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Saturday, 14 October 2017

मानव में हिंसक प्रवृति :एक विचार

(मानव में हिंसक प्रवृति  : एक विचार)
मानव का प्रार्दुभाव कहते है ,वानर से हुआ फिर धीरे धीरे इसका उद्विकास हुआ। कुछ लोग इस थ्योरी को नही मानते। लेकिन अगर मानव का विकास वानर या पशु अवस्था से हुआ है तो उसके भीतर हिंसक प्रवृति  का पाया जाना स्वाभाविक होगा । लेकिन अगर उसका उद्विकास नही हुआ और वो सीधे ही धरती पर आगया तो उसके भीतर हिंसक प्रवृति का होना चिंतनीय है। खैर ,उसके प्रादुर्भाव की चर्चा से मैं दूर हटता हूँ।
कभी दो जानवर जब लड़ते है , जब दो पक्षी भी लड़ते है । यहां मैं छोटे पक्षी , बिल्ली या छोटे नस्ल के कुत्तों  की बात कर रहा हूँ क्योंकि वो हमारे आसपास रहते है। जो लोग मुर्गी पालते है ,उन्होंने भी देखा होगा। लड़ते समय वो एक दूसरे को खत्म करने तक में तुले होते है।
अब सभ्य कहे जाने वाले व्यक्ति स्त्री और पुरुष को कभी लड़ते देखों। मानव का तुरंत रिएक्शन देखों ,जब वो गुस्से में होता है तो ऐसा कुछ कितनी बार खोजता है ,जिससे वो अपने विरोधी को मार ही देगा। ये मैं उन लोगो की बात कर रहा हूँ ,जो कई बार या कभी कभार ऐसा करते होंगे और जिन्होंने ऐसा कम ही  किया होगा। बहुत सभ्य मानव विचारों के मतभेद  में संदर्भ में ऐसा कर देते है। धर्म जो प्रेम सिखाता है ,विरोधी विचार से किसी बात में बहस हो जाये तो फिर क्या कहने। इतिहास गवाह है , स्त्री ,पुरुष,संपत्ति , जमीन, धर्म, भाषा आदि कितने ही कारण है जिनके लिए मानव अपने विरोधी को मार ही देना चाहता है। उसके भीतर का हिंसक तत्व उभर आता ही है। छीन लेने का उसका स्वभाव उसको और भी हिंसक बना देता है। अगर हम इन बातों पर चिंतन करें तो हम कह सकते है कि मानव में हिंसक तत्व पशुओं जैसे ही है। लेकिन मानव ने कालांतर के अपने उद्विकास में बहुत कुछ सीख लिया है। ये सीखने की यात्रा जारी है। एक उद्धरण लिया जा सकता है। जब कोई मानव गुस्से में किसी को मारने के लिए कुछ खोजता है, उस समय उसके आस पास खड़े लोग ऐसा करने से दोनों को रोकते है। ये मानव ने सीखा है। इसको उद्विकास कह सकते है। गुस्से पर काबू पाना भी उसने सीखा है। चलो अब इसकी पड़ताल मानव के बालकपन से करते है।
मानव के स्वभाव में जिन चीजों को नेगेटिव माना जाता है, गुस्सा, लालच, हिंसकपन, ईर्ष्या, घमंड ,अपने वश में करने की आदत आदि । ऐसा कहा जाता है ये सब बुरी आदत है ,ये बच्चा और मानव जल्दी सीखता है। लेकिन छोटे बच्चे जो बहुत ही सभ्य समाज और परिवार में होते है। उनको थोड़ा फोकस करके देखों ,उनके भीतर ये सब स्वाभाविक तौर पर व्याप्त होते है। लेकिन मानव ने इनसे बचने के ही सारे उपाए सृजित किये है। इसी कारण उसको पूरे जीवन भर ये सब सिखाना पड़ता है ,या वो इनसे बचने की चर्चा करता रहता है। मज़े की बात है कि ऐसे  लोग भी इसमे लिप्त हो जाते है, जो जीवन भर इससे बचने के उपाय दुनिया को बताते रहे।
लेकिन मानव का स्वभाव आखिर कैसा होना चाहिए । दुनिया के सभी ग्रंथो और चिंतन में मानव को स्थिर होने की बात कही है। किसी भी स्थिति में स्थिर रहे। इसको विस्तार से लिखना शुरू करूं तो बहुत कुछ है। लोग जानते ही है। लेकिन सरल शब्दों में कहें तो किसी भी परिस्थिति,घटना, क्लेश, दुःख ,सुख और वीभत्स से वीभत्स घटना में भी स्थिर रहने का प्रयास धर्म का मर्म है। जिनके कारण धर्म का उदय हुआ या जिन्होंने धर्म में अपना अतुलनीय योगदान दिया। उनकी सभी  कथाओं का सत्व और मर्म केवल मानव को स्थिर होना ही सिखाया और निर्देशित किया गया है। जो मनुष्य स्थिर होगा। वो किसी भी बात को सुन कर तुरंत प्रतिक्रिया नही करेगा। जो मनुष्य चिंतनशील होगा तो वो बात को सुन,देख कर तनिक सोचेगा। ये तनिक सोचना ही उसमे ज्ञान और उसके भीतर न जाने कितनी बातों का खजाना होना दर्शाता है। ये तब संभव है ,जब मानव समग्रता से चीज़ो को समझने का प्रयास करता है। उसको एकाकी और अपने जैसा बनाने का इतिहास उसके प्रादुर्भाव से जुड़ा है। अभी भी मानव समाज में एक धर्म, सम्प्रदाय, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर एकाकी बनाने की पुरातन प्रक्रिया जारी है। लेकिन मानव ने सहअस्तित्व के  मर्म को भी सीख लिया है और वो सीखने की और है। मानव ने भेदपूर्ण, समाज जो एक जैसे लोगों का हो सृजित करने की  कोशिश की और उसकी तमाम कोशिश के बावजूद भी उसमे सबको सुनने का स्वभाव समाप्त नही हुआ। जो उसमे विवेक से प्राप्त होता है। मानव के भीतर सबसे ससक्त और उसको सबके साथ जोड़ने और स्वयं को जानने का सूत्र विवेक ही है। इसलिए मानव ने प्रेम और साथ रहने की आदत को पनपाने में विवेक को ससक्त बनाने और विवेकशील होने पर इस कारण जोर दिया है। जब मानव विवेकशील होगा तो वो स्थिर होने लगता है। मानव में कुछ लोग विवेकी स्वभाव के भी होते है। लेकिन अगर नही तो उसको परिमार्जित किया जा सकता है। सम्पूर्ण प्रकृति वैविध्यपूर्ण है। अगर ऐसा है ,तो मानव स्वभाव में एकाकी होना सहज और सत्य नही हो सकता। लेकिन मानव ने अभी तक भी एक समान मनुष्यों के साथ रहना सीखा है। लेकिन अब उसका एक साथ रहना केवल आत्म सुरक्षा की दृष्टि से ही नही बल्कि सहज और समरसता के कारण भी । लेकिन इससे स्थिरता मानव में पूरी तरह नही आती । उसके लिए उसके भीतर विवेक का प्रस्फुटन और उसका सहज विकास ही एक मात्र उपाए हो सकता है। मानव की ये अंतर्यात्रा जारी है। विवेक को कुंद करने और उसके स्थिर स्वभाव को निष्क्रिय करने के प्रयास भी साथ साथ जारी है। ताकि किसी समूह के वर्चस्व को स्थापित किया जा सकें।  लेकिन मानव अस्तित्व के लिए विवेक का विकास और स्थिर होने की यात्रा ही एक मात्र है , उसके चिरस्थाई होने का और समस्त प्रकृति को भी अक्षुण्ण  रखने का क्योंकि मानव ने स्वयं का संहार और सम्पूर्ण प्रकृति के अस्तित्व को मिटाने के तरीके विकसित कर लिए है। केवल विवेक के अस्तित्व से ही ये सब संरक्षित और सुरक्षित है। इसलिए विवेक का विस्तार ताकि स्थिर होने का स्वभाव पनप सके की और जाना ही होगा। इस बात को पूरी तरह समझ लेना ही होगा।

विनीत
रमेश मुमुक्षु

Thursday, 12 October 2017

भक्त होने का अर्थ

(भक्त होने का अर्थ)
राम रहीम ,आशा बापू, निर्मल बाबा और धार्मिक अथवा सांस्कृतिक संगठनों के भक्तो का होना सोचने जैसा है। भारत में करीब सभी किसी के भक्त है। अधिकांश लोग सत्संग वो संगठनों में सफाई करते नज़र आते है।
लेकिन उसके बावजूद भी सफाई का आलम हमारे सामने है। एक भक्त होता है ,जो विचार से भक्त बना होता है। एक भक्त होता है ,जिसे बनाया जाता है। बनाया जाने वाला भक्त रिमोट कंट्रोल भक्त होता है। उसको देश के कानून से कुछ लेना देना नही होता। बाबा या नेता कुछ कह देगा वो मान लेगा। भक्त बनाने के प्रोसेस में सबसे पहले उसके विवेक और समझने की ताकत को खत्म किया जाता है। एक बार वो बाबा और नेता  की बात को अंधा होकर सुनने लगता है। तो समझ लो कि वो अंधा भक्त बन गया। अंधे भक्त को तालिबानी प्रवृति में लेजाना आसान हो जाता है। भक्त बनाने  के रास्ते जब किसी को विवेक शून्य बना दिया जाता है, तो वो अतिकट्टरता की ओर जाने लगता है। मैंने तालिबानी इसलिए बोला क्योंकि उन्होंने पेशावर में स्कूल के बच्चों को बेरहमी से कत्ल किया। इसके अतिरिक्त बाह्मयन बुद्ध की प्रतिमा को खंडित करना। ये इसलिए होता है क्योंकि भक्तों को किसी जाति, धर्म, विचार और संगठन के विरुद्ध सतत विषगमन किया जाता है। उसके विवेक और सोचने की ताकत को पूरी तरह नियंत्रित किया जाता । एक बार भक्त तैयार हुआ तो सिलसिला जारी होता जाता है। रामरहीम अभी का उदाहरण है। ये धार्मिक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों में अधिक पाया जाता है। तालिबानी कैंपो की तरह दिन भक्तों को निर्मित करने में लगे रहते है। किसी आम आदमी की सोच को पूरी तरह फोकस्ड करके कठपुतली की तरह बना देना। एक बार भक्त तैयार होगया तो समझों की उसको कभी भी रिमोट की तरह इस्तेमाल कर लो।
उस भक्त की फ्रीक्वेंसी जो विवेक के रूप में उसके भीतर है , जो सही गलत को समझने में सहायक होती है, उनको जैमर के माध्यम से डीएक्टिवेट करके ये भक्त पूरी तरह अंधे हो जाते और फिर इनसे कुछ भी करवा लो। अचरज की बात है ,इन भक्तों की भाषा और बोली एक जैसी ही रहती है। एक आम भक्त  सबसे निचले  पॉयदान पर खड़ा  और शीर्षस्थ भक्त एक भाषा और भावभंगिमाओं का उपयोग करते है। उनके भीतर भर दिया जाता है कि तुम ही सत्य हो शुद्ध हो। हिटलर ने यहूदियों के विरुद्ध विषगमन किया जिसका परिणाम 60 लाख यहूदियों का निर्मम  जनसंहार । ऐसा करते हुए हिटलर के अंधभक्तों को गर्व महसूस होता था। गेस चैम्बर में नवजात शिशुओं की हत्या उनके लिए मिशन पूर्ण होना था।
अंध भक्तों की पहचान कैसे हो । वो बहस करते समय विरोधी को व्यक्तिगत रूप से गाली आदि देना शुरू कर देते है। विषय को छोड़ वो इतिहास और कुछ खास घटनाओं के आधार पर आगबबूला हो उठते है। कुछ सवाल और सही गलत की बात करने वाले उनके सबसे बड़े शत्रु होते है। अगर कोई भी व्यक्ति।स्वयं पढ़ाई लिखाई नही करता। चीजों की पड़ताल नही करता । वो इन कट्टरपंतियों के ट्रेप में आ ही जाते है। भारत की परंपराओं में पंक्ति को मिटाने और छोटा करने की बजाए अपनी लकीर को लंबा करने की बात कही जाती है। लेकिन अंधभक्त लाइन को मिटाने की कोशिश में लगे रहते है।
जब विवेकानद कहते है, उनको 100 अनुयायी मिल जाते तो वो एक बड़ा परिवर्तन ला सकते थे। विवेकानद अंधभक्त नही सच्चे विवेकशील और सही गलत को कहने वाले विचारमान भक्त बनाना चाहते थे।
मानव समाज में भक्त नही एक समझदार व्यक्ति के रूप में व्यक्ति का उद्विकास ओर  अपनी विवेक और सोचने की शक्ति के रूप में होना चाहिए। वो इसलिए एक व्यक्ति अपने में पूर्ण होता है। लेकिन मानवजाति ने स्वयं अपने ही मानव को अपने इशारों पर चलाने की काबिलियत हासिल कर ली। उसको तोड़ने के लिए रैशनल और जिज्ञाशूपन का भी विकास कम ही , लेकिन होता आया है। कट्टरवाद और उदार वादी के बीच ही असल द्वंद है। कट्टरवाद आदमी को रिमोट से कंट्रोल करना है और उदारवाद अथवा विवेकशील होना , अपनी सोच और विवेक पूर्ण चीज़ों को समझना ही है। कट्टरवादी अधिक तेजी से तरक्की करता है। उसका फोकस दिखाने और प्रभावित करने के विकास में अधिक होताहै ताकि किसी को नीचा दिखा कर ही अपने को ऊंचा और असल साबित करना है।
अगर ऐसे अंधभक्तों को सत्ता मिल जाये तो खतरनाक होता है। ये विवेकहीन स्वयं को भी निगलने  का आधार बना ही लेते है। ये अंधभक्त विवेकहीन एक समय ऐसा आता है , स्वयं भस्मासुर बनते जाते है। इनमे खुद के नाश करने की नैसर्गिक प्रवर्ति पाई जाती है।
हम सभी के आस पास ऐसे अंधे विवेकहीन भक्त पाये जाते है। अगर इनकी बात नही मानी तो ये आपको बुरा भला और गाली गलौज भी कर देते है। ये हमेशा गुस्से में रहते है। इनकी बातें हास्यास्पद होती है। कही का लॉजिक कही बैठाने की कोशिश दिन रात करते है। इनका मानना है कि उनके अतिरिक्त सब गलत है। पूरी दुनियां में वो ही श्रेष्ठ है। आप ऐसे लोगों को देखे और उनकी बात जरूर सुने ताकि बच्चो और युवाओं को समय रहते चेता दिया जाए। ये लोग बच्चों पर अधिक फोकस करते है। पुरुष प्रधान समाज की परिकल्पना में ही रहते है। गलत सूचना, भ्रामक तथ्य, बदनाम करने की कोशिश, जो इनकी नही सुनता ,उनके पीछे पड़ना। इनका स्वभाव होता है।
लेकिन ये डरपोक और निडर सही मांयने में नही होते क्योंकि जो नेगेटिव और गलत बात को लेकर चलता है , जो सच्चा नही है, वो निडर नही हो सकता। ये लोग वाचाल होते है। सत्यवादी तो कतई नही होते। ये समाज में तनाव पैदा करना चाहते है।
ये सभी जाति ,धर्म और देश में पाएं जाते है। मानव धर्म,  सरल ,सहज और सतत विश्व के विकास के लिए ऐसे लोगों की संख्या न बड़े इसका सतत प्रयास करते रहे। बच्चों और युवाओं को सही जानकारी और स्वयं पड़ताल करने की आदत डालें। पढ़ने और आपस में बातचीत की आदत डालें ताकि भ्रम पैदा न हो सके।

विनीत
रमेश मुमुक्षु

Friday, 15 September 2017

हिंदी दिवस : आओ विचार करें


हिंदी दिवस और पखवाड़ा इस बात का परिचायक है कि अभी हिंदी राज्य भाषा नही बन सकी है। वैसे भी हिंदी के बड़े परिवार से बहुत सी भाषा अपना अलग घर बसा चुकी है और बहुत सी लाइन में खड़ी है। इस तरह हिंदी का कद छोटा होता जा रहा है। हालांकि बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है ,जिन्हें इंग्लिश नही आती । लेकिन इसका अर्थ ये नही है कि हिंदी का चलन बड़ा है। हिंदी का कद फ़िल्म , फिल्मी गाने और टीबी सीरियल बहुत से  बढ़ा है। लेकिन शिक्षा के प्रसार में अंग्रेज़ी मीडियम से पढ़ने वाली की संख्या अधिक होती जा रही है। गैरसरकारी और निजी स्कूल का चलन केवल अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाई के कारण बढ़ा है।
आजकल बच्चे हिंदी में गिनती तक भूल गए और दूसरी और अंग्रेज़ी में भी बच्चे पारंगत नही है। लिखने में तो थोड़ा बहुत लिखने और रटने से काम चल जाता है। लेकिन बोलने में अभी भी पिछड़े है।  लेकिन लोग इससे भी खुश है कि उनका बच्चा अंग्रेजी में पढ़ रहा है। अभी भी समाज में अंग्रेज़ी जानने वाले का सम्मान अधिक होता है। इस  मानसिकता  ने भी हिंदी के प्रति उदासीनता पैदा की है। नौकरी तो एक कारण है ही।
लेकिन गूगल ने लोगो को हिंदी लिखना सिखा दिया। आजकल बहुत लोग जिनको हिंदी टाइप नही आती वो भी हिंदी टाइप कर लेते है। मैं स्वयं इसी तरह टाइप करता हूँ।
सरकारी विभाग में भले आप हिंदी में लिखे , लेकिन जबाव अंग्रेज़ी में ही आएगा। कम से कम केंद्र सरकार में तो हिंदी अनुभाग  केवल अनुवाद के लिए ही खुले हुए है। संसदीय प्रश्न का अनुवाद हिंदी में होना अनिवार्य है, वो भी इस कारण ।अभी स्मार्ट फोन आने से लोग हिंदी का भी इस्तेमाल भी करने लगे है।
हिंदी को राज्य भाषा का दर्जा मिलने में अड़चन इसलिए भी है क्योंकि अन्य राज्यों के नागरिक इसको अपने ऊपर हिंदी तो थोपना कहते है। इसका एक कारण हो सकता है कि भारत में अन्य भाषाओं को समुचित सम्मान नही मिला। स्कूल में विदेशी भाषा का विकल्प रहता है। आजकल संस्कृत को बढ़ावा मिल रहा है। लेकिन तमिल और अन्य भाषा का भी समृद्ध इतिहास रहा है। उन भाषाओं को स्कूल में एक विकल्प के रूप में क्यों उचित सम्मान नही मिलता? ये सोचने का विषय है।  ये भी विडंबना है कि लोग विदेशी साहित्य को जानते है ,लेकिन तमिल जैसी समृद और परिष्कृत भाषा के इतिहास को नही जानते।
हालांकि जवाहर नवोदय विद्यालयों में बच्चों को किसी अन्य राज्य में जाकर रहना होता है और उसकी भाषा सीखनी होती है। लेकिन मेरा दावा है ,इस विषय में सब लोग नही जानते। इसलिए हमें भारत की सभी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए।
एक बात तो हम सब स्वीकर कर ही लेंगे की हिंदी में पूरे देश की संपर्क भाषा होने का सामर्थ्य कहूँ या  संभावना, इस बात से इनकार नही किया जा सकता। हिंदी भाषा को आप किसी भाषा या बोली की तरह बोल सकते है , हिंदी भाषा का हिंदीपन खत्म नही होता। तमिल हिंदी , गुजराती हिंदी आदि बन कर भी हिंदी ही रहेगी । लेकिन किसी अन्य भाषा को हिंदी की तरह नही बोला जा सकता क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो वो हिंदी ही हो जाएगी। इसलिए इस भाषा में संपर्क भाषा होने का गुण तो है। हिंदी परिवार से निकली राजस्थानी, मैथिली, बृज और अन्य भाषा भले वो अपनी अलग पहचान बना ले , लेकिन हिंदी की तरह संपर्क भाषा का स्थान नही ले सकती। भारत में किसी भी राज्य में आज भी हिंदी भाषा के करण संपर्क हो सकता है। हालांकि अभी अंग्रेज़ी को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित किया जा रहा है। 90 के दशक में सरस्वती शिशु मंदिर का प्रचार इसलिए अधिक हुआ क्योंकि उसमें अंग्रेज़ी भाषा प्रथम कक्षा से पढ़ाई जाने लगी थी। सरस्वती शिशु मंदिर स्कूलों ने हिंदी धर्म और संस्कृति का कितना प्रचार और प्रसार किया ,ये कहा नही जा सकता। लेकिन अंग्रेज़ी के प्रति दूर दराज में रहने वालों का भी आकर्षण बड़ा ही है।
डंडे के बल पर इसको लागू नही किया जा सकता है। जिनको हिंदी आती है , उनको तो इसका उपयोग करना ही चाहिए। सामाजिक , धार्मिक और अन्य क्षेत्रों में अंग्रेज़ी और हिंदी वालों का अंतर दीख पड़ता है। कोर्ट कचेरी में अधिकांश काम अंग्रेज़ी में होता है। निचली अदालत में ज़िरह जरूर हिंदी या लोकल बोली में होती है, लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में तो अखबार की खबर का भी अनुवाद करना होता है। जज केवल अंग्रेज़ी में ही ज़िरह करते है। क्लाइंट जिसके केस पर ज़िरह होती है। वो समझ ही नही पाता कि क्या हो रहा है। ये सब चीज़े लचीली होनी चाहिए। किसी भी भाषा को संपर्क भाषा तो होना ही है। अभी लोग दक्षिण में पढ़ रहे है। इस तरह उनको उसी राज्य की भाषा को जानना चाहिए । लेकिन वहां भी लोग हिंदी , जो अपने तरह से बोली जाती है , का इस्तेमाल करने लगे है। किसी ने कहा नही की हिंदी का इस्तेमाल करो। लेकिन वो एक संपर्क भाषा के रूप में स्वतः ही पहुँच गई। ये हिंदी को लाभ है। जैसे अंग्रेज़ी अलग देशों में उसी तरह बोली जाती है। लेकिन वो होती अंग्रेज़ी ही है। बहुत से लोग संस्कृत को संपर्क भाषा के रूप में प्रचारित करते है। संस्कृत पढ़ाई जाए । लेकिन वो हिंदी की जगहे लेगी ऐसा सोचना उचित नही। अभी जो लोग संस्कृत के ज्ञानी आपस में संस्कृत नही बोलते है। इसलिए सभी भाषा का सम्मान और उनके इतिहास की जानकारी से सारी भाषा नजदीक आएगी। इस संदर्भ में जवाहर नवोदय विद्यालय ने जो पहल की है। इसके लिए राजीव गांधी के विज़न जिसमे दूरभाष और कंप्यूटर के साथ स्कूल में ही बच्चे एक अन्य भाषा भी सीख लेते है, बड़ा कदम था। इस तरह के ताने बाने से ही हिंदी के प्रति लोगो को गुस्सा नही है। बल्कि उनकी भाषा और बोली को यथोचित सम्मान न मिलने से वो हिंदी के विरुद्ध बोलते है।
इसलिए उस दिन का इंतजार तो रहेगा जब हिंदी सप्ताह मनाना बन्द होगा और लोग अंग्रेज़ी को याद करेंगे। क्या आएगा ऐसा दिन ? ये सोचने का विषय है।
रमेश मुमुक्षु
9810610400
ramumukshu@gmail. com

Thursday, 14 September 2017

पंचेश्वर झील : एक कविता


गांव पड़ाव बन गया
पड़ाव कस्बा
कस्बा  नगर
नगर महानगर
महानगर
महापिशाच बनते जा
रहे है
जिनकी भूख
कम होने की जगह
बढ़ती जाती है
महानगर भी
भष्मासुर की तरह
अपने रास्ते में आने
वाले सभी गांव कस्बों
को भस्म करता जा रहा है
बिजली पानी की
भूख
उसकी बढ़ती जाती है
धीरे धीरे वो सारे
पर्वतों और
सुरम्य घाटियों को
लील कर
नदी को
अपनी सुरंग नुमा
मुँह से निगलता जाएगा
अभी तो टिहरी
ही बनी है
झील
लेकिन
उसकी
भूख और प्यास
बढ़ती जाती है
पंचेश्वर को भी
झील में
बदलने
को आतुर
उसकी ओर बढ़ रहा है
समा
जाएगी
सारी
सदियों
से पनपती
घाटियां
दफ़्न हो
जाएगी
सभ्यता
लोगों की
यादें
गीत, झोड़े ,जागर, चांचरी
ढोल ,दमाऊं ,
खेत खलियान
ग्राम देव
नुक्कड़ के बड़े पेड़
किलमोड़ी, हिंसालु
चीड़, बांझ, बुरांस
सब
समा जाएंगे
लेकिन
इसके बाद और बढ़ेगी
उसकी
भूख
सारे पहाड़
को
बना देगा
झील केवल झील
पहाड़ी बन जाएंगे
महापिशाच
के पीछे
कठपुतली से
जो उसके
लोलुपता के धागे से
बंधे
भूल  जाएंगे
अपना पहाड़ी
होना भी
महापिशाच के झंडे उठाए
अपने गाड़ गधेरों का
सौदा
करने को आतुर
दूर गांव में
खेती को
जिंदा रखे
परंपरा
को जीवित रखे
किसान को उखाड़ने
को तत्पर
विकास
की आंधी
के साथ
बेपरवाह
विकास नही
विनाश
के साथ
उस कुत्ते के समान
जो हड्डी चूसते हुए
अपने
मसूड़ो
के खून को हड्डी
से निकला
खून समझ
बेतहासा
हड्डी
को चबाने लगता
है
बांध दिया है
लोगों
के विवेक और सोचने की
आदत
दूर दराज बैठा
अंतिम आदमी
भी
विकास का
स्वप्न
देखता है
लेकिन
ये कैसा विकास
जिसकी भूख बढ़ती
जाती है
सदियों से
धरती को
अपनी आगोश
में
थामे
बर्फ के हिमनदों
की
पकड़ ढीली होती जा रही
नदी के वेग के
साथ
वो
भी खिसक रहे है
प्रलय के दस्तक से
लेकिन
आदमी की
भूख और लालच
ने उसकी
आंखों पर
पट्टी
बांध दी है
संवेदनायें शून्य
सी होती आई है
स्वार्थ ने
ढांप लिया
उसके
व्यक्ति
होने को भी
अगर नही मिटी
महापिशाच
की
भूख
तो
क्या सारे पहाड़ो
को झील
बना देगा
जीवन
देने वाले
जीवन
बचा
नही सके
तो
क्या होगा
सृष्टि का
विकास
जो
एक सतत प्रक्रिया है
लेकिन
विनाश
तो अंतिम
और आखिरी चोट है
जीवन
की
क्या बचा सकेंगे
पहाड़ का पहाड़ होना
नदी का अविरल
स्वछ बहना
झरनों का निरंतर
बहना
हिरण का
कुलांचे मरना
बाघ की
दहाड़
चिड़ियों का
चहक कर
घाटी
की ओर
जाना
सदियों
से
ऋषि मुनि
के पदचाप की
साक्षी
पगडंडियों
का
साम्राज्य
जिन पर
शंकराचार्य
समेत  कितने
ही महान
पुरुष गुजरे
है
आदमी का
कौशल
सीढ़ीनुमा खेतों के
चित्र
बकरियों को
हांकता
कोई
बूढा
क्या मिल सकेगा
जंगल में पत्ते सारती कोई
महिला
गीत गुनगुना सकेगी
मस्तक उठा कर क्या
देवदार
देख सकेगा
दूर तक
कही झील तो कही
दो लेन से चार लेन
में तब्दील होती
काली टेडी मेड़ी
सड़के
जिनकी लंबाई
बढ़ती जाती है
पहाड़ो की जड़ों को
काटती हुई
फिर तांडव होगा 
अविरलता
की बात उठेगी
जो ठेकेदारों की
जेसीबी
के शोर में गुम हो
जाएगी
किसी पहाड़ी रास्ते में कोई
बूढ़ी आमा लंबी
सांस लेते
हुए कहेगी
कि
क्या सब डूब
जाएगा
मेरा
खेत भी
ग्राम देवता
भी
अब जाने का मन
नही कही
लेकिन वो
आमा
क्या
जाने
सब
डूब जाएगा
आमा के
खेत सहित
क्या बचा सकेंगे
पहाड़ होना
और
पहाड़ीपन
जिसके 
जल, जंगल, जमीन ही
ही
ईश्वर है
और है
जीने का आधार ।
...रमेश मुमुक्षु

Thursday, 24 November 2016

आर॰ बी॰ आई॰ एक्ट 1934 (RBI ACT) की धारा 45 E में तुरंत बदलाव कर लोन डिफ़ौल्टर्स के नाम उजागर किए जाये

देश को एनपीए (NON-PERFORMING ASSET) से छुटकारा दिलाया जाए


प्रधानमंत्री ने नोटबन्दी पर एक कडा कदम उठा लिया है, जिससे एक बात साफ है, यदि प्रधानमंत्री चाहे तो कोई भी कदम उठा सकते है| कई दशकों से बड़े उद्योगों ने सरकारी और प्राइवेट बेंकों से परियोजनाओं के लिए भारी भरकम रकम ऋण के रूप में लिया है| लेकिन लंबी अवधि बीत जाने पर भी ऋण चुकाया नहीं गया| एक समय था कि ये न तो ब्याज ही देते थे और न ही ऋण वापस करते थे| ऐसी रकम को एन.पी.ए में बदल दिया गया| आज ये रकम मिलकर करीब 3 लाख करोड़ से अधिक हो गई है और एनपीए कर दी गई है| आर॰ बी॰ आई॰ एक्ट (RBI Act)1934 कि धारा 45 C के तहत बेंकों से डिफालटर बड़े उद्योगपतियों कि लिस्ट मँगवाई जाती है, लेकिन 5 करोड़ और उससे बड़े डिफालटर उद्योगपतियों की लिस्ट को आर॰ बी॰ आई॰ एक्ट 1934 की धारा 45 E के तहत गोपनीय रखने का प्रावधान है| इसका अर्थ हुआ की 5 करोड़ से अधिक पैसा गटकने वालों का नाम बदनाम न हो जाए, सभी सरकारों ने इस अधिनियम का सहारा लेकर ऋण न चुकाने वालों का नाम सूप्रीम कोर्ट के मांगने के बावजूद भी नहीं उजागर किए| सबसे अचरज की बात यह है कि मोदीजी ने भी आज तक इस अधिनियम में बदलाव नहीं किया| उनका दावा है कि उन्होने सारे अंग्रेज़ो के समय के कानून या तो बदल दिये या निरस्त कर दिये| लेकिन ये कानून जो सबसे पहले बदलना था, ये कैसे छूट गया| ये साफ दिख पड़ता है, इन बड़े उद्योगपतियों को बचाने का ही प्रयास है| याद रहे, ये एक्ट अंग्रेज़ो के समय का है, उस समय राजा, महाराजा, पटेल, सेठ, थोकदार, मालदार और इस तरह के अमीर और प्रभावशाली डिफालटर उद्योगपतियों की बदनामी के डर से उजागर नहीं किए जाते थे | असल में अंग्रेजों ने इन्ही के दम पर भारत में राज किया था| दिल्ली में अभी भी इन सब देशभक्तो की हवेलियाँ हैं| इनमे से बहुत तो आज भी राजा ही हैं| बहुतों को तो अंग्रेजों ने ही पैदा किया था, अपने स्वार्थ के लिए उधार ना चुकाने के बावजूद भी इनकी डिफालटर लिस्ट उजागर नहीं की जाती थी| लेकिन अब तो प्रजातन्त्र है और जनता  का पैसा बैंको के माध्यम से उधार दिया जाता है| फिर क्यों सरकार इन्हे उजागर करने से कतराती है, क्योंकि ये बड़ी गहरी साँठगांठ है| यहीं कारण है कि मोदी जी कि निगाह इस पर नहीं पड़ी| इसका खुलासा पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी किया था| संसद में भी इस पर शोर मचता रहा कि नाम उजागर किए जाये| लेकिन ये अंग्रेज़ो के समय का कानून है, जो अपने करीबी लोगो को बचाने के लिए बना था, उसका इस्तेमाल आज भी छाती चौड़ी करके किया जाता है|
अब समय आ गया है कि  आर॰ बी॰ आई॰ एक्ट 1934 (RBI ACT) की धारा 45 E में तुरंत संशोधन किया जाये ताकि 5 करोड़ से ऊपर डिफालटर उद्योगो और उनके मालिको का नाम उजागर किया जा सके| अभी  मालया का नाम एक आम आदमी भी जनता है| सरकारों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए इस कारण देश के लोगो का एक बड़ा पैसा आज तक लौटाया नहीं गया| बड़ी विडम्बना है, विदेशी बेंकों, खास तौर पर स्विस बैक,  में भी जिनका काला धन रखा है, उनको भी आज तक देश को नहीं बताया गया| उसमे तो मल्टिपल अग्रीमेट्स के कारण ऐसा नहीं हो सका| लेकिन देश के कानून में संशोधन कर देश कि जनता को डिफालटर उद्योगो और उनके मालिको का नाम बताया जाए, जो असल तो छोड़िए ब्याज भी नहीं चुका रहे| असल में ये कहा जाता है कि इनके नाम उजागर होने से शेयर मार्केट और बाज़ार पर प्रतिकूल असर पड़ेगा| फिर तो ये और भी जरूरी है कि इनके नाम उजागर किए जाए ताकि मार्किट वास्तव में ऊपर जाये न कि केवल सट्टेबाजी के आधार पर| एक बार ठोस कदम से भविष्य में परियोजना का क्रियान्वयन ठीक समय पर हो सकेगा और एनपीए से बचा जा सकेगा| नोटबन्दी में भी कहा गया कि देश वासी सब्र करें| अगर इस नियम को बदला जाता है, तो सारा आर्थिक तंत्र ठीक से आगे बढ़ेगा| इस अकेले कदम से सारे देशवासी वास्तव में खुश होंगे|
इस अधिनियम में बदलाव के साथ इन सभी डिफालटर उद्योगपतियों को एक महीने का समय देकर उनसे ऋण की रकम वसूली जाए| अगर ये ऋण वापस नहीं करते है तो इनपर भी कानूनी शिकंजा कसा जाए और इनकी संपत्ति को नीलम कर दिया जाए ताकि कुछ तो रकम वापस आ सके| एक आम आदमी जब छोटा सा ऋण लेता है, ऋण न चुकाने पर रिकवरी और उसकी संपत्ति की कुड़की तक हो जाती है| आजतक किसान और आम आदमी छोटे- छोटे ऋण के कारण खुदखुशी करते रहे है, लेकिन आजतक कितने बड़े उद्योगपतियों ने खुदखुशी की है, ये लोग जानते है| ये बड़े लोग आज भी खुले आम मौजमस्ती का जीवन जी रहे है| संविधान की नज़र में सारे नागरिक एक समान है| इसलिए ये कदम वास्तव में एक बहुत बड़ा कदम होगा| इसलिए इस अंग्रेज़ो के समय के कानून की धारा 45 E को नोटबन्दी की तरह एक झटके में ही बदल कर देश के सामने उन सभी बड़े उद्योगपतियों के नाम उजागर करे, ताकि ये सिलसिला यहीं रुक जाये| अगर नोटबंदी से पहले ये कदम उठाया जाता, अधिक सार्थक कदम होता| केवल 100 डिफ़ालटरों से ही हमारे देश के खजाने भर जाते| नोटबंदी की सफलता इस बात पर निर्भर करती है की अन्य दलों सहित सत्तारूढ़ दल से जुड़े कितने लोग कानून के चंगुल में आते है| अभी तो पूरे देश में क्या नुकसान हुआ है और क्या फायदा, इसका मूल्यांकन और प्रभाव भविष्य के गर्भ में छुपा है|

रमेश मुमुक्षु
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