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Sunday, 9 February 2020

बचपन के स्मृतिशेष

बचपन के स्मृतिशेष
बचपन की यादें आदमी के संग उसकी मौत तक साथ रहती है।।हटाने सेऔर बलबती हो उठती है।  दो तरह के आदमी होते है ,एक वो जो बचपन की यादोँ से दूर भागता है क्योंकि वर्तमान के रंग बिरंगे पैबंद जो लगा रखे है, लेकिन एक बात दीगर है कि शतप्रतिशत तो कोई भी कह नही सकता। लेकिन कुछ अपने तरीके से लिखने का मन कलम चलवा ही देता है। 70 के दशक के बच्चे  उस समय ग्रामीण परिवेश को कुछ कुछ जी रहें थे। हाफ पैंट जिसको  निक्कर बोलते थे , टल्ली से ढकी रहती थी। एक दो कपड़ो के बादशाह होते थे ,बच्चे जो पढ़ाई में बीच वाले होते थे। पढ़ाई का  अर्थ जो पास हो जाया करते थे। मोती बाग का जिक्र करके बहुत कुछ स्मृति के सागर से लहर बन कलम पर टकरा रहा है। मोती बाग प्राइमरी स्कूल और उसके बाहर बैठने वाले टोकरी में इमली, लाल इमली, टाटरी, आमपापड़, अभ्रक, चूरन की गोली, संतरें की गोली, गटारे , लालबेर, बर्फ का गोला बिकता था। बद्री, चुलबुली दो मोटे तौर पर टोकरी लिए बैठते थे। दोनों एक दूसरे को कुछ कुछ बोलते थे। बिज़नेस में प्रतिस्पर्धा ही थी वो छोटे स्तर की। आधी छुट्टी हुई बच्चे  एक पैसे से लेकर 5 पैसे लेकर निकल पड़ते थे ,इन हॉकर्स के पास। भैय्या मुझे..... दे दो। कुछ उस्तादी भी करते थे ,एक आध गोली गोल कर लेते थे , भीड़ का फायदा उठा, चोरी कम खेल अधिक रहता था। जिस दिन बर्फ का गोला खा लिया और घर पर खांसी हो गई तो शामत समझों, पिटाई ,जो एक रूटीन ही था। पिताजी के सामने बच्चे भटकते भी नही थे। एक तो लगभग सभी आखिरी औलाद थी, कितने तो पैदा होते ही , मर जाते थे। हालांकि आज भी कितनी बार पेरेंट्स और बच्चों की उम्र में अंतर हो ही जाता है। 
जो कुछ पिताजी को कहना होता तो माँ के पीछे लग जाओ। स्कूल से भी कभी कोई पर्ची नही आती थी। शायद 13  पैसे या कुछ अधिक फीस फीस होती थी। 
किताबे पुरानी ही चलती थी। कॉपियां राशन की दुकान से आती थी। उस समय लकड़ी की तख्ती का इस्तेमाल होता था। स्लेट और चौक से रफ़ काम हो जाता था। स्लेट भी पत्थर की और टिन की होती थी। पत्थर बच्चे बोलते थे वो एक तरह से टाइल्स की तरह होती थी। 
जितना लिखो और मिटा दो। कपड़ो की शामत होती थी। नाक का निकलना भी खूब होता था। नाक बही और हथेली और कोहनी के बीच से लपेट देते थे या सुड़क लेते थे, नाक का निकलना और सुड़क लेने का सिलसिला कितनी बात पिटाई तक जाता था। रुमाल कम ही होते थे। बच्चों के गंदे होने में कलम दावत भी शामिल थे। इसके अतिरिक्त होल्डर भी हाथ और कपड़े नीले करता था। बॉलपेन होते नही थे, जो थे, वो जेब के दुश्मन थे। चलते ठीक नही थे। बच्चे उसकी निब निकाल कर फूँक ही मरते रहते थे। एक तो बच्चे पढ़ते नही थे, दूसरी और ये सब समान बच्चों का समय खराब  भी करते थे। बच्चे भी खुश ही रहते थे। फाउंटेन पेन की निब ठीक नही चलती थी ,तो फर्श पर मार के तोड़ देते थे। कॉपी किताबो का अल्लाह मालिक होता था।......
शेष आगे....
रमेश मुमुक्षु

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