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Saturday, 24 October 2020

श्री राजेन्द्र सिंह ,एसीपी को समर्पित कुछ पंक्तियां

श्री राजेन्द्र सिंह ,एसीपी को समर्पित कुछ पंक्तियां 
💐सहज उपलब्ध सरल भावयुक्त 
चेहरे पर भीतर तक देख सकने वाली 
अचूक आंखें 
जो दोस्त को देख मुकरा देती है,
लेकिन अपराधी को अंधरे में खोज लेने वाला पैनापन घेर लेता है 
यकायक पलक झपकतें ही 
इससे पहले कोई पलक झपके
अपने पाश में जकड़ने की ताकत और जोश
 जो हमेशा होशयुक्त ही रहा।
निर्भया को न्याय दिलाने को आतुर 
उसके दर्द को महसूस कर 
दरिंदों को अंजाम तक पहुचाने का जज्बा देखते ही बनता है
जिसकी आंखें किसी को भेदने को हो आतुर 
 फर्ज के लिए तल्लीन व्यक्तित्व हमेशा अपना सा ही लगता है
यूं नही कोई सबका अपना 
बन सकता है
कर्तव्य अधिकार समर्पण ही किसी को अपनेपन तक ले आता है
ताकत का डर
 किसी को भयातुर कर सकता है
लेकिन ताकत का सदुयोग डर को दूर भगाकर भयमुक्त वातावरण बना सकें 
इसको ही  ताकत और अनुसाशन का होना कहा जा सकता है।
ये ही अहसास तुमको दोस्तों का दोस्त और अपराधी का कहर बना देता है
कानून के दायरे में
एक बात कहूँ धीमें से 
मेरा दावा है, तुमको दुश्मन भी भूल नही सकता
क्योंकि वो जानता है उसको ईमानदारी से पकड़ा गया था
ये ही अहसास आदमी को अपना बना देता है ,
वरना पैरों से कुचलने वाले निपट अकेले ही गुम हो गए भवसागर में अनगिनत चेहरे और उनपर टिकी आंखें कहां  रहती है याद 
लेकिन तुम्हारी चौकस आंखों 
को भूल जाना कहा होगा संभव 
ये तय है......💐
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष ,हिमाल
9810610400
27.5.2020/24.10.2020 

Saturday, 5 September 2020

अध्यापक दिवस : सर्वपल्ली राधा कृष्णन के जन्म दिन की याद में।

अध्यापक दिवस : सर्वपल्ली राधा कृष्णन के जन्म दिन की याद में।
जीवन में चाहे कोई कितना बड़ा हो जाये और चाहे कितना आगे निकल जाए ,लेकिन कोई न कोई अध्यापक जरूर  याद होता होगा, जिनसे परोक्ष या अपरोक्ष रुप कोई एक बात ने व्यक्तित्व में कुछ जोड़ा होगा। हम जैसे बच्चे जो इसलिए स्कूल जाते थे क्योंकि घर वाले रास्ता लगा देते थे। बस्ता उठाये चल दिये बिना मन स्कूल में केवल गप्प और आपस में बहस । इतना जरूर है कि टीचर अभी भी पूरी तरह आंखों के सामने रहते है।  उस वक्त तो सबका नामकरण करते थे। आज कभी मिलते है तो उनको दूसरी नज़र से देखते है। प्राइमरी स्कूल के हेड मास्टर की दो बातें मुझे आज भी याद है।।उनकी शक्ल और नाम बिल्कुल भी याद नही। वो एक गाना बच्चों को सुनाते थे, जो मुझे हमेशा याद रहा। मन्ना डे का गाना"  खुदगर्ज़ दुनिया में ये इंसान की पहचान है 
जो पराई आग में जल जाए ,वो इंसान है"
अपने लिये जिये तो क्या जिये , 
तू जी ऐ दिल जमाने के लिए" ये गाना शायद ये पहली कक्षा में सुना था ,वो अभी भी आंखों के सामने तैरता है। जीवन उसी के रास्ते आज भी चल रहा है, दुनियां के हिसाब से बिल्कुल नाकामयाब। उसी हेड मास्टर की एक बात भी मुझे याद है। उन्होंने एक बार बाल सभा , जो सरकारी स्कूल में पढ़े होंगे, उन्हें ये अचानक याद आ जायेगा , में बच्चों को एक किस्सा बताया कि जापान के प्राइम मिनिस्टर ने हमारे प्रधामंत्री  स्व. नेहरू को बताया कि आप मानव अपशिष्ठ को व्यर्थ करते है ,जबकि जापान तो बिजली और खाद भी बनाता है। आजतक हमारी वो ही स्थिति है। ये दो बातें आजतक याद है। बाकी खेलना कूदना और सरकारी एन डी एम सी का स्कूल था , तो दलिया, बिस्किट , मीठी ब्रेड का इंतजार सबसे अधिक रहता था। अभी लिखते हुए,वो स्वाद रसना ने ले लिया। नाकामयाबी का एक बड़ा फायदा रहता है क्योंकि उनको पुरानी चीज़े हमेशा याद रहती है। संभव है, नाकामयाबी का भी ये ही कारण हो। लेकिन मेरा दावा है, इसको पढ़ कर सब बचपन में स्कूल के समय पहुँच जाएंगे। हम जैसों को पढ़ाई के अतिरिक्त सब कुछ याद है। पढ़ाई इसलिए नहीं क्योंकि पढ़ता कौन चाहता  था। पढ़ना उतना ही ताकि आगे खिसक जाए। लेकिन जो बच्चें प्रथम आते थे, वो हम जैसों से डरते जरूर थे। कोर्स की दुनियां से परे हम बादशाह हुआ करते थे। जिन जानकारी को बच्चों को दूर रखा जाता था ,हमें वो ही प्रिय थी। पांचवी कक्षा तक हम लोग धर्म, सच झूट और न जाने कितनी बहसों में लगे रहते थे। बहस और गप्प में हम लोगों को महारत हासिल थी। खेलना, बेर तोड़ना, अमरूद,जामुन पर हाथ साफ करना, आम पापड़, टाटरी , बर्फ का गोला, गटारे , अमर्क , बेर, पकड़म पकड़ाई, पिट्ठू, लट्टू, गुल्ली डंडा, कंचे , चोर सिपाई, दोस्तों के कंधे पर हाथ टिकाये, निक्कर को ऊपर खींचते हए , सभी अपने अपने पिताजी के आने और उनके आफिस जाने तक शरीफ और आज्ञाकारी बने रहते थे। बात बात पर चांटा रसीद हो जाता था। रात को भूत प्रेत की कहानी सुनना और डर डर के घर भागना। ये कुल जीवन चर्या थी। 
मुझे खुद का तो बहुत याद नही की किसी टीचर ने जीवन बदल डाला ,लेकिन दोस्तों के जीवन में बदलाव याद है। 
सीनियर सेकेंडरी स्कूल जैसे प्रिंसिपल शायद कोई दूसरा भी होगा। उनका नाम स्व. अयोध्या दास था। उनका अनुशासन डेडिकेशन और एक एक बच्चे पर नज़र रखना गज़ब का था। अभी 5 वर्ष पूर्व ही उनका देहांत हुआ। एक एक टीचर आंखों के सामने आते जा रहे है। एक एक टीचर की कुछ बातें, उनका तरीका, किसी दिन किसी बात ने जरूर कुछ हरकत की होगी। जब सब को जोड़ लगाते है तो बहुत कुछ निकल कर आता है। जो बच्चे गंभीर और पढ़ाई को ध्यान से करते है, उनको बहुत कुछ याद होगा ,शायद ,हम जैसे बच्चे जो हमेशा बिना छुट्टी स्कूल गए ,कभी  फुटके भी नही ,लेकिन ताज्जुब है,कभी दिल नही लगा पढ़ाई में। लेकिन किताबों की दुनियां सर्दी की ठंड, गर्मी की लूं का लुफ्त, बरसात में नहाने का आनंद , तितली, चिड़िया पेड़ पौधे ही साथी थे। एक मित्र है ,मेरा राकेश गुप्ता वो तीन घंटे तक फ़िल्म की स्टोरी सुनाया करता था। स्टोरी में टेन टेना तक याद होता था।  लेकिन ये सब खूबी बच्चो की आज तक रेखांकित नही की जातीं। हम जैसे बच्चे जो बैठेते स्कूल में थे,लेकिन उनका फ़ोकस कहीं बाहर रहता था। ऐसे बच्चों के लिए,  उनकी जिज्ञासा के लिए आज भी कोई स्थान नही है। बच्चे के भीतर  मौजूद वास्तविक बच्चे को निकालना ही शिक्षा और शिक्षक का सबसे बड़ा रोल होता है। शिक्षा प्रणली में  इस बात को शामिल करना सबसे पहली शर्त होगी। आप में बहुत से लोगों ने तोतो चान पुस्तक जिसके लेखक तेत्सुकों कुरोयानागी पढ़ी होगी। रेल के डिब्बे में स्कूल और तोतो चान का लंबा इंटरव्यू प्रिंसिपल के साथ । इसके अतिरिक्त पहला अध्यापक , चिंगीज एत्मातोव का लघु उपन्यास के अध्यापक का जुनून और बच्चों के प्रति अध्यापक का अगाध प्रेम और जज्बे की कहानी है। स्टेपी के क़ुरकेव गांव के टीले पर दो पॉप्लर के पेड़ों का बढ़ना और स्कूल की पहली बच्ची का   वैज्ञानिक  बनने की कथा भूलना कठिन है। हमारे देश में तो एक लंबी परम्परा है,गुरु शिष्य परम्परा की। आचार्य चाणक्य, द्रोणाचार्य समेत लंबी लिस्ट है। लेकिन मैं आचार्य चाणक्य को सबसे आगे रखता हूँ क्योंकि उन्होंने एक साधारण बालक में भारत का सम्राट खोज लिया ही नही लिया बल्कि बना ही डाला। जबकि द्रोणाचार्य  एकलव्य को शिष्य न बनाकर बड़े अवसर से चूक गए। गुरु मजबूर हो तो वो महान गुरु नही हो सकता। लेकिन अर्जुन ने उनको ऊंचा स्थान प्रदान किया। राजवंश  के बच्चों को कुछ बनाना कोई बड़ी उपलब्धि नही मानी जा सकती है। फिर भी गुरु के रूप में उनका ऊंचा स्थान रहेगा ही। आधुनिक समय में परमहंस रामकृष्ण और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद का अद्भुत योग था।  बच्चे के भीतर कला, संगीत, बहस, तर्क,गणित, भाषा, उच्चारण , चिंतन, खेल प्रतिभा, दार्शनिक चेतना, समाज सेवा ,कृषि के प्रति रुचि, अन्वेषण के गुण , शारीरिक लोच और ताकत न जाने कितने गुण विद्यमान होते है। उनको ही सहज रूप से पहचानना और निकाल कर परिष्कृत करना ही गुरु और अध्यापक का भी विशेष गुण होता है। अध्यापक और गुरु, वो ही श्रेष्ठ होता है, जो स्वयं का भी परिष्कार करता रहे और समयानुकूल चीज़ों को  अपनाता रहे। गुरु चूंकि अंधकार से शिष्य को प्रकाश की ओर ले जाता है,इसलिए गुरु का स्वयं का प्रकाशमान होना पहली शर्त है।लेकिन बहुत से पेरेंट्स गुरु और मास्टर को ऐसा समझते है कि इसका तो काम ही है,कोई एहसान नही कर रहा। ये सोच बच्चे में कृतज्ञता  की जगह कृतध्नता का भाव उपन्न करता है। जो सामाजिक ताने बाने और स्वयं के जीवन के लिए ठीक नही होता। 
अंत में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक दार्शनिक राष्ट्रपति थे। ये हम सब के लिए गौरव की बात है। उनके जन्मदिन को अध्यापक दिवस के रुप में मनाना ,अध्यापक के प्रति अगाध प्रेम और सम्मान का  परिचयक ही है। उनकी कुछ पुस्तक आज भी प्रचलित है ,जिनमे The World Treasure of Modern Religion, Idealistic view of Life , The Hindu view of life, Indian Philosophy ,East and West Religion & Religion and Society समेत बहुत सी पुस्तक आज भी पढ़ी और पढ़ाई जाती है। प्लेटो ने सही कहा था कि राजा दार्शनिक होना चाहिए। उनके राष्ट्रपति बनने पर महान आधुनिक दार्शनिक  ,गणितज्ञ बर्ट्रैंड रसल ने डॉ राधाकृष्णन के राष्ट्रपति बनने पर दर्शन शास्त्र का सम्मान बताया था। विडंबना है कि ये सब केवल 5 सितंबर को ही रस्मअदायगी हो जाती है।। दर्शन से परे जाता समाज केवल भटक सकता है,  विवेक से परे हो जाता है। जिसको आज अनुभव किया जा सकता है, इस बात से इनकार नही किया जा सकता है।

(रमेश मुमुक्षु )
अध्यक्ष, हिमाल 
सेक्टर 16 बी द्वारका 
नई दिल्ली 78
9810610400 
ramesh_mumukshu@yahoo.com
5.9.2020

Tuesday, 1 September 2020

भुला बिसरा फुटपाथ हूँ: डी डी ए मुझे भूल गई।

मैं भुला बिसरा फुटपाथ हूँ: डी डी ए मुझे भूल गई।
मैं भारत अपार्टमेंट सेक्टर 16 बी के साथ का ही अभागा फुटपाथ हूँ। मेरे जन्म के बाद से ही मुझे एक तरह से बिसरा दिया गया। मेरे बदन पर झाड़ झंकार पनपने लगे और इतने पनप गए कि मेरी पहचान ही लगभग मिट गई। मेरे शरीर के कितने हिस्से निकाल दिए गए ,आज तक उनको  भरा नही गया। एक दशक से ऊपर हो गया ,लेकिन विभाग ने मुझे भुला ही दिया । 
लेकिन अभी 2018 के सितंबर के महीने में मेरे शरीर की सफाई आरम्भ की । कोई परमार्थी वाले थे, ऑरेंज  रंग की यूनिफार्म पहले युवा आये और उन्होंने ऐसी सफाई की कि मेरा उद्धार हो गया। मेरे ऊपर लोग आने जाने लगे। मेरे बदन में जो गड्ढे थे ,अब वो उभर कर दिखने  लगें। मुझे उम्मीद थी कि वो डी डी ए ठीक कर देगी। लेकिन मैं तो अभिशिप्त हूँ, एक साल के लगभग मुझे परमार्थी वाले मेरे को प्रेम से साफ करते रहे। मुझे भी खुला खुला लग रहा था। आपस में बात करते हुए लोग बोला करते थे कि की परमार्थी को छोटा छोटा अंशदान दे दो ,जिससे सफाई होती रहे। 
मेरे बगल में ही पुलिस अपार्टमेंट का पार्क था। मुझ से भी झाड़ झाड़ झाँकड से पटा हुआ। उसको भी साफ किया गया। साफ होने के बाद खुश।होकर सभी बच्चे और परिवार आने लगे। परमार्थी न जाने कितने ट्रक भर कर लंबे समय से पड़े कचरे को उठा लिया था। मैं भी सोचता था कि ये सब क्यों हो रहा है? लेकिन कुछ भी मेरे बदन की काया पलट हो गई थी। 
मुझे याद है कि किस तरह सभी बच्चों और बड़ों ने मिलकर मेरे बगल की दीवारों पर पेटिंग भी की सभी ओर उजला हो गया था। लेकिन अभी फिर वो ही सब होता गया। फिर झाड़ झंखाड़ उग गए। फिर उस पर चलने वालों ने चलना बन्द कर दिया। फिर मुझे लगता है , लोग मुझे भूल जाएंगे। पुलिस अपार्टमेंट का पार्क फिर वीरान हो जाएगा। दीवार की पेंटिंग भी धूमिल हो गई है। डी डी ए फिर मुझे चिरस्थाई काल के लिए भूल गई है।  
फिर भरत अपार्टमेंट से पुलिस अपार्टमेंट सेक्टर 16 बी के फुटपाथ और पार्क वीरान हो चले है। एक कहावत याद आ गई।" *चार दिनों की चांदनी फिर अंधेरी रात*"
*नोट:* मुझे व्यक्तिगत तौर पर परमार्थी विशेषकर रवि जी के सफाई के मॉडल की बदहाली देख दुःख होता है। मुझे भी लगता था कि रवि जी और उनका सामाजिक संघटन,  परमार्थी,  द्वारका की काया पलट कर सकता था। लेकिन जनभागीदारी जितनी ,उपकेक्षित , थी, कम हुई। एक व्यक्ति ने तन ,मन धन   से अपना समय और उर्जा झोंक दी ,एक सपना लेकर की द्वारका को एक पहचान दिलवाने के लिए। मुझे भी ये मॉडल बहुत ही पसंद आया। मैं माननीय श्रीमती मृदुला सिन्हा जी को इस मॉडल की जानकारी दी ,तो उन्होंने गोआ सदन में बुलाकर परमार्थी को स्वच्छ्ता दूत मनोनीत कर लिया। लेकिन , लॉक डाउन से पहले ही डेढ़ साल तक जिन रास्तों को साफ रखा और खूबसूरत बना डाला  आज वो सब वापस अपनी बदहाली की  लौट चले है। ये सब देख मन उचाट तो हो ही जाता। 
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष हिमाल 
9810610400
28.8.2020

Saturday, 29 August 2020

श्री एंटो अल्फोन्स : सह्रदय डीसीपी

श्री एंटो अल्फोन्स : सह्रदय डीसीपी 
संत तिरुवल्लुवर के महान ग्रंथ तिरुक्कुरल के वचन : 
Quote 2 : इंसान भीतर से जितना मजबूत होगा उतना ही उसका कद ऊंचा होगा
Quote  21 : नम्रता और मीठे वचन ही मनुष्य के आभूषण होते हैं। शेष सब नाममात्र के भूषण हैं।
श्री एंटो अल्फोन्स जी पर ये दोनों वचन पूर्ण रूप से देखे जा सकते है। अक्सर देखा जाता है कि कुछ अधिकारी जनता के लिए  ठीक होते है और अपने विभाग के लिए उतने ठीक नही होते। हालांकि द्वारका को अभी तक अच्छे व्यवहार के ही डीसीपी मिले है। लेकिन एंटो जी जनता एवं अपने विभाग दोनों का ख्याल रखने वाले व्यक्ति है।सरल स्वभाव और हमेशा हंसता हुआ ,चेहरा उनकी सरलता को इंगित करता है। 
पिछले वर्ष मेरी इच्छा थी कि जन्माष्ठमी में भाग लेने वालों  बच्चों को उनके हाथों पुरस्कार दिलवाए जाएं , मैंने केवल एस एम एस ही किया। उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। ये उनकी सरलता और जनता के प्रति  उनका प्रेमल  स्वभाव ही है।
मैंने अभी करीब दो दिन पूर्व उनसे व्हाटसअप पर लिखा कि मैं आपके ऊपर एक छोटी सी स्टोरी लिखना चाह रहा हूँ ,एक छोटा सा प्रोफाइल भेज दीजियेगा। लेकिन उन्होंने तुरंत दो लाइन लिखकर भेजी की वो पुलिस के कल्याण और जनता की सेवा करते है। ये उनके व्यक्तित्व की सरलता ही थी। 
उनके  नेतृत्व और कार्यकाल में  पुलिस और पब्लिक  के बीच बहुत करीबी रिश्ता कायम हुआ। विभिन्न जनोपयोगी योजनाएं आरम्भ की जिससे जनता विशेषकर  बुजुर्ग स्त्री ,बच्चे लाभान्वित हुए। अपराध होने के बाद तुरंत गिरफ्तारी का सिलसिला द्वारका जिले की बड़ी उपलब्धि है,  मैं कह सकता हूँ।अभी 15 अगस्त 2020 को द्वारका जिला सामुदायिक प्रकोष्ठ में तैनात हेड कांस्टेबल श्री मनीष मधुकर को राष्ट्रपति ने कोरोना योद्धा का सम्मान दिया, ये श्री एंटो जी द्वारा अपने विभाग में ईमानदारी से काम करने वालों को प्रोत्साहन प्रदान का परिचायक ही है। उनके नेतृव में लॉक डाउन के दौरान द्वारका पुलिस का एक साथ पूरी तल्लीनता से जन सेवा एवं कानून लागू करवाने का अथक प्रयास प्रशंसनीय और द्वारका वासियों को गर्वान्वित करने का उपक्रम ही था। एक बात से उनकी सरलता एवं उनका लोगों के प्रति  प्रेम एक बात से दीख पड़ता है, श्री एंटो जी मेरे पॉकेट में मुझे कोरोना से बचने के लिए  दस्ताने देने के लिए आएं, ये उनकी सादगी और जनसरोकार की झलक ही है। किसी अधिकारी की उपलब्धियां बहुत हो सकती है, लेकिन जनता के साथ  व्यवहार एवं न्याय प्रदान करने का जाज्बा ही किसी अधिकारी को सबसे अलग कर देता है। इस रूप में श्री एंटो अल्फोन्स जी हमारी स्मृतियों में रहेंगे। उनके अच्छे और समृद्धिपूर्ण कैरियर एवं जीवन की कामना तो द्वारका के रेसिडेंट्स करेंगे ही। बेस्ट सुरक्षित सोसाइटी की स्क्रीइनिंग कमेटी के मेंबर होने के नाते उनके साथ काम करके उनके व्यक्तित्व में सरलता और समर्पण का भाव मैंने सर्वप्रथम अनुभव किया था। मेरा दावा है, श्री एंटो अल्फोन्स जी भी द्वारका वासियों को नही भूल सकेंगे । 
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष हिमाल 
सेक्टए 16 बी द्वारका
9810610400
29.8.2020

Friday, 21 August 2020

अजब कहानी शहरों के विकास की

अजब कहानी शहरों के विकास की
पहले पहले शहर धीमें धीमें बिना आहट बढ़ता है। खेत, खलियान, जलस्रोत, जोहड़, तालाब , झील  निगलता है, उनकी गाड़ी सरपट दौड़े कोशिश करता है। एक बार शहर सुंदर हो गया ,तो उसको पर्यावरण की याद आने लगती है । अपने आस पास सब ठीक रहे ,जगत भले विनाश की ओर जाए। वो मैप देखता है और वहीं जाता है,जहां पर सिक्स लेन और चार लेन की सड़क सरपट एसयूवी को ले जाये और किसी बड़े मोटल में रेस्ट कर के आगे सरपट हो जाये। मेरे घर के पास नही , इसको दूसरे के घर ले जाओ।मुझे नही चाहिए पुल ,कारखाना मेरे घर के बाजू में लेकिन चाहिए किसी ओर के घर के बाहर कुछ भी हो। जिसकी चलती है, वो रास्ते बदल देता है। एक फार्म हाउस के लिए सरकारी सड़क बदल जाती है। समग्रता से सोचना हम छोड़ चुके है। लेकिन हम केवल अपने लिए ही सोचते है। हज़ारों गंगोत्री के रास्ते देवदार कटे ,कोई अंतर नही, हमारी गाड़ी सरपट दौड़नी चाहिए। देवदार 100 साल में बढ़ता है। पिलखन नही है, जो दूसरे दशक में ही विशालकाय हो जाता है।  21 किलोमीटर लंबे मानेसर तक लंबाई और 6 किलोमीटर चौड़ाई वाले कंक्रीट और ऊंची मंजिलों से भरपूर द्वारका एक्सप्रेस वे उस दिन देखा तो मुझे लगा ,ये जिन के दीपक की तरह कहाँ से अवतरित हो गया। खेत खलियान और न जाने कितने जल स्रोत स्वाहा हो गए ,इस विकास की यात्रा में, ताज्जुब है, किसी की उफ तक नही आई। जिन्होंने वहां पर फ्लैट लिए वो कहते आ रहे है कि जल्दी ही कनेक्टिविटी हो जाएगी। खेती की सदियों से पुरखों द्वारा तैयार की गई ,जमीन कांक्रीट में तब्दील हो गई। 
ये सब महानगर की त्रासदी है, ये सच्चाई अथवा अनिवार्यतया ,ये कौन तय करेगा? कौन द्वारका आना चाहता था, मेट्रो बनी तो डीलर की भाषा में कनेक्टिविटी से रेट बढ़ गए। अब कहते है, द्वारका एक्सप्रेस वे की कनेक्टिविटी बनी तो फिर क्या है?  पानी का एक बहुत विशाल और न ख़त्म होने वाला स्रोत नजफगढ़ झील है और हो सकता था, लेकिन विकास और अदूरदर्शिता से वो भी संकट में है। विकास की बेतरतीव रफ्तार ने साहिबी/साबी नदी को रेवाड़ी के मसानी बैराज तक ही सीमित कर दिया। अभी नजफगढ़ झील में सारा पानी विश्वप्रसिद्ध गुरुग्राम के सीवर का पानी आकर इकट्ठा होता है। हालांकि अभी झील में रिचार्ज भी होने लगा है। लेकिन किसी को कुछ लेना देना नही। विदेशी पक्षी यहाँ पर बहुत बड़ी तादाद में आते रहे। ये प्राकृतिक अवसाद , नेचुरल डिप्रेशन है। ये खादर का इलाका है। वर्षा में जलभराव होता है और धीमे धीमे वो चेनल के द्वारा यमुना  नदी में जाता है, जिसको खोद कर गहरा और चौड़ा कर के नजफगढ़ नाला कहलाया है। जिसके अंदर वजीराबाद तक करीब 35 से ऊपर गंदे नाले गिरते है, जो यमुना नदी को दूषित करते है।  लेकिन हम सब भूल गए। हम को केवल 4 बी एच के ,पेंटहाउस, डुप्लेक्स जैसे शब्द ही याद रहे गए। पानी कहाँ से आयेगा, कोई परवाह नही। गुरुग्राम के लगभग सभी प्राकृतिक स्रोत खत्म हो चुके है। यमुना और गंगा के पानी पर निगाहें है। जबकि हिमालय के 285 ब्लॉक पानी की कमी को झेल रहे है। जब प्राकृतिक स्रोत पर संकट आता है ,तो नदी में पानी कैसे बढ सकेगा। लेकिन इतना कौन सोचे। अपना घर बचे दूसरा जाता है, तो हमें क्या लेना देना?
 कब आएगी ये आवाज की हमें नही चाहिए हिमालय में कोई और बड़ा बांध, नही चाहिए कोई बड़ी माइंस, नही चाहिए बड़े कारखाने और एयरपोर्ट ,नही फोड़ना है, पर्वत के सीने को, नही घेरना है, सागर तट, नही चाहिए मुझे , उच्च हिमालय पर पर्यटन और नही चाहिए मुझे सारे संसाधन मेरे घर पर। विकास हो प्राकृतिक संवर्धन के साथ और सतत विकास ही एक मात्र उद्देश्य हो।मेरा घर , मोहल्ला, शहर भी बचे और दूसरे की भी हम सोचे ,ये माइंड सेट होना है। समग्रता से चिंतन करना है।द्वारका के विकास का असर कहाँ पर होगा। हम पानी किस नदी से लेंगे, उस नदी के उदगम से सागर तक जाने के क्या हाल है? नदी के किनारों पर कब्जे तो नही, सागर के किनारों को हम घेर तो नही रहे।उच्च हिमालय को हम छेड़ तो नही रहे,जहां पर सिटी मारने से ही पत्थर भरभरा के गिरने लगते है। 
कही और विकास को  देख हम खुश होते है, लेकिन मेरे घर के पास कुछ हुआ तो मैं दुःखी हो उठता हूँ। ये होलिस्टिक सोच नही है। हम तो जड़ चेतन,सूक्ष्म अति सूक्ष्म की भी कामना करते है। समस्त पृथ्वी एवं ब्रह्मांड की चिंता और स्तुति करते है ,तो हम संकुचित क्यों सोचे? नागरिक और सरकार को इस संकुचित सोच से  उभरना है। किसी भी विकास परियोजना को जनता के सामने रखे और खुलके चर्चा हो ,तो प्रोटेस्ट की जरूरत ही न हो।  विकास के साथ प्राकृतिक स्रोत का संरक्षण ,संवर्धन पहली शर्त होनी चाहिए। कूड़े का निस्तारण कैसे होगा। दूषित जल का प्रबंध कैसे होगा। जल का अनुकूलतम एवं अधिकतम उपयोग कैसे होगा। ऐसी सोच के बिना समग्र एवं सतत ,सस्टेनेबल ,टिकाऊ विकास संभव ही नही है। अभी ई आई ए EIA 2020 ,  Environment Impact Assessment Rule 2020  ,जैसे का तैसा लागू हुआ तो शिकायत भी नही हो सकेगी, ये भी हम सब को सोचना ही होगा । एक बात याद रखें कि कोई भी परियोजना पुब्लिक इंटरेस्ट के नाम पर बनती है। जबकि पब्लिक ने तो नही बोला और न ही पब्लिक से पूछा। इसपर हम सब को आगे मिलकर काम करना है। मुझे पुल नही चाहिए, सड़क नही चाहिये , दूसरी ओर ले जाओ, मुझे बख्सों ,ये सोच अधूरी है। जहां ले जाओ, उसके बारें में भी सोचों की वहां पर क्या होगा? लेकिन मेरी बला से कहीं भी जाए। 
कोई  ही प्रोटेस्ट हो ,जो पर्यावरण के संरक्षण के लिए हो उसका स्वागत तो होना ही चाहिए ,लेकिन हमारा  दृष्टिकोण समग्र और सतत विकास की अवधारणा पर टिका हुआ हो। 
 सरकार ,ठेकेदार और विकास के पुरोधा इसी हमारी संकुचित सोच का लाभ उठाते है। हमें विभिन्न प्रकार के प्रलोभन दे दें है। जब तक हम छोटा सोचेंगे ,उतना ही हम को इग्नोर किया जाएगा। मेरे घर के पास नही, मेरे घर से दूर ले जाओ क्योंकि आखिर ये मेरा ही है, लेकिन मुझे शांति चाहिए, सफाई चाहिए और चाहिए कि ये सब विकास कहीं और करों ,मेरे घर पर नही, भले वहां के लोगों के साथ कुछ भी करों।
चले जाओ ,मुझे अपना पेड़  बचाना है,भले दूसरों के जंगल साफ हो जाए। बस मैं बचूं और मुझे सभी ओर सरपट दौड़ने वाली  सड़क चाहिए, पुल चाहिए और चाहिए  ऊंचे पर्वतों पर रहने के लिए आराम गाह । सरकार पहले सपना दिखाती है, सब सपने में मग्न हो जाते है।।जब तक सपना किसी और के विनाश का होता है, तो कोई एतराज नही लेकिन जब गाज अपने सिर पर गिरने लगती है तो बरबस सब कुछ याद आने लगता है । बस मैं ही बचूं, मेरा पेड़, मेरा गांव, मेरा शहर, मेरी शांति , ये सब चलता है। बस मैं ही बचूं।
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष, हिमाल 
20.8.2020

Thursday, 20 August 2020

वर्षा के आने पर कभी खुश होते थे ,अब होते दुःखी: विकास की यात्रा की एक बानगी देखें

वर्षा के आने पर कभी खुश होते थे ,अब होते दुःखी: विकास की यात्रा की एक बानगी देखें
करीब 70 के दशक में वर्षा आते है ,निकल पड़ते थे ,हम जैसे सभी बच्चे, न पैरों में चप्पल न जूते , जिसको आज पानी का भरना कहते है, उस जल भराव में बच्चे छपाक से कूद फांद करते थे, खुली बरसाती नालियां होती थी। हां,  एक बात है, उन नालियों में बह जाने का भय जरूर था।।कभी कभी उन तेज बहती बरसाती नालियों में चप्पल फेंक कर उसको दूसरी जगह पकड़ने का एक खेल बच्चों में प्रचलित था।। कागज की नौकाओं के बच्चे कारीगर ही होते थे। नाव बनाकर पानी में डाल कर जब वो हिचकोले खाती चलती थी,उसका अलग आनंद होता था।। घटों हम बच्चों का वाटर स्पोर्ट चलता था। मोती बाग ,नई दिल्ली 21  एन डी एम सी प्राइमरी स्कूल के सामने एक छोटा सा गोल चक्कर ,जिसे आज राउंड अबाउट कहते है, उसके ठीक सामने पानी इकठ्ठा हो कर बहता था।वर्षा हुई और सभी बच्चे ,निकल गए ,फटी पुरानी  निक्कर पहन , हाफ पैर और शार्ट का पुराना नाम, बस फिर क्या था ,कूद फांद, छपाक और चिल्लम चिल्ली , उठा पटक , हाथों से छपाक छपाक का आनंद कुछ और ही था। ये रोड पर ही होता था। बच्चों को मालूम था कि घर जा कर मां ने पिटाई करनी है। उस वक्त थप्पड़, चिकोटी, डंडे से पिटाई आम बात थी। घर वाले स्कूल के मास्टर को बोलते थे ,मास्टर जी अगर ये न  पढ़े तो  थींस देना , सूत देना , रुई की धुनाई जैसे बच्चे ठुकते थे, लेकिन किसे इसकी परवाह होती थी। 
मज़े की बात अब बचपन की याद आती है, वो सारे खुले नालों में केवल बरसात का पानी बहता था। उस समय पॉलिथीन भी नही था, उसको लोकल भाषा में मोमजामा कहते थे। वो मोड़ा बनाने में काम आता था, मोड़ा जो एक तरह का रेन कोट । अगर खुदा न खस्ता पिताजी का बेंत की डंडी वाला बड़ा छाता हाथ लग गया ,तो कितने ही छोटे मोटे हम एक साथ कंधें पर हाथ टिका कर  घूमते थे, उसका भी आनंद अलग था। हवा में वो छाते खुलकर उल्टे हो जाते थे, उस वक्त सांस अटक जाती थी। बाप की ठुकाई जो खानी पड़ती थी। बच्चों का एक और शौक था, नालियों के अगल बगल आम के पौधें उखाड़ कर उसकी उसकी घुठली निकाल कर ,थोडा घिसकर पी पी करते डोलते रहो। उसको  पप्पियाँ कहते थे। ये कुछ शब्द केवल चलन में होते थे। 
पानी में तेरते केंचुए पकड़ना भी एक खेल ही था।आज वर्मी कंपोस्ट की चर्चा करते है। इसके इलावा एक रेंगने वाला भूरा और सफेद धारी वाला जीव भी हमारे खेल का हिस्सा होता था। बरसात के बाद मिट्टी की ऊपर की चिकनी परत को हम बच्चे मलाई कहते थे। 
पैसा जेब में होता नही था। बरसात के मौसम में जामुन खाने के लिए कुछ पेड़ थे, मजाल है, नीचे कोई जामुन गिरे और वो बच्चों के हाथ से बच जाए, आजकल जामुन के पेड़ को इसलिए नही उगाते क्योंकि वो गंदगी करता है। फल के गिरने को गंदगी तक हमारा विकास आ गया है। पहले बच्चे पत्थर से जामुन गिराकर खाते थे। उस वक्त कार तो दूर ,स्कूटर भी एक आध के पास ही होता था। केवल सरकारी मकान के शीशे टूट जाते थे, जो लग जाते थे। आम का चूसना उस वक्त के हम बच्चें ही जानते थे, जब तक आम का आखिरी रेसा रहता था, चूसते रहते थे। हम  बच्चे कड़की के बादशाह होते थे। कितने ही पत्ते और उनकी कोंपले खाते थे। आम, जामुन, नीम, घास भी, एक खरपतवार होती थी, उसके हरे काले फल होते थे,वो बहुत प्रिय थे। इमली के पत्ते, एक घास में उगता था, वो भी खट्टा होता था, लपेट लेते थे। नीम की निबोलियाँ तो बहुत प्रिय थी। उसी दौरान चाणक्य सिनेमा घर के पास एक अंडर पास बना था,वो बरसात में  भर गया, एक डी टी सी की बस फंस गई,ये अजूबा था ,उस समय का। यमुना में बाढ़ खतरे के निशान से ऊपर बह रही है,ये आम खबर होती थी। 1978 में ढांसा बांध टूटने से सब और पानी भर गया ,सब कुछ डूब गया था। उस समय स्कूलों में शरणार्थी आये हुए थे। हमारे लिए वो दिन आनंद के दिन थे, क्योंकि छुट्टी होती थी। लेकिन अब पता चला कि वो साहिबी नदी का पानी था, जो नजफगढ़ झील बनाता था ,अब केवल सीवर का पानी ही रह गया। 
घरों में पकोड़े, फुलवड़ियाँ, पापड़ जैसी खाने की चीज़ें बनती थी। आलू के चिप्स उनपर लाल मिर्च की खुशबू और स्वाद से लिखते लिखते मुहँ में पानी आ गया। जुखाम हो जाये तो चांटा रसीद और तुलसी के पत्तों की चाय या काढ़ा मिलता था।ये समय आम के अचार का भी होता था, बच्चे अचार खाने के जुगाड़ खोजते रहते थे। उस  वक्त चीनी मिट्टी के बर्तन जिसको ,मर्तबान कहते थे, अचार डाला जाता था। घर पर ही बड़े बड़े मर्तबान में आचार डालता था। उस अचार की खुश्बू आज भी स्मृति में जीवित है।  बरसात में बच्चों के फोड़े और फुंसी आम बात थी। उनपर लाल और नीली दवा अक्सर बच्चों के लगी रहती थी। चौलाई, गोकुरु का साग बच्चे तोड़ते थे। 
बरसात में स्कूल की छुट्टी भी हो जाती थी। हमें याद है,पांचवी से छटी में गए तो ,उस वक्त स्कूल की नई बिल्डिंग का काम हो रहा था।  हम बच्चे पैरों में कीचड़ ला कर जूतों से फर्स पर लगा देते थे तो कितनी बार छुट्टी हो जाती थी। छोटे बच्चे कितने उस्ताद होते है, या अब सोच कर महसूस होता है।जिन दिनों बारिस की झड़ लगती थी, रात दिन हल्की ,तेज बारिश होती रहती थी। कई बार सात दिन तक झड़ लगती थी। उस समय का आनंद क्या होता था। हर घर में तोरी की बेल होती थी। उसके पीले फूल और उनपर मंडराते भवरें और एक लाल और काली धारी वाला कीट बच्चों का प्रिय होता था। उससे भी खेलते थे। 
रात को मेडक की टर्र टर्र आज भी याद है। उसको हम डडू बोलते थे, शायद पंजाबी शब्द होगा। बरसात का आना एक आनंद देता था। पानी का नालियों में बहना बच्चों के रोमांचकारी खेल होते थे। ये सब खेल प्राइमरी स्कूल तक के लिख रहा हूँ।कितने छोटे छोटे बच्चे घंटों पानी में खेलते थे।हमारा  वो ही वाटर स्पोर्ट ही होता था। किस्ती बनाना और चलाना हमारी नन्ही दुनियाँ के खेल थे। इंद्रधनुष का भी इंतजार होता था। टटीरिहि की टी टी टी टियूँ  सुनने का  इंतजार रहता था। मेडक की टर्र टर्र , मोर की आवाज, केंचुए का पानी में बहना, पानी का बहना ,उसकी किस्ती की रेस अब न जाने कितनी आगे निकल गई। बड़े शहर और महानगर गंदगी के साम्राज्य बन चले है। आज पानी का भराव डराता है, पानी में पैर टच न हो जाये। बरसात में नहाने तो कहीं दूर निकल गया। किस्ती  मोबाइल के खेल में तब्दील हो गई।लेकिन बच्चों में आज भी बरसात को देख उमंग होती है। नैसर्गिक उमंग , आज भी  उनका भी मन होता है। लेकिन बीमारी और गंदगी के कारण खेल नही पाते । पढ़ाई का बोझ भी कारण ही है। लेकिन बच्चों को बरसात में भीगना जरूरी है। छोड़ दो कुछ समय के लिए , उसके आनंद को मत रोको। अपनी नज़र के सामने ही रखो भले। खुद भी भीग लो और प्रकृति का आनंद खुद भी लो   और बच्चों को भी लेने दो। ये ही जीवन के मूल आनंद है। इनको जीवन से दूर मत करो , इनको अपने आगोस में समेट लो और डूब जाओ कुछ पलों के लिए ,ये आनंद से भर देगा , कुछ लम्हों को,  ये तय है।
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष ,हिमाल
9810610400
20.8.2020

Sunday, 16 August 2020

क्या मानव प्रकृति के सामने बौना है, क्षुद्र हैं और है , अशक्त ?

क्या मानव प्रकृति के सामने बौना है, क्षुद्र है और है , अशक्त ?
कोरोना तुम काल बनके आये 
किस मकसद से ये कौन जाने 
तितर  बितर कर दिया तूने आदमी का दम्भ और न झुकने का झूठा संसार 
भरी दुनियां में अपनों के चार कंधें भी नही मिल पा रहे है, विडंबना तो देखों सेवा से वंचित आदमी मृत्यु  शैय्या पर कितने अपनो से दूर जाता अनुभव करता होगा।  सब कुछ जो उसने अपने से बुनी दुनियां हथेली से फिसलती जा रही है। सब कुछ लॉक डाउन में तब्दील होता गया। कितना कुछ ठहर सा गया है। लेकिन आदमी के भीतर एक जिद है ,जो उसको आगे और पीछे ले जाती है। उसके बनाये सर्वनाश करने वाले सारे हथियार कितने लाचार है ,कोरोना के सामने ,जो अदृश्य सा सबको लील रहा है। एक बार पुनः प्रकृति से मानव का द्वंद आरम्भ हुआ है। एक बात तय हो गई कि मानव प्रकृति के सामने कितना बौना है, क्षुद्र और है , अशक्त । लेकिन क्या ये सच है कि केवल एक बात?
लेकिन वो इसमें भी उभर जाएगा और समझेगा की वो पुनः जीत गया। फिर उसकी यात्रा पूर्ववत आरम्भ होगी। फिर वो पर्यावरण को भूल जाएगा ,भूल जाएगा कि कोरोना के डर से वो दुबक गया था। फिर होगा ,पहले की तरह जीतने हराने का सिलसिला और भूल जाएगा ,की वो लॉक डाउन में दार्शनिक और चिंतक बन गया था।
उसने एक क्षण में नदियों, आकाश ,जल थल को स्वयं साफ होते हुए देखा और चमत्कृत हुआ था। वन्य प्राणियों को अपने प्राकृतिक  रास्तों से गुजरते हुए देखा था ,जो वो भूल चुका था। लेकिन जो दुनियां हम बुन चुके है, उसमें से कैसे निकले और जमीन के एक एक कतरे को कैसे प्रेम करें ? ये हम  भूल चुके है। जीतना ही हमें याद है। जीतने के लिए ये तय है ,किसी को हराना ही होगा। ये जीतने और हराने  के सिलसिले से ही धरती को हम भूल जाते है, कि हम उसके ऊपर निर्भर है और उस पर ही उल्टे लटके से लगते है ,अगर दूर आकाश से देखें तो। 
क्या लॉक डाउन आत्म मंथन था कि बस किसी वर्षा के दौरान  भीगने से बचने के लिए तनिक किसी पहाड़ से निकली चट्टान के नीचे खड़े हुए टाइम पास ? ये   तो सोचना ही होगा , ये तय है।
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष ,हिमाल 
9810610400
15.8.2020