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Sunday, 12 May 2024

ऐसी ही ठहरी ईजा

(ऐसी ही ठहरी ईजा)
वो पूरन की ईजा थी 
खेत जानवर 
हाथ में दरांती 
भोर सुबह से 
रात तक केवल काम 
मेहनतकश जीवन
पुरखों के खेतों 
को अपने खून पसीने 
से सींचती 
अपने  चारों बच्चों की
 आस
वो लगी रहती थी
अपने नित्य कर्म में
ईजा नाम ही मेहनत का
 पर्याय है
सीधी सादी सभी प्रपंचों से 
कही दूर
क्या अपने बच्चों को 
दे दूँ
पोटली उसकी कभी 
नहीं होती
थी खाली
आज  पूरे पहाड़ में 
कुछ एक खेत
 हरे भरे है ये  केवल 
ईजा का 
ही प्रसाद है
लड़ेगी भिड़ेगी 
उजाड़ खाने वाले जानवरों 
के मालिक से
उसके काम का
कोई मोल नहीं
एक धुरी  है
घर की
अभी भी कुछ एक 
पुराने मकान 
पाल के अस्तित्व में है
केवल ईजा के कारण
ईजा के बीमार होते ही
और 
न होने मात्र से पूरे 
घर की 
नींव ही हिल
जाती है
तब समझ आता है
उसके होने का अहसास
पूरन  की ईजा कैंसर 
से ठीक होने पर
भी भेंस पालने
का सपना देख रही 
थी
  उसका अडिग विश्वास , तकलीफों को झेलने
का अद्भ्य साहस 
देखते ही बनता था
बीमार होने पर भी सपना 
और
संकल्प खेत और जानवर का ही
सच यही अहसास बचा सकता  है खेत खलियान को
उसके लिए कभी काम 
ही सच है
बहस और चर्चा से दूर
उसके खेत में कभी 
नहीं रुका काम
कभी नहीं सूखी
उसकी क्यारी 
जिसमे सब्जी उगाती
 थी 
ईजा
राजनीति के दंगल से 
दूर 
केवल 
कृषि कर्म को 
निभाती ईजा
क्या शोषित थी?
क्या उसका शोषण हुआ था?
क्या उसका खेत में काम करना 
उसके साथ न्याय नहीं था?
क्या वो किसी दबाव में करती थी 
 खेती?
हो सकता है की 
ये सवाल सही भी हो 
लेकिन उसके घर पर आये
 मेहमान को 
कटोरी या गिलास में 
दही और दूध देना 
केवल उसका प्रेम और 
उसका ईजा होना ही था
ये ईजा ही है 
जो 
अभी भी 
खेत जानवरों और जंगल 
को अपने साथ ही ले गई
टूट गया सदियों का सिलसिला
एक ईजा से टूट सकता 
है 
एक पूरा गाँव और पूरे  खानदान
का आश्रयस्थल
ये सोचने जैसा है
गाँव जिन्दा रखने के लिए
ईजा का होना
कितना अहम् है
ये तो केवल वो  ही 
जाने जिनकी 
ईजा 
के जाने से टूट गया धागा
जो सबको बांधे था
ऐसी ही ठहरी अपनी  ईजा
सच ऐसी ही......
रमेश मुमुक्षु
12.2.2018