(वायु का मानव को संदेश)
मैं वायु हूँ , शुद्ध, निर्मल और मंद मंद बहना मेरा स्वभाव है। कभी कभी तीव्र और प्रचंड रूप से भी बहती हूँ। दुनियां के सभी जीव मेरे कारण ही जीवित है। एक पल भी मैं बहना बंद कर दूं तो जीव का अस्तित्व ही समाप्त हो जाये। लेकिन बहना मेरा स्वभाव ही है।मैं बहुत से कण और धूल अपने साथ ले कर बह सकती हूँ। वो भी कभी कभी। लेकिन ये मानव इतना मूर्ख है कि इसको अहसास ही नही कि वो इतने खरनाक रसायन, तत्व मेरे आंचल में भर रहा है। वो भूलता है कि मेरी भी क्षमता है। पहले ये मानव बहुत कम प्रदूषण मेरे आँचल में फेंक दिया करता था। लेकिन अभी तो ये दिन रात केवल अपने सुख और मूर्खता के पोषण के लिए इसके जीवन के आधार को ही नष्ट करने को उतारू है।
ये अपना विवेक खो गया है। जैसे जैसे तापमान कम होने लगता है, मैं इतनी प्रदूषण को कैसे साथ लेकर बह सकती हूँ। धीमी और जमीन का सहारा तक लेना होता है। कितने जीव भी मर जाते है। अचरज का विषय है कि ये स्वयं ही उपदेश देता हैं कि सुबह उठ कर लंबी सांस लो ताकि प्राण वायु से शरीर स्वस्थ और निर्मल बने। लेकिन इसने मुझे इतना प्रदूषित कर दिया की अब कह रहा है कि सुबह सांस संबंधी योगा मत करो। सांस गहरा मत लो।
हे, मानव तू महामूर्ख है। अपनी ही बनाई गंदी दुनिया में केवल तू खुद ही उलझ गया।जल, जंगल ,जमीन तो तू नष्ट करने में लगा है और अब मुझे भी इतना प्रदूषित कर देगा कि घुट घुट कर अपना अस्तित्व ही न समाप्त कर
ले ।
तूने कभी सोचा है, मेरे निर्मल , भारहीन स्वभाव को कष्ट होता होगा। अब तो मेरे लिए भी बहना भी दूभर हो गया है। कितनी बार तो सूर्य की किरणें भी जमीन और मानव के शरीर को छूने असमर्थ हो जाती है। तूने कुछ भी नही छोड़ा। कभी सोचती हूँ रुक ही जाऊँ ,लेकिन मानव ही अकेला नही है और भी जीव है, उनके लिए बहना है। अंधे दम्भ में डूबे हुए ,कुछ देर चिंतन कर ले और कितना जहर मेरे आँचल में उड़ेलेगा।अब तो अचंभा सा लगता है कि मास्क पहने लगा है कि प्रदूषित वायु शरीर में न प्रवेश करें।
इतना बज्र मूर्ख और असंवेदनशील है कि पहले खुद ही मुझे दूषित करने में लगा रहेगा और भी खुद ही वायु साफ करने के तरीके खोजता है। खुद ही प्रदूषण का उत्पादित करता है और फिर उसको शुद्ध करने के उपाए सोचता है। पहले मुझे दूषित करने के साधन आविष्कृत करेगा और फिर साफ करने की खोज करेगा। मेरे प्रचंड रूप का अंदाज़ा मानव को पूरी तरह नही है, एक क्षण में मैं इसको तिनके की तरह उड़ा सकती हूँ।लेकिन मेरा स्वभाव विनाश नही बल्कि जीवन है। लेकिन मूर्ख मानव तू खुद ही अपनी जान के पीछे पड़ा है। जब तू जानता है, फिर भी ,तू ऐसी ऐसी चीज़े बनाता है कि प्रदूषण इतना भर देगा कि स्वयं सांस लेना तुझे दूभर होगा। प्लास्टिक, रबर और कितने रसायन तूने मेरे आँचल में भर दिए। जल भी दुःखी है, भूमि भी उकता गई। तुझे इतना कुछ प्रकृति से मिला ,जिसको तू अनंत काल तक उपयोग कर सकता था। लेकिन तुझे चैन और आराम नही। एक दम तू सब कुछ कर लेना चाहता है। सबको अपनी मुट्ठी में कसना चाहता ही।तू भूलता है, अगर मैं बहना छोड़ दूं तो कितने पल का होगा तेरा जीवन और तेरा अस्तित्व , ये तू खुद ही जानता है, लेकिन मानता नही।
अब भी समय है , चेत जा , वरना मुझे क्या जो मेरे आँचल में उड़ेलेगा ,वो ही तुझे लेना होगा। तू ही सदियों से कहता आया है, बोयें बीज बबूल का तो आम कहाँ से होए। कुछ तो याद कर और तनिक रुक कर सोच और प्रकृति को शुद्ध ही रहने दे। तेरे प्रदूषण से प्रकृति को कोई अंतर नही होने वाला बस तेरा अस्तित्व नही रहेगा। सरीसृप तक लोप हो गए, तू भी कब तक रहेगा। ये तय है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष , हिमाल
9810610400
4.11.2024 पहली बार
22.11.2024.2024
No comments:
Post a Comment