कुछ पगडंडियाँ बची है पहाड़ की चोटी कीओर
अभी भी कुछ
पगडंडियाँ
बची है पहाड़ की चोटी की
ओर
जाने के लिए
वर्ना लील गई
काली सड़क की
बेतहासा रफ़्तार
विकास का झंडा थामे
देती तो है सुख
पर ले लेती है
उन वनों में रहे
मूक जीव का सब कुछ
घबरा कर दूर चले जाते
है लुप्त होने से
पहले
लाखों साल मानव के
दो पैर नाप गए
पूरी धरती
आने वाली नस्ल ये
सुन मजाक उड़ाएगी
कि पैर चलने के लिए होते है
न जाने कितने लोग इस
धरती को नाप चुके है
लेकिन आज भी
पगडण्डी जंगलों के बीच
से होती हुई
अपनी और खींच ही
लेती है
सड़क सुख है
सुविधा है
लेकिन
पगडण्डी सा खिचाव
नहीं
पगडण्डी और पैर
एक ही है
आदिमानव के पदचाप
पगडण्डी में ही
मिल सकेंगे
क्या खोज सकेंगे
बुद्ध, महावीर , शंकराचार्य और विवेकानंद समेत असंख्य
खोजी
जो दब जायेंगे सड़क के
नीचे
खो जायेंगे वो सब
पैरों के निशान
जिन पे चल कर
सभ्यता आती और
जाती गई
निरंतर
पगडण्डी से ही
वनवास हो सकता
है
सड़क पर केवल
भागा जा सकता
जीतने के लिए
एक बात तय है
पगडण्डी
केवल जंगल , पहाड़,
गाँव नदी किनारें ही
रह सकती है
दूर आँखों से ओझल होने
तक
अपनी ओर आमंत्रण देती
टेडी मेडी पगडण्डी
धरती की भाग्य रेखा
सी उबड़ खाबड़
ऊँची निची
शांत एकाकी
किसी साधक की
साधना सी
और
कलाकार की
लकीरें सी
मानव के इतिहास की गवाह
दोस्त और उसके अस्तित्व
का दस्तावेज सी
आज भी बुलाती दिखती है अपनों जैसी
सच अपनों जैसी ही
रमेश मुमुक्षु
अप्रैल 2018
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