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Sunday, 18 March 2018

स्टीफेन हॉकिन्स को समर्पित

💐स्टीफन हॉकिन्स को
समर्पित💐
(यात्रा ब्लैक होल तक)
बचपन से मुझे ब्रह्मांड में
दूर एक बिंदु दिखता था
जो
मुझे लगता था
कि
निगल जाएगा
कायनात को
जो एक ही बिंदु
में सिमट रहा है
मुझे डरा  देता था
किसी बात को समझना
मेरे लिए
कठिन ही था
और
किसी की बात को मैं समझा
नही पाता था
मेरे संगी साथी मुझे दिखते ही नही थे
दिन रात बह्मांड , गुरुत्वाकर्षण, मेग्नेटिक आकर्षण और नाभिकीय बिंदु
मुझे
चैन से बैठने नही देते थे
जब मैं सुनता ईश्वर एक है तो मुझे
लगता की
अनेक
क्या हुआ
क्यों
एक
अधिक बड़ा होता है
एक और अनेक मेरे मस्तिष्क को जैसे
फोड़ ही देंगे
मेरा सिर फोड़ने का मन होता
मेरे साथी खेल में खुश रहते
मुझे खेलना ही नही आता था
बस पूरी
कायनात
मुझे अपनी ओर खींचती लगती
उम्र बड़ी मैंने आइंस्टीन को पढ़ा
तो मुझे लगा की
मैं ही अकेला
नही
सिर फोड़ने वाले मुझे से पहले भी रहे है
मुझे एक और डर सताता रहता
कोई मुझे मार देगा
परन्तु मुझे जीने की बहुत गहरी इच्छा थी
मुझे उस बिंदु को खोजना था
जो मुझे तंग किये था
यकायक मुझे लगने लगा
मेरा सारा शरीर मुझसे
कही छूट रहा है
मैं शरीर को थाम नही पा रहा हूँ
अपनी बीमारी सुन मुझे मौत का अहसास
हमेशा ही रहा
लेकिन मेरे दिमाग में
उथल पुथल
जारी थी
मस्तिष्क के भीतर
भी
एक ब्रह्मांड है
अरबों न्यूरॉन की चक्कर
लगाती
दुनिया जो एक दूसरे
को संदेश देते है
बिग बैंग और ब्लैक होल
मुझे
दिन रात घुमाते
मुझे लगता कैसे हुई ब्रह्मांड की उत्पत्ति
क्या था वो महाविस्फोट
हबल का रेड शिफ्ट कही
रुकेगा
कोई होगा
स्पेस लिमिट का कोई बिंदु
अल्बर्ट आइंस्टीन के प्रकाश की यात्रा का कही अंत होगा
प्रकाश से तेज कुछ चलेगा
क्या हम फैल रहे है
या
किसी बिंदु में सिमटने के लिए फैल है
क्या हमारा ईश्वर इसको संचालित कर रहा है
क्या ये सतत चलने वाला
खेल है
क्यों आइंस्टीन नही मानते थे
कि
कुछ भी केवल बाहर ही छिटक सकता है विस्फोट के बाद
अगर ऐसा ही होता तो
बिग बैंग क्यों होता
महाविस्फोट से पूर्व क्या था
चंद्रशेखर लिमिट के आगे
काले धब्बे  ही होंगे
महाशून्य
निपट काला
मुझे ताज्जुब हुआ
कि उस महाशून्य में प्रकाश भी समा जाता है
मैं ओर भी घबरा जाता
यूरेका यूरेका कहने का मन होता
लेकिन मेरा शरीर जैसे केवल मेरे मस्तिष्क को रखने के लिए
ही बना था
ब्लैक हाल के करीब
में जितना जाता उतना ही
मुझे आदमी ही हेंकड़ी पर तरस आता
आदमी मुझे केवल एक चूहे सा लगता
जो गड्डा खोद कर रहने के लिए स्पेस बनाता है
लेकिन मिट्टी से एक छोटा पहाड़ बना देता है
पहाड़ खोदता है तो गड्डा बना डालता है
एक दिन ये सिलसिला रुकेगा
क्या मैं थ्योरी ऑफ एवरीथिंग का सूत्र खोज सकूँगा
मानव एक यात्रा पथ पर
है
मानव  कछुए की पीठ
पर सवार
पृथ्वी से बहुत आगे निकल गया है
क्या एक ही महाशून्य होगा कि अनगिनत
तारे की मौत क्योंकर होती है
सूर्य का भी अंत होगा
तारे की मौत उसके कोर का ठंडा होना होता है
घनत्व का अंतहीन बढ़ना ब्लैक होल की शर्त है
सब कुछ इतनी तेजी से
भीतर और भीतर
सघनता से एक बिंदु में समाहित होना
किसी
महाविस्फोट की पूर्व स्थिति ही तो है
थ्योरी ऑफ एवरीथिंग ही समझा सकती है
ब्रह्मांड की उत्पत्ति के राज
मानव की ताकत
उसके गोले की और आने
और टकराने वाले
उल्का पिंड से अधिक नही है
क्या होगा पृथ्वी का अंत
क्या छोड़ना होगा इस गोले को
क्या होगा ऐसा कोई गोला जहां जीवन होगा
क्या  ब्रह्मांड की उत्पत्ति का रहस्य जान सकेगा
मानव
नैनो तकनीक से खोज सकेंगे
इन उलझे सवाल
पृथ्वी को अगर हम संभाल नही सकें
तो बढ़ता तापमान मानव का अंत कर देगा
ये तय है
क्या महाविस्फोट से  बड़ा है
हमारा एटम बम
पृथ्वी को मानव अपने हाथ से खत्म करने को तुला है
घर तो बदल सकेंगे
लेकिन क्या बदल सकेंगे
अपनी पृथ्वी  को
जी सकेंगे
किसी और ग्रह और तारे पर
मानव की सारी खोज
और
विकास का एक ही सूत्र है
गड्डा खोद कर वो पहाड़ बनाता है
और पहाड़ खोद कर गड्डा बनाता है
अब तय करना है
पृथ्वी पर रहना है
कि
कहीं अंतहीन ब्रह्मण्ड के किसी गोले पर जाना है
फिर ब्लैक होल मुझे घूर रहा है
अपने भीतर समाने को
इतना भीतर की
प्रकाश भी घनत्व में
लोप हो जाएगा
आदमी की हेंकड़ी और उसकी ताकत सूक्ष्म अति सूक्ष्म ब्लैक होल के सामने नगण्य है
या है ही नही
इसलिए चूहा बनना है
कि
कायनात की चाल
के साथ
उसके संगीत
रिदम का आनंद लेना
है
अभी महाविस्फोट से
उत्पन्न लहर की खोज
भी मानव को करनी है
लेकिन ये चूहे के
विकास से नही होगा
पृथ्वी के संसाधन स्वच्छ
और
निर्मल है
सतत है
निरंतर है
इसकी चाल के साथ
ही दूर तक
यात्रा संभव है
महाविस्फोट
से पहले
ब्लैक होल में
अस्तित्व
हीन होने से पहले
ये तय है
ये सोचना ही होगा .....
रमेश मुमुक्षु

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