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Friday, 9 February 2018

(वालमार्ट और लोकल विक्रेता )

(वालमार्ट और लोकल विक्रेता)
अभी वालमार्ट भारत में आ ही जायेगा। हम उंसके खिलाफ कहते रहेंगे , लेकिन उसको आना ही है। कैसे आना है और क्योंकर लोग उसको स्वीकार करेंगे। इसपर कुछ चर्चा करते है। अभी हाल में धारवाड़ जाते हुए , मनवाड़ स्टेशन पर 100 रुपये के अनार बिक रहे थे। संभव है फसल अधिक होगी ,इसलिए सस्ते बिक रहे होंगे। हालांकि ये भारत वर्ष में सब जानते है कि स्टेशन पर कुछ नही खरीदना ,क्योंकि वो लोग खराब माल बेचते  है। ऐसा ही अधिकांश धार्मिक स्थल पर होता है। जम्मू की वैष्णो देवी मंदिर से पहले कटरे में अखरोट दिखाते कुछ और है , देते कुछ और, ये हमेशा रहा है। अभी आज क्या है, मुझे इसकी जानकारी नही है। लेकिन अभी भी ऐसा ही होता होगा।
आदमी ये सोचता है कि चलो सस्ता मिल रहा है और स्थानीय सामान लेने की इच्छा सब की होती है। हमने भी सोचा चलो सस्ता मिल रहा है। संभव है, इसकी भी कमाई होगी और हमको भी सस्ता मिलेगा।  एक पॉलिथीन में वो बेचते है। मेरे सामने  जो ट्रैन में बैठा था उस अनार वाले को कह रहा था कि तेरा माल सही नही लग रहा। लेकिन मैंने कहा कोई नही , इसकी कमाई हो जाएगी और इतना सस्ता कहाँ मिलता है और उन्नीस बीस चलता ही है।
लेकिन जब थैला खोला तो ये सब देख बड़ा दुख हुआ। वो क्या करते है, ऊपर के अनार अच्छे रखते है और नीचे सारे अनार पेड़ पर पकने से जो फट जाते है, उनको चालाकी से रख कर बेच देते है।  फटे हुए अनार की कोई कीमत नही होती। ऐसा आपको हर जगह ही मिलता है। कोई आपको किशमिश दिखायेगा , कासरगोड स्टेशन के आस पास लेकिन वो निम्न किस्म के नही ,बल्कि खराब होते है। किसी से घी लो और शहद खरीदों उसमे सालों से मिलावट करते आते है।
ऐसा करके वो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते है।  अभी भी भारत में गांव की चीज़ें लेना लोग अच्छा समझते है। लेकिन कुछ लोग खराब और बेक़ीमत माल चालाकी से बेच देते है। ये एक ओर बेईमानी है और दूसरी ओर  और लोगों का स्थानीय उत्पाद के प्रति विश्वाश टूटना है। इसका सीधा लाभ बड़े ब्रांड उठा लेंगे।
अब वालमार्ट या अमेज़ॉन को देखों। घर बैठ आउट लेट में जाकर  आप समान मंगवा लेते है, बाजार से सस्ता और अगर पसंद न आये तो वापस।
ये अनार निम्न किस्म का देता , लेकिन खराब और कटा नही देता, जिसकी एक पैसे बाजार में कीमत नही है। 30 और 40 रुपये का बेच देता , यात्री ले लेता। वो केवल इसलिए नही लेता की केवल सस्ता है, उसको स्थानीय चीज़े अच्छी लगती है। ये सब चिन्दी चोरी और मिलावट ने मल्टीनेशनल स्टोर के रास्ते खोल दिये। पहले दाल और अनाज़ में मिलावट होती थी। ये जगजाहिर सत्य था। लेकिन डिपार्टमेंटल स्टोर जैसे सुपर बाजार आदि के बाद ये सब बदल गया। लोकल प्रोडक्ट लोग इसलिए नही लेते क्योंकि उसमें मिलावट होती है। स्टेशन की चाय में मिलावट और सभी सामान घटिया बेचकर स्थानीय विक्रेता अपनी स्वयं जड़ खोद रहा है। फिर उसको लगता है कि ये  बड़े स्टोर सब देश को लूट रहे है। खुला दूध, दही, घी कोई नही खरीदता। खोए की बर्फी मिलावट के कारण लगभग बन्द  हो गई। ऐसे कितने समान है, जो सस्ता होने के बाद भी नही खरीदते। साफ सफाई की बात तो भूल जाओ। ।ऐसा ही अन्य खाने और पीने की चीज़ों में मिलता है। ये सब लोगों में विश्वास को तोड़ देगा।  अब आजकल मॉल खुल रहे है। जब अधिक सामान लो तो सस्ता भी मिल जाता है। खराब होने पर शतप्रतिशत वापसी होती है। माफी भी मांग लेंगे। दिल्ली के पालिका बाजार, पहाड़ गंज और चांदनी चौक की खरीदारी लोग जानते ही है। ऐसा नही यहां पर कुछ ऐसे है, जो थोक का अव्वल माल बेचते है।
लेकिन जो घटिया और खराब माल बेचते है, वो अपनी जड़ ही काट रहे है। वो एक सिद्धान्त पर काम करते है कि ग्राहक को काट लो , देश बड़ा है , कौन वापस आएगा। ये सोच स्थानीय उत्पाद के बिकने और विश्वास को तोड़ने वाली है
लोकल विक्रेता को चाहिए वो माल सही बेचे दाम अधिक  न करें , लोग उससे माल खरीद लेते है। अभी भारत के लोगों ने ग्रामीण और स्थानीय उत्पाद के प्रति प्रेम और विश्वास है। लेकिन उपरोक्त उदाहरण और घटना विश्वास तोड़ देते है और वालमार्ट और अन्य विक्रेता तो आने ही है। आदमी साफ सुथरा और ताज़ा माल लेना चाहता है। लेकिन ये सब समय रहते संभाल जाना है, नही तो केवल कोसते ही रहेंगे और ये सब देश की लोकल मार्किट को भी अपने में मिला लेंगे। ये तय है और स्थानीय उत्पाद के प्रति अपनापन चला जायेगा, वैसा मोटे तौर पर चला ही गया।
मॉल में एक मानसिकता काम करती है। वो आपको अधिक आइटम लेने पर छूट देता है उससे ये देखा गया है ,मॉल और इस तरह के आधुनिक आउटलेट  में लोग फालतू और बिना इस्तेमाल के सामान खरीद लेते है। लेकिन एक ही छत पर माल उनको मिल जाता है।
इसलिए जो भी स्थानीय और छोटे माल गांव का शुद्ध बोलकर बेचते है , उनको चाहिए कि अच्छी किस्म , ताज़ा और शुद्ध बेचे और ग्राहकों को एक बार में न काटे बल्कि विश्वास हांसिल करें। लोग बेझिझक माल खुश होकर खरीद लेंगे। मेरा दावा है कि अगर किसान और गांव से जुड़े छोटे माल बेचने वाले उपरोक्त बातों को ध्यान में रखे तो लोग हाथोहात माल खरीद लेंगे। इस विश्वास को कभी न टूटने दे। यूरोप का किसान अपने खेत के बाजू में ही माल बेच देता है। लोग ताज़ा माल खेत से ही खरीद लेते है। ऐसा ही किसान भी कर सकते है। अभी उत्तराखंड और अन्य राज्यों में ये प्रचलन बहुत कम है, लेकिन इस बीच ये थोड़ा बड़ा है। अगर गांव के बाहर ही छोटा सा माल बेचने का ठिया बना लिया जाए तो निश्चित ही लोग माल खरीद लेंगे। अभी कितना उत्पाद फल और सब्जी बिक नही पाती। एक बार बिक्री शुरू हो जाएगी तो मन भी करेगा। दिल्ली में यमुना के पुल के ऊपर लंबे समय से सब्जी और फल बेचे जाते है। ये एक अच्छा और बिना खर्च का तरीका है। केवल एक दो डलिया लेकर बैठना है और कमाई शुरू। आज गांव के सामान को बिना केमिकल और दवाई के शुद्ध माल हो तो आज भी लोग खरीदने को तैयार है। इसका ख्याल तो रखना ही होगा। मॉल और बड़े स्टोर  रहें तो रहें । लेकिन किसान और गांव में एक रोजगार का ससक्त और सतत रास्ता है। बशर्ते की शुद्ध और साफ माल बेचे। आज भी सबसे बड़ा बाजार गांव से सीधे माल का है। अगर कोई शुद्ध शहद बेचे तो लोग महंगा लेने को राजी है। घी शुद्ध बेचे तो हाथोहात बिक जाएगा। आज भी बड़े महानगर में रहने वाले गांव के उत्पाद बड़े दिल से खरीद लेते है। किसान और गांव के लोग इस बात को समझ नही पाते। अगर कोई अपने पेड़ से अमरूद तोड़ कर सड़क पर बेच देता और भले वो अधिक सस्ता न भी बेचे ,तो मेरा दावा है ,उसका माल हाथोहात बिक जाएगा। इससे माल भी खराब नही होगा और बिक भी जाएगा। इस तरह की दुकानदारी में एक पैसा भी खर्च नही है। अभी उत्पाद अधिकांश बेकार के पकने के बाद गिर कर सड़ जाते है। आज समय आगया है, छोटी छोटी मार्किट अपने गांव और खेत के बगल लगा कर माल बेचा जा सकता है। लेकिन ये वहीं अधिक बिकेगा जहां पर चलता रोड होगा। इस और सबको सोचना है। गांव के लोग महागर में रहने वालों को माल उनसे बात कर बेच सकते है। ऐसा कुछ तरीका खोजना ही होगा।
लेकिन विश्वास और ग्राहक को एक बार में ही काट लो , जैसी आदत से बचना होगा।
मनवाड़ स्टेशन पर अनार बेचने वाला अच्छा माल भले महंगा बेचता लोग हाथोहात खरीद लेते। लेकिन  उन्हें मालूम है कि सवारी कौन सी हमेशा ही आती है। एक बार काट लो । इस सोच से उठना है। शुद्ध और बिना मिलावट का एक बड़ा बाजार है बस इस और सोचना ही होगा। वरना लोगों का विश्वास गया तो फिर लौट कर नही आएगा। उस पर विचार करना ही होगा।
(रमेश मुमुक्षु)
अध्यक्ष हिमाल
9810610400
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1 comment:

  1. जिसे अंग्रजी में 'चिकन एंड एग' परिस्तिथि कहते हैं......प्रश्न है एक विश्वासनीय व्यवस्था स्थापित करने का जो आत्म सम्मान व् आत्मा विश्ववास भी जगाये......हो सकता है, अगर संकल्प ले कर ५ - १० लोग जुट जाएँ....

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