घर के मंदिर की मूर्ति से कचरा बनी मूर्ति की आत्मकथा: कब सुधरेगा हे मानव ( द्वारका नही दिल्ली एशिया की सबसे बड़ी और हाई प्रोफाइल सबसिटी )
कितना अद्भुत है, हे मानव कैसे तू मुझे खरीद कर लाया था। कपड़े से मुझे साफ करता था। कितनी बार मुझ को छूकर उल्टे सीधे सभी काम भी करता था। कितनी बार तो मिठाई भी मुझे लगा देता था। ॐ जै जगदीश से लेकर गायत्री,महामृत्यंजय मंत्र और न जाने क्या क्या करता रहा है। "मैं पापी हूं, खलगामी, पतित , और अधर्मी हूं"। हे प्रभु मेरा तर्पण करें। मुझे छू कर मुझ पर गंगा की बूंदें भी छिड़कता रहा है। लेकिन अभी दीवाली आने से पूर्व मुझे घर से ऐसे निकाल कर पीपल के पेड़ के नीचे डाल गया, जैसे मैं इसके लिए केवल कचरा बन गई।इसको किंचित मात्र भी अंतर नही पड़ता कि वो क्या कर रहा है। एक वर्ष तक ये मुझे मूर्ति मात्र नही, बल्कि साक्षात ईश्वर ही समझता रहा। लेकिन अभी मेरे साथ मिट्टी के गणेश, शिव ,दुर्गा सभी की मूर्तियां को भी फेंक दिया। हम सभी
मंदिर की मूर्ति से कचरा रूप धारण कर चुके है।
हे ! हे त्रिमूर्ति इस मानव को सद्बुद्धि प्रदान कर और जो इसके पास है, उसको जाग्रत कर, उसकी चेतना को सुप्तावस्था से उठा दे ताकि ये धर्म, अध्यात्म और भक्ति के सच्चे अर्थों को समझ सके और वातावरण को स्वच्छ रखने का व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास आरंभ करें।
रमेश मुमुक्षु
9810610400
10.11.2023
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