हरिजन बस्ती पालम में बिताया एक महीना: पुरानी स्मृति।
यायावरी और जिज्ञासु जीवन एक स्थान पर नही ठहरता । कभी यहां तो कभी वहां। 1995 में मैं कुछ समय उत्तराखंड में रहा। लेकिन मेरी जिज्ञासा अभी शायद साउथ कैंपस के पहले तल्ले की आखिरी कुर्सी पर मंडरा रही थी।जहां पर विभिन्न पुस्तकों में ऐसे भटकान होती थी जैसे किसी घने अनजान जंगल में रास्ता खोजते हुए होता है। मैं पुनः दिल्ली आ गया। जीवन को एक बार खुल्ला छोड़ दो तो कड़की का साम्राज्य आपको घेर लेता है। कड़की और अपने ही रास्ते चलने का निर्णय आदमी को कहां से कहाँ ले जाता है। नौकरी न करने का निर्णय और राष्ट्रीय हॉबी सिविल सर्विसेज के मेंस एग्जाम से पहले ही उसको सदा के लिए तिलांजलि देने का निर्णय और जीवन को अपने भीतर उमड़ रहें द्वंदों के बीच लाकर खड़ा कर देता है। उसी दौरान पेंटिंग भी कही किसी भीतर के किनारे से बाहर तेजी से निकल आई थी। 1996 साउथ कैंपस जाने के लिए मुझे एक महीना हरिजन बस्ती पालम में शिफ्ट करना पड़ा। मेरे एक मित्र रावत के ससुर का एक प्लाट था ,यहां।ये भी खूब रही , 20 पॉइंट प्रोग्राम की जमीन भी बिक चुकी थी। खेर, पुस्तको का ढेर लेकर दोस्तों की मदद से यहां पर शिफ्ट किया। पुस्तके भी मोह माया से कम नही होती। एक समय बाद उनको पढ़ना भी नही होता, छोड़ना तो संभव ही नही। मुझे याद है, उस वक्त ब्रह्मा अपार्टमेंट का निर्माण हो रहा था। लोग कहते थे कि ये पपन कलां परियोजना बन रही है। उस वक्त हरिजन बस्ती में कच्चे पक्के मकान थे। रात को लाइट गई तो पड़ोसी कहता कि आप की कुंडी निकल गई। ये कुंडी क्या बला है? कुंडी का अर्थ चोरी की बिजली। उस वक्त लगभग सभी कॉलोनियों में बिजली की चोरी का चलन था। कॉलोनियां भी बेतरतीव पनपती चली गई। मुुंशी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान में वर्णित घास फूस की तरह पनप रहीं थी।
मेरे वहां पर रहते हुए ही सड़क का निर्माण हुआ। उस वक्त वहां पर 801 बस चलती थी।
उसी वक्त मेरे पड़ोसी जो मजदूरी करते थे, उनके साथ शायद बागडोला में एच पी की गैस एजेंसी खुली थी, उनके साथ गया था। रामफल चौक कुछ भी नही था। एक बार मेरे मित्र के गांव बामनौली से पैदल ही पालम आया। उस वक्त पूरे द्वारका में गड्ढे ही गड्ढे थे। महानगर बनने की तैयारी हो रही थी। मुझे कुछ धुंधली याद है कि जाट चौपाल पार करके , जहाँ पर अभी कूड़ा फेंका जाता है, शायद उस वक्त भी वहां पर ही कूड़ा फेंका जाता था। असल में ये गांव से बाहर का भाग रहा होगा।उस समय जोहड़ भी ठीक ही था। पालम से 781 बस में रात को चौपाल पार करके हरिजन बस्ती आने के समय कुत्तो की घुर्राती भीड़ का सामना करना पड़ता था। उस समय मुझे चेगीज़ आत्मयतोफ के लघू उपन्यास पहला अध्यापक में दुष्यंन के पीछे भेड़िए पड़ जाने जैसा ही लगता था।अंधकार से पटा होता था, पूरा क्षेत्र। उस वक्त हैंड पंप से पानी लेते थे। ये पूरा इलाका धूल से भरा रहता था, जो आज भी है। पामम कॉलोनी, राजनगर पार्ट ii, यहां पर इतने मकान और फ्लैट बन गए है । अगर इन सभी इलाको को घूमो तो पाओगे कि धूल ही धूल उड़ती रहती है। एक बार 1981 में भी प्लाट खरीदने राज नगर घर वालो के साथ आया था। उस वक्त 60 रुपये ग़ज़ प्लाट मिलता था।
आज सेक्टर 7 और 8 की हालात इसलिए लचर है क्योंकि ये सब बिना प्लानिंग के बनता चला आया है। पालम क्रासिंग से सेक्टर 7 तक केवल घर ही घर है।कोई पार्क और खुली जगह नही। फाटक से यहाँ तक पूरे साल भीड़, जाम और धूल उड़ती रहती है। कचरे का कोई निस्तारण नही है। जब द्वारका महानगर में भी इतनी पुख्ता व्यवस्था नही है ,तो उन घनी कॉनोनियाँ मैं कैसे हो सकती है।
मुझे याद है कि 2002 में सेक्टर 1 के चौराहे से शाम 7 बजे के बाद जाने से लोग डरते थे। ऋषिकुल स्कूल है, वहां पर दूध की मदर डेरी थी। ट्रैफिक बिल्कुल नही था।
उस वक्त ही अगर ये सब योजना बन जाती तो हमें ब्रह्मा अपार्टमेंट के बाहर खड़े होकर प्रोटेस्ट नही करना होता।
उस दिन वहां पर खड़े होकर 1996 का मंजर स्मृति शेष में उभर गया। 1996 से आजतक कूड़ा वहीं का वहीं है।
हो सकता है कि कुछ बातें भूल गया हूँ।मैं हरिजन बस्ती एक महीना रहा। लेकिन आता कम ही था। महीने बाद में शिफ्ट कर गया था। कैंपस दूर पड़ता था और फाटक पर घंटो फाटक खुलने का इंतजार भी खूब रहा करता था।
कभी कभी किन्ही जगहों पर हम अनायास ही चले जाते है। मेरा यहां पर आना और कुछ दिन रहना ,शायद इस लेख का आधार बनना ही है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष ,हिमाल
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Saturday, 3 November 2018
हरिजन बस्ती में बिताया एक महीना: पुरानी स्मृति
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