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Tuesday, 3 March 2020

संवाद को बचाना है । 3 मार्च 2017 फेसबुक की पोस्ट

(संवाद को बचाना है) 3 march 2017 facebook ki post.
पिछले  वर्षो से यकायक देश के  आम नागरिक  इतना अधिक सजग हो गया कि अब लोग ही सब फेंसले स्वयं ही कर लेने को आतुर है। युवा का गुस्सा जब किसी के द्वारा संचालित होता है तो वो कुछ भी कर गुजरने को आतुर होता है। ये आज तक दुनियां के सामने मजबूरी है कि सीमा , सेना  दुश्मन और सुरक्षा एक साथ रहते है। मानवता ने अभी भी एक साथ रहना पूरी तरह नहीं सीखा इसलिए अपने को बचाना और दुश्मन को मारने की दुधारू तलवार की नौक पर जीवन चल रहा है। पूरी मानवता इस न ख़त्म होने वाले मानव के संघर्ष को आज तक झेल रही है । आजतक सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध और उससे उपजी घृणा और संताप को मानव कभी नहीं भुला सका। लेकिन उसी वक्त बुद्ध की निर्मल बयार ने उस भयानक त्रासदी को लम्बे कालखंड के लिए शांति की धारा की और मोड़ दिया। दुनियां ने इतिहास में युद्धों का शोर और चीत्कार सुनी और आकाश के विस्तार में उनकों गुम होते देखा है। विश्व युद्ध की याद अभी भी लोगो के जहन में है ही। इन विश्व युद्धों में केवल मानवता की हार ही हुई थी। हिटलर का पागलपन लोगो को याद ही है   मानव मूल रूप से अपने अस्तित्व की रक्षा के प्रति सजग रहा है। लेकिन मानव ने अपने उद्विकास की यात्रा में एक साथ रहना भी सीखा लिया है।
मानव ने विभिन्न विचारों को सुनना भी सीख लिया है। जो मानव की बड़ी उपलब्धि है। लेकिन मानव में  समय समय पर विभिन्न विचारो के प्रति दुश्मनी का भाव आता रहता है। एक मानव की कमजोरी है की किसी एक बात से ही हम पुरे देश जाति और धर्म के दुश्मन बन सकते है। विगत में ऐसे उद्धरण हमारी यादों में है। इसलिए आदमी ने संवाद का आपस में बात करने का एक माध्यम बनाया। संवाद और किसी बात पर आपस में विरोध के बावजूद भी बात करना। इसी तरह विभिन्न संसथान मानव ने खड़े किये ताकि व्यक्तिगत रूप से निर्णय न लेकर संस्थान अपने नियम के अनुसार आगे बड़े। अभी एक लड़की ने अपने विचार व्यक्त किये चारों और ऐसा माहौल बन गया की कोई भी अपनी समझ में गलत सही है का निर्णय लेकर आम आदमी ही कुछ कर देने को तैयार है ।  देश में अफरातफरी का माहौल ऐसे ही बन जाता है। आज़ादी की इतनी गहन बहस की अचानक जरुरत आन पड़ी। अचानक हम केवल नेशनल और एंटी नेशनल में बंट गए लगते है। अभी जनरल रावत ने किसी सैनिक के द्वारा कोई शिकायत की बात पर सोशल मीडिया पर कुछ कहने पर रोक की बात कही वही गृह राज्य मंत्री की सैनिक का विडियो अपलोड कर देता है। उस लड़की को क्या क्या कहा दिया। अगर कोई भी कुछ कहता है तो उसके लिए हमने प्रावधान रखे है। उसके तहत कार्यवाही करें और बहस करें। 
इन बातों से देश कमजोर होता है। सबसे बड़ी बात है की हम लोग किसी भी घटना को कैसे समझ कर उसपर क्या प्रतिक्रिया दें, ये जरुरी बात है। हम अगर संवाद को ही ख़त्म कर देंगे तो क्या रहेगा शेष। अचरज का विषय है कि हमारी सोच और विवेक किसी एक विचार और घटना के आधार पर ही संचालित हो सकती है। हम सब जानते है , देश में वोट की राजनीति हमेशा ही रही है। बहुत कुछ हमेशा ही अच्छा हुआ हो ऐसा भी नहीं। लेकिन ये सब उद्विकास की प्रक्रिया है। ऐसा हमेशा ही होगा। लेकिन संवादहीनता किसी भी काल के लिए सबसे खतरनाक स्थिति हो सकती है। इससे ही देश को बचाना है। भावना भड़काना मानव की कमजोरी है  किसी एक बात को इतना ऊँचा ले जाया सकता है की आपस में संवाद हीनता की स्थिति पैदा हो जाये।
सारे मुद्दे कही छिप जाते है। हालाँकि हमारे देश में लोकतंत्र की ताकत है ही। हम सबका फर्ज है की संवाद को खत्म करने के किसी भी प्रयास का विरोध करें। अपनी बात रखे। उस लडकी को जिसने भी नुक्सान पहुचानें की बात कही उसका विरोध करना हम सबका फ़र्ज़ है। बात होने दो। केवल प्रचार और सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से ऐसा माहौल न बन जाये जिससे आपस में ही संवादहीनता पैदा हो जाये। देश केवल सेना से ही सुरक्षित नहीं होता । वो सुरक्षित होता है संवाद और आपसदारी से । विभिन्न विचार को स्वीकार करके आगे जाने में। देश  द्रोह की परिभाषा सड़कों पर तय मत होने दो। वर्ना मौका परस्त ऐसी परिस्तिथियों से लाभ उठा सकते है। ऐसा एक बार नहीं बार बार हुआ है।
किसी भी देश की ताकत उसका संवाद ही है। देश इतना कमजोर नहीं है कि हम संवाद को ही ख़त्म करने को अमादा हो जाये। 
नफरत को दिमाग में हावी मत होने दो। नफरत आदमी को स्वयं ही नष्ट कर सकती है। आदमी ने इतिहास में कितनी बार इस घृणा और नफरत से मानवता का नुक्सान किया है । ऐसा करने से पहले हमेशा संवाद को रोकने का प्रयास किया गया है। 
बाकी देश मजबूत संवाद से बनता है। ये आदमी ने अपनी लम्बी यात्रा में सीखा है। 
रमेश मुमुक्षु

Tuesday, 18 February 2020

(सीख ले इन पेड़ों से ) 24 जुलाई 2019

( सीख ले इन पेड़ों से)
अरावली पर्वत श्रृंखला जैसे कितने पहाड़ मिट  गए जमीन में
सभ्यतायें धूल में मिट गई
अवतार और पैगम्बर भी आये और गए
दुनियां में महायुद्ध हुए और
इतिहास में गुम हो गए
बड़े बड़े खूंखार दरिंदे आये और
खो गए
महायोद्धा आये और जीत कर 
चलते बने
धरती ने कितने ही रूप बदल लिए
आदमी के आने से पहले क्या क्या गया बदल
विशालकाय जीव भी धरती में समा गए
अभी वर्तमान दौर में अदनी सी जान लिए 
हाथ में खुद की मौत का
रिमोट लिए आदमी एक दूसरे डरा रहा है
समझता है सारी कायनात उसकी मुट्ठी में आ जाये
सबको अपनी औकात मालूम है
लेकिन माने कौन
आदमी के विकास की बानगी देखें जिस पानी से जिंदा है
उसको ही दूषित कर रहा है
अपनी शांति भंग करने को शहर बना लिया और अब अपने शहर 
से दूर जाकर उसको भी बर्बाद करने ही होड़ लगा है
इसको मार उसको मार 
इसको दबा , उसको खोल, उसको पटक , उसको उठा
इसी तरह जीवन ये सब चलता है
सांस भीख की
जिंदगी उधार की
एक पल का भरोसा नही 
ऐंठ आकाश पाताल की 
कही तो रुक 
उँगलीमाल भी रुक गया था
माना अभी तथागत नही है
लेकिन अनुभव तो है ही
सीख ले कुछ घांस और पेड़ों से
आज भी हरे भरे है।
मानव से पहले थे और आगे भी रहेंगे 
ये तय है
इसलिए अपनी औकात में रह
पीर पगम्बरऔर देवी देवता भी 
भी गए
मानव तो बुलबुला है
फूटना ही है
लेकिन इसने पूरी धरती आकाश 
नीचे ऊपर तबाही मचा रखी है
होश में आजा
टूट गया विशाल बर्फ़ का पहाड़ 
अंटार्टिका से
भूकम्प के ऊपर  रहती है 
पूरी दुनियां
इसलिए अब भी जान लो 
समझ लो 
इन  पेड़ो और जंगल से सीख 
जो आज भी तमाम मानव की 
गंदगी झेल कर
भी खड़े है
उसकी बेवकूफी और नादानी पर
हंसते है
मालूम होते हुए भी 
वो प्रकृति का विनाश करता है
विकास के नाम पर
मौत का सामान जोड़ रहा है
पटाखे से परहेज करता है
और एटम बम बनाता है
धुंए से डरता है
युद्ध में झोंक देता है
दुनियां को
खुद बनाता है
बिगड़ता है
रोता है 
रुलाता है
पछताता है
तुलसी को पूजेगा
जंगल को उजाड़ देगा
चींटी को दाना देगा 
वन्य प्राणी को
खत्म करेगा
खुद की झोपड़ी 
को बचाने पर मर मिटेगा
प्राणी के परिवेश को उजाड़ देगा
कब रुकेगा ये गड़बड़ झाला 
एक हाथ में बंदूक और दूसरे हाथ में कबूतर लिए शांति दूत बना 
घूमता है
दिन रात प्रलय का सामान लिए 
रिमोट के साथ
चिप में बंद अपनी मौत का 
प्रोग्राम थामे ।
रमेश मुमुक्षु

Sunday, 9 February 2020

बचपन के स्मृतिशेष

बचपन के स्मृतिशेष
बचपन की यादें आदमी के संग उसकी मौत तक साथ रहती है।।हटाने सेऔर बलबती हो उठती है।  दो तरह के आदमी होते है ,एक वो जो बचपन की यादोँ से दूर भागता है क्योंकि वर्तमान के रंग बिरंगे पैबंद जो लगा रखे है, लेकिन एक बात दीगर है कि शतप्रतिशत तो कोई भी कह नही सकता। लेकिन कुछ अपने तरीके से लिखने का मन कलम चलवा ही देता है। 70 के दशक के बच्चे  उस समय ग्रामीण परिवेश को कुछ कुछ जी रहें थे। हाफ पैंट जिसको  निक्कर बोलते थे , टल्ली से ढकी रहती थी। एक दो कपड़ो के बादशाह होते थे ,बच्चे जो पढ़ाई में बीच वाले होते थे। पढ़ाई का  अर्थ जो पास हो जाया करते थे। मोती बाग का जिक्र करके बहुत कुछ स्मृति के सागर से लहर बन कलम पर टकरा रहा है। मोती बाग प्राइमरी स्कूल और उसके बाहर बैठने वाले टोकरी में इमली, लाल इमली, टाटरी, आमपापड़, अभ्रक, चूरन की गोली, संतरें की गोली, गटारे , लालबेर, बर्फ का गोला बिकता था। बद्री, चुलबुली दो मोटे तौर पर टोकरी लिए बैठते थे। दोनों एक दूसरे को कुछ कुछ बोलते थे। बिज़नेस में प्रतिस्पर्धा ही थी वो छोटे स्तर की। आधी छुट्टी हुई बच्चे  एक पैसे से लेकर 5 पैसे लेकर निकल पड़ते थे ,इन हॉकर्स के पास। भैय्या मुझे..... दे दो। कुछ उस्तादी भी करते थे ,एक आध गोली गोल कर लेते थे , भीड़ का फायदा उठा, चोरी कम खेल अधिक रहता था। जिस दिन बर्फ का गोला खा लिया और घर पर खांसी हो गई तो शामत समझों, पिटाई ,जो एक रूटीन ही था। पिताजी के सामने बच्चे भटकते भी नही थे। एक तो लगभग सभी आखिरी औलाद थी, कितने तो पैदा होते ही , मर जाते थे। हालांकि आज भी कितनी बार पेरेंट्स और बच्चों की उम्र में अंतर हो ही जाता है। 
जो कुछ पिताजी को कहना होता तो माँ के पीछे लग जाओ। स्कूल से भी कभी कोई पर्ची नही आती थी। शायद 13  पैसे या कुछ अधिक फीस फीस होती थी। 
किताबे पुरानी ही चलती थी। कॉपियां राशन की दुकान से आती थी। उस समय लकड़ी की तख्ती का इस्तेमाल होता था। स्लेट और चौक से रफ़ काम हो जाता था। स्लेट भी पत्थर की और टिन की होती थी। पत्थर बच्चे बोलते थे वो एक तरह से टाइल्स की तरह होती थी। 
जितना लिखो और मिटा दो। कपड़ो की शामत होती थी। नाक का निकलना भी खूब होता था। नाक बही और हथेली और कोहनी के बीच से लपेट देते थे या सुड़क लेते थे, नाक का निकलना और सुड़क लेने का सिलसिला कितनी बात पिटाई तक जाता था। रुमाल कम ही होते थे। बच्चों के गंदे होने में कलम दावत भी शामिल थे। इसके अतिरिक्त होल्डर भी हाथ और कपड़े नीले करता था। बॉलपेन होते नही थे, जो थे, वो जेब के दुश्मन थे। चलते ठीक नही थे। बच्चे उसकी निब निकाल कर फूँक ही मरते रहते थे। एक तो बच्चे पढ़ते नही थे, दूसरी और ये सब समान बच्चों का समय खराब  भी करते थे। बच्चे भी खुश ही रहते थे। फाउंटेन पेन की निब ठीक नही चलती थी ,तो फर्श पर मार के तोड़ देते थे। कॉपी किताबो का अल्लाह मालिक होता था।......
शेष आगे....
रमेश मुमुक्षु

Tuesday, 7 January 2020

डी डी ए की उपेक्षा का शिकार: लाल पत्थर से बने स्ट्रक्चर की आत्म व्यथा। सेक्टर 16 बी द्वारका मेरा डी डी ए द्वारा कभी निर्माण हुआ होगा। लाल पत्थर से मुझे सजाया गया था। प्रेसिडियम स्कूल , अभी प्रूडेंस स्कूल का नाम हो गया और भारत अपार्टमेंट सेक्टर 16 बी के पास मैं पूर्णतः उपेक्षित और तिरस्कारपूर्ण जीवन जीने को बाध्य हूँ। करीब 2006 से पहले मेरा निर्माण हुआ होगा। मौसम के तफेडे खाते खाते मैं खुद ही भूल गया कि मेरा वास्तव में अस्तित्व क्या है? मुझे क्योंकर निर्मित किया गया होगा ? सुनने में आता था कि मुझे तहबाजारी के लिए बनाया गया था। लेकिन अब तक प्रतीक्षा करते करते मैं उकता गया हूँ। अब झाड़ झंकार ही मेरे संगी साथी है। कभी कभी बरसात में सांप भी मेरे साथ रहते है। कुछ वर्षों तक कभी कभार सफाई हो जाती थी। अब तो वो भी नही हो रही है। अभी मेरे बगल में क़ुछ खाने पीने की रेहड़ी लगने से कुछ रौनक सी लग गई है। लेकिन मेरी इस वीरान जगह पर अपराधी भी आराम से छिप सकते है। कुछ गलत चीज़ भी छिपा सकते है। परंतु मेरी सुध कौन ले? ओ ! मेरे जन्मदाता डी डी ए इतना निर्मोही क्यों हो गया ? कभी तो मुझे फाइलों में खोज ले। कभी तो तनिक देख ले कि मुझे क्यों कर बनाया गया था ? मेरा जीवन अनारकली के गीत जैसा होगा और दिन रात रोता और उम्मीद से गाता है।"आ जा आ तो आ जा मेरे किस्मत के खरीदार अब तो अब तो आज " कर्ण अर्जुन फ़िल्म की तरह गाता हूँ" DDA के JE AE आएंगे मुझे बचाएंगे । बस अब ये ही रह गया है, मेरे जीवन में एक व्यक्ति मुझे हमेशा याद करता है, रमेश मुमुक्षु , लेकिन वो भी क्या करें, लगता है, वो भी मुख्य अभियंता ,द्वारका को कहते कहते थक गया। उस दिन फोटो ले रहा था, मुझे हंसी आ रही थी ,क्या होगा ,मुमुक्षु भाई, जब मेरा जमदाता ही मुझे भूल गया ,अब कौन याद करेगा। लेकिन अभी डी डी ए के उपाध्यक्ष श्री तरुण कपूर जी बहुत ही कर्मठ एवं काम करने वाले आएं है। हो सकता है, मुमुक्षु को मति आ जाए और उनको लिख दे। इस तरह मेरा तर्पण हो सकेगा, लगने लगा है। अब दिल गाने लगा है " दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे रंग जीवन मे नया लायो रे दुःख भरे दिन बीते रे भैया"देखना है,अब कब और कितनी जल्दी मेरा तर्पण होता है। श्री तरुण कपूर जी से आस बंधी है। रमेश मुमुक्षु 5.1.2020

मेरा डी डी ए द्वारा कभी निर्माण हुआ होगा। लाल पत्थर से मुझे सजाया गया था। प्रेसिडियम स्कूल और भारत अपार्टमेंट सेक्टर 16 बी के पास मैं पूर्णतः उपेक्षित और तिरस्कारपूर्ण जीवन जीने को बाध्य हूँ। करीब 2006 से पहले मेरा निर्माण हुआ होगा। मौसम के तफेडे खाते खाते मैं खुद ही भूल गया कि मेरा वास्तव में अस्तित्व क्या है?मुझे क्योंकर निर्मित किया गया होगा। 
सुनने में आता था कि मुझे तहबाजारी के लिए बनाया गया था। लेकिन अब तक प्रतीक्षा करते करते मैं उकता गया हूँ। अब झाड़ झंकार ही मेरे संगी साथी है। कभी कभी बरसात में सांप भी मेरे साथ रहता है। कुछ वर्षों से का कभी कभार सफाई हो जाती थी। अब तो वो   भी नही हो रही है। 
अभी मेरे बगल में क़ुछ खाने पीने
 की रेहड़ी लगने से कुछ रौनक सी लग गई है। 
लेकिन मेरी इस वीरान जगह पर अपराधी भी आराम से छिप सकते है। कुछ गलत चीज़ भी छिपा सकते है। परंतु मेरी सुध कौन ले?
ओ ! मेरे जन्मदाता डी डी ए इतना निर्मोही क्यों  हो गया? कभी तो मुझे फाइलों में खोज ले। कभी तो तनिक देख ले कि मुझे क्योंकर बनाया गया था? 
मेरा जीवन अनारकली के गीत जैसा होगा और दिन रात रोता और  उम्मीद से गाता है।
"आ जा आ  तो आ जा मेरे किस्मत के खरीदार अब तो अब तो आज " कर्ण अर्जुन फ़िल्म की तरह गाता हूँ" जे ई ,ऐ ई आएंगे मुझे बचाएंगे । बस अब ये ही रह गया है, मेरे जीवन में। एक व्यक्ति मुझे हमेशा याद करता है, रमेश मुमुक्षु , लेकिन वो भी क्या करें, लगता है,वो भी मुख्य अभियंता ,द्वारका को कहते कहते थक गया। उस दिन फोटो ले रहा था, मुझे हंसी आ रही थी ,क्या होगा ,मुमुक्षु भाई, जब मेरा जमदाता ही मुझे भूल गया ,अब कौन याद करेगा। लेकिन अभी डी डी ए के उपाध्यक्ष श्री तरुण कपूर जी बहुत ही कर्मठ एवं काम करने वाले आएं है। हो सकता है, मुमुक्षु को मति आ जाए और उनको लिख दे। इस तरह मेरा तर्पण हो सकेगा लगने लगा है। अब दिल गाने लगा है
 " दुःख भरे दिन बीते रे भैया
अब सुख आयो रे
रंग जीवन मे नया लायो रे
दुःख भरे दिन बीते रे भैया"
देखना है,अब कब और कितनी जल्दी मेरा तर्पण होता है। श्री तरुण कपूर जी दे आस बंधी है। 
रमेश मुमुक्षु
5.1.2020

Tuesday, 10 December 2019

*(पुरानी कविता है ,जिसमे भगीरथ के सिर से निकली धार को निर्मल अविरल बहने दो की अपील है)*

(पुरानी कविता है ,जिसमे भगीरथ के सिर से निकली धार को निर्मल अविरल बहने दो की अपील है)
कैलाश पर बैठे ध्यानस्थ 
सर्पों को गले में धारण 
किये भभूत मले शरीर 
में 
जटाओं में 
भागीरथी की स्वच्छ धारा 
को बर्फीले साम्राज्य 
के घमंड रहित 
सम्राट 
गण , भूत , पिचास 
से घिरे 
डर भय जिनके 
पैरों पर गिर कर
अपने को लोप 
कर देते है
त्रिशूल  गाढे 
तीसरी आंख 
को बन्द 
किये 
अर्द्ध नेत्रों से  संसार 
के जड़ चेतन के ज्ञाता
डमरू 
के स्वामी
आकाश पाताल
समेत सम्पूर्ण सृष्टी 
के रक्षक 
को क्या हमारे जैसे
तुच्छ 
स्वार्थी प्रकृति के भक्षक 
शिव की जटाओं से 
निकली स्वच्छ 
जल की 
धारा 
से बनी गंगा 
को भी अपनी 
निकृष्ट 
स्वार्थी 
नियत और सीरत से 
लील कर 
अपनी कलुषित 
मानसिकता
के अनुसार 
मैला कर देने
वाले
बर्फ के साम्राज्य 
को भी खत्म करने 
को आतुर 
अपने को शिव भक्त 
कह कर
गर्वान्वित अनुभव करते
शिवरात्रि 
पर
आडम्बर कर
प्रसन्न करने 
का ढोंग करते
नहीं थकते
झूट स्वार्थ
लालच 
से भरा 
क्या शिव की अर्चना कर सकेगा
भोले को भोला समझ 
भांग धतुरा सुल्फा 
शिव का भोग समझ 
अपनी स्वार्थ की 
पूर्ति करता है
जो 
अपने आराध्य 
के सिर से 
निकली जल धार 
को नहीं साफ़ रख 
सका 
वो क्या शिव की अर्चना करेगा
अब तो वो शिव की तीसरी आंख से भी डरता नहीं
क्या शिव खोलेंगे अपनी
तीसरी आंख 
नहीं 
क्योंकि
आदमी ने स्वयं अपनी
मौत का 
सामान जुटा 
जो लिया है
जल जंगल जमीन 
समेत सब कुछ लील 
कर 
क्या हो सकेगी 
शिव अर्चना
हाँ अभी भी 
किसान , मजदूर 
वनवासी समेत वो सभी जो 
मानव और प्रकृति 
की सेवा में
लगे है
शिव की मूर्ति 
नहीं 
उनके 
पास प्रतिक 
को ही शिव 
समझ 
पूरी तन्मयता 
से सजीव को करते है
स्मरण
उनके निश्चल प्रेम 
को भी देख नहीं 
खोलता शिव 
अपनी तीसरी आंख
मानव की 
नीचता को देख
वो तांडव करने को तैयार 
है
लेकिन वो शिव है
अवसर देना
क्षमा करना 
उनका स्वाभाव है
वो भोले है 
लेकिन भोले नहीं
कुछ ऐसा करें की 
न खुले उनकी 
तीसरी आंख
एक क्षण 
में स्वाहा हो 
जायेगा 
हमारे स्वार्थ का
साम्राज्य
शिव की अर्चना 
उसकी जटा 
से निकली  
धारा अविरल 
निर्बाध 
बहने दो
शिव नहीं कहता
की उनकी तरह कैलाश 
पर रहो 
लेकिन 
ऐसा मत करों की 
कैलाश 
पर ही संकट 
आजाये
संभव है 
कुछ इस तरह 
उसकी अर्चना 
हो सकती
है
शायद......
रमेश मुमुक्षु

पुरानी कविता है ,जिसमे भगीरथ के सिर से निकली धार को निर्मल अविरल बहने दो की अपील है)

*(पुरानी कविता है ,जिसमे भगीरथ के सिर से निकली धार को निर्मल अविरल बहने दो की अपील है)*
कैलाश पर बैठे ध्यानस्थ 
सर्पों को गले में धारण 
किये भभूत मले शरीर 
में 
जटाओं में 
भागीरथी की स्वच्छ धारा 
को बर्फीले साम्राज्य 
के घमंड रहित 
सम्राट 
गण , भूत , पिचास 
से घिरे 
डर भय जिनके 
पैरों पर गिर कर
अपने को लोप 
कर देते है
त्रिशूल  गाढे 
तीसरी आंख 
को बन्द 
किये 
अर्द्ध नेत्रों से  संसार 
के जड़ चेतन के ज्ञाता
डमरू 
के स्वामी
आकाश पाताल
समेत सम्पूर्ण सृष्टी 
के रक्षक 
को क्या हमारे जैसे
तुच्छ 
स्वार्थी प्रकृति के भक्षक 
शिव की जटाओं से 
निकली स्वच्छ 
जल की 
धारा 
से बनी गंगा 
को भी अपनी 
निकृष्ट 
स्वार्थी 
नियत और सीरत से 
लील कर 
अपनी कलुषित 
मानसिकता
के अनुसार 
मैला कर देने
वाले
बर्फ के साम्राज्य 
को भी खत्म करने 
को आतुर 
अपने को शिव भक्त 
कह कर
गर्वान्वित अनुभव करते
शिवरात्रि 
पर
आडम्बर कर
प्रसन्न करने 
का ढोंग करते
नहीं थकते
झूट स्वार्थ
लालच 
से भरा 
क्या शिव की अर्चना कर सकेगा
भोले को भोला समझ 
भांग धतुरा सुल्फा 
शिव का भोग समझ 
अपनी स्वार्थ की 
पूर्ति करता है
जो 
अपने आराध्य 
के सिर से 
निकली जल धार 
को नहीं साफ़ रख 
सका 
वो क्या शिव की अर्चना करेगा
अब तो वो शिव की तीसरी आंख से भी डरता नहीं
क्या शिव खोलेंगे अपनी
तीसरी आंख 
नहीं 
क्योंकि
आदमी ने स्वयं अपनी
मौत का 
सामान जुटा 
जो लिया है
जल जंगल जमीन 
समेत सब कुछ लील 
कर 
क्या हो सकेगी 
शिव अर्चना
हाँ अभी भी 
किसान , मजदूर 
वनवासी समेत वो सभी जो 
मानव और प्रकृति 
की सेवा में
लगे है
शिव की मूर्ति 
नहीं 
उनके 
पास प्रतिक 
को ही शिव 
समझ 
पूरी तन्मयता 
से सजीव को करते है
स्मरण
उनके निश्चल प्रेम 
को भी देख नहीं 
खोलता शिव 
अपनी तीसरी आंख
मानव की 
नीचता को देख
वो तांडव करने को तैयार 
है
लेकिन वो शिव है
अवसर देना
क्षमा करना 
उनका स्वाभाव है
वो भोले है 
लेकिन भोले नहीं
कुछ ऐसा करें की 
न खुले उनकी 
तीसरी आंख
एक क्षण 
में स्वाहा हो 
जायेगा 
हमारे स्वार्थ का
साम्राज्य
शिव की अर्चना 
उसकी जटा 
से निकली  
धारा अविरल 
निर्बाध 
बहने दो
शिव नहीं कहता
की उनकी तरह कैलाश 
पर रहो 
लेकिन 
ऐसा मत करों की 
कैलाश 
पर ही संकट 
आजाये
संभव है 
कुछ इस तरह 
उसकी अर्चना 
हो सकती
है
शायद......
रमेश मुमुक्षु

Wednesday, 4 December 2019

इन विभागों की ड्यूटी क्या है?

इन विभागों की ड्यूटी क्या है?
डी डी ए का मूल काम है, किसानों की जमीन अधिग्रहित करके रेजिडेंशियल  और कमर्शियल यूनिट बनाये। आप सब को आश्चर्य होगा , डी डी ए की करीब 1300 एकड़ भूमि पर करीब 4 वर्ष पूर्व तक कब्जा हो चुका था। कैसे और क्यों कब्जा हुआ? इसका एक मात्र कारण है। जिम्मेदारी का अभाव, विभाग के  भीतर समन्वय की कमी, टेंडर के मकड़ जाल में फंसी व्यवस्था और प्रलोभन को नकारा  नही सकते। आजतक डी डी ए ने जितने इंफोर्समेंट  के नोटिस निकाले होंगे, उनमे से आधे से कम भी किर्यान्वयन की प्रक्रिया में आ जाते तो न तो जमीन पर कब्जा होता ,और न ही बिल्डिंग विरूप होती। 
नियम ताक पर रख कर कोई विभाग काम करेगा ,तो चीज़े बिगड़ ही जाती है। दूसरी ओर दबंग लोग भी विभाग को कमजोर बनाते है। अपनी मर्जी से कुछ   ही कब्जा कर लो और गैरकानूनी निर्माण कर लो। अधिकारी को तिलक लगाने से लेकर धमकी तक चलती है। एक बार नियम टूट जाये तो लोग उसका लाभ उठा लेते है। बहुत से मेहनती और ईमानदार अधिकारी भी होते है। जिनकी बात हम लोग भी कम करते है। 
इसमें मैं सिविल  सोसाइटी की कुछ कुछ जिम्मेदारी की बात करूंगा। बहुत बार बहुत से लोग विभाग को केवल गलत ही कहते है। उससे जो लोग मेहनती और ईमानदारी से काम करते है,उनके नैतिक साहस और सेल्फ रेस्पेक्ट पर कुप्रभाव पड़ता है। काम होते है, बहुत धीमे धीमे ,ये डी ङी ए की कमी है।
इनको स्वयं ही रोजमर्रा देखना चाहिए कि कौन सा रोड टुटा है। कहाँ पर रिपेयर करना है। ये उनकी रोजमर्रा की ड्यूटी है। लेकिन लिखने के बावजूद भी काम लंबित रहता है। इसलिए जनता परेशान होकर इनको बुरा भला कहती है।
इनको एक गैंग टीम बनानी चाहिए। आप बहुत से लोगो को याद होगा, रेलवे और सड़क के लिए भी एक गैंग टीम हुआ करती थी। रेलवे में तो अभी  ही है। ये टीम रोज खुद ही देखती रहे और समय रहते ही ठीक करती रहे ,तो सड़क और कुछ भी खराब ही न हो।
ये इनके ही काम होते है। रेसिडेंट्स को   खाली मेहनत करनी पड़ती है। 
ऐसे ही एम सी डी की कहानी है।।उनको डी डी ए से हैंडओवर हुआ है। वो ही टेंडर और लटकाना। आपस में ब्लेम गेम। काम इतना धीमे होता है की आदमी अधीर हो उठता है।ये भी उनके रोजमर्रा के काम है। एम सी डी में लोग पार्षद को बोलते है। पार्षद उनके काम  को करवाने के लिए विभाग को यहाँ वहां भेजता है। स्टाफ भी इसका आनंद लेते है।" साब ने वहां भेज दिया ,कर तो रहा हूँ।" पुराने घाघ उनके टोटका दे जाते है, वो सिखाते है, " *काम करियो मत फली फोडियो मत* *do nothing look buzy*
कुछ पुराने घाघ सिखाते है, *किसी काम को मना नही करना* हां साब करता हूँ। एक टोटका सरकारी काम में पुरातन समय से चल रहा है। *अफसर के अगाड़ी और घोड़े के पिछाड़ी कभी मत जाओ।*  मजे की नौकरी करें। 
कुछ ईमानदार और कर्मठ लोग विभाग को चलाते है। अब रही टेंडर और उससे जुड़ी कहानी ,ये जग जाहिर है। 
*विभाग को एक रेकी या गैंग टीम बनानी होगी ,जो रोजमर्रा पूरे इलाके की देख रेख करे। ये टीम रिपेयर का सामान लेकर चले। जिसमें सड़क, सिविल,बिजली, हॉर्टिकल्चर सभी शामिल हो ,छोटी छोटी रिपेयर रोजमर्रा होती रहे यो चीज़े खराब ही न हो।*
*एम सी डी को प्रति दिन कूड़ा उठाने ही  ही है। सुविधा और जुर्माना टीम एक साथ रूटीन में चले।*
ये ही एक मात्र तरीका है। कुछ पॉइंट ऐसे है, जो मैं 2007 से देख रहा हूँ। आजतक काम नही हुआ। हो सकता है, डी डी ए उसको भूल ही गया हो,उनको रिकॉर्ड में खोजना होगा।
स्टाफ की कमी  भी आड़े आती है।
बाकी फिर कभी।
रमेश मुमुक्षु
4.11.2019