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Tuesday, 16 July 2024

दिल्ली : 💦 पानी के लिए निर्भर क्योंकि अपना पानी खत्म कर दिया

दिल्ली : 💦 पानी के लिए निर्भर क्योंकि अपना पानी खत्म कर दिया
अभी मुनक  नहर से  पानी नहीं आया तो दिल्ली बिन पानी हो गई। द्वारका उप नगर जिसका नाम लेते ही हम सभी को गर्व होता है। 👉ऊंची ऊंची बिल्डिंग और बढ़ती कीमत जैसी बातें भी कहते थकते नहीं। लेकिन अभी पानी की सप्लाई रुकी तो सबके हाथ पैर ठंडे हो गए। एक बूंद पानी हमारा अपना नही है। 
👉सभी गांव में जोहड़, कुएं हुआ करते थे। अभी भी जोहड़ जिसको वाटर बॉडी कहते है, मौजूद है, या तो वो पार्क के रूप में बदल दिए गए या गंदे पानी से भरे हुए है। 
👉नजफगढ़ नाला असल में साहिबी या साबी नदी थी। लेकिन अभी ये सीवर के पानी को ढोकर ले जाने वाला नाला बन कर रह गई।
👉नजफगढ़ झील एक पानी का बहुत बड़ा स्रोत है, बल्कि वेटलैंड ही है, लेकिन अभी उसमे भी गुरुग्राम , मानेसर के सीवर और केमिकल युक्त पानी ही आता है। इसके अतिरिक्त यमुना नदी तक कितने सीवर से भरे नाले उसने गिरते है। जो यमुना को सबसे अधिक दूषित कर देता है।
👉पहले एनजीटी और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी वेटलैंड अधिसूचित करने के निर्देश दिए है। लेकिन सरकार और बिल्डर आदि नही चाहते।
द्वारका और द्वारका एक्सप्रेस पूरा ऊंची ऊंची बिल्डिंग से भरा हुआ है। लेकिन प्राकृतिक पानी की एक बूंद भी नही है। एक बोतल पानी भी किसी प्राकृतिक स्रोत से नही ले सकते है।
👉ये है,हमारा बिन पानी के विकास का मॉडल । करोड़ों की बिल्डिंग और एक बूंद पानी  प्राकृतिक स्रोत का नही है। ये 🤔बहुत गंभीर चिंतन का विषय है। ये मॉडल पाइप लाइन से पानी लाने का है। पाइप लाइन आया और प्रकृति के स्रोत पूरी तरह इग्नोर कर दिए जाते है । स्थानीय वन और प्राकृतिक वनस्पति भी विकास की आंधी में खत्म होते गए है।👉 कभी दिल्ली जैसे महानगर में अपना खुद का पानी था, जंगल और जैवविविधता थी। लेकिन विकास के मॉडल में उनके  लिए स्थान नही तय किया गया। 
👉बिन पानी विकास और कूड़े और कचरे के पहाड़ परिणाम है , हमारे शहर और महानगर। लेकिन ये विकास अब गांव की और पैर पसार रहा है।
🤔 अब उत्तराखंड के गांव में भी कचरा विशेषकर प्लास्टिक आदि फैलने लगा हैं । पाइप से पानी का विकास भी तेजी से फैलने लगा है। हालांकि प्राकृतिक स्रोत मौजूद है, लेकिन उनमें भी पानी आदि बहुत कम होता गया है। परंपरागत नौले आदि भी भुला दिए गए है। कभी इन को गांव के लोग  रूटीन में साफ और व्यवस्थित करते रहते थे, लेकिन अभी पानी न आने पर ही होता है। 👉पाइप के विकास ने पाइप तोड़ना , बुझा लगाना सीखा दिया है। लेकिन पानी के स्रोत मौजूद है , इनके रिचार्ज के लिए कार्यक्रम चल रहा हैं । इनकी ओर देखना और गांव में प्लास्टिक को मैनेज करने से बहुत कुछ ठीक हो सकता है । विकास हो लेकिन गांव के संसाधनों को संरक्षित करते हुए। 
👉महानगर विकास की आंधी में अपने सारे प्राकृतिक और परंपरागत जल स्रोत लील गए। महानगर के विकास के मॉडल में सैंकड़ों किलोमीटर पाइप से पानी लाने का प्रावधान रहता है। लेकिन अब समय की मांग है कि महानगर में भी अपने पानी का संरक्षण और पानी का शोधन करके पानी दार बनना है। घर और कॉलोनी अथवा सोसायटी का पानी पुनः साफ करके इस्तेमाल करें। द्वारका जैसे उप महानगर में वर्षा जल संग्रहण एवं उपयोग के बाद पानी का शोधन युद्ध स्तर पर किया जाना जरूरी है। 
अभी विकास के कारण जमीन के नीचे भूजल भी कब का खत्म हो चला है। जो है, वो बहुत ही खारा पीने लायक भी नहीं है ।
इस बार की गर्मी और अभी जल संकट ने बहुत बड़ा इशारा किया है। ये इशारा शहर और गांव सभी के लिए है। पर्वतीय क्षेत्रों में भीषण गर्मी जंगल की आग और सूखते जल स्रोत ने भी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया है।
सभी को एक साथ बैठकर सोचना ही नही बल्कि आगे बढ़ना ही होगा। महानगर में मियावकी 🌲वन,  🌧️ वर्षा जल संग्रहण और उपयोग हुए जल का शोधन के साथ घर से ही कचरे का प्रबंधन इसका उपाय हो सकता 
है । 
रमेश मुमुक्षु
9810610400
16.7.2024

Sunday, 7 July 2024

👉मानव और प्रकृति: स्वंभू बनने की 👎व्यर्थ होड़

https://www.facebook.com/share/p/JGYnKy6uipwJcaBY/?mibextid=Nif5oz
👏🌹स्व.सरला बहन ,लक्ष्मी आश्रम, कौसानी, अल्मोड़ा की संस्थापिका की 8 जुलाई को उनकी पुण्य तिथि के उपलक्ष में समर्पित कुछ पंक्तियां🌲🌲

👉मानव और प्रकृति: स्वंभू बनने की  👎व्यर्थ होड़ 

🌞 भीषण गर्मी में वर्षा की आस 
तेज 🌧️ वर्षा में धीमी वर्षा की दरख्वास्त 
गर्मी में पानी की कमी पर याद आते हैं, परंपरागत जल स्रोत 
वर्षा आते ही पुनः विस्मृत हो जाते है
लगातार वर्षा में रुकने का आग्रह
सूखी नदी में पानी बहने की इच्छा 
बाढ़ आने पर उजड़ जाने का भय
घने 🌲 जंगल में कुछ पेड़ काटने की चर्चा
उजड़े जंगल को आबाद करने का प्रयास
 🏡 पुराने घर तोड़ कर कंक्रीट की होड़  
कंक्रीट की जगह पुराने मकान बनाने की चर्चा
🌾 फसल बढ़ाने के लिए रसायन का इस्तेमाल
रसायन हटाकर  जैविक के मिशन
हम मानव है विचित्र कभी किसी को भगवान  बना दे और किसी को हैवान 
असल में हमारी औकात प्रकृति को काबू करने की है ही
नही, लेकिन हम है कि काबू करने में लगे है
कुछ कुछ खोज और अविष्कार करके लगता है कि प्रकृति को काबू करने की कुंजी मिल गई
लेकिन फिर उसी खोज के परिणाम हमको पुनः उसी बिंदू पर ले आते है, प्लास्टिक का अविष्कार और खोज की जीत और उसके परिणाम का दंश पूरी मानवता को जैसे लील लेने को आतुर है
💣 परमाणु हथियारों का घमंड और बटन दबाने का भय
कबीर ने अपनी उलटबासियों में खूब ये सब खूब  लिखा है
लेकिन हम मानव जिसको विश्व गुरु और प्रकृति को काबू करना है, लेकिन प्रलय तक कैसे स्वीकार करें , उसके बाद सब जीरो हो जायेगा, कि हम प्रकृति के सामने मात्र एक जीव है, जिसकी डोर प्रकृति के हाथ में है,
वर्षा को ला  नही सकते,
वर्षा को रोक नहीं सकते
बाढ़ को बांध बनाकर रोक सकते है, लेकिन प्राकृतिक  आपदा को क्या रोक सकेंगे
हम केवल  कठपुतली के पात्र के समान ही है, केवल कठपुतली के पात्र 
क्या मानव मन स्वीकार करेगा
कदापि नही, ये तय है
रमेश मुमुक्षु
9810610400
7.7.2024

Sunday, 12 May 2024

ऐसी ही ठहरी ईजा

(ऐसी ही ठहरी ईजा)
वो पूरन की ईजा थी 
खेत जानवर 
हाथ में दरांती 
भोर सुबह से 
रात तक केवल काम 
मेहनतकश जीवन
पुरखों के खेतों 
को अपने खून पसीने 
से सींचती 
अपने  चारों बच्चों की
 आस
वो लगी रहती थी
अपने नित्य कर्म में
ईजा नाम ही मेहनत का
 पर्याय है
सीधी सादी सभी प्रपंचों से 
कही दूर
क्या अपने बच्चों को 
दे दूँ
पोटली उसकी कभी 
नहीं होती
थी खाली
आज  पूरे पहाड़ में 
कुछ एक खेत
 हरे भरे है ये  केवल 
ईजा का 
ही प्रसाद है
लड़ेगी भिड़ेगी 
उजाड़ खाने वाले जानवरों 
के मालिक से
उसके काम का
कोई मोल नहीं
एक धुरी  है
घर की
अभी भी कुछ एक 
पुराने मकान 
पाल के अस्तित्व में है
केवल ईजा के कारण
ईजा के बीमार होते ही
और 
न होने मात्र से पूरे 
घर की 
नींव ही हिल
जाती है
तब समझ आता है
उसके होने का अहसास
पूरन  की ईजा कैंसर 
से ठीक होने पर
भी भेंस पालने
का सपना देख रही 
थी
  उसका अडिग विश्वास , तकलीफों को झेलने
का अद्भ्य साहस 
देखते ही बनता था
बीमार होने पर भी सपना 
और
संकल्प खेत और जानवर का ही
सच यही अहसास बचा सकता  है खेत खलियान को
उसके लिए कभी काम 
ही सच है
बहस और चर्चा से दूर
उसके खेत में कभी 
नहीं रुका काम
कभी नहीं सूखी
उसकी क्यारी 
जिसमे सब्जी उगाती
 थी 
ईजा
राजनीति के दंगल से 
दूर 
केवल 
कृषि कर्म को 
निभाती ईजा
क्या शोषित थी?
क्या उसका शोषण हुआ था?
क्या उसका खेत में काम करना 
उसके साथ न्याय नहीं था?
क्या वो किसी दबाव में करती थी 
 खेती?
हो सकता है की 
ये सवाल सही भी हो 
लेकिन उसके घर पर आये
 मेहमान को 
कटोरी या गिलास में 
दही और दूध देना 
केवल उसका प्रेम और 
उसका ईजा होना ही था
ये ईजा ही है 
जो 
अभी भी 
खेत जानवरों और जंगल 
को अपने साथ ही ले गई
टूट गया सदियों का सिलसिला
एक ईजा से टूट सकता 
है 
एक पूरा गाँव और पूरे  खानदान
का आश्रयस्थल
ये सोचने जैसा है
गाँव जिन्दा रखने के लिए
ईजा का होना
कितना अहम् है
ये तो केवल वो  ही 
जाने जिनकी 
ईजा 
के जाने से टूट गया धागा
जो सबको बांधे था
ऐसी ही ठहरी अपनी  ईजा
सच ऐसी ही......
रमेश मुमुक्षु
12.2.2018

Thursday, 23 November 2023

ऐसा ही ठहरा मेरा कमरा

🛖 ऐसा ही ठहरा मेरा कमरा
👉👉मेरा  कमरा अस्त व्यस्त
रहता है,
ठीक मेरे जैसे
🪑 कुर्सी पर कपड़े लिपटे रहते है, बेतरतीव से 
खूंटी पर टंगे रहते है
झुरमुट बनाए हुए 
कपड़े 
जो कह रहे है कि कभी 
हिला भी दिया कर
बिस्तर पर कंबल का 
अलमस्त पड़े रहना,
 बिस्तर के किनारे पर 
कुछ कुछ पड़ा देख वास्तव में
  किसी को
भी अच्छा न लगे
मेरे छोटे कमरे में बिना 
टकराए 
चलना कहां होता है, 
संभव
कभी कभी महीनों में 
एक बार बदलती है, 
मेरे कमरे की सूरत 
ठीक 
मेरे जैसे
लेकिन इस बेतरतीब 
अस्त व्यस्त कमरे में 
🕊️ सकून, 😘 प्रेम और अपनेपन 
 का 
साम्राज्य है, 
कमरे के एक किनारे में रसोई है
जहां पर
रामकृष्ण परमहंस  
के अहसास जैसे 
 प्रेमल सरल
 पकवान बनते है
उनकी तरह खाना परोसना
कमरे में कहीं भी बैठने पर
सीधी सादी बिना किसी 
टेबल के
प्लेट आनंद  😊 भर ही देती है
इसी उटपटांग कमरे में  संगीत 🎶 की सुरलहरी का आनंद लेकर
मेरी  🤞 उंगली पेपर पर 🖋️ पेन, रंग और 📱 मोबाइल से क्रेटिविटी को सराबोर कर देती है
सरस्वती का अहसास 
होता रहता है, 
सौंदर्य देव अपने दस्तक
 रंगों में दे ही जाते है, 
यदा कदा कभी कभार 
सत्यं शिवम सुंदरम के
 पदार्पण होते रहते है
सुबह सूर्य की पहली  किरण और रात में चंद्रमा की चांदनी 
मेरे बेतरतीब कमरे के रोजमर्रा के 
मेहमान है
रात के 😶 सन्नाटे में  झींगुर का स्वर खामोशी में  🎵 संगीत भरना ही है
🌧️ बरसात में बादलों का वितान तना ही रहता है
रात पाथर की छत में वर्षा का टिप टिप करना 
सच में संगीत का आनंद  दे देता हैं 
कहीं दूर  🐆 गुलदार की दहाड़, से 
 🦌 काकड़ का बोलना, 
जंगली सुअर का चिल्लाना 
जंगल का अहसास करवा देता है
शाम होते ही  जंगली मुर्गी के इधर उधर भागना मेरे प्रतिदिन के दृश्य  ही है
जंगली फल, काफल, 
किलमोडी,हिसालू, 
 वन जीरा मेरे 
ऋतुओं के मेहमान है
ठीक सामने सीढ़ीनुमा खेतों का सौन्दर्य पुरखों की मेहनत और कौशल का प्रतिफल ही  है
🐄 गाएं , 🐐 बकरी, को चराते ग्वाला मेरे संगी साथी है
असोज में घास काटने वाले 
मेरे कमरे से गुजरते है, मेहनतकश ,कर्मठ ग्रामीण विशेषकर स्त्रियां, 
इस फक्कड़नुमा कमरे में
चाय की चुस्की 
चलती रहती है
बिना ये देखे कि कौन 
 इसका आनंद ले रहा है
बड़ा सकून है कि 
किसे के आने से पहले   
सफाई और कमरे को सजाने की अच्छी आदत से दूर
मेरा कमरा 
 सभी का  प्रेम से 
स्वागत करता है, 
सुबह पक्षी मेरे से बात करते है
कीट पतंग, तितली, रंग बिरंगे पक्षी अपनी दस्तक दे ही जाते है
पूरे वर्ष फूलों से परिपूर्ण है
कमरे के आसपास का जंगल
बुरांश से पयां तक रंग बिरंगी चादर ओढ़े
 हिमालय की पंचाचुली बर्फ से भरी चोटियां अपनी ओर निहारने को आतुर कर देती है,
 🌞 सूर्योदय और सूर्यास्त के बदलते रंग
रात को 🌙 चांदनी और ☁️ मेघों का 
एक दूसरे में लिपटना और 
अपनी छटा से 
प्रकृति को सुंदर बनाना
मेरे कमरे के आकर्षण है
शुद्ध प्रकृति से ओत प्रोत
ऐसा ही ठहरा मेरा कमरा.....
रमेश मुमुक्षु
9810610400
21.11.2023

Friday, 10 November 2023

घर के मंदिर की मूर्ति से कचरा बनी मूर्ति की आत्मकथा: कब सुधरेगा हे मानव ( द्वारका नई दिल्ली एशिया की सबसे बड़ी और हाई प्रोफाइल सब्सिडी)

घर के मंदिर की मूर्ति से कचरा बनी मूर्ति की आत्मकथा: कब सुधरेगा हे मानव ( द्वारका नही दिल्ली एशिया की सबसे बड़ी और हाई प्रोफाइल सबसिटी )
 कितना अद्भुत है, हे मानव कैसे  तू मुझे खरीद कर लाया था। कपड़े से मुझे साफ करता था। कितनी बार मुझ को छूकर उल्टे सीधे  सभी काम भी करता था। कितनी बार तो मिठाई भी मुझे लगा देता था। ॐ जै जगदीश से लेकर गायत्री,महामृत्यंजय मंत्र और न जाने क्या क्या करता रहा है। "मैं पापी हूं, खलगामी, पतित , और अधर्मी हूं"। हे प्रभु मेरा तर्पण करें। मुझे छू कर मुझ पर गंगा  की बूंदें भी छिड़कता रहा है। लेकिन अभी दीवाली आने से पूर्व मुझे घर से ऐसे निकाल कर पीपल के पेड़ के नीचे डाल गया, जैसे मैं इसके लिए केवल कचरा बन गई।इसको किंचित मात्र भी अंतर नही पड़ता कि वो क्या कर रहा है। एक वर्ष तक ये मुझे मूर्ति मात्र नही, बल्कि  साक्षात ईश्वर ही समझता रहा। लेकिन अभी मेरे साथ मिट्टी के गणेश, शिव ,दुर्गा सभी की मूर्तियां को भी फेंक दिया। हम सभी
मंदिर की  मूर्ति से कचरा रूप धारण कर चुके है। 
हे ! हे  त्रिमूर्ति इस मानव को सद्बुद्धि प्रदान कर और जो इसके पास है, उसको जाग्रत कर, उसकी चेतना को सुप्तावस्था से उठा दे ताकि ये धर्म, अध्यात्म और भक्ति के सच्चे अर्थों को समझ सके और वातावरण को स्वच्छ रखने का व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास आरंभ करें।
रमेश मुमुक्षु
9810610400
10.11.2023

Wednesday, 1 February 2023

शादी के बैंड बाजे वाले: दशकों से नही बदले हाल

शादी के बैंड बाजे वाले: दशकों से नही बदले हाल
बचपन में बैंड बाजे वालों को देख कभी कभी दया भी आती थी। शादी का सबसे मुख्य आकर्षण होता था ,बारात का बैंड बाजा, जिसके बिना शादी कहां शादी लगती है। आज वर्षो बाद बैंड वालों को को दीवार पर टेक लगाए लोधी कॉलोनी में देखा तो बचपन की छवि उभर आई। संगीत मन को प्रफुल्लित कर देता है। लेकिन ये बैंड बाजे वालों को चेहरों पर उत्साहहीनता  साफ झलक जाती है। कोई उमंग नही ,कोई जोश नही। कुछ खास धुन को ही बजाते रहते थे। "देश है,वीर जवानों का" आज मेरे यार की शादी है" 70 के दशक में " शीशी भरी शराब की पत्थर पे तोड़ दूं" खासतौर पर सुबह विदाई के समय ठंड के मौसम में आंखों में नींद और लगभग कांपते हुए , धुन " बाबुल की दुवाएं लेती जा" अभी भी बचपन की यादों में ले गई।
इतना कुछ बदल गया। शादी अब इवेंट्स बन चुकी है । टेंट से गुजरती हुई डेस्टिनेशन मैरिज तक आ गई, लेकिन ये बैंड बाजे वाले आज तक वहीं खड़े लगते है। पहले से ही कुछ लोग कंधो पर लाइट उठा कर चलते थे। कुछ बड़े बैंड ,जैसे हिंदू जिया बैंड , में कपड़े अच्छे होते थे। बाकी की हालत खस्ता रहती थी।
देखना है कि कब इनके चेहरों पर रौनक आयेगी और आयेगी ताजगी, ये तो देखना ही होगा।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
1.2.2023

Thursday, 15 September 2022

फ्लाइट लेफ्टिनेंट सुमित मोहंती मेमोरियल पार्क की स्थापना

फ्लाइट लेफ्टिनेंट सुमित मोहंती मेमोरियल पार्क की स्थापना
13 सितंबर 2022  को  सेक्टर 7 में एयर फोर्स एंड नेवल ऑफिसर्स (AFNOE) एन्क्लेव के बगल राइज फाउंडेशन के माध्यम से AFNOE , एयर विस्तारा एवं
फ्लाइट लेफ्टिनेंट सुमित मोहंती फाउंडेशन व द्वारका रेसीडेंट्स के आपसी सहयोग से  दो चरणों में 10 सितंबर व 13 सितंबर को मियावाकी  वन लगाया गया। करीब 3000 वर्ग फीट पार्क में 900 सैपलिंग जिसमें 25 स्थनीय प्रजाति भी शामिल थी। 
राइज फाउंडेशन के द्वारा ये बारहवां  मियावाकी प्रोजेक्ट सम्पन्न किया गया।  
अकीरा  मियावाकी ने शहरों में कम जगह पर कम दूरी में विभिन्न प्रजातियों के पेड़ों व झाड़ियों को इस तरह लगाने की तकनीक विकसित की कि कम जगह में कम समय में ही ये जंगल पनप जाता है। 
राइड फाउंडेशन के सह सचिव श्री मधुकर वार्ष्णेय ने अपनी कॉर्पोरेट की नौकरी के समय स्मार्ट सिटी के अध्ययन के दौरान कई देशों की यात्रा में  मियावाकी प्रोजेक्ट की जानकारी ली और उन्होंने अपनी संस्था के सहयोग से एन सी आर में इसको आरम्भ किया। एयरफोर्स एंड नेवल ऑफिसर्स  एन्क्लेव (AFNOE) सोसाइटी की मैनेजमेंट हमेशा ही पर्यावरण के कार्य में बढ़ चढ़ के हिस्सा लेती आई है। कुछ वर्ष पूर्ण इनके ऑडिटोरियम में पर्यावरण पर लेक्चर सीरीज आरम्भ की थी, मुझे भी वहां शामिल होने का अवसर मिला था।
एयर विस्तारा ने अपने सी एस आर द्वारा ये बहुत ही याद रखने वाली मदद की है।  वृक्षारोपण धरती को संरक्षित रखने व मानव द्वारा विनाश की प्रक्रिया को बाधित करने का एक बड़ा कदम है। राइज फाउंडेशन की सचिव श्रीमती माधुरी वार्ष्णेय रावत विगत कई वर्षों से राइज फाउंडेशन के माध्यम से विभिन्न सामाजिक कार्यो  में संलग्न है।
हमारी संस्था हिमालयन इंस्टीटूट ऑफ मल्टीप्ल अल्टरनेटिव लाइवलीहुड (हिमाल) द्वारा एच आई वी अनाथ बच्चों के तहत एक युवा को उसकी पढ़ाई आदि के लिए  आर्थिक मदद भी प्रदान की थी। राइज फाउंडेशन ने हमारी संस्था के द्वारा रूद्राक्ष वन आटी ग्राम, दन्या, अल्मोड़ा का दौरा किया । इस तरह राइज फाउंडेशन द्वारा विविध सामाजिक कार्य के माध्यम से सतत विकास के मार्ग पर चलने का प्रयास है। 
इस  मियावाकी वन को फ्लाइट लेफ्टिनेंट सुमित मोहंती मेमोरियल पार्क के रूप में बनाना वास्तव में सच्चा कदम है।मियावाकी  प्रोजेक्ट के बारें में अब धीरे धीरे लोग जानने लगे है। 2021 में उस वक्त के उपायुक्त एस डी एम सी ,नजफगढ़ जोन के श्री भूपेश चौधुरी ने ग्रीन यात्रा सामाजिक संस्था के माध्यम से इन्द्रप्रस्त एन्क्लेव द्वारका  सेक्टर 17, पॉकेट A2 ,नई दिल्ली में बहुत ही सुंदर  मियावाकी वन की स्थापना की है। वहां पर 90 प्रतिशत से अधिक पेड़ संरक्षित है। वहाँ पर विभिन्न वृक्षों से आने वाली हवा में खुशबू आने लगी है। 
राइज फाउंडेशन ने ब्रह्मा अपार्टमेंट में द्वारका का पहला  मियावाकी वन लगया था। ये पर्यावरण संरक्षण की राह में पॉजिटिव कदम है। 
लेकिन हम सब देश वासियों को देश के सघन वनों को कम से कम क्षति पहुँचाने  की कोशिश करनी चाहिए।  मियावाकी  वनों का तभी लाभ सही अर्थों में होगा, जब देश के सघन वन प्रदेश व जैव विविधता संरक्षित रहेगी।  देश को 33%वन कुल भूभाग में संरक्षित रखने और उसको बढ़ाने का बीड़ा उठाना होगा।  विकास का मॉडल हिमालय समेत पूरे देश के वनों व प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने का हो ऐसी  आवाज उठानी है। विकास आज बहुत सहज हो चला है। लेकिन वन प्रान्तर एक लंबी उद्विकास की  प्रक्रिया के माध्यम से पनपता है। 
इसके लिए हम सब को एक साथ आगे आना है। जितने सघन वन देश में होंगे ,उतना ही वातावरण शुद्ध और स्वछ होगा। प्राकृतिक वैविध्य ही पर्यावरण की असली कुंजी है।
देश तभी विकसित सही अर्थों में होगा, जब देश जल जंगल जमीन संरक्षित रहेंगे। हम सब देश वासियों को हिमालय में 3000 मीटर की ऊंचाई से ऊपर वाले क्षेत्रों को विशेष रूप से संरक्षित रखने और उनमें कम से कम मानव गतिविधियों व निर्माण  के मॉडल को अपनाना ही होगा।   आज हिमालय के हज़ारों प्राकृतिक स्रोत  सूखने के कगार पर है। इस बात को हम हमेशा याद रखे।  इसलिए चिपको आंदोलन का ये नारा सदैव हम सभी को प्रेरणा देता रहेगा। 
क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल 
9810610400
15.9.2022