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Wednesday, 17 January 2018

खबर निष्पक्ष होनी चाहिए

(खबर निष्पक्ष होनी चाहिए)

दैनिक जागरण की ये खबर जिस पत्रकार ने लिखी है ,ये साफ है , उसने पहले ही सोच लिया था कि मुख्यमंत्री की जनसुनवाही की कैसे बखिया उधेरी जाए।

सबसे पहले लिखा कि जनसुनवाही केवल अपने लाभ के लिए थी। इसका अर्थ है कि मुख्यमंत्री को नही आना चाहिए था। इसी खबर में लिखा था कि सोसाइटीज के लोग मिलना चाह रहे थे, लेकिन मुलाकात नही हुई।
उस सभागार में माइक लेने की होड़ ,साबित कर रही थी कि मुख्यमंत्री का आगमन कितना सार्थक था।

पत्रकार ने गलत लिखते हुए जोश में समय का हिसाब नही लगाया और लिख मारा कि 45 मिनट मंच पर सम्मानित करने में लगे। सवा घंटे में 45 मिनट सम्मानित करने में, मेरा दावा है ,दुनियां में ऐसी कोई सभा नही होगी,जो सम्मानित करने में इतना समय ले।

फिर उसने लिखा कि इससे खफा होकर फेडरेशन की सचिव श्रीमती सुधा सिन्हा ने माइक लिया तो आप के लोग एतराज करने लगे।

ये भी पत्रकार भूल गया कि सम्मानित करने  द्वारका की एक दूसरी फेडरेशन के प्रेजिडेंट श्री भट्टाचार्य जी एक फोटो लेकर मुख्यमंत्री को भेंट करने गए थे , मतलब 45 मिनट में द्वारका की फेडरेशन भी शामिल है।

नाराज़ भी रहो और फ़ोटो भी खिंचवा लो फेडरेशन का ये अंदाज मुझे पसंद आया। ये बात पत्रकार नही सोच सका। ऐसा ही होता है, जब कोई बात हम पहले से ही सोचकर  लिखे ।

जहां तक माइक की बात है, सबसे पहले मैंने एतराज किया क्योंकि मैंने सबसे पहले हाथ उठाया ,लेकिन माइक लेफ्ट साइड ही जा रहा था। माइक वाले को लोग इशारा करके माइक मर्जी से दे रहे थे। जो गलत और अनुशासनहीनता है।

इसलिए पत्रकार का फर्ज होता है कि खबर लिखते समय निष्पक्ष और तथ्यों के आधार पर ही खबर लिखे।

पानी को लेकर लोकल विधायक और अधिकारियों से लगातार मीटिंग चल रही थी।

बाकी काले झंडे और मुख्यमंत्री आप का नही जैसी बातों पर मैं कमेंट नही करूँगा। उस दिन इनका कोई महत्व नही था।
जहां तक बोलने वालों की संख्या को ले । कम से कम  12 से 15 लोग  बोले होंगे। मुख्यमंत्री, विधायक, जल बोर्ड के अधिकारी सभी ने बोला।

सवा घंटे का हिसाब आप लगा ले। कुल समय पत्रकार के हिसाब दे 75 मिनट। 45 मिनट सम्मानित किया तो बचे 30 मिनट। अब कोई भी हिसाब लगा ले क्या  30 मिनट में सब अपनी बात बोल गए ?

जो भी पत्रकार था । खबर को तोड़ मरोड़ कर लिखनी भी हो तो भाई समय और तथ्यों का सही से आंकलन तो कर ही लिया करो।
जब हम जीवन में पूर्वागृहपूर्ण कार्य करते है तो ऐसी गलती होगी ही।

पत्रकार चौथा स्तम्भ है, वो कैसे की एक पक्ष की बात ही कहे और लिखते समय क्योंकर उसका अंतर्मन ऐसा करने की इजाज़त दे सकता है।

पत्रकार से विनती है, उपरोक्त बातों पर ध्यान दें और अपनी गलती में सुधार करें।

गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों की जिंदगी का कुछ तो अध्यनन कर प्रेणना लेने की चेष्टा तुम्हारे भीतर निष्पक्ष और जिम्मेदार पत्रकार बनाने में मदद करेगा। कभी जीवन में उलझन लगे तो मेरे पास आ जाना। मैं तुम्हारी उलझन को सुलझाने का प्रयास करूंगा।

रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष , हिमाल
9810610400

Sunday, 14 January 2018

(द्वारका जल विवाद और समाधान)

(द्वारका जल विवाद और समाधान)
तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा । इसकी झलक आज द्वारका में मुख्यमंत्री , दिल्ली जल बोर्ड , द्वारका रेसिडेंट्स के जनसंपर्क कार्यक्रम में पानी पर विवाद और पानी के प्रति असंवेदनशीलता को देख अनुभव हुआ। मजे का विषय है कि सबसे अधिक पढ़े लिखे लोगों में लामबंद कर के माइक अपने कब्जे में करने की कोशिश से बड़ा अफसोस हुआ। पानी की समस्या से द्वारका के रेसिडेंट्स वर्षों परेशान रहे। लेकिन वर्तमान सरकार ने आते ही द्वारका समेत पूरी दिल्ली को साफ पानी उपलब्ध करवा दिया। 20000 लीटर फ्री जल के बाद भी जल बोर्ड को नुकसान नही हो रहा। द्वारका की सोसाइटी में बोरवेल , वर्षा जल प्रबंधन आदि की शिकायत आती रही है। साफ पानी के बाद भी जमीन का भूजल निकालना जारी है। भारी बिलों का मसला भी चर्चा के लिए जरूरी था। खेर ,ये सब एक हैप्पी एंडिंग में समाप्त हुआ। लोगों के बिल माफ हो गए और भूजल का इस्तेमाल भी प्रतिबंध के साथ स्वीकार कर लिया गया।
ये सब जल प्रबंधन की बात ही थी। सबको अपने पानी की पड़ी थी। पानी के बिल मॉफ कर दो की बात थी। चूंकि जल बोर्ड ने कुछ जल्दबाजी भी की थी।
लेकिन कुछ लोग कह रहे थे कि अगर पानी कम होगा तो हरियाली कम हो जाएगी। ये वो लोग है जिनको टेहरी बांध का पानी और बिजली दिखती है, बेशकीमती घाटियां और जल,जंगल,जमीन की बर्बादी नही दिखती। सोसाइटी के भीतर घांस और कुछ पेड़ ही इनकी दुनियां है।
अभी सर्दी का मौसम है, लेकिन अभी हाल फिलहाल उत्तराखंड के वनों की आग इनको प्रभावित नही करती। हाइड्रो और रोड़ प्रोजेक्ट जिनमे पंचेश्वर बांध और चारधाम आल वेदर रोड में हज़ारों बेशकीमती वन संपदा का खत्म हो जाना इनके लिए न तो मुद्दा है और न ही उनको इसकी चिंता है। उनको केवल अपनी घांस बचाने की बनावटी चिंता है।
सरकारें भी कोई पुख्ता इंतजाम नही कर पा रही है। भूजल के उपयोग की जगह जल को पुनः साफ करके भेजने का प्रयास नही हुआ।  सरकार को जितना जल्दी हो भूजल का इस्तेमाल पूरे तरह रोक देना चाहिए क्योंकि भूजल का स्रोत  acquifer जलभृत एक बार खत्म हो जाये तो विनाश की स्थिति ही मानी है जा सकती है।
इस कारण सरकार भी इस विषय पर अधिक संवेदनशील नही है। सरकार को कमरकस कर जल शोधन कार्यक्रम को शुरू करके बागवानी के लिए अलग से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करवाना ही पड़ेगा। जितना पानी घरों में इस्तेमाल होता है, उसको साफ करके हरियाली बचाई जा सकती है।
जल,  जैसा हम जानते ही है, हिमानी और ग़ैरहिमानी नदियों से ही आता है। जब हम पानी का इस्तेमाल करते  है तो एक बात नही भूलनी चाहिए कि जल ही जीवन है और इसको उपयोग करते हुए हमें सदैव इसके स्रोत को स्मरण करना चाहिए।
लेकिन द्वारका के रेडिडेंट्स भी जल के संदर्भ में नुकसान क्यों कर उठाये। इसका भी ख्याल रखना चाहिए।
कुछ लोग ऐसे भी है ,जो सरकार विशेषकर दिल्ली सरकार को कोसते हुए कहते है कि सारी सुविधा केवल झुगी झोपड़ी वालों को हो मिलती है। इस तरह की तुलना हमारे बौद्धिक छोटेपन की ओर इशारा करता है। झुगी झोपड़ी बस्ती का जीवन और द्वारका की सोसाइटी के जीवन में कोई तुलना नही हो सकती। लोग भूल जाते है, इस बस्तियों में बहुत छोटी आय वाले लोग भी जीवन बसर करते है। इस तरह हम को द्वारका में रहने और दिल्ली सरकार के पानी के कार्य की सराहना करनी ही चाहिए।
अभी कुछ दिनों पूर्व  द्वारका को सोलर सिटी बनाने का ऐलान और अब जल संकट की चर्चा जिसमे दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी जनता के सामने समाधान हेतु आना पड़ा। ये दोनों बहुत बड़े कार्य है।
मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगा जैसे बहुत से लोग आप पार्टी और मुख्यमंत्री को दिमाग़ से स्वीकार नही करते। लेकिन दिल में उनको दिल्ली सरकार के कामों की हलचल तो रहती ही है।
अंत में हम सब की कोशिश रहे कि बिजली और पानी का उपयोग किफायत से हो ताकि बेतहाशा मांग बढ़ने से कहीं और बड़े बांध और कोयले के नाम पर प्राकृतिक संपदा नष्ट न हो सकें। हमारी अधिक मांग जल जंगल जमीन के लिए विनाश का कारण न बन सके, इस मिशन के साथ हमें देश को आगे ले जाना है।
भले हम दिल्ली सरकार को माने या न माने लेकिन उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, जल प्रबंधन एवं उपलब्धता और बिजली में सुधार तथा बिल न बढ़ना कल्याणकारी सरकार की अवधारणा में सफल प्रयास ही है। ये एक मिशन ही हो सकता है। द्वारका के लिए इससे अधिक गर्व का विषय क्या होगा कि द्वारका को प्रथम सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की मंसा द्वारका के रेसिडेंट्स के लिए गर्व का विषय होना चाहिए। राजनीति से उठकर इन सब कदमों का दिल से धन्यवाद देना चाहिए। केवल स्वार्थपूर्ण ओछी राजनीति से हम सब को बचना है। द्वारका को भारत की सोलर, जल संरक्षण  और जीरो वेस्ट मैनेजमेंट अथवा पूर्ण कचरा निस्तारण सिटी आओ सब मिलकर बनाये और भूल जाये कि हम किस दल से जुड़े है, याद रहे कि द्वारका के रेसिडेंट्स है। हमारा ये मिशन सतत विकास की अवधारणा को स्थापित करेगा और पर्यावरण संरक्षण में योगदान देगा ,  ये तय है।
(रमेश मुमुक्षु)
हिमाल एवं राइज फाउंडेशन से सम्बद्ध।

(द्वारका जल विवाद और समाधान)

(द्वारका जल विवाद और समाधान)
तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा । इसकी झलक आज द्वारका में मुख्यमंत्री , दिल्ली जल बोर्ड , द्वारका रेसिडेंट्स के जनसंपर्क कार्यक्रम में पानी पर विवाद और पानी के प्रति असंवेदनशीलता को देख अनुभव हुआ। मजे का विषय है कि सबसे अधिक पढ़े लिखे लोगों में लामबंद कर के माइक अपने कब्जे में करने की कोशिश से बड़ा अफसोस हुआ। पानी की समस्या से द्वारका के रेसिडेंट्स वर्षों परेशान रहे। लेकिन वर्तमान सरकार ने आते ही द्वारका समेत पूरी दिल्ली को साफ पानी उपलब्ध करवा दिया। 20000 लीटर फ्री जल के बाद भी जल बोर्ड को नुकसान नही हो रहा। द्वारका की सोसाइटी में बोरवेल , वर्षा जल प्रबंधन आदि की शिकायत आती रही है। साफ पानी के बाद भी जमीन का भूजल निकालना जारी है। भारी बिलों का मसला भी चर्चा के लिए जरूरी था। खेर ,ये सब एक हैप्पी एंडिंग में समाप्त हुआ। लोगों के बिल माफ हो गए और भूजल का इस्तेमाल भी प्रतिबंध के साथ स्वीकार कर लिया गया।
ये सब जल प्रबंधन की बात ही थी। सबको अपने पानी की पड़ी थी। पानी के बिल मॉफ कर दो की बात थी। चूंकि जल बोर्ड ने कुछ जल्दबाजी भी की थी।
लेकिन कुछ लोग कह रहे थे कि अगर पानी कम होगा तो हरियाली कम हो जाएगी। ये वो लोग है जिनको टेहरी बांध का पानी और बिजली दिखती है, बेशकीमती घाटियां और जल,जंगल,जमीन की बर्बादी नही दिखती। सोसाइटी के भीतर घांस और कुछ पेड़ ही इनकी दुनियां है।
अभी सर्दी का मौसम है, लेकिन अभी हाल फिलहाल उत्तराखंड के वनों की आग इनको प्रभावित नही करती। हाइड्रो और रोड़ प्रोजेक्ट जिनमे पंचेश्वर बांध और चारधाम आल वेदर रोड में हज़ारों बेशकीमती वन संपदा का खत्म हो जाना इनके लिए न तो मुद्दा है और न ही उनको इसकी चिंता है। उनको केवल अपनी घांस बचाने की बनावटी चिंता है।
सरकारें भी कोई पुख्ता इंतजाम नही कर पा रही है। भूजल के उपयोग की जगह जल को पुनः साफ करके भेजने का प्रयास नही हुआ।  सरकार को जितना जल्दी हो भूजल का इस्तेमाल पूरे तरह रोक देना चाहिए क्योंकि भूजल का स्रोत  acquifer जलभृत एक बार खत्म हो जाये तो विनाश की स्थिति ही मानी है जा सकती है।
इस कारण सरकार भी इस विषय पर अधिक संवेदनशील नही है। सरकार को कमरकस कर जल शोधन कार्यक्रम को शुरू करके बागवानी के लिए अलग से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करवाना ही पड़ेगा। जितना पानी घरों में इस्तेमाल होता है, उसको साफ करके हरियाली बचाई जा सकती है।
जल,  जैसा हम जानते ही है, हिमानी और ग़ैरहिमानी नदियों से ही आता है। जब हम पानी का इस्तेमाल करते  है तो एक बात नही भूलनी चाहिए कि जल ही जीवन है और इसको उपयोग करते हुए हमें सदैव इसके स्रोत को स्मरण करना चाहिए।
लेकिन द्वारका के रेडिडेंट्स भी जल के संदर्भ में नुकसान क्यों कर उठाये। इसका भी ख्याल रखना चाहिए।
कुछ लोग ऐसे भी है ,जो सरकार विशेषकर दिल्ली सरकार को कोसते हुए कहते है कि सारी सुविधा केवल झुगी झोपड़ी वालों को हो मिलती है। इस तरह की तुलना हमारे बौद्धिक छोटेपन की ओर इशारा करता है। झुगी झोपड़ी बस्ती का जीवन और द्वारका की सोसाइटी के जीवन में कोई तुलना नही हो सकती। लोग भूल जाते है, इस बस्तियों में बहुत छोटी आय वाले लोग भी जीवन बसर करते है। इस तरह हम को द्वारका में रहने और दिल्ली सरकार के पानी के कार्य की सराहना करनी ही चाहिए।
अभी कुछ दिनों पूर्व  द्वारका को सोलर सिटी बनाने का ऐलान और अब जल संकट की चर्चा जिसमे दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी जनता के सामने समाधान हेतु आना पड़ा। ये दोनों बहुत बड़े कार्य है।
मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगा जैसे बहुत से लोग आप पार्टी और मुख्यमंत्री को दिमाग़ से स्वीकार नही करते। लेकिन दिल में उनको दिल्ली सरकार के कामों की हलचल तो रहती ही है।
अंत में हम सब की कोशिश रहे कि बिजली और पानी का उपयोग किफायत से हो ताकि बेतहाशा मांग बढ़ने से कहीं और बड़े बांध और कोयले के नाम पर प्राकृतिक संपदा नष्ट न हो सकें। हमारी अधिक मांग जल जंगल जमीन के लिए विनाश का कारण न बन सके, इस मिशन के साथ हमें देश को आगे ले जाना है।
भले हम दिल्ली सरकार को माने या न माने लेकिन उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, जल प्रबंधन एवं उपलब्धता और बिजली में सुधार तथा बिल न बढ़ना कल्याणकारी सरकार की अवधारणा में सफल प्रयास ही है। ये एक मिशन ही हो सकता है। द्वारका के लिए इससे अधिक गर्व का विषय क्या होगा कि द्वारका को प्रथम सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की मंसा द्वारका के रेसिडेंट्स के लिए गर्व का विषय होना चाहिए। राजनीति से उठकर इन सब कदमों का दिल से धन्यवाद देना चाहिए। केवल स्वार्थपूर्ण ओछी राजनीति से हम सब को बचना है। द्वारका को भारत की सोलर, जल संरक्षण  और जीरो वेस्ट मैनेजमेंट अथवा पूर्ण कचरा निस्तारण सिटी आओ सब मिलकर बनाये और भूल जाये कि हम किस दल से जुड़े है, याद रहे कि द्वारका के रेसिडेंट्स है। हमारा ये मिशन सतत विकास की अवधारणा को स्थापित करेगा और पर्यावरण संरक्षण में योगदान देगा ,  ये तय है।
(रमेश मुमुक्षु)
हिमाल एवं राइज फाउंडेशन से सम्बद्ध।

(द्वारका जल विवाद और समाधान)

(द्वारका जल विवाद और समाधान)
तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा । इसकी झलक आज द्वारका में मुख्यमंत्री , दिल्ली जल बोर्ड , द्वारका रेसिडेंट्स के जनसंपर्क कार्यक्रम में पानी पर विवाद और पानी के प्रति असंवेदनशीलता को देख अनुभव हुआ। मजे का विषय है कि सबसे अधिक पढ़े लिखे लोगों में लामबंद कर के माइक अपने कब्जे में करने की कोशिश से बड़ा अफसोस हुआ। पानी की समस्या से द्वारका के रेसिडेंट्स वर्षों परेशान रहे। लेकिन वर्तमान सरकार ने आते ही द्वारका समेत पूरी दिल्ली को साफ पानी उपलब्ध करवा दिया। 20000 लीटर फ्री जल के बाद भी जल बोर्ड को नुकसान नही हो रहा। द्वारका की सोसाइटी में बोरवेल , वर्षा जल प्रबंधन आदि की शिकायत आती रही है। साफ पानी के बाद भी जमीन का भूजल निकालना जारी है। भारी बिलों का मसला भी चर्चा के लिए जरूरी था। खेर ,ये सब एक हैप्पी एंडिंग में समाप्त हुआ। लोगों के बिल माफ हो गए और भूजल का इस्तेमाल भी प्रतिबंध के साथ स्वीकार कर लिया गया।
ये सब जल प्रबंधन की बात ही थी। सबको अपने पानी की पड़ी थी। पानी के बिल मॉफ कर दो की बात थी। चूंकि जल बोर्ड ने कुछ जल्दबाजी भी की थी।
लेकिन कुछ लोग कह रहे थे कि अगर पानी कम होगा तो हरियाली कम हो जाएगी। ये वो लोग है जिनको टेहरी बांध का पानी और बिजली दिखती है, बेशकीमती घाटियां और जल,जंगल,जमीन की बर्बादी नही दिखती। सोसाइटी के भीतर घांस और कुछ पेड़ ही इनकी दुनियां है।
अभी सर्दी का मौसम है, लेकिन अभी हाल फिलहाल उत्तराखंड के वनों की आग इनको प्रभावित नही करती। हाइड्रो और रोड़ प्रोजेक्ट जिनमे पंचेश्वर बांध और चारधाम आल वेदर रोड में हज़ारों बेशकीमती वन संपदा का खत्म हो जाना इनके लिए न तो मुद्दा है और न ही उनको इसकी चिंता है। उनको केवल अपनी घांस बचाने की बनावटी चिंता है।
सरकारें भी कोई पुख्ता इंतजाम नही कर पा रही है। भूजल के उपयोग की जगह जल को पुनः साफ करके भेजने का प्रयास नही हुआ।  सरकार को जितना जल्दी हो भूजल का इस्तेमाल पूरे तरह रोक देना चाहिए क्योंकि भूजल का स्रोत  acquifer जलभृत एक बार खत्म हो जाये तो विनाश की स्थिति ही मानी है जा सकती है।
इस कारण सरकार भी इस विषय पर अधिक संवेदनशील नही है। सरकार को कमरकस कर जल शोधन कार्यक्रम को शुरू करके बागवानी के लिए अलग से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करवाना ही पड़ेगा। जितना पानी घरों में इस्तेमाल होता है, उसको साफ करके हरियाली बचाई जा सकती है।
जल,  जैसा हम जानते ही है, हिमानी और ग़ैरहिमानी नदियों से ही आता है। जब हम पानी का इस्तेमाल करते  है तो एक बात नही भूलनी चाहिए कि जल ही जीवन है और इसको उपयोग करते हुए हमें सदैव इसके स्रोत को स्मरण करना चाहिए।
लेकिन द्वारका के रेडिडेंट्स भी जल के संदर्भ में नुकसान क्यों कर उठाये। इसका भी ख्याल रखना चाहिए।
कुछ लोग ऐसे भी है ,जो सरकार विशेषकर दिल्ली सरकार को कोसते हुए कहते है कि सारी सुविधा केवल झुगी झोपड़ी वालों को हो मिलती है। इस तरह की तुलना हमारे बौद्धिक छोटेपन की ओर इशारा करता है। झुगी झोपड़ी बस्ती का जीवन और द्वारका की सोसाइटी के जीवन में कोई तुलना नही हो सकती। लोग भूल जाते है, इस बस्तियों में बहुत छोटी आय वाले लोग भी जीवन बसर करते है। इस तरह हम को द्वारका में रहने और दिल्ली सरकार के पानी के कार्य की सराहना करनी ही चाहिए।
अभी कुछ दिनों पूर्व  द्वारका को सोलर सिटी बनाने का ऐलान और अब जल संकट की चर्चा जिसमे दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी जनता के सामने समाधान हेतु आना पड़ा। ये दोनों बहुत बड़े कार्य है।
मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगा जैसे बहुत से लोग आप पार्टी और मुख्यमंत्री को दिमाग़ से स्वीकार नही करते। लेकिन दिल में उनको दिल्ली सरकार के कामों की हलचल तो रहती ही है।
अंत में हम सब की कोशिश रहे कि बिजली और पानी का उपयोग किफायत से हो ताकि बेतहाशा मांग बढ़ने से कहीं और बड़े बांध और कोयले के नाम पर प्राकृतिक संपदा नष्ट न हो सकें। हमारी अधिक मांग जल जंगल जमीन के लिए विनाश का कारण न बन सके, इस मिशन के साथ हमें देश को आगे ले जाना है।
भले हम दिल्ली सरकार को माने या न माने लेकिन उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, जल प्रबंधन एवं उपलब्धता और बिजली में सुधार तथा बिल न बढ़ना कल्याणकारी सरकार की अवधारणा में सफल प्रयास ही है। ये एक मिशन ही हो सकता है। द्वारका के लिए इससे अधिक गर्व का विषय क्या होगा कि द्वारका को प्रथम सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की मंसा द्वारका के रेसिडेंट्स के लिए गर्व का विषय होना चाहिए। राजनीति से उठकर इन सब कदमों का दिल से धन्यवाद देना चाहिए। केवल स्वार्थपूर्ण ओछी राजनीति से हम सब को बचना है। द्वारका को भारत की सोलर, जल संरक्षण  और जीरो वेस्ट मैनेजमेंट अथवा पूर्ण कचरा निस्तारण सिटी आओ सब मिलकर बनाये और भूल जाये कि हम किस दल से जुड़े है, याद रहे कि द्वारका के रेसिडेंट्स है। हमारा ये मिशन सतत विकास की अवधारणा को स्थापित करेगा और पर्यावरण संरक्षण में योगदान देगा ,  ये तय है।
(रमेश मुमुक्षु)
हिमाल एवं राइज फाउंडेशन से सम्बद्ध।

Wednesday, 13 December 2017

जीवन सुख और दुःख: एक विचार

(जीवन सुख और दुःख : एक विचार)
अगर दिन महीने साल न हो तो उम्र का हिसाब मुमकिन ही न हो। शुक्र है, दिन रात होने से कुछ घटित हो गया लगता है। जीवन बिना रुके चलता है, सतत लगातार। उम्र के पड़ाव दर पड़ाव चलती चली जाती है। सुख दुःख उंसके सबसे गहरे दोस्त है। कभी दोनों साथ चलते है। कभी एक पीछे चलता है, कभी एक आगे। सुख अधिकांश आगे रहता है। आदमी उंसके साथ चलने का प्रयास हमेशा करता रहता और उसका प्रयास दुःख को नजदीक ले जाता है। ऐसा कभी नही होता कि कोई एक कभी नज़दीक ही न रहे। किसी एक को हमेशा के लिए दूर  भी नही किया जा सकता है। आदमी का पूरा जीवन सुख को साथ बुलाने और दुःख को दूर भगाने में ही निकल जाता है। जब जब सुख साथ होता है,  तो वो ऐसे कर्म करेगा कि दुःख स्वतः ही साथ हो लेता है। लेकिन दुःख को दूर करना सबसे कठिन है। सुख से गहरी दोस्ती दुःख को निमंत्रण ही होता है। सुख कभी कभी साथ रहता है। कितनी बार तो दुःख के साथ भी वो नज़दीक आजाता है।।क्या दुःख कभी दूर होता है। शायद नही। अब समझ आया महात्मा बुद्ध की बात की दुःख तो सत्य हींहै। वो तो हमेशा साथ ही रहेगा। अब जब उसको साथ ही रहना है ,तो उससे दोस्ती करें कि उसको महत्व ही देना बंद कर दें। उसका निवारण नही किया तो भी वो ओर बढ़ सकता है। उसको  स्वीकारना ही एक मात्र उपाय है। उंसके साथ रहते हुए भी जीवन को जीना एक मात्र उपाय है।
लेकिन दुःख और सुख किसको कहें ,इसको भी तय करना आसान नही होता। सुख का अतिरेक दुःख ही होता है। सुख पर नियंत्रण उसको लम्बे समय दोस्त बनाये रहता है। इस दोनों दोस्तों को समझना और दोनों के होने से जीवन प्रभावित कम रहे , ऐसी युक्ति ही जीवन को इनके मोह और पीड़ा से दूर रख सकती है। इसके लिए कुछ ऐसा सतत करें ताकि करने से अच्छा लगे। अच्छा ऐसा हो ताकि किसी को कम से कम दुःख और परेशानी रहे। ये इतना आसान नही। सुख अपने साथ मोह और घमंड साथ रखता है। मोह और घमंड आदमी को छदम सुख प्रदान करते  अनुभव होते है। ये ही सबसे अधिक दुःख को निमंत्रण होता है। दुःख तो हर क्षण साथ है।।अगर इन दोनों के होते आदमी अपने काम और लक्ष्य की और बढ़ता रहे , तो इनका होना उसको प्रभावित नही करेगा। बीमार व्यक्ति अगर कभी ठीक नही होगा, जीवन  तो जीना ही है। जीवन जीना है  , ये ही सत्य है। दुःख को अधिक करीब रख कर एक और सुख से वंचित होना है और दूसरी और फिर दुःख के संताप को झेलना होगा। ऐसे में जीवन जीना कठिन ही होगा। एक छोटा सा उदाहरण लेते है। किसी भी तरह की सफलता मिल गई । उससे खुशी होगी और खुशी सुख को निमंत्रण है। लेकिन केवल सुख में डूबने और अधिक खुशी दुःख की आगोश में ले जाता है। जब इसको ही समझ लेना है। इन दोनों को जीने की कला सभी तरह के ज्ञान के उद्विकास का कारण है। एक व्यक्ति बीमार और परेशानियों में भी खुश रह कर जीवन जीता है। लेकिन दूसरी ओर एक व्यक्ति सब कुछ होने के बावजूद भी दुःख के संताप से पीड़ित रहता है। बस ये ही सत्य है।
केवल जीवन जीने की कला जो अपने लक्ष्य की ओर ले जाये , इसकी बहुत अधिक परवाह करें कि दुःख होगा कि सुख । आदमी को लक्ष्य और काम में व्यस्त रखता है। दोनों को स्वीकार करते हुए। जो शायद सबसे अधिक कठिन होगा। लेकिन करना अनिवार्य ही है।करना होगा ही। इनसे ऊपर आनंद, परमानंद, चिदानंद और सदानंद की व्याख्या नाना प्रकार से हुई है।
सौ बातों की एक बात जीवन है तो जीना ही होगा ,अब रो के या खुश हो कर। दुःख बांटने और किसी के दुःख में शरीक होने से वो अपना सा लगता है। संतोष के मर्म को समझ लिया तो ,ये सब साथ भी हो तो जीवन अपनी सहज चाल में चलता जाता है। संतोष का अतिरेक फिर दुःख का कारण है। इसलिए ये सब साथ ही रहेंगे और इनको समझना और जीवन जीना ही एक मात्र सत्य है।
बाकी फिर कभी झोंका आया तो मीमाँसा करेंगे। चारों और ज्ञान का भंडार लुटाया जा रहा है। संत महात्मा और एक से ज्ञानी मौजूद है। लेकिन इन सबके बावजूद भी क्या.............। चर्चा हो ही सकती है।
रमेश मुमुक्षु

Sunday, 12 November 2017

जनता का पैसा सरकार संचालित करेगी कि जनता : एक विचार

जनता का पैसा सरकार संचालित करेगी कि जनता : एक विचार ।
एक बहस लगातार चल रही है कि डिजिटल व्यवस्था से सरकार के खजाने में अधिक पैसा आएगा जिससे देश में विकास कार्यों में तेजी आएगी।
ऊपर से देखने में ये बात ठोस और  सही लगती है। लेकिन एक बात को भी ध्यान में रखना होगा कि ये सब विकास के विभिन्न काम उसी सिस्टम के द्वारा ही संचालित किए जाएंगे जो लगभग पूरे देश में लचर हो चुका है। करप्शन से लिप्त सारा सिस्टम जिसके तहत छोटी छोटी योजना और परियोजना में 40 से 60 प्रतिशत कमीशन खोरी देश का कड़वा सत्य है। टेंडर की कहानी  जगजाहिर है। मेरा दावा है कि   इस लचर व्यवस्था में कोई भी अंतर दीख नही पड़ता। करप्शन के रूप बदल रहे है। पटवारी , क्लर्क, राजस्व, पुलिस, निगम समेत उच्च अधिकारी और नेता अथवा उनके गुर्गे आदि सभी की कहानी लोग स्वयं सुनाते रहते है। दुनिया में अधिकांश देश अभी भी नकद व्यवस्था के तहत संचालित होते है। जॉन रस्किन ने कहा था कि सरकार जनता के कर से मौज लेती है। पिछले लोक सभा चुनाव में बेसुमार पैसा खर्च हुआ। अभी भी इसपर कोई रोक टोक नही। सरकारी बैंकों के एन पी ए की खबरें आती ही रहती है। सरकार के करीबी देश हित में परियोजना बनाते है और मोटा पैसा कमा लेते है। छोटे छोटे प्रोजेक्ट में भी कमीशन खोरी आम बात है। अभी ध्यान से देखों तो लगभग सभी चीजों के रेट बढ़ने में ही है। दिल्ली की मेट्रो में अधिक से अधिक किराया 60 रुपये हो गया है। आने जाने के लिए 120 रुपये पहले ये किराया 60 रुपये से कम लगता था।
ऐसा कितने मदों में है। सरकार ध्यान बांटने में जी जान से जुटी है। करप्शन दो तरह का होता है , एक बेतरतीव और दूसरा पूरी तरह अनुशासित । जब सिस्टम में पकड़ कम होती है तो करप्शन भी फोकस्ड नही रहता। सरकार में कोई भी करप्शन कर लेता है। दूसरा करप्शन फोकस्ड होता है, जिसमे सरकार उसको पूरी तरह से नियंत्रित करके करती है। इसको हम ऐसे समझ सकते है। सबसे पहले फोकस्ड सरकार और व्यवस्था जनता की सोच और उसके विवेक को नियंत्रित कर लेती है। केवल एक उदहारण से समझा जा सकता है। सेना के लिए वन रैंक वन पेंशन का सरकार ने पूरा क्रेडिट ले लिया। देश सेना और सैनिक की बातों में मगन है। लेकिन जंतर मंतर में लंबे समय से इस मुद्दे पर सेना के रिटायर्ड उच्च अधिकारी और सैनिक धरने पर बैठे है। उनकी चर्चा ही नही है। एक फार्मूला चल रहा है , कुछ भी कर लो। सैनिक बॉर्डर पर खड़ा है ,कह कर किसी को चुप कर दो। ऐसा लगता है , सेना के प्रति हमारा प्रेम उमड़ गया। जबकि सच ये है कि आजकल आर्मी अधिकारियों के बच्चे तक सेना में भर्ती नही होना चाहते। ऐसा सरकारें करती आई है। सबसे पहले लोगों की सोच पर पूरा नियंत्रण करके उनको रिमोट की तरह संचालित करना।
जब ऐसा होता है तो सरकार अपने पैसों का उपयोग अपने फैलाव और अपने अस्तित्व के लिए करती है। इसलिए सरकार सोचती है कि देश का सारा खजाना उसके नियंत्रण में ही रहे ताकि सब लोग उसके ही द्वारा संचालित रहे। लेकिन सिद्धान्त रूप से ये सही होता है। जब सिस्टम पूरी तरह सरकार के नही जानता के नियंत्रण में रहता है। एक बात नही भूलनी चाहिए कि प्रजातंत्र जब तक ससक्त और इंक्लूसिव नही हो सकता , जब तक सरकार के नियंत्रण में रहेगा। कोई भी देश और प्रजातांत्रिक राष्ट्र जनता द्वारा चुना जाता है । जनता के लिए । इसका अर्थ हुआ सरकार राज करने के लिए नही है। वो जनता की व्यवस्था के लिए है। लेकिन क्या ये सत्य है?  कदापि नही लेकिन आम आदमी चुप चाप ये देखता और सेहता । एक पुरातन सीख है पाप करने से पाप सहना अधिक घातक है। अब इस बात से हम अंदाजा लगा सकते है। किसी भी देश का सिस्टम जब ईमानदार और जिम्मेदार हो जाता है तो सबसे नीचे की व्यवस्था में वो स्वयं दिखने लगता है। लिटमस टेस्ट में वो साफ बच जाता है। लेकिन ये पूरा देश जानता है क्योंकि 'ले देकर सुल्टा ले ', ये देश का नंगा सत्य है। आज भी पूरी तरह नामक के दरोगा चुपड़ी रोटी खाते है। ये सब हम समाज में आस पास देख सकते है।
अब जब सरकार के पास सब कुछ आ जाये और सिस्टम में आधारभूत परिवर्तन न हो और दलाल पूरी तरह चुस्त दुरस्त रहे , तो परिणाम क्या होगा ? इस पर अधिक बोलना समय की बर्बादी है।
इसलिए सो बातों की एक बात सरकार कोई भी हो अगर जनता सरकार पर नियंत्रण रखने की कोशिश नही करेगी और पार्टी पॉलिटिक्स में व्यस्त रहेगी। बहस में एक दूसरे का सिर फोड़ेगी तो मान लो सरकार और नेता के प्रचार का खर्च जनता बिना मतलब कम करेगी। जब हम किसी पर आस्था के स्तर तक विश्वास कर लेते है , तो उसकी गलती पर भी चुप रहते है और चुप रहने को बाध्य होते है। इसलिए सरकार आस्था नही व्यवस्था है और व्यवस्था का नियंत्रण जनता के हाथ में होना ही वास्तविक प्रजातंत्र होता है। इन सब के बिना सरकार कैसे काम करेगी , ये जगजाहिर है। इसलिए छोटी इकाई से नियंत्रण करना ही एक मात्र उपाय है। ग्राम पंचायत की सभी मीटिंग में जाना और जानकारी प्राप्त करने से शुरुवात हो सकती है। निगम आदि की सबसे छोटी इकाई की जानकारी सूचना अधिकार आदि से प्राप्त कर सरकार और व्यवस्था पर जनता की निगरानी बढ़ सकती है। ये एक मात्र विकल्प है। एक ब्रह्म सत्य है , जब कोई सरकार और नेता कहे कि जनता को सिस्टम से उलझने की जरूरत नही होगी। मैं और हमारी सरकार स्वयं सब कुछ देख लेंगे , तो मान लो जनता पर शिकंजा कसने की तैयारी है। अगर नेता और व्यवस्था कहे कि जनता सवाल पूछे और सिस्टम को नियंत्रण में रखे तो समझ लीजिए सुशासन और इंक्लूसिव प्रजातंत्र की शुरुवात हो गई।
इन बातों पर ठोस कदम जनता को उठाने ही होंगे। नही तो कहीं पे निगाहे कही पे निशाना व्यवस्था का आधार होगा और सरकार जनता को अपनी मुट्ठी में रखने की कोशिश करेगी। चुनाव जनता को करना करना है।
रमेश मुमुक्षु

Thursday, 9 November 2017

स्थापना दिवस और एच आई वी एड्स

(स्थापना दिवस और एच आई वी एड्स )
9 नवंबर 2000 आज ही के दिन मैंने डिग्री कॉलेज बेरीनाग में HIV/एड्स के बारे में लेक्चर दिया था। उस समय इस बीमारी के बारे में लोगों की जानकारी कम थी और लोग बात तक करने से कतराते थे। आज 2017 में भी हालात बहुत नही बदले।अभी हाल फिलहाल में कुछ बच्चों की सूचना मुझे मिली जिनको  को अलग रखा गया है। ये केवल उत्तराखंड की नही बल्कि दिल्ली में भी ऐसा देखने और सुनने को मिल जाता है।
दिल्ली में एक पीढ़ित को आपरेशन करवाना था। बड़ा ताज्जुब हुआ , लगभग सभी अस्पताल वालों ने कुछ बहाना बनाकर आपरेशन से इनकार किया।
लेकिन उत्तराखंड में अभी लोग कतराते जरूर है। लेकिन नुकसान नही पहुंचाते हैं। असल में इसका कारण जानकारी न होना भी है। असल में जानकारी और मरीज़ की सेवा संबंधी सावधानी,  जी किसी भी बीमारी के साथ होता है , को ध्यान में रखकर आगे आना चाहिए।
लेकिन मेरी अपील है कि अगर कोई बीमार और प्रभावित हो तो उसके साथ मिलजुल कर रहे। उसके इलाज और देखभाल से पीछे न हटे।
पिछले तीन वर्षों के दौरान सभी केअर होम अब काम नही कर रहे है। पहले कोई बीमार मिलता था , तो उसको मैं कहीं कहीं भेज दिया करता था।। अब दिक्कत हो चली है। लगता है स्वयं ही कोई केअर होम खोलना पड़ सकता है।
बाकी बहुत कुछ वैसा का वैसा ही है, ये लोग जानते ही है। जब कोई अनाथ बच्चे वो भी hiv प्रभावित हो की सूचना मिल जाये , तो कुछ ठोस करना ही होगा। 17 साल हो गए राज्य को बने इस क्षेत्र में प्रगति नाम मात्र ही है। इसके अतिरिक्त अन्य बीमारी की भी यही स्थिति है। अभी कैंसर के मरीज और शुगर की संख्या बढ़ने लगी है।
सब लोग इस बारे में सजग रहे और जानकारी प्राप्त  कर पीढ़ित को प्रेम प्रदान करें ।
रमेश मुमुक्षु
9810610400