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Friday, 11 December 2020

शीर्षक : कोई काला धन छुपाएगा

शीर्षक : कोई काला धन छुपाएगा -
कोई काला धन छुपाएगा 
कोई काला धन बनाएगा 
वो कहाँ जाएँ 
जिनके पास ना काला धन 
न सफ़ेद धन 
 उनके पास है 
प्रेम , आपसदारी 
तूफानों से जूझने का जज्बा  
और 
सत्य को स्थापित करने की जिद 
दोस्तों  के दोस्त  
अभाव और फाँकों 
के 
संगी साथी 
मतवाले 
अपनी धुन में चलने वाले 
न लेफ्ट के न राइट के 
 मात्र 
मानवता के 
निपट अकेले 
हमसफर 
प्रेम के प्यासे 
मानवता  के दोस्त 
कौन सा एटीएम उनके भीतर के 
 कोलाहल
को समझ पाएगा 
कौन सा पासवर्ड 
होगा 
जो दोस्तों पर न्योछावर कर देगा 
रंगीन नोट 
प्रेम से भरपूर 
हवा में होगा अर्थशास्त्र  
हवा तो हवा ही है 
किधर बह जाये 
मानव की 
संवेदना 
को भी 
सुना है 
क़ैद कर लिया जाएगा 
मशीनों में 
ताकि उनकी  बगावती
आवाज़ 
किसी पासवर्ड और पिन नंबर 
 से जूझती रहे 
निकलने को क़ैद 
से 
और खोजती रहे 
प्रेम
 और
 दबा दी गई 
 वो चिंगारी 
जो एक फूँक 
के लिए तरसेगी 
एक दिन 
क्रांति की ज्वाला 
भड़काने 
के लिए ....
रमेश मुमुक्षु
2016 नोट बंदी के दिनों कैफ़े द आर्ट मरीना आर्केड कनॉट प्लेस में एकल पेंटिंग प्रदर्शनी के दौरान ए टी एम की लंबी लाइनों के दौरान लिखी।

Saturday, 14 November 2020

दीवाली की रात अभी पुलिस बीट वालों के हूटर की हुआ हुआ अभी बजी बज रही थी।

दीवाली की रात अभी पुलिस  बीट वालों के हूटर की हुआ हुआ अभी बजी बज रही थी।
इस बार पूरा विश्व कोरोना के कारण अप्रत्याशित त्रासदी से जूझ रहा है। दिल्ली में वायु प्रदूषण और कोरोना के केस यकायक बढ़ने के कारण किसी भी प्रकार के पटाखे इस बार पूर्णतः वर्जित किये गए है।लेकिन अभी भी फाटक ,धाएँ धाएँ ,सुर्र सुनाई दे रहे है। पुलिस के हूटर आने पर क्षणिक रूक जाते है। बात ये नही कि पटाखे जलाना सही है,या गलत ,लेकिन जब दुनियां में कोरोना से बहुत बड़ी जनसंख्या ग्रसित है और ऐसा अध्ययन से मालूम चला है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण और उसके साथ पटाखे के धुएं से कोरोना पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। 
इस कारण सरकार और स्वास्थ्य विभाग की ओर से आह्वान किया गया कि किसी भी प्रकार के पटाखे न जलाए ताकि वायु प्रदूषण न बढ़ने पाए। 
लेकिन अभी मैं 9.15 रात में  घर पर ये लिखते हुए , पुलिस।का हूटर और पटाखे की आवाज सुन रहा हूँ हालांकि पिछले वर्षों से बहुत कम है। लेकिन हम लोग क्यों नही पूरी तरह ऐसी बातों को नही मानते है। 
सबके अपने अपने तर्क होते है। लेकिन अभी भी कितने लोग होंगे ,जिनको  स्वास संबंधी रोग होंगे। मैं खुद भी अस्थमा से पीड़ित हूँ, बचपन से , इसलिए इसका अहसास मुझे है। 80 के दशक में कितनी बार दीपावली के कारण दमें के अटेक भी हुए। लेकिन उस दौर में वायु प्रदूषण इतना अधिक नही था।हालंकि 1982  एशियाड के बाद चीज़े तेजी से बदलने लगी,जो आज भी जारी  है। कितने बार लगता है कि हम कानून, परम्परा, अध्यात्म सहित दुसरों की तकलीफ को भी कम ही महसूस करते है। बहुत से लोग ये कहते है कि क्यों न पटाखे जलाये। इसकी उसकी कहते है और जम के जलाते हुए ,गौरवान्वित अनुभव करते है। अच्छा हो कि देश के आह्वानों को सुने और देश हित और मानवता के हित में एक दूसरें की परवाह  करने की आदत डालें। अभी रात के 10.44  बज रहे है  लेकिन अभी धड़ाम धड़ाम की आवाज बीच बीच में आ रही है। कुछ देर पहले लड़ी की आवाज आ रही है। 
लॉक डाउन की तरह ये पाठखे बजाने वाले पुलिस के आते  ही चुप हो जाते है। कुछ कहते है,परम्परा है, कुछ कहेंगे कि बच्चों के लिए करना होता है। काश हम लोग कानून और इस तरह के आह्वान पूरी तरह मानना सीख ले तो देश के संविधान और कानून को मानने की आदत ही पड़ जाए। देखते है ,कब ये शुरू होगा। दीपावली की सभी को शुभकामना। 
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष ,हिमाल
 9810610400
14.11.2020 
11.12 PM

Monday, 2 November 2020

सब इंसेक्टर की गिरफ्तारी से आगे करना होगा मानसिकता में बदलाव

सब इंसेक्टर की गिरफ्तारी से आगे करना होगा मानसिकता में बदलाव
21अक्टूबर 2020  को मुझे सोशल मीडिया पर शिरीन का वीडियो मिला ,जिसमें अपनी आपबीती बहुत ही विस्तार और लगभग समझते हुए बताई और  समाज में कैसे महिलाओं के विरुद्ध छेड़छाड़ और महिलाओं की डिग्निटी पर प्रहार किया जाता है। इस वीडियो ने एक बहस ही छेड़ दी।  मैंने भी अपना फर्ज समझ  वीडियो सभी सोशल  मीडिया और  21 अक्टूबर तारीख शाम 6.44 मिनट पर डीसीपी श्री संतोष कुमार मीणा जी को पोस्ट किया और उन्होंने उसी शाम 6.47 मिनट पर कार्यवाही करने की बात लिखी। उसी दिन रेडियो द्वारका के विशाल जी ने भी डीसीपी को वीडियो भेजा और लिखा कि शायद इस बच्ची को पुलिस की मदद चाहिए। 21अक्टूबर  की रात 11.25 पर डीसीपी श्री संतोष मीणा जी ने कार्यवाही आरम्भ कर दी, है , और बच्ची से कांटेक्ट किया जा रहा है ,मैसेज प्रेषित किया ।  22 तारीख को द्वारका की प्रबुद्ध महिला डेलीगेशन ने डीसीपी एवं 23 अक्टूबर को डी एम श्री नवीन अग्रवाल से मुलाकात की। डी एम श्री नवीन अग्रवाल  ने एक विस्तृत पत्र लिखा। 23 नवंबर  8.20 सुबह  हमारा  द्वारका ग्रुप में श्री राजेन्द्र सिंह , भूतपूर्व एसीपी ने "हमारा द्वारका ग्रुप" में सूचित किया कि कार्यवाही शुरू हो गई है, 50 पुलिस कर्मी सीसीटीवी आदि देख रहे है। इससे पहले 17 नवंबर को दो बच्चियों की एफ आर आई की गई थी। द्वारका में  लोगों ने अपने अपने स्तर पर शिरीन के वीडियो के माध्यम से अपनी अपनी बात रखी। महिला ग्रुप जो 22 तारीख को डीसीपी से मिले और 23 तारीख को डी एम से मिले उनके मिलने से व्यापक  असर हुआ। लेकिन पुलिस ने डी एम के लेटर से पहले ही कार्यवाही आरम्भ कर दी थी।  द्वारका पुलिस जैसे अक्सर बहुत से केस जल्दी हल करती है। उसी तरह ये भी सुलझा लिया। भूतपूर्व एसीपी श्री राजेन्द्र सिंह जी जिन्होंने निर्भया केस, धौला कूआँ रैप केस, सुनंदा पुष्कर जैसे बड़े केस सुझाए। पिछले 3 वर्षों में द्वारका पुलिस में प्रहरी, महिला दस्ता, सीसीटीवी लगाने जैसे काम किये।  इसके लिए द्वारका पुलिस का धन्यवाद तो किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त दिल्ली पुलिस के  आयुक्त द्वारा सब इंस्पेक्टर को डिसमिस करने जैसे ठोस कदम के लिए भी धन्यवाद देना चाहिए। इसके अतिरिक्त ट्वीटर और अन्य सोशल मीडिया पर भी ये सब आने से इसको व्यापक आधार मिला।
  टाइम लाइन दिखाने का अर्थ ये नही की इस कारण ही कार्यवाही हुई । वीडियो को डीसीपी समेत सभी ग्रुप में डालने का आशय था कि इस पर कार्यवाही हो। 
शिरीन ने उस समस्या की ओर इशारा किया ,जिस पर समाज जिसने पुरूष और औरत भी शामिल है, आगे आने से कतराते है।  जब मालूम चला कि ये सब इंस्पेक्टर है ,इस केस ने बहुत सवाल उठा दिए। लेकिन दिल्ली के पुलिस आयुक्त ने सब इंस्पेक्टर को डिसमिस कर के एक मिसाल कायम की। 
ये चिंतन का विषय है कि एक व्यक्ति कई दिनों तक लड़कियों के साथ दुर्व्यहार करता रहा, बिना नंबर प्लेट के घूमता रहा। ये बहुत ही गंभीर बात है। ट्रैफिक पुलिस के लिए भी ये चैलेंज है। सम्भव है, पुलिस  क्राइम ब्रांच के कारण कुछ न कहती हो , इस पर व्यपाक कार्य करने की जरूरत है। ये भी चिंतन और सुधार का विषय है। 
लेकिन ऐसी घटना कम हो और इन पर चर्चा और कार्यवाही भी हो, ये जरूरी है। इसके लिए मैंने भी सभी ग्रुप में लिखा था कि एक द्वारका में महिला ग्रुप बनाना चाहिए जिसमें सभी सोसाइटी और पॉकेट की महिलाएं शामिल हो ,ताकि ऐसी बहुत सी घटनाएं सामने आने लगे। मुझे नही लगता ,जिस तरह शिरीन ने  इस  घटना को सविस्तार बताया , कोई बता पाता। एक बात तय है कि बहुत बार महिलाएं सामने नही आती , समाज में गतिरोध के कारण। परिवार की इज्जत और जो ऐसी बात बताए , उस पर भी प्रश्न उठा दिया जाता है, बजाए उसकी बात सुनने और कार्यवाही करने के। अगर शादीशुदा शिकायत कर दे ,तो और भी हतोत्साहित किया जाता है। ये इज्जत का मसला नही होता, बल्कि न्याय दिलवाने की बात होनी चाहिए। इन सब में बदलाव के लिए  सामाजिक तौर पर भी काफी प्रयास करने होंगे। किसी भी युवती, बच्ची और स्त्री को जबरन घूरना भी स्त्री के सम्मान को ठेस पहुंचाना होता है । छेड़छाड़ और उससे आगे तो गंभीर अपराध है। इसके लिए सतत और विस्तृत प्रयास करने पड़ेंगे।  इस घटना में तो सख्त कार्यवाही हो ही गई है। लेकिन पुलिस सुधार और निचले स्तर की पुलिस को  अधिक संवेदशनशील बनाना जरूरी है।  पुलिस के भीतर अक्सर पुलिस की संख्या बल  में  कमी की बात भी आती रहती है। जिसने ड्यूटी का समय तय न होना भी एक समस्या है।  पुलिस को पब्लिक के साथ अधिक मिलकर काम करने की जरूरत है। द्वारका पुलिस ने पोलिसिंग के माध्यम से इसकी शुरुवात तो की है। इस कारण द्वारका में नागरिक और पुलिस  के बीच काफी मेल जोल बड़ा है।ऐप डाउनलोड करना, सुरक्षा के लिए प्रहरी ताकि रात को पार्कों में गार्ड और पुलिस गश्त लगा सकें। इसे कार्य आरंभ किये है। जिनको और भी बढ़ाना होगा। लेकिन इन सभी स्कीम में द्वारका के निवासियों को बढ़चढ़ कर भाग लेना चाहिए, जबकि अभी भी संख्या कम है। ये लगातार ही करना ही होगा। 
  शिरीन ने हालांकि बाद में शिकायत की ,लेकिन  उन्होंने सुधार और व्यवहार पर भी जोर दिया, जिससे वो केवल शिकायत न होकर  सुझाव भी था। 
ये बात भी सही है कि एक आम स्त्री एक दम ऐसे कदम नही उठा सकती। इसी को मजबूत करना है। अधिकांश महिला सामने नही आती। सामाजिक तौर पर उनको ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित नही किया जाता। लेकिन पुरुष भी बहुत अधिक अपने अधिकारों और अपनी बात कहने से  कतराते है। ये सब बदलना ही होगा।31 को  महिला मार्च भी होना था ,शायद वो किन्ही कारणों से पुलिस ने रोका।  हालांकि होने देना चाहिए था।  लेकिन इस मार्च में और भी बेहतर होता कि इसने डीसीपी और डी एम भी शामिल होते और उनके साथ एक नई शुरुआत होती। मार्च का ट्रीटमेंट इस तरह से था कि व्यवस्था ने काम ही नही किया। महिलाओं को सुरक्षित स्पेस चाहिए। ये बात की ही शुरुवात प्रशासन के साथ एक सरल और दीर्घकालीन सोच के साथ आयोजित होती तो पुलिस और जिला प्रशासन के साथ एक लंबी रणनीति जनता के मध्य आरम्भ की जाती। इस केस में प्रशासन का रोल पोसिटिव ही रहा।  लेकिन ये कहीं छूट सा गया। किसी कानून और किसी ऐसी घटना जिसमें पुलिस और प्रशासन ने सुना ही न हो, वहां पर प्रोटेस्ट उचित है। हाथरस में एस पी और डी एम का रोल और इस घटना पर द्वारका पुलिस और  जिला प्रशासन के व्यवहार की तुलना नही हो सकती। किसी भी घटना ,जिसने कार्यवाही न हो ,उसके लिए बड़े स्तर पर मार्च और प्रोटेस्ट बहुत जरूरी है। लेकिन यहां पर 17 अक्टूबर से 25 अक्टूबर के बीच एफ आई आर दर्ज होने के बाद गिरफ्तारी और सख्त कार्यवाही हुई। इसलिए मार्च की शक्ल प्रशासन के साथ दीर्घकालीन रणनीति और  मानसिक बदलाव के साथ सतत कार्यक्रम की शुरुवात होती तो शायद इसका व्यापक असर होता। इस बारीक से अंतर को हम लोगों को हमेशा ही समझना होगा। लेकिन  मार्च और प्रोटेस्ट  से पूर्व और बाद में   सतत प्रयास और विभिन्न आयामों को एक साथ लेकर आगे बढ़ना होगा।  प्रोटेस्ट और मार्च भी जरूरी है ,लेकिन इनका अधिक लाभ जभी होगा ,तब रूटीन में सतत प्रयास चलते रहे। 
मैं द्वारका पुलिस और डी एम से अनुरोध है कि वो भी एक महिला ग्रुप बनाये ,जिसमें पुलिस और सेल्फ डिफेंस और कानून की जानकारी का कार्यक्रम चलता रहे। इस ग्रुप में जनता ही एडमिन हो ताकि महिलाएं अपनी बात खुल कर रख सकें। ये ग्रुप जो भी ग्रुप बने है , उनके साथ मिलकर भी काम करें।
ट्रैफिक पुलिस और द्वारका पुलिस भी अधिक चौकस होकर ,बिना नंबर, काले शीशे ,शराब पी कर हुड़दंग न मचाये पर कार्यवाही के साथ जागरूकता की शुरुवात करें ताकि  संवेदनशीलता को बढ़ाया जा सकें। 
मेरा स्त्री समेत सभी ग्रुप से अनुरोध है कि पुलिस और सभी विभागों के साथ मिलकर एक दीर्घकालीन और सतत कार्यक्रम के माध्यम से आगे बढ़े। 
अपराध से पहले ही इसको रोकना और आपराधिक प्रवत्तियों को बढ़ने न देना , बहुत जरूरी है।
इसके लिए स्त्री को ही  आगे आना होगा। 
ये मानसिकता बदलने का उपक्रम है, ये मार्च और प्रोटेस्ट मात्र से ही ठीक नही होगा। निर्भया आंदोलन इतने बड़े स्तर पर हुआ। लेकिन रूटीन में सतत काम न होने के कारण इसका असर और प्रभाव धीमे धीमे आता है। जितना अधिक नागरिक विभागों से संपर्क करके काम करेंगे ,उतना ही माहौल बदलेगा। बीच बीच में जागरूकता के कार्यक्रम मार्च होने चाहिए। पुलिस पब्लिक मीटिंग का दौर भी चलता रहे।
इसलिए मानसिकता को बदलना पूरी तरह से पूरी व्यवस्था में बदलाव होता है। 
आप लोगों को शायद ज्ञात  होगा कि भूतपूर्व एससीपी श्री राजेन्द्र सिंह जी ने एक विस्तृत पत्र द्वारका के डार्क स्पॉट को दूर करने के लिए लिखा था, जो पुलिस का काम नही है, लेकिन द्वारका के जागरूक नागरिक और  के साथ मिलकर ये पत्र लिखा गया। कुछ शुरुवात भी हुई थी। लेकिन ये काम धीमे धीमे ही चलते है। दिखते कम है। काम नही हुआ और काम कैसे हो इन दोनों बातों को एक साथ लेकर चलना जरूरी है।
मुझे उम्मीद है, द्वारका  इस ओर पहल करके एक आदर्श उप नगर बनाकर इस मानसिकता को बदलने का अथक प्रयास करेगा। शिरीन के साथ जो हुआ , आगे और न हो सकें। इसके लिए आगे ही बढ़ना ही  होगा।
ये मात्र प्रोटेस्ट , मार्च और बड़े इवेंट ही  बनकर न  रहे,रूटीन में भी चलता रहे, सतत और अनवरत। 
एक बात को नही भूलना है कि निर्भया के इतने व्यपाक आंदोलन के बावजूद हाथरस जैसी घटना अभी भी हो रही है। लेकिन दिल्ली पुलिस ने इस केस में ठोस कदम उठाया लेकिन  अभी सड़क, मोहल्ले, पॉकेट ,सोसाइटी  सभी स्त्री के लिए सुरक्षा और सहजता के साथ आगे बढ़ना है। 
सभी ग्रुप मिलकर इस मुहिम को जारी रहें। सम्भव है, मेरी इस पोस्ट में कोई उतेजना नही लगे क्योंकि मैंने समग्र दृष्टिकोण की बात कहने की कोशिश की है। जिस तरह हम सतत विकास में सतत प्रयास की बात करते है, उसी तरह हम मानसिकता बदलाव में सतत प्रयास करें। गतिरोध होने पर मार्च और प्रोटेस्ट का सहारा भी लेते रहें। सरकार शिकायत और सुझाव दोनों पर बराबर काम करें और आलोचना ,समालोचना भी सुनने को तैयार रहे ,तभी वास्तविक संवाद की स्थापना हो सकेगी। आशा है, द्वारका में हम इसकी शुरुआत कर सकेंगे। 
इस पर प्रतिक्रिया का मैं स्वागत करूंगा। 
विनीत 

(रमेश मुमुक्षु)
अध्यक्ष, हिमाल 
9810610400
2.11. 2020

Thursday, 29 October 2020

बहुत हुआ अब बहुत हुआ

बहुत हुआ अब बहुत हुआ
 
बहुत हुआ अब बहुत हुआ 
डर के रहना बहुत हुआ ।

अब न रुकेंगे अब न डरेंगे
बहुत हुआ अब बहुत हुआ ।।

खुद ही लड़ेंगे आगे बढ़ेंगे 
बहुत हुआ अब बहुत हुआ ।।।

बलात्कारियों रुक जाओ अब 
बहुत हुआ अब बहुत हुआ ।v

दया  नही अब न्याय चाहिए
बहुत हुआ अब बहुत हुआ V

कमजोर नही मजबूर नही हम
बहुत हुआ अब बहुत हुआ VI

अब न हम खामोश रहेंगे 
बहुत हुआ अब बहुत हुआ V।।

घूरती आंखेंअब  न सहेंगे 
बहुत हुआ अब बहुत हुआ V।।।

इज्जत का डर अब न सहेंगे 
बहुत हुआ अब बहुत हुआ ।X

अब एक नही सैलाव चलेगा 
बहुत हुआ अब बहुत हुआ X

रुदन नही हुंकार उठेगा
बहुत हुआ अब बहुत हुआ XI
डर के रहना बहुत हुआ 
रमेश मुमुक्षु 
सोशल एक्टिविस्ट 
9810610400 
29.10.2010

Monday, 26 October 2020

शिरीन के वीडियो से सेफ द्वारका तक..

शिरीन  के वीडियो से सेफ द्वारका तक...
(छेड़छाड़ करने वाला पुलिस का सब इंस्पेक्टर निकला)
17 अक्टूबर 2020 की घटना की वीडियो शिरीन ने बनाकर सोशल मीडिया में पोस्ट करने से यकायक इस बात पर सभी लोग सक्रिय हो गए। ऊपर से देखने पर ये एक छेड़छाड़ की घटना थी ,जिस पर हम लोग बहुत ध्यान नही देते। लेकिन ऐसे कोई कैसे किसी भी स्त्री की डिग्निटी को चैलेंज कर सकता है। द्वारका जैसे उपनगर में जहां पर इतनी जागरूक जनता है। लेकिन यहां पर भी सड़क पर बहुत बार  काले शीशे वाले व्हीकल, तेज फर्राटा से चलते बिना हेलमेट के बाइकर्स दिखाई पड़ते है। ये इतनी तेजी से चलते है कि हादसा हो जाये।
वैसे भी बड़ी गाड़ी वालों को पुलिस का डर नही रहता। उनको बहुत बार रोका भी नही जाता। ये सामाजिक दायरे और कानून दोनों को इग्नोर करते है। जब कोई बिना हेलमेट और कानून तोड़ कर आता जाता है। वो कानून सम्मान नही करता और दूसरी ओर समाज का लिहाज नही करता। 
लड़को को भी बचपन से लड़कियों के साथ कैसा व्यवहार करें और क्या न करें सहजता से समझाना जरूरी है। बहुत सी बातें उम्र के साथ जुड़ी होती है। उनको एक चैनेल  प्रदान करना होगा। बच्चों की एनर्जी का सही उपयोग और रूटीन में उनको सही दिशा में लगाना होगा। घर वालों को बच्चों के रूटीन को सहजता से चेक करना ही होगा। सहज व्यवहार और आपराधिक वृति को भी रेखांकित करना होगा। अभी द्वारका समेत बहुत जगहों पर लॉक डाउन के दिनों में साईकल ग्रुप प्रतिदिन साइकिलिंग  करते पाएं गए। प्रतिदिन घंटों उन्होंने साईकल और विभिन्न खेलों के माध्यम से अपनी ऊर्जा उपयोग पॉजिटिव तरीके से लगाया। 
जब तक समाज में देख लेंगे, चलता है, कोई नही ले देकर काम कर लेंगे, क्या हो गया, लड़के तो ऐसा करते ही है, लड़कियों को वहां से नही जाना चाहिए ,जहां पर उनके साथ छेड़छाड़ हो सकती है, इग्नोर कर लिया करो। ये  चलता दृष्टिकोण कानून और सामाजिक फ्रेमवर्क को डिस्टर्ब करता रहता है। 
शिरीन के वीडियो ने इस सबसे इग्नोर मामले को समाज के सामने एक दम ला दिया। जहां पर रेप के जघन्य अपराध भी दरकिनार कर दिए जाते है, लेकिन इस घटना ने एक आम समझने वाली आदत जिसको हम इग्नोर कर देते है, पर सबको सोचने पर सक्रिय कर दिया। 
महिलायों के डेलीगेशन ने डीसीपी और डी एम के सामने इस घटना की शिकायत के साथ विभिन्न मुद्दों पर ध्यान खींचा। डी एम ने बहुत ही विस्तृत लेटर भी लिखा ,जिसनें विभिन्न विभागों को निर्देश दिए। उसके बाद पुलिस ने भी सक्रियता दिखाई और सफलता पाई।  एफ आई आर के बाद केस का अपना एक तौर तरीका होता है, वो आगे चलेगा।
लेकिन द्वारका में महिलाओं ने इस पर तेजी से आगे बढ़कर सक्रियता दिखाई और तुरंत 23 अक्टूबर 2020 को रात 10 बजे ज़ूम मीटिंग के माध्यम से द्वारका का एक ग्रुप भी तैयार कर लिया ,जिसमें 35 महिलाओं ने भाग लिया।ये बड़ा और ठोस कदम है। 
महिलाओं का एक साथ आगे आना ,ये दर्शाता है कि ये सबसे इग्नोर की जाने वाली घटना को अब नियंत्रित करना होगा। इस समस्या का समाधान अब महिलाएं खुद ही खोजेंगी। 
हम सब को इस दिशा में गंभीरता से सोचना ही होगा। 
अब उम्मीद की जा सकती है कि द्वारका में बिना हेलमेट, तीन सवार ,बिना मास्क, काले शीशे वाली गाड़ी  में चलने वाले सावधान हो जाएंगे,गाड़ी में शराब पीने वाले सावधान  हो जाने चाहिए। 
सरकार से आह्वान है, सीसीटीवी का जाल बिछना चाहिए ताकि अपराधी पकड़ा जा सकें।
अगर ऐसी छेड़छाड़ वाली घटनाओं पर शिकंजा कसा जाएगा तो जघन्य अपराधों को भी रोका जा सकता है। महिलाओं की ये पहल परिवर्तन की ओर एक ठोस कदम सिद्ध होगा,ये तय है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
26.10.2020

Saturday, 24 October 2020

श्री राजेन्द्र सिंह ,एसीपी को समर्पित कुछ पंक्तियां

श्री राजेन्द्र सिंह ,एसीपी को समर्पित कुछ पंक्तियां 
💐सहज उपलब्ध सरल भावयुक्त 
चेहरे पर भीतर तक देख सकने वाली 
अचूक आंखें 
जो दोस्त को देख मुकरा देती है,
लेकिन अपराधी को अंधरे में खोज लेने वाला पैनापन घेर लेता है 
यकायक पलक झपकतें ही 
इससे पहले कोई पलक झपके
अपने पाश में जकड़ने की ताकत और जोश
 जो हमेशा होशयुक्त ही रहा।
निर्भया को न्याय दिलाने को आतुर 
उसके दर्द को महसूस कर 
दरिंदों को अंजाम तक पहुचाने का जज्बा देखते ही बनता है
जिसकी आंखें किसी को भेदने को हो आतुर 
 फर्ज के लिए तल्लीन व्यक्तित्व हमेशा अपना सा ही लगता है
यूं नही कोई सबका अपना 
बन सकता है
कर्तव्य अधिकार समर्पण ही किसी को अपनेपन तक ले आता है
ताकत का डर
 किसी को भयातुर कर सकता है
लेकिन ताकत का सदुयोग डर को दूर भगाकर भयमुक्त वातावरण बना सकें 
इसको ही  ताकत और अनुसाशन का होना कहा जा सकता है।
ये ही अहसास तुमको दोस्तों का दोस्त और अपराधी का कहर बना देता है
कानून के दायरे में
एक बात कहूँ धीमें से 
मेरा दावा है, तुमको दुश्मन भी भूल नही सकता
क्योंकि वो जानता है उसको ईमानदारी से पकड़ा गया था
ये ही अहसास आदमी को अपना बना देता है ,
वरना पैरों से कुचलने वाले निपट अकेले ही गुम हो गए भवसागर में अनगिनत चेहरे और उनपर टिकी आंखें कहां  रहती है याद 
लेकिन तुम्हारी चौकस आंखों 
को भूल जाना कहा होगा संभव 
ये तय है......💐
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष ,हिमाल
9810610400
27.5.2020/24.10.2020 

Saturday, 5 September 2020

अध्यापक दिवस : सर्वपल्ली राधा कृष्णन के जन्म दिन की याद में।

अध्यापक दिवस : सर्वपल्ली राधा कृष्णन के जन्म दिन की याद में।
जीवन में चाहे कोई कितना बड़ा हो जाये और चाहे कितना आगे निकल जाए ,लेकिन कोई न कोई अध्यापक जरूर  याद होता होगा, जिनसे परोक्ष या अपरोक्ष रुप कोई एक बात ने व्यक्तित्व में कुछ जोड़ा होगा। हम जैसे बच्चे जो इसलिए स्कूल जाते थे क्योंकि घर वाले रास्ता लगा देते थे। बस्ता उठाये चल दिये बिना मन स्कूल में केवल गप्प और आपस में बहस । इतना जरूर है कि टीचर अभी भी पूरी तरह आंखों के सामने रहते है।  उस वक्त तो सबका नामकरण करते थे। आज कभी मिलते है तो उनको दूसरी नज़र से देखते है। प्राइमरी स्कूल के हेड मास्टर की दो बातें मुझे आज भी याद है।।उनकी शक्ल और नाम बिल्कुल भी याद नही। वो एक गाना बच्चों को सुनाते थे, जो मुझे हमेशा याद रहा। मन्ना डे का गाना"  खुदगर्ज़ दुनिया में ये इंसान की पहचान है 
जो पराई आग में जल जाए ,वो इंसान है"
अपने लिये जिये तो क्या जिये , 
तू जी ऐ दिल जमाने के लिए" ये गाना शायद ये पहली कक्षा में सुना था ,वो अभी भी आंखों के सामने तैरता है। जीवन उसी के रास्ते आज भी चल रहा है, दुनियां के हिसाब से बिल्कुल नाकामयाब। उसी हेड मास्टर की एक बात भी मुझे याद है। उन्होंने एक बार बाल सभा , जो सरकारी स्कूल में पढ़े होंगे, उन्हें ये अचानक याद आ जायेगा , में बच्चों को एक किस्सा बताया कि जापान के प्राइम मिनिस्टर ने हमारे प्रधामंत्री  स्व. नेहरू को बताया कि आप मानव अपशिष्ठ को व्यर्थ करते है ,जबकि जापान तो बिजली और खाद भी बनाता है। आजतक हमारी वो ही स्थिति है। ये दो बातें आजतक याद है। बाकी खेलना कूदना और सरकारी एन डी एम सी का स्कूल था , तो दलिया, बिस्किट , मीठी ब्रेड का इंतजार सबसे अधिक रहता था। अभी लिखते हुए,वो स्वाद रसना ने ले लिया। नाकामयाबी का एक बड़ा फायदा रहता है क्योंकि उनको पुरानी चीज़े हमेशा याद रहती है। संभव है, नाकामयाबी का भी ये ही कारण हो। लेकिन मेरा दावा है, इसको पढ़ कर सब बचपन में स्कूल के समय पहुँच जाएंगे। हम जैसों को पढ़ाई के अतिरिक्त सब कुछ याद है। पढ़ाई इसलिए नहीं क्योंकि पढ़ता कौन चाहता  था। पढ़ना उतना ही ताकि आगे खिसक जाए। लेकिन जो बच्चें प्रथम आते थे, वो हम जैसों से डरते जरूर थे। कोर्स की दुनियां से परे हम बादशाह हुआ करते थे। जिन जानकारी को बच्चों को दूर रखा जाता था ,हमें वो ही प्रिय थी। पांचवी कक्षा तक हम लोग धर्म, सच झूट और न जाने कितनी बहसों में लगे रहते थे। बहस और गप्प में हम लोगों को महारत हासिल थी। खेलना, बेर तोड़ना, अमरूद,जामुन पर हाथ साफ करना, आम पापड़, टाटरी , बर्फ का गोला, गटारे , अमर्क , बेर, पकड़म पकड़ाई, पिट्ठू, लट्टू, गुल्ली डंडा, कंचे , चोर सिपाई, दोस्तों के कंधे पर हाथ टिकाये, निक्कर को ऊपर खींचते हए , सभी अपने अपने पिताजी के आने और उनके आफिस जाने तक शरीफ और आज्ञाकारी बने रहते थे। बात बात पर चांटा रसीद हो जाता था। रात को भूत प्रेत की कहानी सुनना और डर डर के घर भागना। ये कुल जीवन चर्या थी। 
मुझे खुद का तो बहुत याद नही की किसी टीचर ने जीवन बदल डाला ,लेकिन दोस्तों के जीवन में बदलाव याद है। 
सीनियर सेकेंडरी स्कूल जैसे प्रिंसिपल शायद कोई दूसरा भी होगा। उनका नाम स्व. अयोध्या दास था। उनका अनुशासन डेडिकेशन और एक एक बच्चे पर नज़र रखना गज़ब का था। अभी 5 वर्ष पूर्व ही उनका देहांत हुआ। एक एक टीचर आंखों के सामने आते जा रहे है। एक एक टीचर की कुछ बातें, उनका तरीका, किसी दिन किसी बात ने जरूर कुछ हरकत की होगी। जब सब को जोड़ लगाते है तो बहुत कुछ निकल कर आता है। जो बच्चे गंभीर और पढ़ाई को ध्यान से करते है, उनको बहुत कुछ याद होगा ,शायद ,हम जैसे बच्चे जो हमेशा बिना छुट्टी स्कूल गए ,कभी  फुटके भी नही ,लेकिन ताज्जुब है,कभी दिल नही लगा पढ़ाई में। लेकिन किताबों की दुनियां सर्दी की ठंड, गर्मी की लूं का लुफ्त, बरसात में नहाने का आनंद , तितली, चिड़िया पेड़ पौधे ही साथी थे। एक मित्र है ,मेरा राकेश गुप्ता वो तीन घंटे तक फ़िल्म की स्टोरी सुनाया करता था। स्टोरी में टेन टेना तक याद होता था।  लेकिन ये सब खूबी बच्चो की आज तक रेखांकित नही की जातीं। हम जैसे बच्चे जो बैठेते स्कूल में थे,लेकिन उनका फ़ोकस कहीं बाहर रहता था। ऐसे बच्चों के लिए,  उनकी जिज्ञासा के लिए आज भी कोई स्थान नही है। बच्चे के भीतर  मौजूद वास्तविक बच्चे को निकालना ही शिक्षा और शिक्षक का सबसे बड़ा रोल होता है। शिक्षा प्रणली में  इस बात को शामिल करना सबसे पहली शर्त होगी। आप में बहुत से लोगों ने तोतो चान पुस्तक जिसके लेखक तेत्सुकों कुरोयानागी पढ़ी होगी। रेल के डिब्बे में स्कूल और तोतो चान का लंबा इंटरव्यू प्रिंसिपल के साथ । इसके अतिरिक्त पहला अध्यापक , चिंगीज एत्मातोव का लघु उपन्यास के अध्यापक का जुनून और बच्चों के प्रति अध्यापक का अगाध प्रेम और जज्बे की कहानी है। स्टेपी के क़ुरकेव गांव के टीले पर दो पॉप्लर के पेड़ों का बढ़ना और स्कूल की पहली बच्ची का   वैज्ञानिक  बनने की कथा भूलना कठिन है। हमारे देश में तो एक लंबी परम्परा है,गुरु शिष्य परम्परा की। आचार्य चाणक्य, द्रोणाचार्य समेत लंबी लिस्ट है। लेकिन मैं आचार्य चाणक्य को सबसे आगे रखता हूँ क्योंकि उन्होंने एक साधारण बालक में भारत का सम्राट खोज लिया ही नही लिया बल्कि बना ही डाला। जबकि द्रोणाचार्य  एकलव्य को शिष्य न बनाकर बड़े अवसर से चूक गए। गुरु मजबूर हो तो वो महान गुरु नही हो सकता। लेकिन अर्जुन ने उनको ऊंचा स्थान प्रदान किया। राजवंश  के बच्चों को कुछ बनाना कोई बड़ी उपलब्धि नही मानी जा सकती है। फिर भी गुरु के रूप में उनका ऊंचा स्थान रहेगा ही। आधुनिक समय में परमहंस रामकृष्ण और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद का अद्भुत योग था।  बच्चे के भीतर कला, संगीत, बहस, तर्क,गणित, भाषा, उच्चारण , चिंतन, खेल प्रतिभा, दार्शनिक चेतना, समाज सेवा ,कृषि के प्रति रुचि, अन्वेषण के गुण , शारीरिक लोच और ताकत न जाने कितने गुण विद्यमान होते है। उनको ही सहज रूप से पहचानना और निकाल कर परिष्कृत करना ही गुरु और अध्यापक का भी विशेष गुण होता है। अध्यापक और गुरु, वो ही श्रेष्ठ होता है, जो स्वयं का भी परिष्कार करता रहे और समयानुकूल चीज़ों को  अपनाता रहे। गुरु चूंकि अंधकार से शिष्य को प्रकाश की ओर ले जाता है,इसलिए गुरु का स्वयं का प्रकाशमान होना पहली शर्त है।लेकिन बहुत से पेरेंट्स गुरु और मास्टर को ऐसा समझते है कि इसका तो काम ही है,कोई एहसान नही कर रहा। ये सोच बच्चे में कृतज्ञता  की जगह कृतध्नता का भाव उपन्न करता है। जो सामाजिक ताने बाने और स्वयं के जीवन के लिए ठीक नही होता। 
अंत में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक दार्शनिक राष्ट्रपति थे। ये हम सब के लिए गौरव की बात है। उनके जन्मदिन को अध्यापक दिवस के रुप में मनाना ,अध्यापक के प्रति अगाध प्रेम और सम्मान का  परिचयक ही है। उनकी कुछ पुस्तक आज भी प्रचलित है ,जिनमे The World Treasure of Modern Religion, Idealistic view of Life , The Hindu view of life, Indian Philosophy ,East and West Religion & Religion and Society समेत बहुत सी पुस्तक आज भी पढ़ी और पढ़ाई जाती है। प्लेटो ने सही कहा था कि राजा दार्शनिक होना चाहिए। उनके राष्ट्रपति बनने पर महान आधुनिक दार्शनिक  ,गणितज्ञ बर्ट्रैंड रसल ने डॉ राधाकृष्णन के राष्ट्रपति बनने पर दर्शन शास्त्र का सम्मान बताया था। विडंबना है कि ये सब केवल 5 सितंबर को ही रस्मअदायगी हो जाती है।। दर्शन से परे जाता समाज केवल भटक सकता है,  विवेक से परे हो जाता है। जिसको आज अनुभव किया जा सकता है, इस बात से इनकार नही किया जा सकता है।

(रमेश मुमुक्षु )
अध्यक्ष, हिमाल 
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5.9.2020