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Sunday, 14 June 2020

हम नही सुधरेंगें चाहे कुछ भी हो कोरोना संकट पर एक विचार

हम नही सुधरेंगें चाहे कुछ भी हो कोरोना संकट पर एक विचार
# बाइक पर दो से तीन कितनी बार बिना मास्क चलेंगे।
# भीड़ करेंगे ,गप्प करेंगे मास्क के बिना
# हम प्याला होंगे , किसी के घर मास्क को दुर रख ,बच्चों की  परवाह किये बिना, मधुशाला गाएंगे।
# दुकान पर डिस्टेंस किसको याद है, अब कोई पुलिस वाला हूटर नही बाजयेगा।
#गली मोहल्ले में मेला लगा है।
# रात के पंछी अभी भी रात को 9 बजे के बाद निकल जाते है,बेरोकटोक। 
# कर्फ्यू पास चस्पा करके कितने तो मार्च से ही आंखों में धूल झोंक रहे है। 
# इतने ही केस आते जा रहे है,उतना ही लोग फ्री घूम रहे है। पार्क सेहत बनाने के लिए भरे जा रहे है। किसी को फिक्र नही।
# मौत का तांडव होने को है,लेकिन राजनीति अभी भी गर्म है। कोरोना कभी केजरी, कही मोदी कभी योगी, कभी उद्धव , कभी फलाना ढिमकना हो रहा है। 
# अफसोस  है , देश केअस्पताल में  1लाख पर 58 बेड 
बंगला देश 87 बेड
चीन         434
रूस          805
भारत कुल बेड 7 लाख 14000
ICU  35700 कुल सरकारी अस्पताल में।
इसमें किसी  पार्टी की सरकार नही ,सभी बराबर के जिम्मेदार है।सभी  पार्टी वर्णसंकर है, मतलब *कहीं की ईंट कहीं को रोड़ा भागमती ने कुनबा जोड़ा।*  कभी किसी ने  पार्टी और  संघटन द्वारा  स्वास्थ्य पर आंदोलन और चक्का जाम की बात सुनी है। इसमें सभी कसूरवार है। हम सोचते हीनही इस बारे में। 
# दुनियां में 10 लाख पर टेस्ट की स्थिति 
भारत         3462
USA          64335
स्पेन            95308
रूस            119793
ब्रिटेन           82299
 इटली           70063     
पेरू              36185
जर्मनी           51916
चीन के यूहान में एक दिन में 14 लाख जांच करवाई थी।
ये देश भारत से 20 गुणा अधिक टेस्ट करवा रहे है। अब खुद ही हिसाब लगा ले कि अगर 20 गुणा टेस्ट हम करते तो आज कितने पॉजिटिव केस हो सकते थे। कितनों की मौत हो सकती थी। 
# ये हमारी हकीकत है। ये किसी भी पार्टी की प्राथमिकता नही रही। अगर किसी पार्टी की सरकार ने काम नही किया तो दूसरी पार्टी ने कौन सा झंडा गाड़ दिया। कभी उपरोक्त बातों पर आंदोलन और चक्का जाम नही हुआ।
# देश में मेडिको इन्शुरन्स , सरकारी स्वास्थ्य कार्ड धारक बहुत कम होंगे। करीब 80% लोग भगवान भरोसे है। खुद ही नीम हकीम से इलाज़ करवाते है। सभी किस्म की दवा में मिलावट और स्टेरॉइड मिला कर देने वाले पिचास खूब मिलते है। अभी भी देश में  20  से 50  किलोमीटर से दूर डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल है,जहां पर भी इलाज़ की उम्मीद नही होती।  
# अब बताओ कोरोना से कैसे बचें । पहले दूसरे लॉक डाउन में पुलिस का  हूटर सुन दौड़ जाते थे। पिछवाड़ा सेक दिया मशहूर हुआ था। अब ऐसे निकलते है, जैसे कोरोना है ही नही। 
# बुरा न मानों बहुत से लोग केवल लठ के ही यार है। हम लोग मार्च से ही पॉकेट के गेट पर पहरा देते है। अभी तक लड़ाई का अंदेशा रहता है। हमारे यहां पर गेट पर ड्यूटी देने के लिए दो हमले भी हो गए। लेकिन अभी भी कुछ लोगों पर अंतर नही पड़ा। 
# खुद ही हम नही मानते कानून और जो बताया जाता है। आदत ही नही। 
# शराब की दुकान में भीड़ ने रिकॉर्ड तोड़ दिया ,ट्रैफिक जाम आम हो गया। 

# जब मरीज एक न था 
लक्षण रेखा खींची गई
अब मरीज चहुं ओर है
रोक टोक कछु न भई 
कैसा गड़बड़ झाला रे 
ये कैसा गड़बड़ झाला 
कोरोना ने कैसे भैय्या
सबको जाल में डाला
सबको जाल में डाला 
किस पर दोष मढ़े 
इस हमाम में भैय्या 
सभी औंधे पड़े ,औंधे पड़े। 
# इसलिए अपनी जान खुद ही बचाएं।
सावधानी हटी दुघर्टना घटी।
#अगर 15 लाख खींसे में है और किसी नेता के करीबी है ,तो भी बच के रहो,ये कोरोना है,जिसने अमेरिका चीन नही बख्शे , परमाणु बम भी इसका बाल बांका भी नही ,तो किसी को नही बख्शेगा। 
*ये हेकड़ी मूछों पर मरोड़ , सीना फुला के चलना, ऐंठ के घूरना सब धरा रह जायेगा। इसलिए सभी भेद भाव भूल कर साथ में आकर खुद बचो और औरों को बचाओं। ये ही मूल मंत्र है।जिंदा रहे तो भिड़ते रहेंगे,पूरा जीवन ,यहीं करते आ रहे है, सदियों से ,अब हो सकता है ,कुछ ऐंठन कम हो जाये ,कोरोना के कारण। ये तो देखना ही है।
विनीत
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल 
9810610400
13.6.2020

Saturday, 16 May 2020

लॉक डाउन और द्वारका पुलिस

*लॉक डाउन और द्वारका पुलिस*
22 तारीख से ही सुबह बीट वाले,श्री वीरेंद्र और कप्तान  की हूटर की आवाज एक आदत सी बन गई है। दिन भर कितनी बार बीट वाले  चक्कर लगाते रहे। माइक लेकर समझाते रहे कि  लोग कोरोना से बचे और घर पर रहे। डी एम श्री राहुल सिंह जी श्री अन्टो अल्फोन्स ,डीसीपी द्वारका पुलिस भी रह रह कर कोरोना संबंधी अपडेट देते रहते है। एक नया संबंध प्रशासन और जनता के बीच  उभर कर आया। पुलिस समेत द्वारका में जनता ने भी इस बारे में अच्छी पहल की।  इस्कॉन ,दिल्ली सरकार, छोटी सी खुशी, द्वारका फोरम, द्वारका फेडरेशन, अनहद ,ट्रेवल्स, आर एस एस , एक मुठ्ठी ट्रस्ट और द्वारका पुलिस के मनीष मधुकर डीसीपी आफिस के , डीसीपी श्री अन्टोअल्फोन्स अतिरिक्त अतिरिक्त डीसीपी श्री मीणा जी एसीपी श्री राजेन्द्र सिंह  ,एसीपी एवं सभी एस एच ओ राशन और खाना बांटने  में लगे रहे। इस सब के बीच एक  दिन राशन बांटने के संदर्भ में श्री संजय जी एस एच ओ द्वारका नार्थ ने अच्छी बात कही कि" राशन वितरण के लिए उतावलापन ठीक नही। कहाँ कितना देना है, किसको देना है, इसका भी ख्याल रखना है।" आरम्भ में भावना बलवती होती है। धीमे धीमे कुछ लोग ही रह जाते है। भोजन और सामग्री देने वाले। कुछ अलग भी होता हुआ ।  हमारी पॉकेट में एक बुजुर्ग महिला ने पीसीआर बुला ली कि उनके पास जो पंखा है,खराब हो गया। गर्मी बढ़ गई है , पंखा चाहिए। बीट के श्री कप्तान सिंह , लग गए मदद के लिए। यहाँ तक भी पुलिस ने मदद करने की कोशिश की। ये सब द्वारका में होता रहा। बुजुर्ग लोगों के यहां भी पुलिस गई। ये सब इसलिए कि हम लोग कोरोना से बचे। हमारी पॉकेट स्टूडियो अपार्टमेंट की RWA और रेडिडेंट्स ने सुबह 7 बजे से रात्रि 1 बजे तक गेट पर तन्मयता से ड्यूटी दी। इस दौरान बाहर से आने वालों से जूझते रहे। ये भी एक बड़ा कदम रहा। नेता भी लगे रहे। सबका नाम मैं जनता ,कोई भूल हो तो , क्षमा करें। ये सब द्वारका को सुरक्षित रखने के लिए।  वैसे BSES ,MCD को भी नही भूल सकते है।पॉकेट के गार्ड, सफाई वाले, फ़ूड सप्लाई वाले भी लगे है। डीसीपी और अन्य बड़े अधिकारी व्यक्तिगत रूप से भी लोगों से मिले ,ये भी होता रहा द्वारका के भीतर। खाना बांटने में छोटी सी खुशी का काम अलग रहा। श्रीमती नामिता  चौधरी बताया कि उन्होंने 50 वालंटियर चुने और सभी ने अपने खाने के साथ एक खाना अतिरिक्त बनवा लिए। प्रतिदिन गार्ड रूम से उनके वर्कर्स खाना लेकर उपयुक्त जगह खाना बांट आते थे। ये भी अलग प्रयोग रहा। श्रीमती माधुरी वर्षांय ने दिल्ली सरकार के माध्यम से राशन, खाना आदि बांटने में बहुत मेहनत कर रही।है।डीसीपी आफिस में कार्यरत श्री मनीष मधुकर जी जो द्वारका पुलिस द्वारा विभिन्न इवेंट्स करवाने में हमेशा दिख पड़ते है। द्वारका जिले बेस्ट सिक्योर्ड सोसाइटी, शतप्रतिशत वेरिफिकेशन , परख ऐप , कम्युनिटी पोलिसिंग में उनका रोल अहम रहा, कम्युनिटी पोलिसिंग व्हीकल, सामुदायिक कियोस्क सेक्टर 10 मार्किट, मेगा रन जैसे द्वारका पुलिस के विभिन्न कार्यो में  सबसे आगे दिखाई देते रहे। अभी कोरोना संकट में भी इन्होंने राशन एवं कम्युनिटी किचन में भी दिखाई पड़े। इन सब कामों में उनके ऊपर डीसीपी श्री अन्टो अल्फोन्स जी प्रोत्साहन रहा। श्रीमती सुधा सिन्हा ने भी डी एम श्री राहुल सिंह एवं डीसीपी द्वारका पुलिस से समय समय पर इंटरव्यू लेकर द्वारका की जनता को जागरूक किया। श्री राजेन्द सिंह एसीपी द्वारका रेसिडेंट्स के जबाव भी बखूबी देते रहे और उपयुक्त जानकारी भी देते रहे। इसके बीच श्री राज दत्त गहलोत उप महापौर अपने हाथ से विभिन्न कॉलोनियों को सैनिटाइज करते दिखे,ये भी नज़ारा अलग ही था। 
*विशेष* सबसे अधिक योगदान मेडिकल स्टाफ का रहा। जो सीधे ही इस संकट से जूझ रहे है। उन सबको तो सलाम करना ही है। लेकिन लोगों की अज्ञानता की बात जरूर करूँगा। हमारे पॉकेट में दो नर्स जो वेंटेश्वर हॉस्पिटल में है, उंनको क्वारंटाइन किया गया। कुछ लोगों को लगा। ये तो कोरोना पोसिटिव है। ये बहुत ही मूर्खतापूर्ण बात थी।हमने उंनको समझाया कि अपने मन से कुछ भी बात करनी ,हमेशा घातक परिणाम को जन्म देती है। मेरा खुद का HIV AIDS के लोगों के साथ काम करके अनुभव हुए। कुछ लोग मुझे भी बोल देते थे कि तू तो इनके साथ काम करता है, तुझे दूर रहना चाहिए। ये मुझे अभी अनुभव हुआ। अगर किसी के घर या पड़ोस में भी पॉजिटिव निकल जाए तो पैनिक नही होना। उसका सामना करना है। जो भी जानकारी और सावधानी है,उसके अनुसार ही करना है।वायरस केवल वायरस होता है, उसका धर्म, जात, क्षेत्र आदि कुछ नही होता। बस सबसे पहला और अंतिम सत्य है, उससे दूर रहना। अचरज की बात है, कुछ लोग इस बात को समझते ही नही, उंनको इस संकट में भी केवल अपने आनंद और इधर उधर जाने का उतावलापन होता है। उनका कहना है कि उंनको कुछ नही होगा। जबकि दिन रात WHO समेत सरकार प्रचार कर रही है कि किसी को संक्रमण हो जाये ,तो उसको क्षति न  भी हो लेकिन वो फैला सकता है। इसको आने ही नही देना है।  इस बात की गांठ मार लो। सावधानी हटी दुर्घटना घटी।
इस बीच एक अविश्वसनीय घटना पूरे विश्व में लोग देख रहे है। आजकल नीला आकाश इस बात का पुख्ता सबूत है कि पर्यावरण मूल रूप में स्वछ ही रहता है। ये हमारे विकास के गलत मॉडल का परिणाम है। साफ हवा का आनंद हम सब ले रहे है। बिना किसी आंदोलन और प्रोटेस्ट के भी सब कुछ स्वछ हो चुका है। पेड़ों के पत्ते भी साफ और चमकीले दीख पड़ते है।दूर तक साफ दिखाई पड़ रहा है। ये अद्भुत नजारा दशकों बाद देखने को रहा है। ये एक नया आयाम दुनियां को देगा और एक रिफरेन्स की तरह इसका इस्तेमाल करना होगा।
इस पोस्ट को 6 मई  को लिख लिया था। लेकिन पोस्ट आज कर रहा हूँ। आगे विस्तार से लिखूंगा।
रमेश मुमुक्षु
9810610400
16.5.2020

Sunday, 8 March 2020

होली मुबारक

(होली मुबारक )
2.3.2018 
यमुना मैली गंगा मैली 
मैली सबरी नदियां
मैले पोखर जोहड़ मैले
मैले होते सागर  सबरे 
मैला होता सागर तट
पिघल रहा हिमालय 
भैया पिघल रहे है 
दोनों पोल 
मैली कुचैली 
यमुना जल में 
 कैसे कान्हा खेले 
होली 
कैसे मारे भर पिचकारी 
काला काला पानी 
राधा है जाएगी कारी
कान्हा के रंग में डूबे बिना 
है जाएगी राधा कारी 
राधा है जाएगी कारी
रूठ गई राधा कान्हा से 
दूर रहो यमुना के तट 
से 
बदबू से भरी बयार बहे
कैसे जाए यमुना के पार
पहले कान्हा साफ करो 
द्वापर की यमुना को लाओ 
निर्मल जल शीशे सा दमके 
फिर खेलूंगी होली 
फिर से उठाओ अपनी उंगली
 सुदर्शन चक्र फिर से चलाओ
 यमुना गंगा स्वछ बनाओ
फिर खेलेंगे जल संग होली 
पिचकारी भर भर मारेंगे 
भिगो भिगो के खेले होली
नीले जल को देखे कान्हा
 बीत गया एक पूरा युग 
बहुत हुआ अब नही चलेगा 
ठान लिया मैंने मन में
नीले जल में खेलेंगे होली 
भिगो भिगो के खेले होली 
होली होली होली होली 
नीले रंग की आई होली 
यमुना गंगा झांक रही है
नभ को देखो निहार रही है
अब खेलेंगे होली कान्हा 
अब खेलेंगे होली ।
रमेश मुमुक्षु

मुझे होना है औरत

(विश्व महिला दिवस )
8.3.2018 
(मुझे होना है औरत)
हाँ वो घूरता है 
जिस्मखोरों की तरह 
आंख में उसके शैतानी 
झांकती है
बस हो गया अब घूरना और 
छेड़ने का सिलसिला औरतों 
का जिस्म 
किसी की जागीर नहीं 
उसका भी अपने पर पूरा 
हक है
मना करना उसको भी आता 
है 
लेकिन अब तक उसने 
केवल चुप्पी ही साधी
अब बहुत हुआ 
चुप चाप रहने की सजा 
अब नहीं सह सकेंगे
हम छुना चाहते है
आकाश को 
स्वयं और बेरोकटोक
नुक्कड़ पर खड़े 
होकर बात करने का 
मज़ा अब हम भी लेंगे
मन करेगा तो अकेले दूर तक 
चलने का 
तो चलेंगे 
अकेले 
डर ही रोकता है
मंजिल तक जाने को
ठिठक जाने का सिलसिला अब 
तोडना है
बिंदासपन और 
घूमने का मज़ा अब आएगा।
रात के चाँद का मज़ा 
लेना हमारा भी हक है
बालकनी पर खड़े रहने 
का मज़ा हम क्यों न लें
छत पर घूमने को तरसना 
अब नहीं होगा
चाय के नुक्कड़ पर
करेगे गप शप और 
राजनीति पर बहस
क्योंकि अब मर्ज़ी से 
डालेंगे वोट
ऐसा भी नहीं कि
हम औरत होना छोड़ 
दे लेकिन केवल औरत 
ही बने किसी की 
मोहताज़ नहीं
प्रेम से कोई बोल ले 
चल ले साथ
केवल साथ
सहज और स्वभाविक 
जो औरत को औरत
और मर्द को मर्द बनाता है
औरत को गुलाम और मर्द को 
मालिक बनाने का 
घेरा तोडना है
हाँ  तोडना है 
अपने चारों और 
का घेरा जो 
हमें गुलाम बनाता खुद का 
चलों अब खुली हवा में
घूम आये 
देख ले दुनिया का फेलाव 
और आगोश में भर ले
आज़ादी के पल 
जो केवल एक कदम दूर है
केवल एक कदम दूर
रमेश मुमुक्षु

Tuesday, 3 March 2020

संवाद को बचाना है । 3 मार्च 2017 फेसबुक की पोस्ट

(संवाद को बचाना है) 3 march 2017 facebook ki post.
पिछले  वर्षो से यकायक देश के  आम नागरिक  इतना अधिक सजग हो गया कि अब लोग ही सब फेंसले स्वयं ही कर लेने को आतुर है। युवा का गुस्सा जब किसी के द्वारा संचालित होता है तो वो कुछ भी कर गुजरने को आतुर होता है। ये आज तक दुनियां के सामने मजबूरी है कि सीमा , सेना  दुश्मन और सुरक्षा एक साथ रहते है। मानवता ने अभी भी एक साथ रहना पूरी तरह नहीं सीखा इसलिए अपने को बचाना और दुश्मन को मारने की दुधारू तलवार की नौक पर जीवन चल रहा है। पूरी मानवता इस न ख़त्म होने वाले मानव के संघर्ष को आज तक झेल रही है । आजतक सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध और उससे उपजी घृणा और संताप को मानव कभी नहीं भुला सका। लेकिन उसी वक्त बुद्ध की निर्मल बयार ने उस भयानक त्रासदी को लम्बे कालखंड के लिए शांति की धारा की और मोड़ दिया। दुनियां ने इतिहास में युद्धों का शोर और चीत्कार सुनी और आकाश के विस्तार में उनकों गुम होते देखा है। विश्व युद्ध की याद अभी भी लोगो के जहन में है ही। इन विश्व युद्धों में केवल मानवता की हार ही हुई थी। हिटलर का पागलपन लोगो को याद ही है   मानव मूल रूप से अपने अस्तित्व की रक्षा के प्रति सजग रहा है। लेकिन मानव ने अपने उद्विकास की यात्रा में एक साथ रहना भी सीखा लिया है।
मानव ने विभिन्न विचारों को सुनना भी सीख लिया है। जो मानव की बड़ी उपलब्धि है। लेकिन मानव में  समय समय पर विभिन्न विचारो के प्रति दुश्मनी का भाव आता रहता है। एक मानव की कमजोरी है की किसी एक बात से ही हम पुरे देश जाति और धर्म के दुश्मन बन सकते है। विगत में ऐसे उद्धरण हमारी यादों में है। इसलिए आदमी ने संवाद का आपस में बात करने का एक माध्यम बनाया। संवाद और किसी बात पर आपस में विरोध के बावजूद भी बात करना। इसी तरह विभिन्न संसथान मानव ने खड़े किये ताकि व्यक्तिगत रूप से निर्णय न लेकर संस्थान अपने नियम के अनुसार आगे बड़े। अभी एक लड़की ने अपने विचार व्यक्त किये चारों और ऐसा माहौल बन गया की कोई भी अपनी समझ में गलत सही है का निर्णय लेकर आम आदमी ही कुछ कर देने को तैयार है ।  देश में अफरातफरी का माहौल ऐसे ही बन जाता है। आज़ादी की इतनी गहन बहस की अचानक जरुरत आन पड़ी। अचानक हम केवल नेशनल और एंटी नेशनल में बंट गए लगते है। अभी जनरल रावत ने किसी सैनिक के द्वारा कोई शिकायत की बात पर सोशल मीडिया पर कुछ कहने पर रोक की बात कही वही गृह राज्य मंत्री की सैनिक का विडियो अपलोड कर देता है। उस लड़की को क्या क्या कहा दिया। अगर कोई भी कुछ कहता है तो उसके लिए हमने प्रावधान रखे है। उसके तहत कार्यवाही करें और बहस करें। 
इन बातों से देश कमजोर होता है। सबसे बड़ी बात है की हम लोग किसी भी घटना को कैसे समझ कर उसपर क्या प्रतिक्रिया दें, ये जरुरी बात है। हम अगर संवाद को ही ख़त्म कर देंगे तो क्या रहेगा शेष। अचरज का विषय है कि हमारी सोच और विवेक किसी एक विचार और घटना के आधार पर ही संचालित हो सकती है। हम सब जानते है , देश में वोट की राजनीति हमेशा ही रही है। बहुत कुछ हमेशा ही अच्छा हुआ हो ऐसा भी नहीं। लेकिन ये सब उद्विकास की प्रक्रिया है। ऐसा हमेशा ही होगा। लेकिन संवादहीनता किसी भी काल के लिए सबसे खतरनाक स्थिति हो सकती है। इससे ही देश को बचाना है। भावना भड़काना मानव की कमजोरी है  किसी एक बात को इतना ऊँचा ले जाया सकता है की आपस में संवाद हीनता की स्थिति पैदा हो जाये।
सारे मुद्दे कही छिप जाते है। हालाँकि हमारे देश में लोकतंत्र की ताकत है ही। हम सबका फर्ज है की संवाद को खत्म करने के किसी भी प्रयास का विरोध करें। अपनी बात रखे। उस लडकी को जिसने भी नुक्सान पहुचानें की बात कही उसका विरोध करना हम सबका फ़र्ज़ है। बात होने दो। केवल प्रचार और सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से ऐसा माहौल न बन जाये जिससे आपस में ही संवादहीनता पैदा हो जाये। देश केवल सेना से ही सुरक्षित नहीं होता । वो सुरक्षित होता है संवाद और आपसदारी से । विभिन्न विचार को स्वीकार करके आगे जाने में। देश  द्रोह की परिभाषा सड़कों पर तय मत होने दो। वर्ना मौका परस्त ऐसी परिस्तिथियों से लाभ उठा सकते है। ऐसा एक बार नहीं बार बार हुआ है।
किसी भी देश की ताकत उसका संवाद ही है। देश इतना कमजोर नहीं है कि हम संवाद को ही ख़त्म करने को अमादा हो जाये। 
नफरत को दिमाग में हावी मत होने दो। नफरत आदमी को स्वयं ही नष्ट कर सकती है। आदमी ने इतिहास में कितनी बार इस घृणा और नफरत से मानवता का नुक्सान किया है । ऐसा करने से पहले हमेशा संवाद को रोकने का प्रयास किया गया है। 
बाकी देश मजबूत संवाद से बनता है। ये आदमी ने अपनी लम्बी यात्रा में सीखा है। 
रमेश मुमुक्षु

Tuesday, 18 February 2020

(सीख ले इन पेड़ों से ) 24 जुलाई 2019

( सीख ले इन पेड़ों से)
अरावली पर्वत श्रृंखला जैसे कितने पहाड़ मिट  गए जमीन में
सभ्यतायें धूल में मिट गई
अवतार और पैगम्बर भी आये और गए
दुनियां में महायुद्ध हुए और
इतिहास में गुम हो गए
बड़े बड़े खूंखार दरिंदे आये और
खो गए
महायोद्धा आये और जीत कर 
चलते बने
धरती ने कितने ही रूप बदल लिए
आदमी के आने से पहले क्या क्या गया बदल
विशालकाय जीव भी धरती में समा गए
अभी वर्तमान दौर में अदनी सी जान लिए 
हाथ में खुद की मौत का
रिमोट लिए आदमी एक दूसरे डरा रहा है
समझता है सारी कायनात उसकी मुट्ठी में आ जाये
सबको अपनी औकात मालूम है
लेकिन माने कौन
आदमी के विकास की बानगी देखें जिस पानी से जिंदा है
उसको ही दूषित कर रहा है
अपनी शांति भंग करने को शहर बना लिया और अब अपने शहर 
से दूर जाकर उसको भी बर्बाद करने ही होड़ लगा है
इसको मार उसको मार 
इसको दबा , उसको खोल, उसको पटक , उसको उठा
इसी तरह जीवन ये सब चलता है
सांस भीख की
जिंदगी उधार की
एक पल का भरोसा नही 
ऐंठ आकाश पाताल की 
कही तो रुक 
उँगलीमाल भी रुक गया था
माना अभी तथागत नही है
लेकिन अनुभव तो है ही
सीख ले कुछ घांस और पेड़ों से
आज भी हरे भरे है।
मानव से पहले थे और आगे भी रहेंगे 
ये तय है
इसलिए अपनी औकात में रह
पीर पगम्बरऔर देवी देवता भी 
भी गए
मानव तो बुलबुला है
फूटना ही है
लेकिन इसने पूरी धरती आकाश 
नीचे ऊपर तबाही मचा रखी है
होश में आजा
टूट गया विशाल बर्फ़ का पहाड़ 
अंटार्टिका से
भूकम्प के ऊपर  रहती है 
पूरी दुनियां
इसलिए अब भी जान लो 
समझ लो 
इन  पेड़ो और जंगल से सीख 
जो आज भी तमाम मानव की 
गंदगी झेल कर
भी खड़े है
उसकी बेवकूफी और नादानी पर
हंसते है
मालूम होते हुए भी 
वो प्रकृति का विनाश करता है
विकास के नाम पर
मौत का सामान जोड़ रहा है
पटाखे से परहेज करता है
और एटम बम बनाता है
धुंए से डरता है
युद्ध में झोंक देता है
दुनियां को
खुद बनाता है
बिगड़ता है
रोता है 
रुलाता है
पछताता है
तुलसी को पूजेगा
जंगल को उजाड़ देगा
चींटी को दाना देगा 
वन्य प्राणी को
खत्म करेगा
खुद की झोपड़ी 
को बचाने पर मर मिटेगा
प्राणी के परिवेश को उजाड़ देगा
कब रुकेगा ये गड़बड़ झाला 
एक हाथ में बंदूक और दूसरे हाथ में कबूतर लिए शांति दूत बना 
घूमता है
दिन रात प्रलय का सामान लिए 
रिमोट के साथ
चिप में बंद अपनी मौत का 
प्रोग्राम थामे ।
रमेश मुमुक्षु

Sunday, 9 February 2020

बचपन के स्मृतिशेष

बचपन के स्मृतिशेष
बचपन की यादें आदमी के संग उसकी मौत तक साथ रहती है।।हटाने सेऔर बलबती हो उठती है।  दो तरह के आदमी होते है ,एक वो जो बचपन की यादोँ से दूर भागता है क्योंकि वर्तमान के रंग बिरंगे पैबंद जो लगा रखे है, लेकिन एक बात दीगर है कि शतप्रतिशत तो कोई भी कह नही सकता। लेकिन कुछ अपने तरीके से लिखने का मन कलम चलवा ही देता है। 70 के दशक के बच्चे  उस समय ग्रामीण परिवेश को कुछ कुछ जी रहें थे। हाफ पैंट जिसको  निक्कर बोलते थे , टल्ली से ढकी रहती थी। एक दो कपड़ो के बादशाह होते थे ,बच्चे जो पढ़ाई में बीच वाले होते थे। पढ़ाई का  अर्थ जो पास हो जाया करते थे। मोती बाग का जिक्र करके बहुत कुछ स्मृति के सागर से लहर बन कलम पर टकरा रहा है। मोती बाग प्राइमरी स्कूल और उसके बाहर बैठने वाले टोकरी में इमली, लाल इमली, टाटरी, आमपापड़, अभ्रक, चूरन की गोली, संतरें की गोली, गटारे , लालबेर, बर्फ का गोला बिकता था। बद्री, चुलबुली दो मोटे तौर पर टोकरी लिए बैठते थे। दोनों एक दूसरे को कुछ कुछ बोलते थे। बिज़नेस में प्रतिस्पर्धा ही थी वो छोटे स्तर की। आधी छुट्टी हुई बच्चे  एक पैसे से लेकर 5 पैसे लेकर निकल पड़ते थे ,इन हॉकर्स के पास। भैय्या मुझे..... दे दो। कुछ उस्तादी भी करते थे ,एक आध गोली गोल कर लेते थे , भीड़ का फायदा उठा, चोरी कम खेल अधिक रहता था। जिस दिन बर्फ का गोला खा लिया और घर पर खांसी हो गई तो शामत समझों, पिटाई ,जो एक रूटीन ही था। पिताजी के सामने बच्चे भटकते भी नही थे। एक तो लगभग सभी आखिरी औलाद थी, कितने तो पैदा होते ही , मर जाते थे। हालांकि आज भी कितनी बार पेरेंट्स और बच्चों की उम्र में अंतर हो ही जाता है। 
जो कुछ पिताजी को कहना होता तो माँ के पीछे लग जाओ। स्कूल से भी कभी कोई पर्ची नही आती थी। शायद 13  पैसे या कुछ अधिक फीस फीस होती थी। 
किताबे पुरानी ही चलती थी। कॉपियां राशन की दुकान से आती थी। उस समय लकड़ी की तख्ती का इस्तेमाल होता था। स्लेट और चौक से रफ़ काम हो जाता था। स्लेट भी पत्थर की और टिन की होती थी। पत्थर बच्चे बोलते थे वो एक तरह से टाइल्स की तरह होती थी। 
जितना लिखो और मिटा दो। कपड़ो की शामत होती थी। नाक का निकलना भी खूब होता था। नाक बही और हथेली और कोहनी के बीच से लपेट देते थे या सुड़क लेते थे, नाक का निकलना और सुड़क लेने का सिलसिला कितनी बात पिटाई तक जाता था। रुमाल कम ही होते थे। बच्चों के गंदे होने में कलम दावत भी शामिल थे। इसके अतिरिक्त होल्डर भी हाथ और कपड़े नीले करता था। बॉलपेन होते नही थे, जो थे, वो जेब के दुश्मन थे। चलते ठीक नही थे। बच्चे उसकी निब निकाल कर फूँक ही मरते रहते थे। एक तो बच्चे पढ़ते नही थे, दूसरी और ये सब समान बच्चों का समय खराब  भी करते थे। बच्चे भी खुश ही रहते थे। फाउंटेन पेन की निब ठीक नही चलती थी ,तो फर्श पर मार के तोड़ देते थे। कॉपी किताबो का अल्लाह मालिक होता था।......
शेष आगे....
रमेश मुमुक्षु