(होली मुबारक )
2.3.2018
यमुना मैली गंगा मैली
मैली सबरी नदियां
मैले पोखर जोहड़ मैले
मैले होते सागर सबरे
मैला होता सागर तट
पिघल रहा हिमालय
भैया पिघल रहे है
दोनों पोल
मैली कुचैली
यमुना जल में
कैसे कान्हा खेले
होली
कैसे मारे भर पिचकारी
काला काला पानी
राधा है जाएगी कारी
कान्हा के रंग में डूबे बिना
है जाएगी राधा कारी
राधा है जाएगी कारी
रूठ गई राधा कान्हा से
दूर रहो यमुना के तट
से
बदबू से भरी बयार बहे
कैसे जाए यमुना के पार
पहले कान्हा साफ करो
द्वापर की यमुना को लाओ
निर्मल जल शीशे सा दमके
फिर खेलूंगी होली
फिर से उठाओ अपनी उंगली
सुदर्शन चक्र फिर से चलाओ
यमुना गंगा स्वछ बनाओ
फिर खेलेंगे जल संग होली
पिचकारी भर भर मारेंगे
भिगो भिगो के खेले होली
नीले जल को देखे कान्हा
बीत गया एक पूरा युग
बहुत हुआ अब नही चलेगा
ठान लिया मैंने मन में
नीले जल में खेलेंगे होली
भिगो भिगो के खेले होली
होली होली होली होली
नीले रंग की आई होली
यमुना गंगा झांक रही है
नभ को देखो निहार रही है
अब खेलेंगे होली कान्हा
अब खेलेंगे होली ।
रमेश मुमुक्षु
No comments:
Post a Comment