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Sunday, 18 February 2018

पकोड़े का सच

पकोड़े का सच
कभी मित्रों सरोजिनी नगर मार्किट , द्वारका सेक्टर 6,10 और 4 और 5 की मार्किट और सभी रोड साइड समोसे, ब्रेड पकोड़े, अंडे, कुल्चे बेचते हुए रेहड़ी के पास किसी नुक्कड़ की दुकान पर चाय पीने बैठ जाओ। कितनी ही बार अचानक हड़कंप मच जाता है ,इनके भीतर। सभी अपने सिलिंडर ,समान ,गैस का चूल्हा उठा कर कही छिपाने लगते है। चाय पीने वाला एक पल घबरा भी जाये कि कोई डॉन या उघाई करने वाला आ गया। इधर उधर निगाह घुमाने पर सच समझ आता है। एक NDMC या MCD का ट्रक आता है, उनमे कर्मचारी ऐसे आते है ,जैसे इराक में अमरीकी सैनिक  आ गये हो  और जान बचाओ हो गई। हम बचपन से सुनते आए है ,कमेटी वाले आ गये। हमें 10 साल की उम्र से ज्ञान है कि ये कमेटी आएगी और इनका सामान ले जाएगी ,ये उनके पास जाएगा , कुछ लेन देन करेगा , फिर दुकान चालू। सरोजिनी नगर जहां पर ब्लास्ट हुआ , वहां पर पूरी मार्किट ही गैरकानूनी तरीके से दशकों से चल रही है। वहां पर भी ये ही तमाशा आये दिन चलता है। ऐसा ही नेहरू प्लेस में भी देखने को मिलता है।
ये चूहे बिल्ली का खेल लगातार चलता है। और तो और नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक के पीछे भी चलता है  जहां पर मोदी, राजनाथ और जेटली बैठते है। 26 जनवरी, 15 अगस्त के दिन अथवा रुट लगा हो तो इनकी दुकान अलग लगती है। ये रेहड़ी और झाबड़ी वाले बहुत बड़ी तादाद में दिल्ली के फुटपात, सर्विस लेन, सड़क की किनारे अपना धंधा करते है। लोग भी इनसे खाना पसंद करते है। अगर आपको सफाई, छोटी जगह हम नही खाते, ये सेहत के लिए ठीक नही, गंदा रहते है, जैसे सिंड्रोम नही है तो आप नुक्कड़ की चीज़ों का आनंद ले ही लेते हो। गोलगप्पे वाला ऐसे उचक और झुक कर जो गोलगप्पे निकलता है। सच मुँह में पानी आ ही जाता है। बचपन में इमली, लाल इमली, टाटरी, आम पापड़, कच्ची इमली , बर्फ का गोला, बेर , अमरक, संतरे और सफेद दूध की गोली हम सब ने खाई है , उन्होंने भी जिनको उपलिखित सिंड्रोम आज है। बचपन में चुलबुली और बद्री का खोमचा अभी भी स्कूल के बाहर लगता था। मुच्छल के गोलगप्पे और जमुना काले काले रा की आवाज अभी भी बचपन में ले जाती है। खेर, हो सकता है , ये गंदे, सस्ता माल , गंदी क्वालिटी के बनाते होंगे। लेकिन नुक्कड़ की दुकान पर चाय और मट्ठी खाने का आनंद कुछ और ही है। कुछ आइटम केवल नुक्कड़ पर मिलते है जैसे लड्डू गरमे, मोठ कचोरी, उबले अंडे आदि। लेकिन एक बात तो थी ,ये सब खाने की चीज़े पेड़ों के पत्ते से बने दोनों और पत्तल पर ही  दिया करते थे। राजेश खन्ना की फ़िल्म अमर प्रेम समोसे पत्तो में लिपटे होते थे।ये सब 40 वर्ष से अधिक उम्र वाले याद कर सकते है। अब तो विकास की उड़ान के संग समझदारी और शिक्षा के बढ़ने के के कारण,  ये सब प्लास्टिक और थेर्मोकोल में परिवर्तित हो  गया जो पर्यावरण के लिए कितना घातक  है।  एक बात दीगर थी और है कि नुक्कड़ बहस के अड्डे भी होते है।
पकोड़ा भी इनका ही हिस्सा है। एक और सभी छोटे दुकान और रेहड़ी लगाने वालों पर संकट है क्योंकि बड़े ब्रांड लाइन में लगे है।  अब प्रधान मंत्री और अमित शाह ने क्या और क्यों बोला ये तो वो ही जाने क्योंकि उन्होंने साफ कर ही दिया था कि ये चुनाव के झुमले ही होते है 15 लाख आएंगे वाले बयान पर। ये जुमले बचपन से सुनते आए है। नेता भी  बचपन में तो ये सब खाते ही होंगे । लेकिन अभी उम्र बढ़ गई, गैस, अफारा, शुगर, मोटापा , हाई ब्लड प्रेसर ने जीभ के स्वाद पर विभिन्न दवाईयों का नाका लगा दिया तो क्या कहे। कही किसी रेहड़ी में गरम जलेबी और पकोड़ा उतरता हुआ देखने पर निगाह चली जाती तो है ही , लेकिन मन और जीभ तो लपलपाती है, पर ऊपर लिखे डर हसरतों के उठने से पहले ही गाला घोंट देते है।
बात पकोड़े की हो रही थी। अब पकोड़े वाला क्या कमाता है और क्या  नही ,लेकिन उसके साथ पूरे प्रशासन की पो बारह ही रहती है। पुलिस का डंडा , mcd और ndmc का चालान ये शब्द सभी ने सुने होंगे। ये कानूनी ड्रामा दशकों से चल रहा है। इन सब के बीच  मोदी जी और अमित शाह जी पकोड़े बेचना आसान नही। इनसब के हिस्से फिक्स है। ये डिजिटल सिस्टम से भी अधिक मुस्तेद है। इन सब को जो झेल ले ,तो ही पकोड़े बेच सकता है।मोदी जी को सोचना चाहिए , अगर पढ़ा लिखा कर भी बच्चा पकोड़ा ही बेचेगा ,तो पड़ेगा क्यों ? उन्होंने सच ही कहा कि नौकरी तो है ही नही। पकोड़े बेचना सबके बूते की बात नही।स्कूल  की फीस इतनी अधिक हो गई है कि पढ़ाना कठिन हो चला है। खेती में पलायन हो रहा है। आज 15 लाख से 25 लाख तक बच्चे पर खर्च हो जाता है, जब कहीं बच्चा कुछ करने लायक बनता है। बेरोजगार तो डॉक्टर और इंजीनियर भी है, तो क्या ये सभी पकोड़े बेचेंगे ?इतना पढ़ा लिखा कर भी कोई केवल पकोड़े बेचे ,तो वो व्यवस्था में कमी है।
कोई पढ़ लिख कर फ़ूड इंडस्ट्री में जाये ,उसका लीगल आउटलेट हो ,तो सही है। बच्चों को मां पाप पैसा और अपनी नींद की परवाह किये बिना पढ़ाते है केवल इसलिए नही की वो नौकरी न मिले तो पकोड़ा ही बेचे।
ये सब दिल्ली में बाहर से आकर धंधा करने आते है। जो अधिकतर खेतीहर मजदूर होते है। एक भी मध्यवर्गीय परिवार से नही आता। ये बात नेता को सोचनी और समझनी चाहिए।
सरकार की ये जिम्मेदारी है कि पढ़े लिखे बेरोजगार को रोजगार देने की गारंटी दे। अब  मोदी जी अमित शाह को पसंद करने वाले भी  सोचे आपका बच्चा कोई उच्च शिक्षा से आया हो तो क्या आप बेरोजगारी से बेहतर पकोड़े का ठेला लगवाना पसंद करेंगे?
इसलिए कितनी बार नेता की बात गधे की लात का कोई एतबार नही ,कही भी चल जाये।
लेकिन ये बात सारी सरकारों पर ही लागू होती रही है, होती रहेगी।
इन सब को देखते हुए , मोदी जी ने अपने दिल की बात कह दी। इसका सीधा अर्थ है, जब आप नौकरी की बात करेंगे तो ऐसा ही सुनने को मिलेगा। अब निर्णय आपके ऊपर है। इनको कहना था कि स्वरोजगार बने तो उचित होता। देश में पकोड़े का धंधा और दूसरी और रामदेव जी पकोड़े और चाय पीने को वर्जित कहते है। प्राकृतिक चिकित्सा में ये सब वर्जित है। अब ये पकोड़ा बेचना भी सेहत के लिए घातक हो गया।
ये ऊपर ,कमेटी जो सामान उठाती है ये  सभी धंधों पर लागू है, इनके नाम और ओहदे बदल जाते है जैसे  इनकम टैक्स, सेल टैक्स आदि आदि। भगदड़ का तरीका और लेन देन की परंपरा अलग है। ये सब कमेटी वाले मुंशी प्रेमचंद की कहानी नामक का दरोगा के मुख्य पात्र है।  जब ये वाले लोग आते है तो ये देखने लायक होते है। इनके चेहरे पर एक खास तरह का रोब होता है। खासतौर पर कमेटी वाले , ये ऐसे लगते है जैसे रणबांकुरे युद्ध भूमि में उतार आये हो। लेकिन ये जनता है ये सब जानती है।
चाय गुडकने का टाइम हो गया , फिर लिखने की उड़क लगेगी तब तक इस पर विचार करना एक नागरिक बन कर पिछलग्गू नही।
रमेश मुमुक्षु
9810610409

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