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Thursday, 1 April 2021

(चलो घूम आओ घड़ी दो घडी)

(चलो घूम आओ घड़ी दो घडी)

न वाद न विवाद 
न आपस में झगड़ा
न तू तू 
न मैं मैं
न इसकी 
न उसकी 
न लेना 
न देना
क्यों आपस में 
मुँह फेर रहे है
बचपन से खेले
सभी संगी साथी
गुस्से से त्योरी 
तनी हुई क्यों है
कभी सुना 
और पढ़ा था
मतभेद बढ़ाना 
सबसे आसान है
हमको भी लगता 
था 
ये सच नहीं है
आपस में 
विरोधी तो भिड़ते रहे है
पर अपनों में दीवारें 
खड़ी हो रही हैं
ये कैसा अजब और गजब 
हो रहा है
गुस्से में राजा गुस्से में
प्रजा
लोकतंत्र कहीं 
दुबक सा गया है
बोलना बुलाना 
बहलना बहलाना 
कृष्ण के किस्से राधा 
कहा अब सुना ही सकेगी
कविता तो होगी
भाव न होगा
न होगा प्रेम 
न होगा आँखों की 
झीलों में 
जाना 
न होगा  बिहारी की 
कविता का उत्सव 
आँखों के इशारे 
सुना है
गुनहा है
चलो दिलदार चलो 
चाँद के पार चलो
पर मौत की सजा होगी
श्रृंगार रस सुना है
 गैर कानूनी और देशद्रोह 
होगा
कामदेव छुप कर
डरा सा हुआ है
न अब उड़ेगी जुल्फें
किसी की
सुना है आँखों
में चश्मे लगेंगे
बिल्डिंग बनेंगी
सड़के बनेंगी
नदियों को जोड़ो 
भले ही उनको मोड़ों
अब कोई न गा सकेगा
वो शाम कुछ अज़ीब थी
न अब साजन उस पार
होंगे
न शाम ही ढलेगी
न हवाएं चलेगी मदमस्त मदमस्त
न होगा गर
इन्तजार किस का
तो पत्थर बनेगा 
कोमल सा दिल अब
जिसमे न होगी कल की
कोई आशा 
भला ऐसे दिल को 
कर सकेगा कोई कैद
मज़ाल है किसी की
उसको झुका दे
ये उलटी धारा न 
बहने अब देना
दिलों को 
जोड़ों 
न तोड़ों 
वो धागा 
रहीम की ही सुन लो
न तोड़ो वो धागा 
फिर कभी ये जुड़ ही न
सकेगा
टुटा हुआ दिल
एटम पे भारा
भय से परे क्या मरना 
क्या जीना
सबको मिलकर 
बनेगा  बगीचा
नवरस बिना 
क्या जीवन का मतलब
बच्चे भी होंगे 
जवानी भी होगी
बुढ़ापा भी होगा
भाषा भी होगी
मज़हब भी होंगे
साधु भी होंगे 
सन्यासी भी होंगे
होंगे ये सब 
जब सारे 
ही होंगे 
सारे न होंगे तो 
अकेला कहाँ होगा
वैविध्य है जीवन और
कुदरत है सब कुछ 
सब कुछ है कुदरत
फिर क्या है मसला 
फिर क्या बहस है
चलो घूम आये 
चलो टहल आये 
मसले तो आते जाते 
रहेंगे 
हम फिर न होंगे
न होगा ये मंज़र
चलो लुफ्त ले लो 
घडी दो घडी 
चलो घूम आएं 
घडी दो घडी....
रमेश मुमुक्षु
(29.3.2017 ट्रैन में लिखी)

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