ही अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि पसंद आता है ,जो ये सब करवा लें।
ये समग्र प्रयास से ही ठीक हो सकता है।  शीर्ष पर बैठे जनप्रतिनिधि को सबसे अधिक जिम्मेदार होना होगा और उसके लिए हम नागरिकों को उसके चुनाव से पहले उसका चयन करना होगा कि वो कैसा हो। जिस दिन हम आम नागरिक अपनी संविधान की शक्ति और कर्तव्य  को संतुलन कर लेंगे ,उसी दिन से बहुत कुछ बदलाव और चीज़े ठीक होने लगेंगी।
विधायिका , कार्यपालिका एवं न्यायपालिका की शक्ति को हम सब को समझना है। ये सब नागरिक के लिए है। अंत में नागरिक ही इनको सुचारू रूप से संचालित, नियंत्रित एवं किर्यान्वित कर सकते है। 
क्या कभी हम इस दिशा में सोचते है? ये हम सब नागरिकों को सोचना है। ज्ञात रहे राष्ट्रपति भी प्रथम नागरिक होता है। किसको चुनाव में वोट देना है, ये नागरिक को करना है, लेकिन मजे की बात है कि नेता और दल बताते है कि किसको चुनना है। इसको ही बदलना है। लेकिन ये तब होगा,जब हम नागरिक ये अपने आप से कर सकेंगे।
इस पर हम सब नागरिकों को गहराई से सोचना ही होगा क्योंकि प्रजातंत्र, लोक तंत्र  सब नागरिक के लिए, नागरिक के द्वारा और ही तय होता है। अधिक से अधिक नागरिकों की भागीदारी ही ये सब वास्तविक लोक तंत्र जहां पर सब कुछ जनता एवं संविधान के माध्यम से संचालित हो  सकें।
ये हम सब को  सोचना ही होगा।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
16.11.2021

Friday, 15 October 2021

रावण की आत्मव्यथा

रावण की आत्मव्यथा
मेरी मृत्यु राम के धनुष से हुई। मैं जानता था कि ये होना ही था। ये वध मेरे तर्पण का आरंभ बिंदु था। मेरा सौभाग्य था कि साक्षात ईश्वर ने मेरे प्राण हरे। मैं  भी सदियों से ये सब भुगत रहा हूँ।सीता के हरण का पाप आजतक मुझे कुरेदता है। राम ने वध के उपरांत मेरा सम्मान किया  ,वो मृत्यु के दर्द को हरने वाला क्षण था। नारायण ने ही प्राण हरे ,ये मेरा सौभाग्य ही था।
लेकिन अभी कुछ वर्ष पूर्व मेरी तंद्रा यकायक टूट गई। पृथ्वी लोक से किसी निर्भया के क्रंदन और दर्द से पूरा ब्रमांड कंपन से हिलने लगा। मेरी भी सदियों बाद आंख खुल गई । इस क्रंदन ने मुझे भी विचलित कर दिया। मैं तो समझे बैठा था कि मेरी मृत्यु के उपरांत  पृथ्वी लोक में स्त्री के प्रति जो अपराध  मैंने किया वो मेरे वध के साथ ही लुप्त हो गया। निर्भया के चीख का सिलसिला जो शुरू हुआ ,आज भी जारी है। मैं 'रावण'  आज ये सब देख बहुत दुःखी हूँ। चारों और  एक के बाद एक निर्भया  के साथ अन्याय देख दिल दहल जाता है। कितने जघन्य अपराध मानव कर रहा है। 
हे राम तुम किस लोक में विरसजमान हो ,देख लो अपने संघर्ष से निर्मित दुनियां की अधोगति और कैसे ये मानव 14 वर्ष की संघर्ष गाथा भी  केवल याद करता है, ह्रदय में अनुभव नही करता। इनके पाप देखकर  मैं खुद भी स्तब्ध हूँ। सदियां मैंने अपनी चिता जलती देखी है। पाप पर  पुण्य की जीत की गाथा सुनते आया हूँ।  लेकिन आज मानव का ये हस्र देख अचरज हो रहा है। ईश्वर से निर्मित सृष्टि को नष्ट करने का पाप तू कर रहा है।   मुझे स्मरण आता है जब मैं मृत्यु शैय्या पर पड़ा था ,उस वक्त राम ने अपने अनुज लक्ष्मण से ज्ञान लेने को कहा ,उस वक्त मैंने तीन बातें बताई , जो आज भी सत्य है, उनका सार था" अपने गूढ़ रहस्य अपने तक रखना, शुभ कर्म में देरी ना करना, गलत काम से परहेज़ करना, और किसी भी शत्रु को कमज़ोर ना समझना , यह अमूल्य पाठ हर एक इंसान को अपने जीवन में उतारना चाहिए।लेकिन आज ये सब नदारद है।अभी ये मानव जो सृष्टि को नष्ट करने में तुला है, ये अदृश्य जीव से डरा हुआ ,मेरे पुतले भी नही जला पाया। ये भी मेरी तरह दम्भ में डूबा जा रहा है। हे राम ये मानव दिन रात जपता रहता है "होइहि सोइ जो राम रचि राखा।" लेकिन करता वही है ,जो उसको लाभकारी लगे , भले वो कहता रहता है कि सबै भूमि गोपाल की" लेकिन  विश्व के सबसे प्राचीन पर्वत अरावली से लेकर हिमालय समेत सब कुछ प्रदूषित और नष्ट भ्रष्ट करने में तुला है। हवा ,पानी , जलथल सब कुछ विकृत कर दिया। मेरे अनुज आई रावण का निवास पाताल लोक भी इस मानव ने भ्रष्ट कर दिया।
ये सब देखने से अच्छा है, पुनः चिरनिद्रा में चले जाएं। 
ये सब बोलकर रावण अंतहीन दिशा की चला गया और हम मानव के लिए  बहुत कुछ चिंतन करने के लिए छोड़ गया। समाज, लोकनीति,राजनीति समेत सब कुछ तहस नहस करने में तुला है।अपनी अपनी ढपली बजाते बजाते हम मानव अपने अस्तित्व को खतरे की ओर ले जा रहा है। अब देखना है कि हम मानव किस दिन एक सच्चा कदम उठाएंगे ,सही दिशा की ओर ....
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
15.10.2021