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Friday, 15 October 2021

रावण की आत्मव्यथा

रावण की आत्मव्यथा
मेरी मृत्यु राम के धनुष से हुई। मैं जानता था कि ये होना ही था। ये वध मेरे तर्पण का आरंभ बिंदु था। मेरा सौभाग्य था कि साक्षात ईश्वर ने मेरे प्राण हरे। मैं  भी सदियों से ये सब भुगत रहा हूँ।सीता के हरण का पाप आजतक मुझे कुरेदता है। राम ने वध के उपरांत मेरा सम्मान किया  ,वो मृत्यु के दर्द को हरने वाला क्षण था। नारायण ने ही प्राण हरे ,ये मेरा सौभाग्य ही था।
लेकिन अभी कुछ वर्ष पूर्व मेरी तंद्रा यकायक टूट गई। पृथ्वी लोक से किसी निर्भया के क्रंदन और दर्द से पूरा ब्रमांड कंपन से हिलने लगा। मेरी भी सदियों बाद आंख खुल गई । इस क्रंदन ने मुझे भी विचलित कर दिया। मैं तो समझे बैठा था कि मेरी मृत्यु के उपरांत  पृथ्वी लोक में स्त्री के प्रति जो अपराध  मैंने किया वो मेरे वध के साथ ही लुप्त हो गया। निर्भया के चीख का सिलसिला जो शुरू हुआ ,आज भी जारी है। मैं 'रावण'  आज ये सब देख बहुत दुःखी हूँ। चारों और  एक के बाद एक निर्भया  के साथ अन्याय देख दिल दहल जाता है। कितने जघन्य अपराध मानव कर रहा है। 
हे राम तुम किस लोक में विरसजमान हो ,देख लो अपने संघर्ष से निर्मित दुनियां की अधोगति और कैसे ये मानव 14 वर्ष की संघर्ष गाथा भी  केवल याद करता है, ह्रदय में अनुभव नही करता। इनके पाप देखकर  मैं खुद भी स्तब्ध हूँ। सदियां मैंने अपनी चिता जलती देखी है। पाप पर  पुण्य की जीत की गाथा सुनते आया हूँ।  लेकिन आज मानव का ये हस्र देख अचरज हो रहा है। ईश्वर से निर्मित सृष्टि को नष्ट करने का पाप तू कर रहा है।   मुझे स्मरण आता है जब मैं मृत्यु शैय्या पर पड़ा था ,उस वक्त राम ने अपने अनुज लक्ष्मण से ज्ञान लेने को कहा ,उस वक्त मैंने तीन बातें बताई , जो आज भी सत्य है, उनका सार था" अपने गूढ़ रहस्य अपने तक रखना, शुभ कर्म में देरी ना करना, गलत काम से परहेज़ करना, और किसी भी शत्रु को कमज़ोर ना समझना , यह अमूल्य पाठ हर एक इंसान को अपने जीवन में उतारना चाहिए।लेकिन आज ये सब नदारद है।अभी ये मानव जो सृष्टि को नष्ट करने में तुला है, ये अदृश्य जीव से डरा हुआ ,मेरे पुतले भी नही जला पाया। ये भी मेरी तरह दम्भ में डूबा जा रहा है। हे राम ये मानव दिन रात जपता रहता है "होइहि सोइ जो राम रचि राखा।" लेकिन करता वही है ,जो उसको लाभकारी लगे , भले वो कहता रहता है कि सबै भूमि गोपाल की" लेकिन  विश्व के सबसे प्राचीन पर्वत अरावली से लेकर हिमालय समेत सब कुछ प्रदूषित और नष्ट भ्रष्ट करने में तुला है। हवा ,पानी , जलथल सब कुछ विकृत कर दिया। मेरे अनुज आई रावण का निवास पाताल लोक भी इस मानव ने भ्रष्ट कर दिया।
ये सब देखने से अच्छा है, पुनः चिरनिद्रा में चले जाएं। 
ये सब बोलकर रावण अंतहीन दिशा की चला गया और हम मानव के लिए  बहुत कुछ चिंतन करने के लिए छोड़ गया। समाज, लोकनीति,राजनीति समेत सब कुछ तहस नहस करने में तुला है।अपनी अपनी ढपली बजाते बजाते हम मानव अपने अस्तित्व को खतरे की ओर ले जा रहा है। अब देखना है कि हम मानव किस दिन एक सच्चा कदम उठाएंगे ,सही दिशा की ओर ....
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
15.10.2021

Tuesday, 12 October 2021

पुरानी कविता (चलो घूम आओ घड़ी दो घडी)

पुरानी कविता 
(चलो घूम आओ घड़ी दो घडी)

न वाद न विवाद 
न आपस में झगड़ा
न तू तू 
न मैं मैं
न इसकी 
न उसकी 
न लेना 
न देना
क्यों आपस में 
मुँह फेर रहे है
बचपन से खेले
सभी संगी साथी
गुस्से से त्योरी 
तनी हुई क्यों है
कभी सुना 
और पढ़ा था
मतभेद बढ़ाना 
सबसे आसान है
हमको भी लगता 
था 
ये सच नहीं है
आपस में 
विरोधी तो भिड़ते रहे है
पर अपनों में दीवारें 
खड़ी हो रही हैं
ये कैसा अजब और गजब 
हो रहा है
गुस्से में राजा गुस्से में
प्रजा
लोकतंत्र कहीं 
दुबक सा गया है
बोलना बुलाना 
बहलना बहलाना 
कृष्ण के किस्से राधा 
कहा अब सुना ही सकेगी
कविता तो होगी
भाव न होगा
न होगा प्रेम 
न होगा आँखों की 
झीलों में 
जाना 
न होगा  बिहारी की 
कविता का उत्सव 
आँखों के इशारे 
सुना है
गुनहा है
चलो दिलदार चलो 
चाँद के पार चलो
पर मौत की सजा होगी
श्रृंगार रस सुना है
 गैर कानूनी और देशद्रोह 
होगा
कामदेव छुप कर
डरा सा हुआ है
न अब उड़ेगी जुल्फें
किसी की
सुना है आँखों
में चश्मे लगेंगे
बिल्डिंग बनेंगी
सड़के बनेंगी
नदियों को जोड़ो 
भले ही उनको मोड़ों
अब कोई न गा सकेगा
वो शाम कुछ अज़ीब थी
न अब साजन उस पार
होंगे
न शाम ही ढलेगी
न हवाएं चलेगी मदमस्त मदमस्त
न होगा गर
इन्तजार किस का
तो पत्थर बनेगा 
कोमल सा दिल अब
जिसमे न होगी कल की
कोई आशा 
भला ऐसे दिल को 
कर सकेगा कोई कैद
मज़ाल है किसी की
उसको झुका दे
ये उलटी धारा न 
बहने अब देना
दिलों को 
जोड़ों 
न तोड़ों 
वो धागा 
रहीम की ही सुन लो
न तोड़ो वो धागा 
फिर कभी ये जुड़ ही न
सकेगा
टुटा हुआ दिल
एटम पे भारा
भय से परे क्या मरना 
क्या जीना
सबको मिलकर 
बनेगा  बगीचा
नवरस बिना 
क्या जीवन का मतलब
बच्चे भी होंगे 
जवानी भी होगी
बुढ़ापा भी होगा
भाषा भी होगी
मज़हब भी होंगे
साधु भी होंगे 
सन्यासी भी होंगे
होंगे ये सब 
जब सारे 
ही होंगे 
सारे न होंगे तो 
अकेला कहाँ होगा
वैविध्य है जीवन और
कुदरत है सब कुछ 
सब कुछ है कुदरत
फिर क्या है मसला 
फिर क्या बहस है
चलो घूम आये 
चलो टहल आये 
मसले तो आते जाते 
रहेंगे 
हम फिर न होंगे
न होगा ये मंज़र
चलो लुफ्त ले लो 
घडी दो घडी 
चलो घूम आएं 
घडी दो घडी....
रमेश मुमुक्षु
(29.3.2017 ट्रैन में लिखी)

Saturday, 2 October 2021

महात्मा गांधी : सतत परम्परा के वाहक

महात्मा गांधी :  सतत परम्परा के  वाहक  
महात्मा गांधी एक नाम ही नही अपितु एक सतत परम्परा का वाहक कहूँ तो गलत न होगा। गांधी के विभिन्न आयाम एक साथ  चलते दिखाई देते है। गांधी प्रार्थना, रोजमर्रा की सफाई, लिखना, बोलना, सेवा, प्रकृति से जुड़ा हुआ जीवन, सतत ग्रामीण विकास , ग्राम स्वराज्य एक समग्र चिंतन और अहिंसा और साहस को स्थापित करने की पहल करने वाला एक व्यक्ति जो जीवन भर नया नूतन खोजता रहा ,बहुत ही सहज और सुगम मार्ग को बनाता गया। 
गांधी में समग्रता का उद्विकास  काल से आरम्भ होता है ,जब उनको अपनी गलती का अहसास और गलती स्वीकार करने का साहस गांधी को एक लंबी यात्रा की ओर ले जा रहा था। एक खोज जो निरंतर चल रही थी गांधी के भीतर। गांधी के भीतर जो पनप रहा था, उसकी पुष्टि गांधी पढ़ने की आदत से पूरी कर लेते थे। उनकी चिंतन यात्रा के दौरान उन्होंने लेव टॉलस्टॉय , जॉन रस्किन, डेविड हेनरी थोरो एवं गोपाल कृष्ण गोखले को जानकर अपने भीतर हो रही उथल पुथल को एक व्यवस्थित मार्ग की दिशा में आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ। इन महान विभूतियों को उन्होंने अपने गुरुओं के रूप में ही हमेशा माना, क्योंकि जो मोहनदास के मन में भविष्य की कल्पना आकार ले रही थीं, इन सब को पढ़ कर , उनको लग गया कि उनका रास्ता और लक्ष्य सही दिशा में जा रहे है।
इसी कारण ट्रैन से नीचे फेंके जाने के कारण ही उन्होंने जो किया , वो अचानक से हो गया था, ऐसा नही उनके भीतर सत्य और अहिंसा का मार्ग प्रशस्त हो रहा था। इस घटना से उनको धरातल पर उतारने का अवसर मिला और सफल भी रहे। साउथ अफ्रीका का प्रयोग शायद मोहन दास को गांधी और महात्मा के मार्ग पर ले गया। विदेश जहां पर अंग्रेजों का शासन था। बाहर के देशवासी दोयम दर्जे के माने जाते थे। रंगभेद के अनुसार भारत के लोग भी काले ही माने जाते थे। उनके भीतर सत्य अहिंसा के आधार पर सफलता ने टॉलस्टॉय की बात को  सिद्ध कर दिया  कि इस युवा से सत्य , अहिंसा और शांति के विचार को प्रतिपादन करने की आशा ही नही विश्वास है। इसके अतिरिक्त अफ्रीका में उनके प्रयोग सफल हुआ और उनकी आहट भारत में भी सुनी जाने लगी।
भारत आने पर गोपाल कृष्ण गोखले ने उनका स्वागत और आशीर्वाद दिया। गांधी ने आज़ादी के आंदोलन में गांव की आवाज़ को जोड़ने का विलक्षण कार्य किया , जिसकी शुरुआत चंपारण से हुई। चंपारण ने ग्रामीण अंचल को मुख्य धारा में लाने का काम भी किया। 
गांधी को किसी भी रूप में इग्नोर नही किया जा सकता है क्योंकि गांधी समग्र और सतत परम्परा के वाहक कहे जा सकते है। गांधी के लिए सफाई ,स्वच्छता दैनंदिन का  अनिवार्य कर्म था, जो सहज और स्वाभाविक ही था।
गांधी ने आज़ादी के आंदोलन के साथ रचनात्मक कार्य की श्रृंखला आरंभ कर समग्रता का परिचय दिया। आज़ादी की लड़ाई में चंपारण के बाद नामक आंदोलन, विदेशी कपड़ों की होली और भारत छोड़ो के साथ रचनात्मक कार्यों में साबरमती आश्रम, गांधी विद्यापीठ , सेवा ग्राम समेत एक लंबी श्रखंला का प्रतिपादन भी किया। सेवा ग्राम में परचुरे शास्त्री कुटी में उन्होंने कुष्ठ होने के बाद भी सेवा की और उन्होंने कहा कि सेवा का संबंध ह्रदय से होता है, सेवा दिल से ही की जा सकती है। इसके बाद कुष्ठ निवारण के कार्य आरंभ हुए। 
नई तालीम के माध्यम से समग्र शिक्षा की बात कही और उनका प्रयोग भी  किया। स्त्री शिक्षा पर उनका बहुत जोर था। 
गांधी ने ग्राम स्वराज्य की कल्पना की जो भारत की महती परम्परा का परिचायक ही था। विदेशी हुकूमत के कारण ग्रामीण सहज परंपरा पर जो विपरीत असर पड़ा ,उसको पुनर्स्थापित करने का ही समग्र और सतत प्रयोग था । ग्राम स्वराज्य आज भी ग्रामीण जीवन और ग्रामीण जीवन को अक्षुण्ण रखने का कारगर उपाय है। ग्राम स्वराज्य जल,जंगल,जमीन,समेत स्थानीय संसाधन का सदुपयोग जो सतत विकास की अवधारणा का वाहक ही है। आज भी ग्राम स्वराज्य ही ग्रामीण स्वावलंबन का एक मात्र उपाए है, भले वो विभिन्न रास्ते से आये। ग्राम स्वराज्य का सबसे बड़ा पहलू है कि ग्रामीण अपने विकास की सही दिशा स्वयं ही खोजे और उसी के आधार पर आगे बढ़े। कृषि एवं पशुपालन एक सिक्के के दो पहलू है। प्राकृतिक एवं जैविक कृषि और जीवन गांधी जी के दो मजबूत 
सत्य व  अहिंसा की ओर जाना तो मानव के सहज स्वभाव में आता गया है। मानव और प्रकृति समेत सम्पूर्ण प्रकृति को एक समग्र दृष्टि से देखना ही जीवन के संरक्षण के लिए बहुत जरूरी है।
गांधी एक निरन्तर चलती आ रही सतत समग्र परम्परा का वाहक कहे तो गलत न होगा। 
गांधी का रामराज्य सर्व धर्म प्रार्थना से सराबोर था। इसलिए उनके हाथों में गीता रही , और मरते समय ह्रदय से राम कितना ये गांधी के द्वारा ही  होना था।
उनके जीवन दर्शन का आधार हिन्द स्वराज्य में गांधी लिखते है कि देश  को अंग्रेजों ने गुलाम कैसे बनाया  ,जबकि अंग्रेज  तो संख्या में कम थे। गांधी उत्तर देते है कि हम खुद ही गुलाम बने है। अगर हम उनकी जीवन शैली अपनाते रहे, धीमे धीमे स्वयं ही गुलाम होते चले गए। ये बात आज भी प्रासंगिक है। 
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधी जी के बारे में कहा था कि “भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था।” ... गांधी अपने में एक विचार थे, गांधी युवा पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत  है।"

रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष ,गांधी शांति प्रतिष्ठान 
दन्या , उत्तराखंड 
9810610400

Tuesday, 14 September 2021

हिंदी दिवस : आओ विचार करें

हिंदी दिवस : आओ विचार करें
हिंदी दिवस और पखवाड़ा इस बात का परिचायक है कि अभी हिंदी राज्य भाषा नही बन सकी है। वैसे भी हिंदी के बड़े परिवार से बहुत सी  समृद्ध जो हिंदी से पुरानी है, अलग हो चुकीं है। तकनीति रूप से हिंदी का कद छोटा होता जायेगा। हालांकि बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है ,जिन्हें इंग्लिश नही आती । लेकिन इसका अर्थ ये नही है कि हिंदी का चलन बढ़ा है। हिंदी का कद फ़िल्म , फिल्मी गाने और टीबी सीरियल  से  बढ़ा है। लेकिन शिक्षा के प्रसार में अंग्रेज़ी मीडियम से पढ़ने वाली की संख्या अधिक होती जा रही है। गैरसरकारी और निजी स्कूल का चलन केवल अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाई के कारण बढ़ा है। 
आजकल बच्चे हिंदी में गिनती तक भूल गए और दूसरी और अंग्रेज़ी में भी बच्चे पारंगत नही है। लिखने में तो थोड़ा बहुत लिखने और रटने से काम चल जाता है। लेकिन बोलने में अभी भी पिछड़े है।  लेकिन लोग इससे भी खुश है कि उनका बच्चा अंग्रेजी में पढ़ रहा है। अभी भी समाज में अंग्रेज़ी जानने वाले का सम्मान अधिक होता है। इस  मानसिकता  ने भी हिंदी के प्रति उदासीनता पैदा की है। नौकरी तो एक कारण है ही। कुछ वर्ष पूर्व हिंदी मीडियम से किसी विद्यार्थी ने राजनीति शास्त्र में प्रथम स्थान प्राप्त किया, ये जानकर सबको ताज्जुब हुआ। विद्यार्थी को ये जानकर बुरा लगा , तब मैंने उस विद्यार्थी को कहा कि इसमें हतोत्साहित होने की कोई बात नही है क्योंकि जो प्रोफेसर भी है, वो प्लूटो का अनुवाद इंग्लिश में पढ़ते है, तुमने हिंदी में पढ़ा तो क्या अंतर पढ़ गया?  ये सब भीतर गहरे में पूर्वाग्रहों के कारण होता है। 
लेकिन गूगल ने लोगो को हिंदी लिखना सिखा दिया। आजकल बहुत लोग जिनको हिंदी टाइप नही आती वो भी हिंदी टाइप कर लेते है। मैं स्वयं इसी तरह टाइप करता हूँ। 
सरकारी विभाग में भले आप हिंदी में लिखे , लेकिन जबाव अंग्रेज़ी में ही आएगा। कम से कम केंद्र सरकार में तो हिंदी अनुभाग  केवल अनुवाद के लिए ही खुले हुए है। संसदीय प्रश्न का अनुवाद हिंदी में होना अनिवार्य है, वो भी इस कारण ।अभी स्मार्ट फोन आने से लोग हिंदी का भी इस्तेमाल भी करने लगे है। 
हिंदी को राज्य भाषा का दर्जा मिलने में अड़चन इसलिए भी है क्योंकि अन्य राज्यों के नागरिक इसको अपने ऊपर हिंदी तो थोपना कहते है। इसका एक कारण हो सकता है कि भारत में अन्य भाषाओं को समुचित सम्मान नही मिला। स्कूल में विदेशी भाषा का विकल्प रहता है। आजकल संस्कृत को बढ़ावा मिल रहा है। लेकिन तमिल और अन्य भाषा का भी समृद्ध इतिहास रहा है। उन भाषाओं को स्कूल में एक विकल्प के रूप में क्यों उचित सम्मान नही मिलता? ये सोचने का विषय है।  ये भी विडंबना है कि लोग विदेशी साहित्य को जानते है ,लेकिन तमिल जैसी समृद्ध , प्राचीन और परिष्कृत भाषा के इतिहास  के संगम काल को नही जानते, जो ईसवी पूर्व चरमोत्कर्ष पर था।
हालांकि जवाहर नवोदय विद्यालयों में बच्चों को किसी अन्य राज्य में जाकर रहना होता है और उसकी भाषा सीखनी होती है। लेकिन मेरा दावा है ,इस विषय में सब लोग नही जानते। इसलिए हमें भारत की सभी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए। शिक्षा नीति 2020 में मातृ भाषा में शिक्षा के साथ अन्य भाषा के विकल्प का प्रावधान रखा है। इसके ठोस रूप से लागू होने से इसमें मूल रूप से परिवर्तन आ सकेगा, उम्मीद तो की ही जा सकती है।
एक बात तो हम सब स्वीकर कर ही लेंगे की हिंदी में पूरे देश की संपर्क भाषा होने का सामर्थ्य कहूँ या  संभावना, इस बात से इनकार नही किया जा सकता। हिंदी भाषा को आप किसी भाषा या बोली की तरह बोल सकते है , हिंदी भाषा का हिंदीपन खत्म नही होता। तमिल हिंदी , गुजराती हिंदी आदि बन कर भी हिंदी ही रहेगी । लेकिन किसी अन्य भाषा को हिंदी की तरह नही बोला जा सकता क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो वो हिंदी ही हो जाएगी।  हिंदी में नए शब्दो को अपने भीतर समाहित करने  की काबलियत है, इसलिए हिंदी का आकार समय के साथ भी बढ़ता रहता है। कुछ लोग शुद्ध हिंदी की बात करते है ,लेकिन हिंदी अपने साथ विभिन्न शब्दों को लेकर चलती है। इसी कारण उसमें सम्प्रेषण की असीम संभावना है, इसलिए इस भाषा में संपर्क भाषा होने का गुण तो है। हिंदी परिवार से निकली राजस्थानी, मैथिली, ब्रज और अन्य भाषा भले वो अपनी अलग पहचान बना ले , लेकिन हिंदी की तरह संपर्क भाषा का स्थान नही ले सकती। भारत में किसी भी राज्य में आज भी हिंदी भाषा के कारण संपर्क हो सकता है। हालांकि अभी अंग्रेज़ी को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित किया जा रहा है। 90 के दशक में सरस्वती शिशु मंदिर का प्रचार इसलिए अधिक हुआ क्योंकि उसमें अंग्रेज़ी भाषा प्रथम कक्षा से पढ़ाई जाने लगी थी। सरस्वती शिशु मंदिर स्कूलों ने हिंदी धर्म और संस्कृति का कितना प्रचार और प्रसार किया ,ये कहा नही जा सकता । लेकिन अंग्रेज़ी के प्रति दूर दराज में रहने वालों का भी आकर्षण बड़ा ही है। 
डंडे के बल पर इसको लागू नही किया जा सकता है। जिनको हिंदी आती है , उनको तो इसका उपयोग करना ही चाहिए। सामाजिक , धार्मिक और अन्य क्षेत्रों में अंग्रेज़ी और हिंदी वालों का अंतर दीख पड़ता है। कोर्ट कचेरी में अधिकांश काम अंग्रेज़ी में होता है। निचली अदालत में ज़िरह जरूर हिंदी या लोकल बोली में होती है, लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में तो अखबार की खबर का भी अनुवाद करना होता है। जज केवल अंग्रेज़ी में ही ज़िरह करते है। क्लाइंट जिसके केस पर ज़िरह होती है, वो समझ ही नही पाता कि क्या हो रहा है। ये सब चीज़े लचीली होनी चाहिए। किसी भी भाषा को संपर्क भाषा तो होना ही है। अभी लोग दक्षिण में पढ़ रहे है। इस तरह उनको उसी राज्य की भाषा को जानना चाहिए । लेकिन वहां भी लोग हिंदी , जो अपने तरह से बोली जाती है , का इस्तेमाल करने लगे है। किसी ने कहा नही की हिंदी का इस्तेमाल करो। लेकिन वो एक संपर्क भाषा के रूप में स्वतः ही पहुँच गई। ये हिंदी को लाभ है। जैसे अंग्रेज़ी अलग देशों में उसी तरह बोली जाती है। लेकिन वो होती अंग्रेज़ी ही है। बहुत से लोग संस्कृत को संपर्क भाषा के रूप में प्रचारित करते है। संस्कृत पढ़ाई जाए । लेकिन वो हिंदी की जगह लेगी , फिलहाल संभव नही है।  अभी जो लोग संस्कृत के जानते है, वो ही आपस में संस्कृत नही बोलते है। इसलिए सभी भाषा का सम्मान और उनके इतिहास की जानकारी से सारी भाषा नजदीक आएगी। इस संदर्भ में जवाहर नवोदय विद्यालय ने जो पहल की है। इसके लिए राजीव गांधी के विज़न जिसमे दूरभाष और कंप्यूटर के साथ स्कूल में ही बच्चे एक अन्य भाषा भी सीख लेते है, एक बहुत बड़ा कदम था। इस तरह के ताने बाने से ही हिंदी के प्रति लोगो को गुस्सा नही आएगा,  बल्कि उनकी भाषा और बोली को यथोचित सम्मान न मिलने से वो हिंदी के विरुद्ध बोलते है।
इसलिए उस दिन का इंतजार तो रहेगा जब हिंदी सप्ताह मनाना बन्द होगा और लोग अंग्रेज़ी को याद करेंगे।  लेकिन अंग्रेजी पढ़ेंगे जरूर। क्या आएगा ऐसा दिन ? ये सोचने का विषय है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
15.9.2017
14.9.2021 (पुनः बदलाव के साथ पोस्ट किया है)
14.9.2022( पुनः बदलाव के साथ पोस्ट किया है)

Monday, 6 September 2021

पेड़ और विकास : अरावली की सुबह

पेड़ और विकास : अरावली की सुबह
4.8.2018 
अभी सुबह मोर  और पक्षियों के कलरव ने  नींद खोल दी। बाहर देखा तो गुडगांव फेज 3 के पीछे अरावली के अवशेष और दूर जहां तक नज़रें जाती है , जंगल का वितान तना है। सच शहरों की बालकनी में खड़े होकर ऐसा दृश्य देखते ही बनता है। जंगल प्रकृति के सबसे खूबसूरत उपहार है। व्यक्तिगत रूप से मुझे मुगल गार्डन भी पसंद नही आता। शुद्ध प्राकृतिक  रूप से उगे पेड़ और उन के साथ इधर उधर पनप गई ,झाड़ियां जंगल को जंगल बना देती है। उसने यहाँ वहाँ उड़ते खगचर ,झींगुर समेत कीटपतंग उसके श्रृंगार ही है। कोई भी मौसम हो जंगल अपना रूप बदलता है। कभी पतझड़ तो कभी बरसात में गाड़े हरे रंग की चादर ओढ़ लेता है ,जंगल। जंगल के भीतर सांप की तरह पगडंडी को दूर से देखने का अहसास ही कुछ और है। सड़क भी अच्छी लगती है , लेकिन सड़क को निहारा नही जा सकता। सड़क पुरातन नही ,पगडंडी पुरातन है, जो मानव के बहुत भीतर तक अवचेतन मन और जीन में मानव की यात्रा के असंख्य दस्तावेज के रूप में समाविष्ट है। 
विभिन्न पेड़ जंगल की एकता और सुखी जीवन का दर्शन है। पेड़ वास्तव में मानव के अनुरूप नही बने है। मानव को केवल उससे गिरा ही खा सकता है। ये बने है ,पक्षी ,कीटपतंग और जानवरों के लिए जो उसकी गोद में बैठकर अपनी भूख और  थकान दूर करते है। 
ये पेड़ कितने ही जीवों के घर और आश्रयस्थल होते है। शायद हम इसकी चिंता और सुध नही लेते। पेड़ बढ़ने में समय लगता है। पेड़ अपने पूरे जीवन में उपयोगी रहता है। पेड़ जब ठूंठ का रूप लेता है ,उसमे भी जीव रहते है। जंगल का अपना एक संगीत रहता है। हवा चलती है , तो नाद होता है। कितनी ही वर्षा हो पेड़ अपने शरीर से उसको फैला देता है। पेड़ जमीन को पानी देते है। नदी को पैदा करता है। वायुमंडल को वायु ,जो जीवन के लिए उपयोगी है। धूप में चलते एक छोटा सा ठूंठ भी राहत दे जाता है। उच्च हिमालय के जंगल दिन में भी अंधेरा ओढ़े रहते है क्योंकि उनमें जीव पनपते है। जंगल के रंग जैसा कोई चित्र नही हो सकता। नाना रंग से सुज्जजित रन बिरंगी चादर जैसा सूंदर दृश्य क्या बना सकता है ,कोई मानव? मानव की सबसे खूबसूरत बिल्डिंग भी तभी सुन्दर  लगती है ,जब उसके चारों ओर पेड़ होते है। बिना पेड़ और हरियाली को उजाड़ कहा जाता है। लेकिन प्रकृति के स्वयं के वृक्षविहीन स्थल भी खूबसूरत होते है। दुनिया का कोल्ड डेजर्ट स्पीति का क्षेत्र खूबसूरत है क्योंकि उसमें बर्फ से प्रकृति चित्रकारी करती है। 
रेगिस्थान के टीले सागर की लहरों से लगते है। एक वक्त था ,मानव ने सभी जगह जीना सीखा और प्रकृति के साथ एकात्म और समरसता रखते हुए। 
लेकिन अभी विकास का मॉडल केवल विकास ही देखता है। पेड़ उसके लिए डी पी आर के किसी चेप्टर का हिस्सा है। कलम चला दो , वो भी अब कंप्यूटर के कीपैड पर उंगली दौड़ेंगी कि 100 पेड़ काटेंगे 1000 लगा देंगे। मानव की जमीन का एक इंच भी कट जाए तो मार काट तक हो जाती है। लेकिन पेड़ और उसमें रह रहे ,जीव की कौन सुने। लेकिन मानव कबूतर को दाना देकर और चींटियों को आटा डाल अपना धर्म पूरा कर लेता है। क्या किसी विकास के मॉडल में इसकी चिंता होती है कि उपसर रहने वाले जीव कहाँ जाएंगे? उनका क्या होगा? अभी तो इसपर चर्चा भी करना बेमानी हो गया है। एक तरफा विकास और विचार संपन्नता लाता है ,लेकिन एकाकी और निपट अकेला बना देता है। विकास का हरेक मॉडल आदमी को एकाकी बना रहा है। प्रकृति में एकाकी कुछ भी नही , समग्रता ही है। भारत का पुरातन ज्ञान भी ये ही कहता है। लेकिन विकास की ज़िद्द और हठधर्मिता मानव को क्रूर बना देती है। जो आज हम झेल रहे है।
इसलिए विकास के चाहने वालों कम से कम पेड़ काटकर कर विकास करों। 
जंगल की आवाज़ हमेशा जिंदा रहे, इसको नही भूलना। ये वो जान सकते है ,जिन्होंने जंगल के बीच उसको महसूस किया होगा।
जल,जंगल ,जमीन और वायु सत्य और जीवन का आधार है। इसको संरक्षित करने का मॉडल ही सतत है और चिरस्थाई है।
अभी भी बाहर जंगल अपनी और बुलाता है। उसमें थोड़ा चल कर किसी चट्टान पर बैठना आकर्षित करता है। जंगल में बहती नदी का नाद संगीत की पराकाष्ठा ही है।
सोचना तो होगा ही ,अगर ये सब न हों, तो क्या करेगा मानव का विकास और उसका एकाकी जीवन।
इसलिए  चिपको आंदोलन का प्रसिद्ध  नारा और बात हमेशा याद रखनी है " 
जंगल के है क्या उपकार 
मिट्टी पानी और बयार
मिट्टी पानी और बयार 
जिंदा रहने के आधार।
(रमेश मुमुक्षु)
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
ramumukshu@gmail.com

Sunday, 5 September 2021

अध्यापक दिवस के बहाने कुछ भूली बिसरी यादें ताजा हो गई।. know thyself -Socrates

अध्यापक दिवस के बहाने कुछ भूली बिसरी यादें ताजा हो गई: know thyself -Socrates
मासाब , गुरुजी, सर् की छवि हमारे दिल में अभी भी बैठी है कि दो तीन रसीद होने वाले है। हाथ आगे कर.... मुर्गा बन, डेस्क पर खड़ा हो जा, ये सब रूटीन की बातें थी  सबके पिताजी हुआ करते थे, डैडी का चलन शुरू हो गया था, कह दिया करते थे कि मासाब अगर ये न पढ़े तो हड्डी पसली एक कर देना..... घूमता रहता है। आवारा हिप्पी हो गया है। अच्छे मासाब का अर्थ जो डंडे से खबर लेते थे। हम भी ढीठ ही थे, कक्षा में खुसर फुसर करने की आदत जो ठहरी ,  कब खुसर फुसर हंसी में तब्दील हो जाती थी, ये आज तक कौतूहल ही बना हुआ है। मासाब को सुनाई पड़ जाता था। बस फिर क्या था, मुर्गा, डेस्क पर खड़ा और उल्टी हथेली करके स्केल से पिटाई शुरू। लेकिन हंसी बजाए रुकने की नॉन स्टॉप हो जाती थी। फिर क्या था,  हाथ और मुँह से  पिटाई पिटाई शुरू। ये सब स्कूल  में आम बात थी। आज जब हम उन अध्यापकों को याद करते है , तो ये ही कहते है कि जो बहुत कर्मठ हुआ करते थे, वो पिटाई भी करते थे। उनको ऐसे लगता था कि ये पढ़ क्यों नही रहा ?  बहुत बार तो बच्चें डर के कारण स्कूल न जाने की सोचते थे। लेकिन ऐसा सोचा तो घर में रेल पेल हो जाया करती थी। उस वक्त परीक्षा में नंबर मिलना राशन और कंट्रोल के अनाज मिलने जैसा ही था। 
लेकिन गुरु जी तो गुरु जी ही थे, पीछे सबके नाम रखे होते थे। हम सब के भी असली नाम न होकर दूसरे नाम हुआ करते थे। सारे बच्चें सुबह 8 बजे रेडियो पर समाचार के खत्म होने का इंतजार करते थे क्योंकि सब के पिताजी साईकल या पैदल ही आफिस जाते थे। ये सरकारी कॉलोनी वाले बच्चों की कथा है। पिताजी दूर दिखे नही की बच्चे बाहर दौड़ जाते थे, जैसे कर्फ्यू से निकले हो। 
लेकिन आज भी वो सारे अध्यापक याद आते है। बहुत से अध्यापक बहुत डेडिकेटेड हुआ करते थे। कुछ ऐसे भी थे,जो बिना पिटाई के पढ़ा लिया करते थे। कभी कभार वो सूद सहित निपटा देते थे। अगर कोई टीचर हल्के मिल जाये तो बच्चे भी अपनी कसर निकाल लिए करते थे। अनूठा संबंध होता है, विद्यार्थी और अध्यापक का, भूल नही सकता कोई। उस वक्त ट्यूशन का  चलन लगभग नही था। टीचर ही संभाल लिया करते थे।  किसी भी बच्चे के जीवन में टीचर का रोल अहम होता है। टीचर का समर्पण और पढ़ाने के तरीके से बच्चे को तरासा जाता है। आज बहुत कुछ बदल गया, लेकिन टीचर तो टीचर ही है। कुछ भी हो टीचर का सम्मान तो होना ही चाहिए और टीचर भी इसको मात्र नौकरी न समझे। टीचर का सबसे बड़ा काम होता है , बच्चे के भीतर छिपी प्रतिभा को खोज कर उसका परिष्कार करना। हालांकि व्यवस्था में इसका वक्त कम मिलता है। जब ये सुनने में आता है कि क्या तीर मार रहा है टीचर , वेतन मिलता है, उसका ये काम ही है, तो लगता है कि कुछ मिस हो गया।  वेतन से ही पढ़ाई नही होती, उसके लिए बहुत अलग अलग अवसर होते है। लेकिन टीचर का बहुत दायित्व होता है कि वो बच्चे में कैसे निखार लाये। अगर टीचर और विद्यार्थी के बीच कनेक्ट कम हुआ तो शिक्षा पर असर पड़ेगा। जरुरी नही कि डरा कर ही पढ़ाई हो  सकती है। टीचर की अपनी तैयारी और रुचि बच्चे को आकर्षित करती है। तोतोचान जैसी बच्ची हो तो  सोसाकू कोबायाशी जैसा अध्यापक और स्कूल चाहिए। इसके अतिरिक्त  चंगीज़ आत्मतोव की पुस्तक पहला अध्यापक के दूईशेन का स्कूल, जिसको उस पिछड़े  गांव कुरकुरेव की पहली विद्यार्थी,  अल्तीनाई  विख्यात होने के बाद भी स्तेपी के दूर ऊँचें टीले पर पोपलर के पेड के नीचे बिताए स्कूल के दिन और अपने अध्यापक को आज हमेशा याद करती है।प्राचीन भारत में आचार्य चाणक्य जिन्होंने एक बच्चे की प्रतिभा को पहचान कर सम्राट बना दिया। परमहंस राम कृष्ण ने अपना शिष्य खुद ही खोज लिया, जो विवेकानंद ही थे।
इतिहास भरा हुआ है। ऑनलाइन के जमाने में जहाँ बच्चे जानकारी रखते है, वहां पर नए तरह के चैलेंज है। लेकिन सबसे बड़ा काम और लक्ष्य होना चाहिए ,बच्चे की प्रतिभा, सृजनात्मकता और अन्वेषण प्रतिभा को खोजना और उसका परिष्कार करना। सर्वपल्ली राधाकृष्णन और उनके द्वारा दर्शन पर लिखी पुस्तकें भी आज हमारी धरोहर है। उनके जन्म दिन को ही अध्यापक दिवस के रूप में मनाया जाता है।महात्मा गांधी द्वारा नई तालीम जिसमें शिक्षा और जमीन से जुड़ना उसका आधार था।  विश्वभारती के संस्थापक गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कोई विश्व विद्यालय की चार दीवारी नही बनाई, उनका कहना था कि शिक्षा खुली और निर्बाध होनी चाहिए, ताज़ा हवा जैसी।देश की आजादी के बाद शिक्षा दरवाजे सभी देशवासी के लिए खुल गए,  ये  बड़ी बात थी।   महान दार्शनिक गुरु सुकरात कहा करते थे  ""सच्चा ज्ञान संभव है,  बशर्ते उसके लिए ठीक तौर पर प्रयत्न किया जाए, जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परखों के बाद हम एक सचाई पर पहुँच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं।' उनका मुख्य ज्ञान सूत्र था, " स्वयं को जानो", Know thyself"। ये प्राचीन भारतीय दर्शन का आधार ज्ञान सूत्र रहा है।   
आज के दिन तो ये सब याद आ ही जाता है। 
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
5.9.2021
4.9.2024
5. 9. 2025
5.9.2026

Tuesday, 6 July 2021

क्या मानव फूल सृजित कर सकता है

क्या मानव फूल सृजित कर सकता है
मानव ने खूब प्रगति की  है ,लगभग सभी क्षेत्रों में , वनस्पति के जीन में भी वो कुछ कुछ कर देता है। उसके दावे है कि वो किसी ग्रह पर बस्ती बनाएंगे।ये हो भी सकता है । लेकिन वंसुधरा में बिखरे अनगिनत फूल हम बना पाएं है।हम मानव जब जब प्रगति के शिखर पर पहुंचें हमने मानव का संहार किया। मानव द्वारा मानव का संहार हमारे मानव इतिहास का सबसे मुख्य विषय रहा है। लेकिन एक छोटे से फूल को बना देना हमारे बस में नही है। उच्च हिमालय पर भी प्रकृति कमल उगा देती है। हमारे लिए वर्षा का आना कभी सुखद और कभी विषाक्त होता है। लेकिन प्रकृति का ये नियम है । वर्षा में ही सुदुर हिमालय  समेत सभी जगह पर पुष्प उगते है। लेकिन हम मानव को चैन नही। एक फोटो के लिए पहाड़ खोदने को आतुर भूखें भेड़ियों की तरह जो स्टेपी के मैदान में बर्फानी रातों को शिकार खोजता है। जबकि उसके आस पास भी सैकड़ों पुष्प खिलते है। लेकिन वो पुष्प नही  देखने जाता ,बस निरुद्देश्य ही जाता है। इस सूरज मुखी फूल ने बता दिया कि चाहे लूं भी चले , लेकिन प्रकृति सृजन करती रहती है, हर क्षण , बस नज़र को उसके पास तक ले जाना होता है। जॉन रस्किन सही कहते थे, मानव क्यों रिक्रिएशन के लिए जाता है , जब ये कुछ क्रिएट नही करता है। बदहवास सा केवल भीड़ करता है। प्रकृति की आगोश में खोने वाले आज भी है। लेकिन हमारी जिद है कि  सभी जगह पर हम जाए , उन स्थानों को देखने भी जाएं ,जो  शांत और सुदूर है ,  लेकिन वहां पर भी भीड़ में जाये और शोर मचाकर कर उसकी शांति का बखान करें।  पिछले लॉक डाउन में ये सिद्ध हो गया कि केवल मानव ही प्रकृति को नष्ट कर रहा है। ये रुकेगा तो सब ठीक चलेगा।घाटी, दून, नदी, नदी का उद्गगम, बुग्याल, बर्फ की चोटी सब लील लेगा। अभी तरक्की के नए नए तरीक़े सीख लिए है, अब तेजी से सब कुछ देखने को आतुर मानव अपने आस पड़ोस को कभी नही देखता, सूर्यास्त की ओर नज़र नही भी नही उठाता ,लेकिन दुनियां के नक्शे में खोजता रहता है कि कहां पर सूर्यास्त अच्छा होता है। केवल अपनी हवस को दूर करने के लिए  ये टिड्डियों के दल की तरह हम भागते है। अभी पर्वत को घंटो निहारने वाले पटाक्षेप में गुम हो गए होंगे। "अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।"ऐसे हिमालय को देखने वाले नागार्जुन अब नही मिलेंगे और आएंगे। अलका पूरी की यात्रा वृतांत सुनने वाले कालिदास किस पहाड़ की चोटी पर बैठकर ये सोच पाएंगे और मेघदूत लिखेंगे। एवरेस्ट को भी नही बक्शा।पिछले दिनों अंटार्टिका में बहुत बड़े आइसबर्ग का टूटना केवल एक छोटी सी किसी अखबार के कोने में छपी छपी घटना थी ,एक फिलर की तरह। कनाडा में 49 डिग्री भी एक दिन सुर्खी बटोरने के लिए थी। 
1992 में रोहतांग ट्रेक की यात्रा के समय एक प्रोफेसर मिले ,पैर में प्लास्टिक के जूते, एक बोरी लपेटी हुई,एक पिट्ठू बेग , ने हमें बताया कि घूमने के लिए " एक निरंजन, दो सुखी ,तीन में झगड़ा ,चार दुखी" अब तो भीड़ ही भीड़ है। हिमालय में कौसानी  और कन्याकुमारी के विवेकानंद केंद्र के पास बैठकर सूर्यास्त की याद आ गई , लेकिन सूर्यास्त को केवल देखने के इतर खामोशी से निहारना होता है, तनिक शांत बैठकर महसूस करने से ही  प्रकृति से एकाकार हुआ जा सकता है, ये तय है।
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष , हिमाल 
9810610400
6.7.2021