किसान को भले हम न जाने और बहुत से लोगों ने देखा भी न हो लेकिन किसान हमारे साथ हमेशा और 24 घंटे रहता है। बदन पर लिपटे कॉटन के कपड़े, चादर, रजाई, जो भी सूती है, वो सब किसान द्वारा उत्पादित कपास से ही बनते है। हमारी चाय में चीनी, दूध ,पत्ती भी किसान द्वारा ही आती है। मैगी, पास्ता,पिज़्ज़ा, मैक्रोनी, चाऊमीन, मोमोज़, इडली डोसा अभी किसान द्वारा उत्पादित उपज से ही निर्मित होते है। पतंजलि, हल्दीराम, बिकानो, वालमार्ट , अमेज़न, बिगबास्केट , रिलायंस फ्रेश समेत सभी किसान के उपज को उत्पाद में बदल बेचते है। घी, मक्खन ,पनीर, नमकीन, शहद, चीज़ सभी किसान द्वारा ही निर्मित है।
एक छोटी सी खोली लेकर दुकान खोल लो ,तो कुछ समय बाद आदमी घर ले लेता है। लेकिन किसान के लिए संभव नही होता।
अगर किसान को हटा दे,तो सारा बाजार ही धराशाही हो जाए और हमारे भी जान के लाले पड़ जाए। अगर ये सारा बाजार हट जाए और केवल किसान रहे ,तो जीवन चलता रहेगा। लॉक डाउन में केवल अनाज ही था। फिर भी जीवन चलता रहा।
इसलिए किसान को बचाना हम सब का कर्तव्य है। किसान गांव छोड़ेगा तो शहर आएगा, कहीं तो उसको रहना ही होगा। किसान भी खुले वातावरण को छोड़ शहर में भीड़ में रहेगा। भीड़ बढ़ेगी, शहर का विस्तार होगा, खेती की जमीन, जंगल की जमीन ,पानी के स्रोत कमतर होते जाएंगे। कुछ लोग गांव को जाना चाहेंगे। वहां पर पहले ही हम बदहाली करते आये है।
इन सब एक सीधा सा उपाए है,किसान और किसानी ,कृषि को संरक्षित कर लो। किसान को सम्मान और सुविधा दो। गांव गांव गोदाम, पानी की सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्राम और कृषि आधारित ग्राम उद्योग, एक एक खेत को संरक्षित करने के उपाए। लेकिन किसान वो ही होगा,जो खेती करता है। शहर में जिम करो, जैविक खाद्य खोजो ,लेकिन मिलते नही। इसलिए केवल किसान संरक्षित हो गया, कृषि बच गई,तो पूरा सिस्टम ही बच जाएगा और अच्छा वातावरण भी संरक्षित रहेगा। आज किसान का बच्चा भी किसानी नही करना चाहता क्योंकि किसान केवल कच्चे माल का उत्पादक बन कर रहे गया। उस उत्पाद को उसको बेचना ही होगा। इसलिए इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।
मौजूद आंदोलन में एक बात तय है कि सरकार संशोधन करने को राजी है का सीधा अर्थ सरकार ने बहुत कुछ ऐसा प्रावधान डाल दिये, जिनको नही होना था। किसान सरकार की बातचीत जारी है।।लेकिन किसान के प्रति संवेदनशीलता जरूरी है। बहुत आमूलचूल परिवर्तन जिससे किसान और कृषि पर बुरा असर न पड़े ,ये तो करना ही होगा। इस बारें में हम सब को सोचना ही पड़ेगा, इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नही।
किसान को पेस्टिसाइड, सीड्स और फ़र्टिलाइज़र से भी संरक्षित करना है। 1000 ईसवी में लिखी सुखपाल जी द्वारा रचित वृक्ष आयुर्वेद में कुंआप जल के निर्माण और उपयोग से खाद और कीट से आई बीमारियों से निजात मिल सकती है। जड़ी बूटी, फल, फूल, पशुधन केवल ग्रामीण अंचल में ही सम्भव है। अतः जैसे प्रोजेक्ट टाइगर से टाइगर संरक्षित होगा तो सारी फ़ूड चेन संरक्षित होगी, उसी तरह किसान संरक्षित रहे तो सारा मानव समाज और पर्यावरण संरक्षित रहेगा। ये बात शत प्रतिशत सत्य है।
इसलिए किसान और कृषि पर चिंतन करें और इनको उसी माहौल में संरक्षित करने के टिकाऊ और प्राकृतिक साधन और स्रोत का उपयोग ही एकमात्र उपाए है, इस बात से इनकार नही किया जा सकता है, के तय है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
6.1.2021
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