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Sunday, 7 July 2024

👉मानव और प्रकृति: स्वंभू बनने की 👎व्यर्थ होड़

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👏🌹स्व.सरला बहन ,लक्ष्मी आश्रम, कौसानी, अल्मोड़ा की संस्थापिका की 8 जुलाई को उनकी पुण्य तिथि के उपलक्ष में समर्पित कुछ पंक्तियां🌲🌲

👉मानव और प्रकृति: स्वंभू बनने की  👎व्यर्थ होड़ 

🌞 भीषण गर्मी में वर्षा की आस 
तेज 🌧️ वर्षा में धीमी वर्षा की दरख्वास्त 
गर्मी में पानी की कमी पर याद आते हैं, परंपरागत जल स्रोत 
वर्षा आते ही पुनः विस्मृत हो जाते है
लगातार वर्षा में रुकने का आग्रह
सूखी नदी में पानी बहने की इच्छा 
बाढ़ आने पर उजड़ जाने का भय
घने 🌲 जंगल में कुछ पेड़ काटने की चर्चा
उजड़े जंगल को आबाद करने का प्रयास
 🏡 पुराने घर तोड़ कर कंक्रीट की होड़  
कंक्रीट की जगह पुराने मकान बनाने की चर्चा
🌾 फसल बढ़ाने के लिए रसायन का इस्तेमाल
रसायन हटाकर  जैविक के मिशन
हम मानव है विचित्र कभी किसी को भगवान  बना दे और किसी को हैवान 
असल में हमारी औकात प्रकृति को काबू करने की है ही
नही, लेकिन हम है कि काबू करने में लगे है
कुछ कुछ खोज और अविष्कार करके लगता है कि प्रकृति को काबू करने की कुंजी मिल गई
लेकिन फिर उसी खोज के परिणाम हमको पुनः उसी बिंदू पर ले आते है, प्लास्टिक का अविष्कार और खोज की जीत और उसके परिणाम का दंश पूरी मानवता को जैसे लील लेने को आतुर है
💣 परमाणु हथियारों का घमंड और बटन दबाने का भय
कबीर ने अपनी उलटबासियों में खूब ये सब खूब  लिखा है
लेकिन हम मानव जिसको विश्व गुरु और प्रकृति को काबू करना है, लेकिन प्रलय तक कैसे स्वीकार करें , उसके बाद सब जीरो हो जायेगा, कि हम प्रकृति के सामने मात्र एक जीव है, जिसकी डोर प्रकृति के हाथ में है,
वर्षा को ला  नही सकते,
वर्षा को रोक नहीं सकते
बाढ़ को बांध बनाकर रोक सकते है, लेकिन प्राकृतिक  आपदा को क्या रोक सकेंगे
हम केवल  कठपुतली के पात्र के समान ही है, केवल कठपुतली के पात्र 
क्या मानव मन स्वीकार करेगा
कदापि नही, ये तय है
रमेश मुमुक्षु
9810610400
7.7.2024

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