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Friday, 4 June 2021

बरगद की आत्म व्यथा भाग -2 मुझ पर धागा बाधने वाले दो पैर के प्राणी : मुझ में भी प्राण है

बरगद की आत्म व्यथा भाग -2
मुझ पर धागा बाधने वाले दो पैर के प्राणी : मुझ में भी प्राण है। 
मेरे शरीर को सीमेंट से पूरी तरह दबा दिया गया है। मैं द्वारका उपनगर नई दिल्ली की सेक्टर 6 की मार्किट में शनिमंदिर के पास ही स्थित हूँ, या सजायाफ्ता हूँ। मेरे कुछ साथी भी। जो मेरे आस  पास मेरे जैसे ही तकलीफ में है। मेरे एक ओर सड़क और दूसरी ओर मार्किट ,ये तय है कि मेरी वृद्धि सदैव बाधित रहेगी। मैं अपनी एरियल रूट्स को जमीन तक कैसे ला सकूंगा। मेरा वजन बढेगा और एक दिन तय है कि मैं गिर ही जाऊं। 
मुझ पर धागा बांधने वाले केवल अपने स्वार्थ के लिए आते है। किसी को मेरी सुध नही कि मेरे भीतर भी प्राण है। मुझे भी अपने शरीर को खुल कर पोषक तत्व और प्रकृति का आनंद चाहिए।काश,  अगर हम खुद यहाँ से वहां चल सकते तो हमेशा इस मनुष्य से दूर ही जाकर बसते।
जब मेरे बीज से अंकुर फूटा था,उस वक्त ही मुझे किसी खुले स्थान पर यहां से हटा कर उगा दिया जाता तो बहुत ही अच्छा रहता। लेकिन ये मनुष्य ठीक मेरे सामने शनिवार को मंदिर में अपने कष्ट निवारण के लिए आता है ,लेकिन किसी को आज तक मेरा दर्द नही सुना। ऐसे ही मेरा भाई पीपल और सभी फाइकस परिवार के पेड़ जिनके बीज पक्षी खाकर यहाँ बिखेर देते है ।जब मनुष्य ने अपने घर नही बनाये थे ,तो हम जंगल अथवा खुले स्थान पर ही उगते थे। लेकिन अभी हम शहरीकरण के दंश और अभिशाप को झेलने के लिए छत, पाइप, दीवार कही भी उग जाते है। 
कब ये मनुष्य मेरी सुध लेगा और कम से कम मेरे शरीर को सीमेंट से मुक्त करेगा। मेरा भार बढेगा तो मेरे शरीर को हल्का करना ही होगा ,वरना मैं अपने भार से गिर जाऊंगा। कल ये मनुष्य 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाएगा  और बड़ी बड़ी बातें करेगा ,लेकिन मुझे कोई नही देखेगा। बस मेरे नीचे अपनी गाड़ी खड़ी करने की सोचता है ताकि धूप से बच सकें।
देखता हूँ ,कौन मेरी फरियाद सुनेगा और कब तक। 
हे प्रकृति ये  बुद्धिहीन ,स्वार्थी, पढ़े लिखे अल्पज्ञानी को कब  मेरी तकलीफ  का अहसास होगा। मुझे मालूम है  कि कुछ लोगों को वास्तव में इसका ज्ञान और जानकारी  नही है,वो मेरे शरीर में निर्दोष भाव से धागा बांधते है, मुझे उनसे कभी तकलीफ नही होती।  लेकिन जो जानते और समझते है, उनके ऊपर  मैं क्षुब्ध रहता हूँ। सरकारी विभाग वाले जो समझते है ,वो भी मेरी सुध नही लेते। कुछ लोग है, जिनके भीतर संवेदना है ,लेकिन वो कम ही है। अभी मेरे अग्रज को, जो गिर गया था ,उसको लगा दिया है।  अब  देखता हूँ ,कब तक मेरा और मेरे परिवार का शरीर सीमेंट से मुक्त होता है। कब तक मनुष्य के भीतर संवेदना का संचार होता है , कब तक.....?
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
4.6.2021

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