महात्मा गांधी : सतत परम्परा के वाहक
महात्मा गांधी एक नाम ही नही अपितु एक सतत परम्परा का वाहक कहूँ तो गलत न होगा। गांधी के विभिन्न आयाम एक साथ चलते दिखाई देते है। गांधी प्रार्थना, रोजमर्रा की सफाई, लिखना, बोलना, सेवा, प्रकृति से जुड़ा हुआ जीवन, सतत ग्रामीण विकास , ग्राम स्वराज्य एक समग्र चिंतन और अहिंसा और साहस को स्थापित करने की पहल करने वाला एक व्यक्ति जो जीवन भर नया नूतन खोजता रहा ,बहुत ही सहज और सुगम मार्ग को बनाता गया।
गांधी में समग्रता का उद्विकास काल से आरम्भ होता है ,जब उनको अपनी गलती का अहसास और गलती स्वीकार करने का साहस गांधी को एक लंबी यात्रा की ओर ले जा रहा था। एक खोज जो निरंतर चल रही थी गांधी के भीतर। गांधी के भीतर जो पनप रहा था, उसकी पुष्टि गांधी पढ़ने की आदत से पूरी कर लेते थे। उनकी चिंतन यात्रा के दौरान उन्होंने लेव टॉलस्टॉय , जॉन रस्किन, डेविड हेनरी थोरो एवं गोपाल कृष्ण गोखले को जानकर अपने भीतर हो रही उथल पुथल को एक व्यवस्थित मार्ग की दिशा में आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ। इन महान विभूतियों को उन्होंने अपने गुरुओं के रूप में ही हमेशा माना, क्योंकि जो मोहनदास के मन में भविष्य की कल्पना आकार ले रही थीं, इन सब को पढ़ कर , उनको लग गया कि उनका रास्ता और लक्ष्य सही दिशा में जा रहे है।
इसी कारण ट्रैन से नीचे फेंके जाने के कारण ही उन्होंने जो किया , वो अचानक से हो गया था, ऐसा नही उनके भीतर सत्य और अहिंसा का मार्ग प्रशस्त हो रहा था। इस घटना से उनको धरातल पर उतारने का अवसर मिला और सफल भी रहे। साउथ अफ्रीका का प्रयोग शायद मोहन दास को गांधी और महात्मा के मार्ग पर ले गया। विदेश जहां पर अंग्रेजों का शासन था। बाहर के देशवासी दोयम दर्जे के माने जाते थे। रंगभेद के अनुसार भारत के लोग भी काले ही माने जाते थे। उनके भीतर सत्य अहिंसा के आधार पर सफलता ने टॉलस्टॉय की बात को सिद्ध कर दिया कि इस युवा से सत्य , अहिंसा और शांति के विचार को प्रतिपादन करने की आशा ही नही विश्वास है। इसके अतिरिक्त अफ्रीका में उनके प्रयोग सफल हुआ और उनकी आहट भारत में भी सुनी जाने लगी।
भारत आने पर गोपाल कृष्ण गोखले ने उनका स्वागत और आशीर्वाद दिया। गांधी ने आज़ादी के आंदोलन में गांव की आवाज़ को जोड़ने का विलक्षण कार्य किया , जिसकी शुरुआत चंपारण से हुई। चंपारण ने ग्रामीण अंचल को मुख्य धारा में लाने का काम भी किया।
गांधी को किसी भी रूप में इग्नोर नही किया जा सकता है क्योंकि गांधी समग्र और सतत परम्परा के वाहक कहे जा सकते है। गांधी के लिए सफाई ,स्वच्छता दैनंदिन का अनिवार्य कर्म था, जो सहज और स्वाभाविक ही था।
गांधी ने आज़ादी के आंदोलन के साथ रचनात्मक कार्य की श्रृंखला आरंभ कर समग्रता का परिचय दिया। आज़ादी की लड़ाई में चंपारण के बाद नामक आंदोलन, विदेशी कपड़ों की होली और भारत छोड़ो के साथ रचनात्मक कार्यों में साबरमती आश्रम, गांधी विद्यापीठ , सेवा ग्राम समेत एक लंबी श्रखंला का प्रतिपादन भी किया। सेवा ग्राम में परचुरे शास्त्री कुटी में उन्होंने कुष्ठ होने के बाद भी सेवा की और उन्होंने कहा कि सेवा का संबंध ह्रदय से होता है, सेवा दिल से ही की जा सकती है। इसके बाद कुष्ठ निवारण के कार्य आरंभ हुए।
नई तालीम के माध्यम से समग्र शिक्षा की बात कही और उनका प्रयोग भी किया। स्त्री शिक्षा पर उनका बहुत जोर था।
गांधी ने ग्राम स्वराज्य की कल्पना की जो भारत की महती परम्परा का परिचायक ही था। विदेशी हुकूमत के कारण ग्रामीण सहज परंपरा पर जो विपरीत असर पड़ा ,उसको पुनर्स्थापित करने का ही समग्र और सतत प्रयोग था । ग्राम स्वराज्य आज भी ग्रामीण जीवन और ग्रामीण जीवन को अक्षुण्ण रखने का कारगर उपाय है। ग्राम स्वराज्य जल,जंगल,जमीन,समेत स्थानीय संसाधन का सदुपयोग जो सतत विकास की अवधारणा का वाहक ही है। आज भी ग्राम स्वराज्य ही ग्रामीण स्वावलंबन का एक मात्र उपाए है, भले वो विभिन्न रास्ते से आये। ग्राम स्वराज्य का सबसे बड़ा पहलू है कि ग्रामीण अपने विकास की सही दिशा स्वयं ही खोजे और उसी के आधार पर आगे बढ़े। कृषि एवं पशुपालन एक सिक्के के दो पहलू है। प्राकृतिक एवं जैविक कृषि और जीवन गांधी जी के दो मजबूत
सत्य व अहिंसा की ओर जाना तो मानव के सहज स्वभाव में आता गया है। मानव और प्रकृति समेत सम्पूर्ण प्रकृति को एक समग्र दृष्टि से देखना ही जीवन के संरक्षण के लिए बहुत जरूरी है।
गांधी एक निरन्तर चलती आ रही सतत समग्र परम्परा का वाहक कहे तो गलत न होगा।
गांधी का रामराज्य सर्व धर्म प्रार्थना से सराबोर था। इसलिए उनके हाथों में गीता रही , और मरते समय ह्रदय से राम कितना ये गांधी के द्वारा ही होना था।
उनके जीवन दर्शन का आधार हिन्द स्वराज्य में गांधी लिखते है कि देश को अंग्रेजों ने गुलाम कैसे बनाया ,जबकि अंग्रेज तो संख्या में कम थे। गांधी उत्तर देते है कि हम खुद ही गुलाम बने है। अगर हम उनकी जीवन शैली अपनाते रहे, धीमे धीमे स्वयं ही गुलाम होते चले गए। ये बात आज भी प्रासंगिक है।
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधी जी के बारे में कहा था कि “भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था।” ... गांधी अपने में एक विचार थे, गांधी युवा पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत है।"
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष ,गांधी शांति प्रतिष्ठान
दन्या , उत्तराखंड
9810610400
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