अध्यापक दिवस के बहाने कुछ भूली बिसरी यादें ताजा हो गई: know thyself -Socrates
मासाब , गुरुजी, सर् की छवि हमारे दिल में अभी भी बैठी है कि दो तीन रसीद होने वाले है। हाथ आगे कर.... मुर्गा बन, डेस्क पर खड़ा हो जा, ये सब रूटीन की बातें थी सबके पिताजी हुआ करते थे, डैडी का चलन शुरू हो गया था, कह दिया करते थे कि मासाब अगर ये न पढ़े तो हड्डी पसली एक कर देना..... घूमता रहता है। आवारा हिप्पी हो गया है। अच्छे मासाब का अर्थ जो डंडे से खबर लेते थे। हम भी ढीठ ही थे, कक्षा में खुसर फुसर करने की आदत जो ठहरी , कब खुसर फुसर हंसी में तब्दील हो जाती थी, ये आज तक कौतूहल ही बना हुआ है। मासाब को सुनाई पड़ जाता था। बस फिर क्या था, मुर्गा, डेस्क पर खड़ा और उल्टी हथेली करके स्केल से पिटाई शुरू। लेकिन हंसी बजाए रुकने की नॉन स्टॉप हो जाती थी। फिर क्या था, हाथ और मुँह से पिटाई पिटाई शुरू। ये सब शिक्षा में आम बात थी। आज जब हम उन अध्यापकों को याद करते है , तो ये ही कहते है कि जो बहुत कर्मठ हुआ करते थे, वो पिटाई भी करते थे। उनको ऐसे लगता था कि ये पढ़ क्यों नही रहा। बहुत बार तो बच्चें डर के कारण स्कूल न जाने की सोचते थे। लेकिन ऐसा सोचा तो घर में रेल पेल हो जाया करती थी। उस वक्त परीक्षा में नंबर मिलना राशन और कंट्रोल के अनाज मिलने जैसा ही था।
लेकिन गुरु जी तो गुरु जी ही थे, पीछे सबके नाम रखे होते थे। हम सब के भी असली नाम न होकर दूसरे नाम हुआ करते थे। सारे बच्चें सुबह 8 बजे रेडियो पर समाचार के खत्म होने का इंतजार करते थे क्योंकि सब के पिताजी साईकल या पैदल ही आफिस जाते थे। ये सरकारी कॉलोनी वाले बच्चों की कथा है। पिताजी दूर दिखे नही की बच्चे बाहर दौड़ जाते थे, जैसे कर्फ्यू से निकले हो।
लेकिन आज भी वो सारे अध्यापक याद आते है। बहुत से अध्यापक बहुत डेडिकेटेड हुआ करते थे। कुछ ऐसे भी थे,जो बिना पिटाई के पढ़ा लिया करते थे। कभी कभार वो सूद सहित निपटा देते थे। अगर कोई टीचर हल्के मिल जाये तो बच्चे भी अपनी कसर निकाल लिए करते थे। अनूठा संबंध होता है, विद्यार्थी और अध्यापक का, भूल नही सकता कोई। उस वक्त ट्यूशन का चलन लगभग नही था। टीचर ही संभाल लिया करते थे। किसी भी बच्चे के जीवन में टीचर का रोल अहम होता है। टीचर का समर्पण और पढ़ाने के तरीके से बच्चे को तरासा जाता है। आज बहुत कुछ बदल गया, लेकिन टीचर तो टीचर ही है। कुछ भी हो टीचर का सम्मान तो होना ही चाहिए और टीचर भी इसको मात्र नौकरी न समझे। टीचर का सबसे बड़ा काम होता है , बच्चे के भीतर छिपी प्रतिभा को खोज कर उसका परिष्कार करना। हालांकि व्यवस्था में इसका वक्त कम मिलता है। जब ये सुनने में आता है कि क्या तीर मार रहा है टीचर , वेतन मिलता है, उसका ये काम ही है, तो लगता है कि कुछ मिस हो गया। वेतन से ही पढ़ाई नही होती, उसके लिए बहुत अलग अलग अवसर होते है। लेकिन टीचर का बहुत दायित्व होता है कि वो बच्चे में कैसे निखार लाये। अगर टीचर और विद्यार्थी के बीच कनेक्ट कम हुआ तो शिक्षा पर असर पड़ेगा। जरुरी नही कि डरा कर ही पढ़ाई हो सकती है। टीचर की अपनी तैयारी और रुचि बच्चे को आकर्षित करती है। तोतोचान जैसी बच्ची हो तो सोसाकू कोबायाशी जैसा अध्यापक और स्कूल चाहिए। इसके अतिरिक्त चंगीज़ आत्मतोव की पुस्तक पहला अधयापक के दूईशेन का स्कूल जिसको उस पिछड़े गांव कुरकुरेव की पहली विद्यार्थी अल्तीनाई विख्यात होने के बाद भी स्तेपी के दूर ऊँचें टीले पर पोपलर के पेड के नीचे बिताए स्कूल के दिन और अपने अध्यापक को आज हमेशा याद करती है।प्राचीन भारत में आचार्य चाणक्य जिन्होंने एक बच्चे की प्रतिभा को पहचान कर सम्राट बना दिया। परमहंस राम कृष्ण ने अपना शिष्य खुद ही खोज लिया, जो विवेकानंद ही थे।
इतिहास भरा हुआ है। ऑनलाइन के जमाने में जहाँ बच्चे जानकारी रखते है, वहां पर नए तरह के चैलेंज है। लेकिन सबसे बड़ा काम और लक्ष्य होना चाहिए ,बच्चे की प्रतिभा, सृजनात्मकता और अन्वेषण प्रतिभा को खोजना और उसका परिष्कार करना। सर्वपल्ली राधाकृष्णन और उनके द्वारा दर्शन पर लिखी पुस्तकें भी आज हमारी धरोहर है। उनके जन्म दिन को ही अध्यापक दिवस के रूप में मनाया जाता है। विश्वभारती के संस्थापक गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कोई विश्व विद्यालय की चार दीवारी नही बनाई, उनका कहना था कि शिक्षा खुली और निर्बाध होनी चाहिए, ताज़ा हवा जैसी। महान दार्शनिक गुरु सुकरात कहा करते थे ""सच्चा ज्ञान संभव है बशर्ते उसके लिए ठीक तौर पर प्रयत्न किया जाए; जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परखों के बाद हम एक सचाई पर पहुँच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं।' उनका मुख्य ज्ञान सूत्र था, " स्वयं को जानो", Know thyself"। ये प्राचीन भारतीय दर्शन का आधार ज्ञान सूत्र रहा है।
आज के दिन तो ये सब याद आ ही जाता है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
5.9.2021
4.9.2024
5. 9. 2025
Nice one
ReplyDeleteBahut Bahut sundar.
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