(गांय की आत्मकथा डाबड़ी के कूड़ेदान से)
हम निरीह प्राणी
डाबड़ी का कूड़ा दान
ही
लगता है
हमारा
भाग्य बन चुका है
धूप हो या कोई भी
मौसम
कूड़े से खाना ढूंढना
और कूड़ा ही खाना
बन चुकी हमारी
नियति
वैसे ये नया नही
दशकों से होता आया
है
पॉलिथीन में बंधा
बदबूदार कूड़ा
खाना
कितनी बार कोई
पैनी चीज़ और ब्लेड
भी आ
जाता है
अनाज और घास की खुशबू
हम भूल चुके है
कितनी बात तो सड़ा हुआ
मांस
भी आ जाता है
और न जाने क्या क्या
ये आदमी विचित्र है
कितनी बार ले आता ही
पूरी और घी लगी रोटी
खिला कर फ़ोन
करेगा कि मिल गई गांय
फिर चला जाएगा
हमारी बुजुर्ग गायें बताती थी
खेतों और गांव की कथाएँ
हरा चारा खाना
खूब मचलाना और घास के
बड़े मैदान पर
घूमकर चरना
ये सब अब ख्याब बन गया
है
सुना है गौशाला बन गई
लेकिन हमारा भाग्य कहाँ
हमें तो डाबड़ी के कूड़े दान में
ही रह कर पेट पालना है
शाम को हमारा पालने वाला आता है
हमारे सूखे थनों से दूध
निकाल लेता है
शरीर में नही ताकत तो क्या
निकले है दूध
ये मानव नही समझता
हमे तो
खेत खलियान ही
भाता है
सूखा चारा घास खली और हरे चारे
के साथ
खेतों और घास के चारागाह
जहा हम पूरे
दिन उछलते कूदते
खाते पीते लौट आते थे
किसान नहलाता
कितना अच्छा लगता
था
कभी पानी
कभी चारा
चलता रहता था
लेकिन अभी
सब कहीं खो गया
बुजुर्ग बताते थे
हमें आवाज़ से डर लगता था
लेकिन हमारा जीवन तो डाबड़ी के कूड़े दान पर ही चलता
है
जहां पर चारो और गाड़ी ही गाड़ी
शोर ही शोर
रोज कुछ बच्चे भी आते
है
जो कूड़ा बीनते है
छोटे छोटे मैले कुचले बालक
फूल से बालक
दिल रोता है
जब वो किसी कूड़े से उठा कर खा लेते है
दुबले पतले कांतिहीन चेहरे
कूड़ा ही इनका जीवन
बन चुका है
कितना झगड़ जाते है
कुछ टूटा फूटा मिल जाता
है
कूड़ा बीनते बीनते
कितनी बार
लोग कहते है कि
गांय तो अभी पूरी भी नही
खाती
ओ अनजान मानव
जिसकी नियति कूड़ा ही हो
वो क्या जाने
पूरी हलवा
हमें कुछ नही चाहिए
बस खेत गांव
लौटा दो
हीरा मोती
दुलारी
कदली
सोनी
जैसे नाम होते थे
गले में घुंघरू
माथे पर तिलक
किसान कितना सहलाता था
अब तो मैले कुचैले बच्चे हमारे बछड़ो को
पीट देते है
हमेशा गाली ही देता है
दिन ढलता है
रात आती है
लेकिन भाग्य नही बदलता
डाबड़ी के कूड़ेदान
पर ही लगता है
जीवन थम गया
बदबू और पॉलीथिन तक ही जीवन सिमट गया
आंतों में अटक कितनी हमारी
बहनें मर जाती है
कहते है
हम पालतू है
लेकिन नही ये सच नही
हमारा भाग्य तो डाबड़ी के कूड़े दान पर ही
कट जाएगा
लो आ गए मैले कुचैले बालक
कचरे का बदबूदार बोरा
छोटी सी पीठ पर लटकाए
ठीक हमारी तरह डाबड़ी के
कूड़ेदान में कूड़ा बीनेंगे और
गली गलौज
कर किसी कूड़े में से निकली बोतल से कुछ पी लेंगे
कभी इनके हाथ सन जाएंगे किसी डायपर से
कभी हाथ कट जाएंगे
फिर वही कूड़े दान
के पास
ये
सिगरेट की चांदनी के
ऊपर रख
जला कर कुछ सूंघेंगे और
झूम उठेंगे
सच डाबड़ी के कूड़े दान
और हम सब
गांय ये सब देखते रहते है
एक कचरे की दुनियां
बदबू से भरी
हमारे भाग्य मे बधी
हमारा घर डाबड़ी का
कूड़े दान .....
रमेश मुमुक्षु
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Tuesday, 20 March 2018
(गांय की आत्मकथा डाबड़ी के कूड़ेदान से)
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