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Sunday, 8 March 2020

मुझे होना है औरत

(विश्व महिला दिवस )
8.3.2018 
(मुझे होना है औरत)
हाँ वो घूरता है 
जिस्मखोरों की तरह 
आंख में उसके शैतानी 
झांकती है
बस हो गया अब घूरना और 
छेड़ने का सिलसिला औरतों 
का जिस्म 
किसी की जागीर नहीं 
उसका भी अपने पर पूरा 
हक है
मना करना उसको भी आता 
है 
लेकिन अब तक उसने 
केवल चुप्पी ही साधी
अब बहुत हुआ 
चुप चाप रहने की सजा 
अब नहीं सह सकेंगे
हम छुना चाहते है
आकाश को 
स्वयं और बेरोकटोक
नुक्कड़ पर खड़े 
होकर बात करने का 
मज़ा अब हम भी लेंगे
मन करेगा तो अकेले दूर तक 
चलने का 
तो चलेंगे 
अकेले 
डर ही रोकता है
मंजिल तक जाने को
ठिठक जाने का सिलसिला अब 
तोडना है
बिंदासपन और 
घूमने का मज़ा अब आएगा।
रात के चाँद का मज़ा 
लेना हमारा भी हक है
बालकनी पर खड़े रहने 
का मज़ा हम क्यों न लें
छत पर घूमने को तरसना 
अब नहीं होगा
चाय के नुक्कड़ पर
करेगे गप शप और 
राजनीति पर बहस
क्योंकि अब मर्ज़ी से 
डालेंगे वोट
ऐसा भी नहीं कि
हम औरत होना छोड़ 
दे लेकिन केवल औरत 
ही बने किसी की 
मोहताज़ नहीं
प्रेम से कोई बोल ले 
चल ले साथ
केवल साथ
सहज और स्वभाविक 
जो औरत को औरत
और मर्द को मर्द बनाता है
औरत को गुलाम और मर्द को 
मालिक बनाने का 
घेरा तोडना है
हाँ  तोडना है 
अपने चारों और 
का घेरा जो 
हमें गुलाम बनाता खुद का 
चलों अब खुली हवा में
घूम आये 
देख ले दुनिया का फेलाव 
और आगोश में भर ले
आज़ादी के पल 
जो केवल एक कदम दूर है
केवल एक कदम दूर
रमेश मुमुक्षु

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