मास्क की आत्मव्यथा : कोरोना संकट में
हे ,मूढ़मते मानव मुझे मालूम है ,तेरी फितरत । तू उपयोग करके भूल जाता है ,और फेंक देता है। तुझे केवल अपनी ही चिंता रहती है। लेकिन तू भूलता है कि तेरे पुरखे अभी भी पृथ्वी पर कहीं कहीं रह रहे है। वो हज़ारों वर्षों से एक जैसा जीवन जी रहे है। वो आज भी प्रकृति पर ही निर्भर है। लेकिन तू आगे निकल गया। तूने जल,थल,नभ एवं अंतरिक्ष से सभी का तेजी से दोहन करना आरम्भ कर दिया।
ऐसा नही कुछ मानव ऐसे हुए जिन्होंने तुझे हज़ारों वर्ष पहले ही चेता दिया था कि प्रकृति के संग मिलकर चल ,उतना ही ले ,जितना उपयोग हो सकें। लेकिन तेरी भूख मिटती नही।
कोरोना ने एक बार तो तुझे घरों के भीतर ही दुबका दिया। पूरी दुनियां ऐसे दुबक गई ,जैसे छोटा सा मूषक बिल में डर के घुस जाता है। कोरोना के डर से बड़े बड़े तीस मार ख़ाँ बिलों में दुबक गए। पूरा विश्व सकते में आ गया । मौतों का सिलसिला तेजी से शुरू हो गया।
जो देश अपनी सामरिक शक्ति का दम्भ भरते थे,वो भी अदृश्य आपदा के आगे घुटने टेक गए। उनके घातक से घातक अचूक हथियार भी कुंद हो गए। खेर ,आदमी भी जिद्दी है,इसका भी उपाए खोज कर अपनी चाल से ही चलेगा।
जिन्हें विश्व अवतार या भगवान का दर्जा देता है, उनकी एक छोटी सी बात भी कभी किसी नही मानी की मानव एक ही है,उसमें भेद नही है। पृथ्वी और प्रकृति सबके लिए एक समान है। इसलिए एक साथ भाई चारे के साथ रहो। लेकिन एक दूसरे को नेस्तानाबूत करने की होड़ में विश्व लगा है । जिस पेड़ पर बैठा है,उसी डाल को काटने में लगा है , इंतजार है कि ये डाल कब कट कर गिरती है।
हथियार ऐसे की एक ही पूरी मानवता को खत्म कर सकता है। लेकिन इस मूढ़मते को कौन समझाए?
कोरोना जैसी अवस्था मानव इतिहास में पहली बार हुई है। 40 दिनों में ही सारा प्रदूषण जाता रहा और ये प्रमाणित हो गया कि प्रकृति तो शुद्ध ही है। ये मानवकृत गंदगी और प्रदूषण के कारण ही सब कुछ प्रदुषित था।
लेकिन इसको कोई अंतर नही पड़ेगा ।मेरा उपयोग कोरोना के संक्रमण से करने के लिए करता है। बहुत बार कोरोना मुझ पर बैठता है। मैं उसको मानव के भीतर जाने से रोक देता हूँ। जिसके कारण बहुत सारे लोग अपनी जान बचा सकें है। लेकिन ये मानव अभी भी बाज नही आ रहा है।मुझे कही भी फेंक देता है।जबकि कुछ समझदार लोग बोलते बोलते थक गए कि इनको यहाँ तहां न फेंक। लेकिन आदमी की पुरानी आदत कि उपयोग करो और भूल जाओ। इस बार भी उसको अक्ल नही आई। हालंकि ये इतना पक चुका है कि मानने को राजी नही।
लगता था कि ये सबक सीखेगा , वहीं ढाक के तीन पात । कहता फिरता है कि मास्क पहनना जरूरी है। इस्तेमाल के बाद इसका निस्तारण एतिहात से करना जरूरी है। लेकिन फिर भी मुझे अपनी जान बचाने के लिए पहनता है और फिर मेरा तिरस्कार कर फेंक देता है। जब अभी भी नही सुधरा तो आगे क्या सुधरेगा, ये सोचने का विषय है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
29.7.2020
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