1991 में मेरे मित्र फोटोग्राफर कलाकार राजीव आनंद, कवि हरिप्रकाश त्रिपाठी और दार्शनिक मित्र राकेश पांडेय के साथ मनाली से रोहतांग पास ट्रेक का प्लान बन गया। दिल्ली से लोकल स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से मनाली पहुंचे चंडीगढ़ के आगे पहाड़ों का आनंद लेते हुए । 1991 में ही सड़क पर इतनी गाड़ियों थी कि हमे लगा ,आगे यहां क्या होगा? हम लोगो ने मिट्टी का तेल लिया। अपने स्टोव को चेक कर लिया। खाने पीने की सब्जी आदि ली। हमारे रकसैक में करीब 20 से अधिक किलो समान होता था। पिण्डरी में तो 28 किलो सामान ले गए थे । मनाली से पैदल ही जाना था । भीड़ बहुत थी। उस वक्त हमने सोचा कि मनाली में तो आना बेकार हो गया । इतनी गाड़ियां सड़क पर है। उंसके बाद अभी करीब 10 साल पहले मैं 2007 में मनाली गया तो 1991 की हमारी चिंता की याद आगई।
मैंने एक बगल के गांव वाले से 2007 में पूछा तो उसने बताया कि अब बर्फ और वर्षा समय पर नही होती। भीड़ बढ़ गई है। ये किसान ने 10 साल पहले बताया था। अब क्या हाल है, ये अंदाज़ा लगाना कठिन है।
सोलंग नाला हमारा पहला पड़ाव था , कितना सुंदर और एकांत । सौंदर्य और नीरवता से ओत प्रोत। 1991 में हमने वहीं पर टेंट पिच कर दिए। लेकिन अभी उसकी नीरवता कही खो गई। हम लोग अगले दिन ढूंढी गए क्योंकि वही से हमें रोहतांग जाना था। लेकिन रास्ता बर्फ से बंद था। 1991 में अच्छी बर्फ गिरती थी। जून के मध्य तक भी गस्ते बंद थे। ढूंढी में रात ठंडी और भालू आदि की आशंका से भरी भी। अगले दिन ब्यास कुंड जहां से ब्यास नदी की एक धारा उद्गमित होती है, ट्रेक का बना ही लिए।
सबसे पहले एक छोटा लेकिन भयानक ग्लेशियर पार करना था। रास्ता करीब एक फ़ीट का रहा होगा। नीचे ब्यास नदी का प्रचंड प्रवाह इशारा कर रहा था कि मेरे आगोश में आये तो वैकुण्ठ भेज दूंगी।। खैर जवानी की जिद मौत को कहाँ समझती है। निकल गए उस पार। कोई आइस एक्स नही, जूते भी लोकल और रस्सी भी कोई नही। खैर, ब्यास कुंड से पहले लंबा ग्लेशियर था और ब्यास कुंड में तो बर्फ का साम्राज्य ही था। अब 2018 में बर्फ को तरस रहे है। लौटते हुए हरी प्रकाश और राकेश पांडेय ग्लेशियर से वापस आये और मैं नदी के ऊपर एक पेड़ का ताना जो दोनों किनारे पर लगा रखा था , उस पर बैठकर कर पर किया। नीचे ब्यास नही का तीव्र प्रवाह जो चटटानों पर ऐसे टकरा रहा था ,मानो उनको तोड़ देना चाह रहा हो। और उस दिन शाम को रोमांच भरी यात्रा से लौट कर ढूंढी आगये और ढूंढी से सोलंग नाला आकर रहे। उंसके बाद सोलंग नाला होते हुए कोठी पहुंचे। कोठी जहां से पीरपंजाल रेंज दिखाई पड़ती है। टेंट पिच किये स्टोव में खाना मिलकर बनाया।
चौथे दिन हम लोग कोठी से पलचान जहां पर ब्यास कुंड से ब्यास नदी की एक धारा और दूसरी रोहतांग से एक धारा का संगम है। हमे रहला होते हुए मढ़ी तक ट्रेक करना था। सड़क गुलाबो होती हुई ,मढ़ी पहुचती है।
रहला फॉल के सामने बैठ कर हमने खाना खाया , नही भूल सकते है। उंसके बाद कठिन चढ़ाई के बाद मढ़ी पहुंचे। चारों और केवल बर्फ ही बर्फ। सड़क पर जमी बर्फ काट ली गई थी। वहां पर स्कीइंग की प्रतियोगिता चल रही थी।
अगले दिन पांचवे दिन रोहतांग जाना था। हमे बताया गया कि बिजली के खम्बों के साथ बर्फ के ऊपर रास्ता बना है, चलते रहो। वहां से सात किलो मीटर बर्फ पर चलना था। बीच में कभी कभी सड़क आती थी। सड़क के दोनों और करीब 18 से 20 फ़ीट तक बर्फ काटी गई थी। हम रोहतांग से पहले बर्फ ऊंचे गलियारे के बीच चल रहे थे।
गस्ते में एक बुजुर्ग मिले। प्रोफेसर थे, लेकिन वो अकेले ही ट्रेक करते थे। उनका पड़ाव रोहतांग से आगे चंद्रताल था। उन्होंने कहा कि अकेले घूमने का अलग का आनंद होता है। उन्होंने एक बात कही, मुझे अभी तक याद है। " एक निरंजन, दो सुखी तीन में झगड़ा चार दुखी" उन्होंने अपनी यात्राओं के जीवंत किस्से बताए। उनका साथ रोहतांग तक था। उनको आगे खोखसर तक जाना था।
रोहतांग से पहले तक ही सड़क कटी थी। खैर हमने बर्फ के ग्लेशियर का रोहतांग पास पर आनंद लिए । रोहतांग के आगे बौद्ध संस्कृति है और मनाली की और हिन्दू संस्कृति। ये दर्रा दोनों को जोड़े है। उंसके बाद मढ़ी आ गये। मढ़ी से नीचे रहला होते हुए कोठी करीब 21 किलोमीटर ट्रेक किया। उस दिन याद है, दाल चावल बनाने का सोच रहे थे। लेकिन थकान बहुत थी। सबने ढूंढा लेकिन दाल नही मिली, जो दिल्ली पहुंच कर मिली तो थकान की शिद्दत याद आ गई। खैर, रात भर टिप टिप वर्षा होती गई। रात टेंट में गुजरी और छठवें दिन पैदल ही कोठी के पुल से जहां बहुत गहरी घाटी है , जिसको गोर्ज कहते है , देखने का दृश्य है, हुए टूटे फूटे मनाली पहुंचे और बस पकड़ दिल्ली की राह पकड़ी।
सच चारों और केवल बर्फ जून 1991 की बात है।
अभी पर्यावरण की हालत सब के सामने है। दिल्ली और महानगर की जिंदगी से तंग आकर पहाड़ जाओ और वहां पर भी भीड़ अधिक होना और बर्फ नदारद । अभी फरवरी 2018 के दिन बर्फ का इंतजार है। अभी हाथ ठिठुरने वाली ठंड इतिहास में कही गुम हो गई। उन दिनों बाबा सहगल का एक रेप ठंडा ठंडा पानी लोक प्रिय हुआ था। उसको ही गाते रहे गस्ते भर। सभी मित्रों के चेहरों की खाल जल गई थी और चेहरे काले पड़ गए थे।
वो दौर था कि निकल जाते थे ,बिना किसी तेल के, केवल सरसों का तेल ही सब काम कर लेता था। चेहरे की किसको परवाह कोई क्रीम भी होती होगी।। बस एक जिद और उत्साह रहता था कि ट्रेक करना है। ढूंढी से ब्यास कुंड ट्रेक में हम लोग कितने ही किलोमीटर बर्फ पर चले। कुछ भी सुविधा नही होती थी , बस चलना है , पहुंचना है।
ये सब जगह सोलंग नाला, ढूंढी, ब्यास कुंड, कोठी, रहला फॉल , मढ़ी सभी खूबसूरत और नीरवता पूर्ण स्थल थे, जिनके कारण लोग कुछ अलग अनुभव करने आते थे। लेकिन अभी ये सब भीड़ भाड़ में तब्दील हो गए है। अभी तो बुग्याल तक भी मस्ती के स्थल बनाने के ख्वाब है।
3000 मीटर के ऊपर तो किसी तरह के निर्माण और लोगों की आवाजाही काम होनी चाहिए। अधिक लोगों से सब कुछ डिस्टर्ब हो जाता है।
पैदल ट्रेक की आदत से ये कुछ बच सकता है। ट्रेक के लिये सेहत और मन मजबूत करना पड़ता है।
पहाड़ की खूबसूरती केवल इसलिए नही है कि भोग करें। उसकी खूबसूरती पर्यावरण के घटक है। जल स्रोतों के उद्गम स्थल । हिमनद और वनों से उद्गमित होती है, नदियां जो पृथ्वी को जल से सींचती है। बर्फ केवल मस्ती के लिए नही बल्कि जल स्रोत है।
किसी जगह को केवल घूम कर ही थोड़ा बहुत समझा जा सकता है। जब तक पैर नही टूटेंगे दमखम नही होगा , तब तक क्या आनंद आएगा। मढ़ी से सात किलो मीटर बर्फ में रोहतांग तक जाने का आनंद आज भी रोमांच और उत्साह भर देता है।
अभी 2016 में पांचवी बार रूप कुंड ट्रेक किया था। लेकिन पिछले वर्ष 2017 में जोशीमठ से ऊपर पांगरचुला ट्रेक में फ्रैक्चर हो गया। फ्रैक्चर के बाद कुल 15 किलोमीटर नीचे आने के कारण अभी घुटने घायल है।
लेकिन उच्च हिमालय को संरक्षित करना हम सबकी जिम्मेदारी है। कम से कम उंसके संरक्षण की सोच तो रखे। विकास विकास रहे विनाश न हो। ये नई पीढ़ी को समझ लेना ही होगा। फुर्र से कही पहुंचने का प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। अम्बानी सहित दुनियां के धनकुबेर मोबाइल और कुछ भी बना सकते है।लेकिन औस की एक बूंद क्या बना पाएंगे? औस की एक बूंद पर्यावरण के अस्तित्व की गवाह है। उसको आने दो। अगर वो कही छिप गई तो सब कुछ ताश के पत्तों सा बिखर जाएगा और इतिहास में खोजना भी कठिन होगा कि औस का न होना कितना घातक हो सकता है। भयानक है लेकिन सत्य। कैलाश को भी हम ऐश गाह बनाने को आतुर है। अपने आराध्य शिव को तबाह करके क्या मना सकेंगे शिव रात्रि ?,ये तो सोचना ही होगा। विष तो पीना ही होगा अगर अमृत को संरक्षित करना है ,तो।
दुनियां के घुमक्कड़ों के आदर्श
राहुल संकृत्यायन ने बचपन में सुना था कि "सैर कर दुनियां की गाफिल जिंदगानी फिर कहाँ , गर जिंदगानी रह गई तो नौजवानीननबब फिर कहाँ"।
खैर, धुन लग गई तो लिखने लगा स्मार्ट फ़ोन पर चिपक गया। अब चाय की हुडक होने लगी। फिर कभी विस्तार से तो पुस्तक में ही लिखा जा सकेगा। लिखने को इतना है कि उम्र कम लगती है।
रमेश मुमुक्षु
9810610400
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Thursday, 15 February 2018
रोहतांग पास यात्रा के बहाने
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वाह.... बहुत खूब मजेदार लिखा है आपने
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