पटाखे और वायु प्रदूषण
दीवाली में पटाखे का इंतजार हर बच्चें को होता है। बड़े भी इंतजार में रहते है कि कब दीवाली आये और पटाखे फोड़े। आज से नही हमेशा ही रहा है। कम से कम शहरों में बहुत अधिक रहा है। अभी भी ग्रामीण अंचलों में लगभग नही है। उसका एक बड़ा कारण आर्थिक समृद्धि महानगरों जैसी नही रही।
70 के उत्तरार्ध में जब हम बच्चे होते थे ,स्कूल में जाते थे। उस वक्त पटाखों के प्रति हमारा अनुराग देखते ही बनता था। दोस्त लोग सब मिलकर सदर बाजार सस्ते पटाखे लेने जाते थे। वो ऐसा होता था ,मिशन इम्पॉसिबल के लिए रणबांकुरे जा रहे हो। उस वक्त सबसे बड़ा बम होता था, जिसको चलती बोली में गोला बम बोलते थे। अगर वो हरी सुतली वाला हुआ था, ऐसा लगता था कि हम ही हम है। उस वक्त बच्चो के पास थोड़े बहुत पटाखे होते थे।
अलग अलग लोकल नाम होते थे, गोला बम, टाइम बम, हवाई, सुर्री, चकरी, लड़ी, हथगोला और छोटे बच्चों के लिए फुलझड़ी, फिरकी, हेंटर और सबका चहिता अनार। ये उसवक्त के पटाखे होते थे।
बच्चे भी खूब आंतकवादी होते थे, किसी के लेटर बॉक्स, बड़े पाइप और गोले बम की बत्ती छील कर टाइम बम बना लिया करते थे। लगे रहते थे ,रात तक। अगर किसी के पास मुर्गा ब्रांड होता था तो समझों वो बादशाह ही है। ये सब लंबे समय से लोग मज़े लिया करते थे। रामलीला के समय से ही प्लानिंग बन जाती थी। पिता सबके हिटलर की तरह होते थे। मां को मखन्न लगाना बहुत पहले से शुरू हो जाता था। एक कमाने वाला कैसे पटाखों के लालायित बच्चो की मांग पूरी करते। बच्चों को अगर पूरा शिवकासी भी दे दो ,उनका मन नही भरता। एक ओर एक ओर करते करते रात हो ही जाती है।
उस समय अगले दिन बचे कुचे पटाखे ढूंढने के मिशन। फुस्स हुए पटाखे मिल जाते थे, तो उनका मसाला निकाल कर जलाने का आनंद कुछ और ही होता था। अचरज मत कीजियेगा उनमें से बहुत से उच्च पदों पर है और रिटायर्ड हो गए होंगे। हम जैसे कलम घिस्सु अभी पेपर काले करते , अब स्मार्ट फ़ोन पर लिखने लगे है।
इतना आनंद और चहल पहल हमारे भीतर बहुत भीतर बैठा हुआ है, एक दम कैसे जाए? न्यायधीश महोदय के पोती पोते ने भी मांग कर दी तो लाना ही होगा। बच्चे जानते है कि ये पर्यावरण के लिए घातक है, लेकिन बालमन प्रलोभन को कैसे तज दें। मां बाप की ममता और तर्क एक ही दिन तो हुआ। क्या फर्क पड़ता है? ये ब्रह्म वाक्य आदमी से क्या कुछ नही करवा लेता।
ऐसा नही कि पहले पर्यावरण दूषित नही होता था। मुझे इसका बहुत गहरा अनुभव है क्योंकि मुझे 1979 से ही दमा, आस्था है। मैं तो वायु प्रदुषण मापक कुदरती ही हूँ । कितनी बार मुझे दमे का अटैक भी हुआ। नेबुलाइजर तैयार रखना होता है। लेकिन ये प्रदूषण 70 के दशक में भी होता था। दीवाली के दिन जलने वाले और सांस रोग से पीड़ित कितने ही बीमार होते है। लेकिन मन है कि मानता नही, बम देख कर फिसल जाता है। पहले भी प्रदूषण के कारक थे। सभी लोग कोयले, लकड़ी और गोबर के कंडे जला कर खाना खाते थे। लेकिन डिवाइस कम थे। अभी इतने डिवाइस और उपभोक्ता आइटम बढ़ जाने से परोक्ष और अपरोक्ष रूप से प्रदुषण बढ़ गया है। हमारी जीवन शैली पर्यावरण के किये घातक साबित होती जा रही है। इस पर विचार करना ही होगा।
लेकिन अभी प्रदूषण की स्थित कही अधिक बुरी हो चुकी है। अभी प्रदूषण के कारक बहुत अधिक बढ़ चुके है। पटाखे इतने घातक है कि उनका प्रभाव पर्यावरण पर पहले की अपेक्षा हज़ारों गुना बढ़ गया है। बिना पटाखे के ही सांस लेना कठिन होता है ।
हमने कभी पक्षियों और अन्य प्राणियों के बारें में नही सोचा। कितने मर जाते होंगे। जो रात्रि विश्राम करने वाले प्राणी होते होंगे ,उनके साथ क्या बीतती होगी ?इसका हमने कभी आंकलन नही किया। हम चींटियों और कबूतरों को दाना देकर समझते है कि हम पुण्य कमा रहे है। अब हमें सोचना ही होगा। किसी बीमार के लिए, बच्चों की सेहत के लिए, जलने की दुर्घटना के लिए, कीट पतंग और सभी खगचर के लिए। दीवाली के दिन हम हमेशा खुश होते थे कि मच्छर मर गए। ये भी अजीब सा अहसास हुआ। बहुत कुछ और भी नुकसान होता होगा।
अब हम लोग जान गए है कि वायु प्रदूषण का स्तर ख़तरे के निशान से ऊपर चला गया है। ये न हो की हमे गाड़ी समेत सभी डिवाइस ही जीवन और सांस लेने के लिए मजबूरी में बंद करने पड़े।
अब ये हम पर है, हमने मिठाई में जहर मिलना शुरू किया तो बर्फी खाना ही बंद हो गया। अब बम ऐसे बने है जैसे 10000 बमों की लड़ी , एक और ध्वनि प्रदुषण और दूसरी और वायु प्रदुषण।
जब मैं कभी पहाड़ो में चला जाता हूँ ,तो सांस आने लगती है। दिल्ली में कितनी बार खांसी ठीक नही होती, वो ठीक हो जाती है।
ये अब गंभीर समस्या के रूप में उभर गया है।
अब तो अगर पटाखे न ही उपयोग हो , तो सबसे अच्छा हो और अपने पर्यावरण को बचा सकें। सांस से पीड़ित लोगों के लिए , पेड़ों में रह रहे खगचर के लिए हमे इस आनंद से ओत प्रोत आदत को जीवन के लिए छोड़ना ही होगा। इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नही दिखता। इस समय भी सांस लेना सहज नही होता। क्या जीवन से बढ़ कर कोई आनंद है? क्या हमें अपने हाथों से ही अपने वातावरण को दूषित करना चाहिए? ये अभी सोचना नही, निर्णय लेने की घड़ी है। मुझे तो ऐसा ही लगता है। ये लिखते लिखते मेरी निगह खिड़की के बाहर गई, वहाँ पर शहतूत का वृक्ष है, उसके पत्ते धूल से पटे हुए है। इनको भी बचाना है, अपने जीवन के लिए। पर्यावरण संरक्षण करना है , अपने जीवन के लिए और मानव जीवन तभी रहेगा ,जब सम्पूर्ण पर्यावरण संरक्षित रहेगा, ये तय है। इन सब मानव के खटराग का असर अंटार्टिका पर दीख पड़ रहा है। इसलिए हमें 'पर्यावरण संरक्षण मानव विकास के लिए और मानव विकास के लिए पर्यावरण संरक्षण' को सदैव याद रखना ही होगा , अगर जिंदा रहना है ,तो ।
रमेश मुमुक्षु
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Thursday, 25 October 2018
पटाखे और वायु प्रदुषण
Tuesday, 23 October 2018
कूड़ा जलाना पाप हैं।
(कूड़ा जलाना पाप है)
शीषर्क में लिखे नारे के साथ करीब 100 के आस पास द्वारका के रेसिडेंट्स सेक्टर 7, ब्रह्मा अपार्टमेंट के बाहर ,जिसमे करीब 15 NGOs भी शामिल थी, हाथों में प्ले कार्ड लिए नारा लगा रहे थे कि कूड़ा न जलाया जाए। कूड़ा जलाना पाप है। (क्षमा करें नाम मैं नही लिख रहा क्योंकि सबके नाम याद नही रहते। ये प्रोटेस्ट जनता का प्रोटेस्ट था । संस्था भी जनता का एक रूप है।)
अचरज का विषय है ,करीब चार वर्षों से स्वच्छ भारत की दिन रात चर्चा है। हर चीज़ में स्वछ भारत लिखा है। द्वारका समेत पूरी दिल्ली में सर्दियों में होने वाले प्रदूषण की चर्चा है। उसके बावजूद भी जलाने वाले बाज नही आ रहे। तू डाल डाल मैं पात पात । कूड़ा है कि बढ़ता जाता है। ज्यों ज्यों आदमी की आय बढ़ती है, कूड़ा भी बढ़ता जाता है।
लेकिन सारा कूड़ा घर से आता।है। घर से सोसाइटी और मोहल्ले में इकट्ठा होता है। उसके बाद किसी भी खाली प्लाट पर डाल दो। घर साफ हो गया और बाहर की चिंता किसे।
कूड़ा उठाने की जगह एक तिल्ली लगाई, सब स्वाहा हो गया। तिल्ली लगाने वाला एक बार भी नही सोचता कि कूड़ा केवल जैविक नही है। कूड़े में प्लास्टिक उत्पाद, सेनेटरी पैड्स समेत न जाने क्या क्या होता है ?तिल्ली लगाने वाला सोचता है कि चलो काम हल्का हो गया। लेकिन उसको ये क्यों नही मालूम कि जलाकर उसने वायु प्रदुषण ही पैदा किया है। कितने लोग सांस की बीमारी से पीड़ित होते है। कितने दम भी तोड़ते होंगे।
प्रशासन कचरा निस्तारण से लेकर ये भी समझाने में पूरी तरह फेल हो गया कि कचरे को जलाने से क्या नुकसान होते है।
कचरे का निस्तारण : घर से ही होना चाहिए। इतनी चेतना अभी नही आई। इसके अतिरिक्त एक व्यवस्था भी पनपती है। अगर सरकारी व्यवस्था चाक चौबंद हो , व्यवस्थित हो तो ही ये सब सुधर जाता है। पूरी दिल्ली कचरे का ढेर बनती जा रही है। लेकिन मेट्रो रेल में सफाई का एक बड़ा कारण है ,पुख्ता सिस्टम। अगर SDMC घर से ही कूड़ा उठाने की व्यवस्था को सुचारू रूप से शुरू कर दे तो एक ओर sdmc की कमाई भी बढे क्योंकि जिसको हम कूड़ा बोल रहे है ,वो एक तरह से खजाना भी है। कल्पना कीजिये कि अगर दिल्ली के प्रत्येक घर से सेग्रेगेटेड होकर कूड़ा अलग अलग हो जाये तो कितनी जैविक खाद का उत्पादन हो जाये और कितना और समान अन्य कामों के लिए इस्तेमाल हो सकता है। इसमे कुछ जानकर लोग आंकड़े दे सकते है।
कचरे में बदबू : कचरा एक साथ होने से ही बदबू शुरू होती है। बदबू के साथ ही विषाणु एवं कीटाणु का विस्तार होने लगता है। ये सभी के किये घातक होता है।
SDMC : अगर sdmc इस काम को अंजाम नही देगी तो कौन देगा। स्टाफ कम है, तो उसको बढ़ाने की ओर कदम बढ़ाओ। इतने बेरोजगार है, उनको रोजगार मिलेगा। कूड़े के एक एक कतरे का सुनियोजित तरीके से उपयोग करें ताकि sdmc की कमाई में वृद्धि हो जाये।
चालान कटे: एक बार व्यवस्था सही होने पर चालान काटने की मुहिम तेज होनी चाहिए। मुझे याद आता है ,मेरे एक अजीज दोस्त ने 90 के दशक के शुरू में चीन की राजधानी बीजिंग स्थित तियानमेन स्क्वायर में सिगरेट का बड फेंक दिया । लेकिन तुरंत पुलिस ने मित्र को पकड़ा और चालान काट दिया। अभी 2018 में ऐसा PMO के आस पास भी एक सपना ही है।
जनता: जनता घर और बाहर सभी अपनी जगह मान कर साफ रखे । ये हमारे लिए कल्पना से परे ही है। इससे हमारा रिपोर्ट कार्ड स्वयं उजागर हो जाता है।
SDMC को भी एक मिशन बना लेना चाहिए कि कचरा जलाने पर 100% रोक लगेगी ताकि हवा का प्रदुषण कम हो सके। द्वारका सबसे अधिक चर्चित महानगर है। यहां रहना एक शान मानी जाती है। लेकिन हवा की गुणवत्ता जब आनंद विहार से नीचे हो तो गंभीर चिंतन तो करना ही हुआ। लगातार प्रोटेस्ट भी संभव नही हो सकता।
आशा है , दक्षिण दिल्ली नगर निगम इस ओर युद्ध स्तर पर पहल करें और कम से कम कूड़ा न जलने दे । इस काम के लिए sdmc को आगे आना ही होगा। इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नही।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष , हिमाल
9810610400
तनिक विचार करें : स्त्री का मंदिर प्रवेश
तनिक विचार करें : स्त्री का मंदिर प्रवेश
जब से मानव का प्रादुर्भाव पृथ्वी पर हुआ है। आम आदमी से लेकर सारे अवतार, पीर पैगम्बर सभी स्त्री की कोख से जन्मे है। भूर्ण से पूर्व इन सब की मां को मासिक धर्म की पावन प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। उसके बाद स्त्री पुरुष के समागम से बच्चे का जन्म हुआ। उपरोक्त और सारी सृष्टि का ये ही विधान है।
# उपरोक्त सभी के देवालयों, धार्मिक स्थलों पर उनको पैदा करने वाली स्त्री को प्रवेश की अनुमति नही है।
क्या ईश्वर ने ये आदेश दिया है? कदापि नही।
इसके पीछे एक बात रही होगी। आजकल सेनेटरी पैड्स के कारण रक्त के रिसाव की संभावना करीब खत्म हो गई है। मालूम नही चलता कि स्त्री मासिक धर्म में है। जब ये पैड्स नही थे , तो रिसाव की संभावना 100 प्रतिशत होती होगी। उस वक्त सफाई और गंदगी के कारण ये प्रतिबंध शुरू हुआ होगा। अभी शहरीकरण से पूर्व ग्रामीण अंचलों में अभी भी स्त्री को घर में आने की मनाही है। खाना भी नही बना सकती।
# लेकिन आज गंदगी और सफाई की बात नही रही।
# क्या आप कल्पना कर सकते है कि आज कोई फरमान जारी कर दे कि मासिक धर्म होने की अवधि में स्त्री सांसद, अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक समाज से अलग, घर से भी अलग रहे।
क्या ये संभव और उचित है? कदापि नही।
# अगर पैड्स न होते अभी भी रिसाव होता, कपड़ो आदि में दीख पड़ता , तो स्त्री को खुद ही अच्छा नही लगता।
# अभी भी जो आदिवासी नग्न रहते है, वो तो पैड्स नही लगाते। वो हम सब सभ्य समाज कहे जाने वालों के पूर्वज ही है। हम कपड़ों तक आगये ,पैड्स बना लिए। वो ठीक वैसे ही है। जब से मासिक धर्म से घृणा शुरू हुई, तभी से नियम पनप गए।
# एक समय था, जब मानव प्रकृति में रहता था। उस समय परिवार नही पनपे थे। उस समय मासिक धर्म में सेक्स न होने पर आदमी औरत को मारने को उतारू हो जाता था। उस समय स्त्री की शारीरिक स्थिति सामान्य नही होती।
उसके बाद स्त्री ने मासिक धर्म में छुपना शुरू किया।ये ही प्रथा के रूप में आज भी प्रचलित है।
### उपरोक्त बातों के आधार पर स्त्री को धार्मिक स्थलों में प्रवेश प्रतिबंधित होना ।क्या उचित और न्यायपूर्ण है?
इस पर अपनी प्रतिक्रिया दें और अपनी राय रखें।
प्रवेश प्रतिबंधित होना उचित है। इस पर भी खुल कर कहे।
रमेश मुमुक्षु
Tuesday, 7 August 2018
कचरा हटाओ नही कचरा पैदा न हो मिशन
(कचरा हटाओ नही कचरा पैदा न हो मिशन)
1. मित्रों , माधुरी वार्ष्णेय जी, द्वारका फोरम की पूर्व अध्यक्ष, ने कितने वर्षों पहले से ही घर से कचरे का अलगाव, प्रबंधन अथवा निस्तारण की वर्कशॉप आरम्भ की थी। ये कोई नई बात नही है। बहुत सी जगह ऐसे सफल प्रयोग हुए है।
एक पॉलिथीन या किसी कंटनेर में कचरे को एक साथ मिलाकर रखने की जगह अलग अलग कचरा रखना है। पॉलिथीन थैली में कचरा रखने से जानवर, पक्षी मर तक जाते है। इसके अतिरिक्त विषाणु का कारखाना बन जाता है , थैली में रखा कचरा ।
इसको आदत में लाना ही होगा।
2. कचरे से खाद बना सकते है। अपने गमले और जहां पर भी पेड़ दिखे उसकी जड़ों में डाल सकते है।
3. सब्जी ,चाय की पत्ती आदि को भी अगर पानी में धो ले और पानी को गमले में और धुली चाय और सब्जी को खाद तैयार करने में इस्तेमाल कर ले।
5. जो भी फल खाएं उनके बीज एकत्रित कर ले। छिलके खाद के लिए काम आजाते है। बची हुई सब्जी, उसके पत्ते आदि बेशकीमती है। इसका सही उपयोग पर्यावरण के लिए अच्छा है, वरना ये बीमारियों की जड़ है।
5. इसके अतिरिक्त दूसरे कचरे का निस्तारण आसान हो जाता है। जैसे दूध की थैली को साफ रखकर सुखा लें। फिर उसको कितने ही तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है।
6. नेपकिन भी हमेशा अलग ही रखे ताकि बाहर यूं ही फेंकने पर जानवर इसको सड़क और फ्लैट्स के आस पास फैला देते है। कांच के टुकड़े भी अलग ही रखे।
7. मलबा कहाँ पर डालना है, इसके बारे में सरकार उन साइट की डिटेल सबको बताए क्योंकि यहां वहां मलबा पड़ा मिलता है। इसको सकती से रोकना है।
8. पीपल ,बरगद के पेड़ के नीचे टूटी मूर्ति, फूल आदि का अंबार न फैलाये, ये कचरा ही होता है। पूजा के लिए एक पंखुड़ी ही काफी है। लोग पूरी टोकरी भर के फूल मंदिर में चढ़ाते है। उनफूलो से भी खाद बन सकती है।
9. छोटे मोटे फंक्शन में कसम उठा लो कि प्लास्टिक, थर्मोकोल जैसी प्लेट आदि का इस्तेमाल नही करेंगे। इसके स्थान पर पत्तल आदि का प्रयोग शुरू करें।
10.किसी भी पार्टी में उतना ही खाना प्लेट में डालों, जितना खा सको। पार्टी ने इस तरह की सूचना लगी होनी चाहिए। प्लेट साफ हो और उसमें कुछ भी बचा नही होना चाहिए।
11. आजकल कुछ लोग कुत्तों के प्रेमी है, वो आसपास घूमते कुत्तों को यहां वहां खाना दे देते है। उनसे भी आग्रह है ,वो एक स्थान विशेष तय कर ले ताकि सोसाइटी और पॉकेट के अंदर जगह जगह कचरा न रह जाये।
12. जो भी कचरे के डिब्बे रखे गए है, उनके रंग देखकर ही कूड़ा डालने की आदत जरूरी है, जो अभी नही पनप सकी है।
ये छोटी छोटी बातें है।
नोट: SDMC समेत सभी सफाई से जुड़ी एजेंसी को" परमार्थी एक प्रयत्न " ने नक्शा दिखा दिया। उनके सारे बहाने खुल गए । जब परमार्थी वास्तविक सफाई कर सकती है तो SDMC के पास क्या ऐसी कुब्बत नही की सफाई कर सके? मेरा दावा है, ऐसी सफाई द्वारका में कभी नही हुई। आगे ये कितना कर सकेंगे ,लेकिन श्रीमती कमलजीत सहरावत जी परमार्थी ने एक स्टैण्डर्ड तय कर ही दिया कि सफाई कम से कम इतनी तो हो ही सकती है। सारे बहाने, स्टाफ कम है, फलाना ढिमका सभी धरें रहे गए।
विनम्र प्रार्थना: या तो SDMC परमार्थी जैसी सफाई खुद ही शुरू करें। नही तो उनके साथ मिलकर ये काम शुरू करें।
मित्रों बिना किसी विवाद और पूर्वग्रह के इस विषय पर सारगर्भित चर्चा तो हो ही सकती है।
ये ही एकमात्र सस्ता और टिकाऊ मार्ग है, कूड़े के पहाड़ों से बचने का।
(रमेश मुमुक्षु)
अध्यक्ष , हिमाल
9810610400
ramumukshu@gmail. com
Saturday, 4 August 2018
पेड़ और विकास
(पेड़ और विकास )
अभी सुबह मोर और पक्षियों के कलरव ने नींद खोल दी। बाहर देखा तो गुडगांव फेज 3 के पीछे अरावली के अवशेष और दूर जहां तक नज़रें जाती हूं , जंगल का वितान तना है। सच शहरों की बालकनी में खड़े होकर ऐसा दृश्य देखते ही बनता है। जंगल प्रकृति के सबसे खूबसूरत उपहार है। व्यक्तिगत रूप से मुझे मुगल गार्डन भी पसंद नही आता। शुद्ध रूप से उगे पेड़ और उन के साथ इधर उधर पनप गई ,झाड़ियां जंगल को जंगल बना देती है। उसने यहाँ वहाँ उड़ते खगचर ,झींगुर समेत कीटपतंग उसके श्रृंगार ही है। कोई भी मौसम हो जंगल अपना रूप बदलता है। कभी पतझड़ तो कभी बरसात में गाड़े हरे रंग की चादर ओढ़ लेता है ,जंगल। जंगल के भीतर सांप की तरह पगडंडी को दूर से देखने का अहसास ही कुछ और है। सड़क भी अच्छी लगती है , लेकिन सड़क को निहारा नही जा सकता। सड़क पुरातन नही ,पगडंडी पुरातन है, जो मानव के बहुत भीतर तक अवचेतन मन और जीन में मानव की यात्रा के असंख्य दस्तावेज के रूप में समाविष्ट है।
विभिन्न पेड़ जंगल की एकता और सुखी जीवन का दर्शन है। पेड़ वास्तव में मानव के अनुरूप नही बने है। मानव को केवल उससे गिरा ही खा सकता है। ये बने है ,पक्षी ,कीटपतंग और जानवरों के लिए जो उसकी गोद में बैठकर अपनी भूख और थकान दूर करते है।
ये पेड़ कितने ही जीवों के घर और आश्रयस्थल होते है। शायद हम इसकी चिंता और सुध नही लेते। पेड़ बढ़ने में समय लगता है। पेड़ अपने पूरे जीवन में उपयोगी रहता है। पेड़ जब ठूंठ का रूप लेता है ,उसमे भी जीव रहते है। जंगल का अपना एक संगीत रहता है। हवा चलती है , तो नाद होता है। कितनी ही वर्षा हो पेड़ अपने शरीर से उसको फैला देता है। पेड़ जमीन को पानी देते है। नदी को पैदा करता है। वायुमंडल को वायु ,जो जीवन के लिए उपयोगी है। धूप में चलते एक छोटा सा ठूंठ भी राहत दे जाता है। उच्च हिमालय के जंगल दिन में भी अंधेरा ओढ़े रहते है क्योंकि उनमें जीव पनपते है। जंगल के रंग जैसा कोई चित्र नही हो सकता। नाना रंग से सुज्जजित रन बिरंगी चादर जैसा सूंदर दृश्य क्या बना सकता है ,कोई मानव? मानव की सबसे खूबसूरत बिल्डिंग भी तभी सूंदर लगती है ,जब उसके चारों ओर पेड़ होते है। बिना पेड़ और हरियाली को उजाड़ कहा जाता है। लेकिन प्रकृति के स्वयं के वृक्षविहीन स्थल भी खूबसूरत होते है। दुनिया का कोल्ड डेजर्ट स्पीति का क्षेत्र खूबसूरत है। क्योंकि उसमें बर्फ से प्रकृति चित्रकारी करती है।
रेगिस्थान के टीले सागर की लहरों से लगते है। एक वक्त था ,मानव ने सभी जगह जीना सीखा और प्रकृति के साथ एकात्म और समरसता रखते हुए।
लेकिन अभी विकास का मॉडल केवल विकास ही देखता है। पेड़ उसके लिए DPR के किसी चेप्टर का हिस्सा है। कलम चला दो वो भी अब कंप्यूटर के कीपैड पर उंगली दौड़ेंगी कि 100 पेड़ काटेंगे 1000 लगा देंगे। मानव की जमीन का एक इंच भी कट जाए तो मार काट तक हो जाती है। लेकिन पेड़ और उसमें रह रहे ,जीव की कौन सुने। लेकिन मानव कबूतर को दाना देकर और चींटियों को आटा डाल अपना धर्म पूरा कर लेता है। क्या किसी विकास के मॉडल में इसकी चिंता होती है कि उपसर रहने वाले जीव कहाँ जाएंगे? उनका क्या होगा? अभी तो इसपर चर्चा भी करना बेमानी हो गया है। एक तरफा विकास और विचार संपन्नता लाता है ,लेकिन एकाकी और निपट अकेला बना देता है। विकास का हरेक मॉडल आदमी को एकाकी बना रहा है। प्रकृति में एकाकी कुछ भी नही , समग्रता ही है। भारत का पुरातन ज्ञान भी ये ही कहता है। लेकिन विकास की ज़िद्द और हठधर्मिता मानव को क्रूर बना देती है। जो आज हम झेल रहे है।
इसलिए विकास के चाहने वालों कम से कम पेड़ काटकर कर विकास करों।
जंगल की आवाज़ हमेशा जिंदा रहे, इसको नही भूलना। ये वो जान सकते है ,जिन्होंने जंगल के बीच उसको महसूस किया होगा।
जल,जंगल ,जमीन और वायु सत्य और जीवन का आधार है। इसको संरक्षित करने का मॉडल ही सतत है और चिरस्थाई है।
अभी भी बाहर जंगल अपनी और बुलाता है। उसमें थोड़ा चल कर किसी चट्टान पर बैठना आकर्षित करता है। जंगल में बहती नदी का नाद संगीत की पराकाष्ठा ही है।
सोचना तो होगा ही ,अगर ये सब न हों, तो क्या करेगा मानव का विकास और उसका एकाकी जीवन।
इसलिए एक नारा और बात हमेशा याद रखनी है "
जंगल के है क्या उपकार
मिट्टी पानी और बयार
मिट्टी पानी और बयार
जिंदा रहने के आधार।
(रमेश मुमुक्षु)
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
ramumukshu@gmail.com
Sunday, 24 June 2018
18000 पेड़ बचाने है।
सेवा में
1. माननीय प्रधानमंत्री महोदय
2. माननीय केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय
3. माननीय केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय
3. माननीय मुख्यमंत्री , दिल्ली
4. माननीय केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय
विषय: दिल्ली का अपना जल नहीं ,बिजली अपनी नही 18000 पेड़ जो है , उनको काट दिया जाएगा। ये क्या गड़बड़ झाला है, कौन सा विकास है ,किस के लिए, सरकार जबाव दे।
मान्यवर महोदय,
अंधाधुंध विकास पहले ही देश के प्राकृतिक संसाधनों को लील चुका है। पर्यावरण परफॉरमेंस रिपोर्ट में 177 नंबर है, प्रदूषण में भी सबसे नीचे पायदान पर खड़े है। हज़ारों किलोमीटर नदियां प्रदूषित हो चुकी है। चारधाम में आल्वेदर रोड के नाम पर लाख पेड़ काटे जाने का सिलसिला शुरू हो चुका है। देश के हिमालयी क्षेत्रों में वर्षा और बर्फ का नैसर्गिक सिलसिला पिछले दो दशकों से बुरी तरह प्रभावित है। उच्च हिमालय पर ठंड कम और कचरा अधिक होता जा रहा है।
एवरेस्ट पर भी अमरनाथ और जम्मू की तरह भीड़ जाने लगी है। धर्म के नाम पर भी पूरी प्रकृति को रौंदने में कोई कसर नही। केदारनाथ समेत सभी पहाड़ों में दर्शन करने के लिए भले पहाड़ नष्ट हो जाये ,कोई लेना देना नही। पवित्र स्थल जहां केवल देवता वास करते थे ,अब लोगों के पाखाने और कचरे से पाट दिए जाने की होड़ है। गंगोत्री की भैरों घाटी में हज़ारों अमूल्य देवदारु के जंगल काटने की जिद ने सरकार की आंखों में पट्टी बांध दी।
दिल्ली की स्थिति और भी खरनाक होती जा रही है। दिल्ली हिमालय को भष्मासुर की तरह निगल जाएगी। दिल्ली का अपना जल नही है। टिहरी बांध के बाद अब पंचेश्वर की ओर निगह है। बिजली और पानी की जरूरत और भी बढ़ेगी और पहाड़ को लील लिया जाएगा।
दिल्ली की लगभग 700 वाटर बॉडीज लगभग खत्म हो चुकी है और खत्म होने के कगार पर है। गांव समेत सभी बिल्डर्स, नेता, माफिया केवल बिल्डिंग बनाने में लगे है।
इसके अतिरिक्त पानी के रूप में एक बहुत बड़ा स्रोत नजफगढ़ झील को भी हरियाणा और दिल्ली सरकार स्वीकार करने को राजी नही। दिल्ली का सारा सीवर वापस यमुना में गिरता है। जल शोधन का काम जो पूरी दिल्ली में हो जाना चाहिए था, अभी तक नही हो सका।
सरोजिनी नगर, नेताजी नगर समय पुरानी सरकारी कॉलोनी पेड़ो से ढकी थी। उसको उजाड़ कर दिल्ली के प्रदूषण को और बढ़ाने की जिद दिल्ली ही नही आसपास के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ने ही होगा। इसलिए समय आगया है कि सरकार की सतत विकास विरोधी नीतियों से सरकार चेता दिया जाए।
प्रार्थना एवं चेतावनी:
सर्वप्रथम रिडेवलपमेंट के नाम पर काटे जा रहे ,18000 पेड़ किसी भी सूरत में न काटे जाए, इस बारे में शीघ्र ही एक पत्र जारी करें। इसके अतिरिक्त निम्न बिंदु है ,जिनपर कार्यवाही करनी है।
1. सबसे पहले दिल्ली के सारे पानी के स्रोत वाटर बॉडीज और झील सभी युद्ध स्तर पर पुनर्जीवित किये जायें। नज़फगढ़ झील को पूरी तरह वेट लैंड घोषित किया जाए। उसके लिए ग्रामीणों को भारी मुवावजा भी देने पड़े तो देना चाहिए। कितनी ऐतिहासिक
2. दिल्ली के एक एक बूंद पानी का का इस्तेमाल किया जाए। सभी कॉलोनी के सीवर के पानी को पुनः साफ करके वापस उपयोग लाया जाए। STP जल शोधन संयत्र युद्ध स्तर पर लगाये जाए।
3. पानी की व्यवस्था करने के बाद ही नए प्रोजेक्ट की बात सोची जाए।
4. सतत विकास के तहत सभी बड़े पेड़ बचाये जाए। जब तक नए पेड़ बड़े नही होते तब तक कोई भी पेड़ न काटा जाए।
5. इन पुरानी कॉलोनी को ग्रीन क्षेत्र भी बनाये जा सकते है। जिनमे पानी रिचार्ज और दिल्ली के प्रदूषण को कम करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
एक बड़ा ग्रीन क्षेत्र पूरी दिल्ली के लिए लाभ करी होगा।
6. केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार किसी भी नए प्रोजेक्ट से पहले एक स्वेत पत्र जारी करें , जिसमे दिल्ली में पानी की उपलब्धता की पूरी जानकारी दी जाए।
7. पानी और ऊर्जा के स्रोत माने जाने वाले राज्य उत्तराखंड और हिमाचल पर भी पर्यावरणीय संकट करीब 2 दशक से छाया है। इस बात को भी गंभीतापूर्ण लेना होगा।
8. यमुना और बगल में हिंडन नदी को देख शर्म से डूबना चाहिए। गंदे नाले के रूप में सब कुछ परिवर्तित हो गया है।
9. देश की राजधानी दिल्ली को देश का मॉडल होना चाहिए।
सभी मौजूद जल स्रोत और पर्यावरण की स्तिथि आदर्श होनी चाहिए।
10. दिल्ली के सभी 5 सितारा होटल, धार्मिक स्थल और सभी स्थान , कॉलोनी जहाँ पर जल का उपयोग अधिक है । वहां पर जल शोधन संयंत्र लगाकर पानी को पुनः उपयोग में लाने का काम युद्ध स्तर पर किया जाए।
11. बिजली की कमी को पूरा करने के लिए पूरी दिल्ली की स्ट्रीट लाइट , मार्किट की लाइट, कॉलोनी जो व्यवस्थित है , उनको सोलर से युक्त करना ही पड़ेगा ।
कचरे से भरी दिल्ली का आलम ये है कि नार्थ ब्लॉक के पिछवाड़े वित्त मंत्री जहां बैठते है और प्रधान मंत्री कार्यालय से करीब 80 मीटर दूर वर्षों से गंदगी का ढेर ज्यों का त्यों पड़ा है।
ये हमारे देश की विडंबना है और कड़वी सच्चाई।
धूल से भरी दिल्ली में पेड़ो की इतनी बड़ी कटाई के लिए सभी दिल्ली वासी के लिए गंभीर सोच का विषय है। पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बारे में सबको सोचना ही होगा । अभी समय कम रह गया है। विश्व पर्यावरण में हो रहे प्रभाव से हम सब परिचित ही होंगे। दिल्ली की गहमा गहमी से दूर पर्वतीय प्रदेश में घूमने जाने वाले अगर नही चेते तो पहाड़ भी संकट में आजायेंगे । अभी संकट और गहरा रहा है। गंगा पार जो बांध रोके गए थे , उत्तराखंड उनको पुनः बनवाने का प्रयास कर रही है। ये गंगा प्रेम के छलावे का परिचायक है।
प्राकृतिक संसाधनो का उपयोग सविंधान के नीति निर्देश " Article 39 (b) that the ownership and control of material resources of the community are so distributed as best to subserve the common good" जनता का ही है। इस तथ्य से हम देश के नागरिकों को सोचना ही होगा , ये निर्णय मात्र मंत्री, अफसरशाही और उद्योगपति का ही नही होना चाहिए। भारत के नागरिक इस में पहल करें। सरकार जनता से है , जनता सरकार से नही ,इस बात को अब समय आगया है अपनाने का।
दिल्ली की इस विनाश लीला को रोकना ही होगा।
विनीत
(रमेश मुमुक्षु)
सामाजिक कार्यकर्ता
अध्यक्ष , हिमाल
पी यू सी एल ,
सदस्य, राइज फाउंडेशन
ग्रीन सर्किल , द्वारका
9810610400
मेल ramumukshu@gmail. com