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Sunday, 16 August 2020

क्या मानव प्रकृति के सामने बौना है, क्षुद्र हैं और है , अशक्त ?

क्या मानव प्रकृति के सामने बौना है, क्षुद्र है और है , अशक्त ?
कोरोना तुम काल बनके आये 
किस मकसद से ये कौन जाने 
तितर  बितर कर दिया तूने आदमी का दम्भ और न झुकने का झूठा संसार 
भरी दुनियां में अपनों के चार कंधें भी नही मिल पा रहे है, विडंबना तो देखों सेवा से वंचित आदमी मृत्यु  शैय्या पर कितने अपनो से दूर जाता अनुभव करता होगा।  सब कुछ जो उसने अपने से बुनी दुनियां हथेली से फिसलती जा रही है। सब कुछ लॉक डाउन में तब्दील होता गया। कितना कुछ ठहर सा गया है। लेकिन आदमी के भीतर एक जिद है ,जो उसको आगे और पीछे ले जाती है। उसके बनाये सर्वनाश करने वाले सारे हथियार कितने लाचार है ,कोरोना के सामने ,जो अदृश्य सा सबको लील रहा है। एक बार पुनः प्रकृति से मानव का द्वंद आरम्भ हुआ है। एक बात तय हो गई कि मानव प्रकृति के सामने कितना बौना है, क्षुद्र और है , अशक्त । लेकिन क्या ये सच है कि केवल एक बात?
लेकिन वो इसमें भी उभर जाएगा और समझेगा की वो पुनः जीत गया। फिर उसकी यात्रा पूर्ववत आरम्भ होगी। फिर वो पर्यावरण को भूल जाएगा ,भूल जाएगा कि कोरोना के डर से वो दुबक गया था। फिर होगा ,पहले की तरह जीतने हराने का सिलसिला और भूल जाएगा ,की वो लॉक डाउन में दार्शनिक और चिंतक बन गया था।
उसने एक क्षण में नदियों, आकाश ,जल थल को स्वयं साफ होते हुए देखा और चमत्कृत हुआ था। वन्य प्राणियों को अपने प्राकृतिक  रास्तों से गुजरते हुए देखा था ,जो वो भूल चुका था। लेकिन जो दुनियां हम बुन चुके है, उसमें से कैसे निकले और जमीन के एक एक कतरे को कैसे प्रेम करें ? ये हम  भूल चुके है। जीतना ही हमें याद है। जीतने के लिए ये तय है ,किसी को हराना ही होगा। ये जीतने और हराने  के सिलसिले से ही धरती को हम भूल जाते है, कि हम उसके ऊपर निर्भर है और उस पर ही उल्टे लटके से लगते है ,अगर दूर आकाश से देखें तो। 
क्या लॉक डाउन आत्म मंथन था कि बस किसी वर्षा के दौरान  भीगने से बचने के लिए तनिक किसी पहाड़ से निकली चट्टान के नीचे खड़े हुए टाइम पास ? ये   तो सोचना ही होगा , ये तय है।
रमेश मुमुक्षु 
अध्यक्ष ,हिमाल 
9810610400
15.8.2020

Tuesday, 11 August 2020

कृष्णजन्मष्टमी 2020 ऐसे भी मनाई जा सकती है।

कृष्णजन्मष्टमी 2020 ऐसे भी मनाई जा सकती है।
"सेस महेस, गनेस, दिनेस, सुरेसहु जाहिं निरन्तर गावैं
जाहि अनादि, अनन्त अखंड, अछेद, अभेद सुवेद बतावैं
नारद से सुक व्यास रटैं, पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पे नाच नचावैं " :रसखान द्वारा रचित काव्यपंक्ति श्री कृष्ण के होने का पूरा विवरण प्रस्तुत करती है। लेकिन इस बार कोरोना के कारण ,रास लीला, झूला, डीजे, टेंट, बच्चों के नृत्य और मंदिर में भीड़ न हो ऐसा ही हम सबको करना है। लेकिन कुछ अतिउत्साही होते है, जिन्हें केवल हांडी फोड़ जैसे कार्यक्रम करने ही है। उनसे भी आग्रह है कि कृष्ण लीला को घर बैठकर भी किया जा सकता है। सूरदास की काव्यपंक्तियों का आनंद ले:
मैया! मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो॥
मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।
मो सों कहत मोल को लीन्हों तू जसुमति कब जायो॥
कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत॥
दुरि देखति जसुमति यह लीला हरष आनंद बढ़ावत।
सूरदास के पदों का आनंद ले ,उनके बारें में कहां जाता है कि वो सबसे महान कवि थे ।
"सूर सुर तुलसी शशि ।,उडगन केशव दास।
अबके कवि खद्योत सम ,जहँ तहँ करहिं प्रकाश ।।"
इस बार सोशल डिस्टेंस, मंदिर में भीड़ न हो, सुरिक्षत रहे और औरों को भी होने दें। हमें नही भूलना है कि कल 60000 कोरोना के केस आएं है। भले लोगों की मरने की संख्या कम है, लेकिन मर ही रहे है। ऐसे में बहुत हर्षोउल्लास न करके उन सभी जो कोरोना के कारण हम सब से दूर हो गए। उस सभी जो कोरोना की जंग में हम मृत्यु को प्राप्त हुए। इस पावन दिवस हम उन सब को भी याद करें। कान्हा को घर बैठकर कर भी याद किया जा सकता है। कभी किसी ने सपने में भी नही सोचा था कि स्कूल बंद होंगे, मेट्रो बंद हो सकती है, कोर्ट, रेल ,हवाई जहाज, सिनेमा हॉल और सभी मनोरंजन बन्द है। इसलिए गृह मंत्रालय के निर्देश का पालन करें।
इस बार मथुरा ,वृंदावन भी शांत है, जैसा माहौल हो ,उसके अनुसार ही व्यवहार करना , उचित होता है।
आओ सभी मिलकर कोरोना के विरुद्ध खड़े हो और शीघ्र ही सब सामान्य हो इसके लिए आगे बड़े।
गोपियों की तरह कान्हा को दूर से स्मरण  करें और पढ़े ऊधव गोपियाँ संवाद : 
"ऊधौ मन ना भये दस-बीस
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, कौ आराधे ईस ।"
राधे कॄष्ण राधे कृष्ण
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष हिमाल
9810610400
11.8.2020

Wednesday, 5 August 2020

इसको ही राममय होना कहते है

                 
असीम शक्ति की पराकाष्ठा लेकिन क्रोध रहित विनय भाव से परिपूर्ण आज्ञाकारी एक क्षण बिना सोचे स्वीकार करने वाला विशालतम व्यक्त्तिव शत्रु को भी गले लगाने का अदम्य साहस जो शत्रु वध कर उसका भी तर्पण कर सकने की असीम शक्ति जीवनपर्यत्न संघर्ष माता पिता भाई बंधु भार्या से दूर वनवासी बन विनयपूर्ण परंपरा को अक्षुण्ण रखते हुए चक्रवर्ती सम्राट को क्षण में तजकर अंगवस्त्र तक त्यागकर एक नही दो नही 14 वर्ष वनवासी बनने जैसी अग्नि परीक्षा को सहर्ष स्वीकार कर पिता के वचन को शीश चरण पर रख तजना राजा हरिश्चन्द्र का का वंशज ही कर सकता है प्रजा की सुनने वाला जिसने एक अंतिम व्यक्ति की शंका के आधार पर सीता को भी अग्नि होम में समर्पित किया जो आज तक विमर्ष  का विषय है लेकिन उसके बाद कहाँ पर आनंद और रस से परिपूर्ण जीवन रहा अपनी ही संतान के संग अश्वमेघ युद्ध लड़ा लेकिन अडिग रहा ऐसा व्यक्तित्व जिसका कौन कर सकेगा अनुकरण और अनुसरण  पूरे जीवन भर  गांडीव धारण किया लेकिन  जिसने एक बार ही क्रोध किया केवल समुद्र की हठधर्मिता को तोड़ने को अपने सबसे बड़े शत्रु का वधकर उसके चरणों की ओर खड़े होने का साहस और आसीन प्रेमभाव जो दंभरहित हो जिसके विराट रूप को देखकर शत्रु को प्रतिशोध से परिपूर्ण होना चाहिए था लेकिन भवविहल हो तर्पण के लिए शीष झुका लेता था क्योंकि ये मात्र जीत के लिए युद्ध नही था सत्य के लिए युद्ध थे सदियों से प्रतीक्षा में शापितों का तर्पण जो करना था ऐसे एक मात्र जो अवतरित होते है नाना रूप में ऐसे श्री राम का आगमन हम उनके ऋणी क्या कर सकेंगे उनका स्वागत जल जंगल जमीन वायु पाताल मानवता आपसी प्रेम त्याग बड़ों का सम्मान रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई को क्या हम किंचित मात्र भी अंगीकार कर सकते है आज कितनी निर्भया न्याय को  तड़प रही है कितनी निर्भया को दिन रात प्रताड़ित किया जा रहा है रावण से बड़े दुष्ट आज मानव समाज में सम्मान पाते है सत्ता के लोलुपता से परिपूर्ण चक्रवर्ती राज को एक क्षण में तजने वाले राम को हम क्या स्वागत कर सकते है शत्रु के वध के बाद भी सम्मानपूर्ण रावण से उनके ज्ञान को नमन करने वाले राम जैसा व्यक्तित्व क्या हमारे भीतर अवस्थित है विद्यमान है कदापि नही लेकिन अब राम जैसा तो संभव नही लेकिन प्रेरित हो एक कदम तो उठाने की चेष्टा की जा सकें ऐसा प्रण लिया जाए अगर प्रण पर टिके रहने का साहस है तो वरना राम को  ह्रदय से स्मरण कर व्यक्तित्व में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगे जिसके बाद जल जंगल जमीन समेत मानवता के प्रति दृष्टि बदले का भाव  ही रामभक्ति का आरम्भ होगा तभी हम राम को दिल से बुला सकते है ताकि उनको लगे कि जो रामराज्य जो  वो छोड़ गए वो अभी भी अस्त्तिव में है श्री राम कहने से क्रोध नही श्री राम का भाव प्रकट होना चाहिए जो क्रोधरहित तेजोमय और विराट हो इसलिए राम होना तो असंभव है लेकिन राम की अतिसूक्ष्म छवि और छाया को अनुभूत करना भी व्यक्ति को राममय बना सकता है केवल दो पंक्ति ही राममय कर सकती है 
*होइ है वही जो राम रचि राखा को करे तरफ बढ़ाए साखा* 
इसको स्वीकारना सरल भी है और असंभव भी है तय हमें करना है क्योंकि मानव मन को स्वयं मानव ही जान सकता है कि भीतर क्या है अगर राम की कृपा रहे और राम की कृपा स्वयं को उसमें विलीन करने की यात्रा से ही आरम्भ होती है और ये यात्रा का कोई आदि अंत नही केवल उस क्षण की प्रतीक्षा ही एक मात्र विकल्प है विडंबना है कि प्रतीक्षा भी करनी नही है निर्लिप्त भाव से परिपूर्ण हो मात्र दर्शनाभिलाषी बन कर्तव्यपूर्ण करते हुए इसको ही राममय होना कहते है ।

(रमेश मुमुक्षु)
अध्यक्ष, हिमाल 
5.8.2020

Wednesday, 29 July 2020

मास्क की आत्मव्यथा : कोरोना संकट में

मास्क की आत्मव्यथा : कोरोना संकट में
हे ,मूढ़मते मानव मुझे मालूम है ,तेरी फितरत । तू उपयोग करके भूल जाता है ,और फेंक देता है। तुझे केवल अपनी ही चिंता रहती है। लेकिन तू भूलता है कि तेरे पुरखे अभी भी पृथ्वी पर कहीं कहीं रह रहे है। वो हज़ारों वर्षों से एक जैसा जीवन जी रहे है। वो आज भी प्रकृति पर ही निर्भर है। लेकिन तू आगे निकल गया। तूने जल,थल,नभ एवं अंतरिक्ष से सभी का तेजी से दोहन करना आरम्भ कर दिया। 
ऐसा नही कुछ मानव ऐसे हुए जिन्होंने तुझे हज़ारों वर्ष पहले ही चेता दिया था कि प्रकृति के संग मिलकर चल ,उतना ही ले ,जितना उपयोग हो सकें। लेकिन  तेरी भूख मिटती नही। 
कोरोना ने एक बार तो तुझे घरों के भीतर ही दुबका दिया। पूरी दुनियां ऐसे दुबक गई ,जैसे छोटा सा मूषक बिल में डर के घुस जाता है।  कोरोना के डर से बड़े बड़े तीस मार ख़ाँ बिलों में दुबक गए। पूरा विश्व सकते में आ गया । मौतों का सिलसिला तेजी से शुरू हो गया। 
जो देश अपनी सामरिक शक्ति का दम्भ भरते थे,वो भी अदृश्य आपदा के आगे घुटने टेक गए। उनके घातक से घातक अचूक हथियार भी कुंद हो गए। खेर ,आदमी भी जिद्दी है,इसका भी उपाए खोज कर अपनी चाल से ही चलेगा। 
जिन्हें विश्व अवतार या भगवान का दर्जा देता है, उनकी एक छोटी सी बात भी कभी किसी नही मानी की मानव एक ही है,उसमें भेद नही है। पृथ्वी और प्रकृति सबके लिए एक समान है। इसलिए एक साथ भाई चारे के साथ रहो। लेकिन एक दूसरे को नेस्तानाबूत करने की होड़ में विश्व लगा है । जिस पेड़ पर बैठा है,उसी डाल को काटने में लगा है , इंतजार है कि ये डाल कब कट कर गिरती है। 
हथियार ऐसे की एक ही पूरी मानवता को खत्म कर सकता है। लेकिन इस मूढ़मते को कौन समझाए?
कोरोना जैसी अवस्था मानव इतिहास में पहली बार हुई है। 40 दिनों में ही सारा प्रदूषण जाता रहा और ये प्रमाणित हो गया कि प्रकृति तो शुद्ध ही है। ये मानवकृत गंदगी और प्रदूषण के कारण ही सब कुछ प्रदुषित था।
लेकिन इसको कोई अंतर नही पड़ेगा ।मेरा उपयोग कोरोना के संक्रमण से करने के लिए करता है। बहुत बार कोरोना मुझ पर बैठता है। मैं उसको मानव के भीतर जाने से रोक देता हूँ। जिसके कारण बहुत सारे लोग अपनी जान बचा सकें है। लेकिन ये मानव अभी भी बाज नही आ रहा है।मुझे कही भी फेंक देता है।जबकि कुछ समझदार लोग बोलते बोलते थक गए कि इनको यहाँ तहां न फेंक। लेकिन आदमी की पुरानी आदत कि उपयोग करो और भूल जाओ। इस बार भी उसको अक्ल नही आई। हालंकि ये इतना पक चुका है कि मानने को राजी नही। 
लगता था कि ये सबक सीखेगा , वहीं ढाक के तीन पात । कहता फिरता है कि मास्क पहनना जरूरी है। इस्तेमाल के बाद इसका निस्तारण एतिहात से करना जरूरी है। लेकिन फिर भी मुझे अपनी जान बचाने के लिए  पहनता है और फिर मेरा तिरस्कार कर फेंक देता है। जब अभी भी नही सुधरा तो आगे क्या सुधरेगा, ये सोचने का विषय है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल
9810610400
29.7.2020

Wednesday, 15 July 2020

शहरी विकास: जिसकी लाठी उसकी भैंस। द्वारका उपनगर के संदर्भ में

शहरी विकास: जिसकी लाठी उसकी भैंस
द्वारका उपनगर के संदर्भ में
हम सबको याद ही होगा , जब द्वारका उप नगर ,जिसको पपन कलां प्रोजेक्ट कहा जाता था, आरम्भ हुआ ,उस वक्त एक भी पेड़ द्वारका उप नगर में नही था। अधिगृहित होने से पूर्व ये सब कृषि भूमि थी,कितने ही गांवों की। शहर और महानगर बनते है ,कृषि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता जाता है।  मधु विहार के पास एक पीपल का बड़ा पेड़ था, उसके नीचे ही बस स्टॉप हुआ करता था। नाले के ऊपर सिंगल रोड़ हुआ करती थी। जो लोग अपनी घोड़ा गाड़ी में चलते है, वो शायद न भी जानते हो। 
मेरे कितने पहचान वालों के फ्लैट द्वारका में  निकले ,लेकिन जंगल में कौन जाए , या तो बेच दिया ,या कहीं और मिले कोशिश में लग गए। यहां के डीलर और बिल्डर बोला करते थे कि अभी मेट्रों आने को है, कुछ बहुत पुल बनेंगे। डाबड़ी, एयरपोर्ट , विकास पूरी को जोड़ा जाएगा। साध नगर होते एक सीधा रास्ता जुड़ेगा। ये एशिया का सबसे  बड़ा उप-नगर है। स्पोर्ट काम्प्लेक्स और न जाने क्या क्या होगा। पालम फाटक पर फंसें सभी द्वारका वासी दुआ करते थे कि कब पुल बनेगा और हम सब घर जा सकेंगे। मैं तो बस वाला था, अभी भी हूँ, 3 से 4 घंटे भी कई बार फंसा। साउथ कैम्पस पुस्तकालय  में दिमाग घिसने जाने में घंटों फाटक पर लटके रहो और सरकार से लेकर सबको कोसते राहों। उस वक्त ठेला और BMW एक साथ फाटक पर फंसें किस्मत को कोसते रहते थे। तभी खबर मिली की पालम पर फ्लाई ओवर ब्रिज बनेगा ,तो सभी फंसने वाले उस शुभ दिन का इंतजार करने लगे।लेकिन जिन्होंने पालम कॉलोनी आदि में कभी जमीन ली थी और जो कुछ पैसा पानी रहा था,  प्राइम लोकेशन वाला प्लाट लिया होगा ,उनके लिए ये विनाश ही लगता था। लेकिन पब्लिक इंट्रेस्ट के नाम पर सब कुछ हो सकता है, खुद को लाभ हो ठीक,  नुकसान हो तो गलत ।  खेर,  द्वारका के लोगों के लिए वरदान सिद्ध हुआ। 
 मेट्रों ने सही अर्थों में द्वारका में लोगों को आकर्षित किया था। मेट्रो के साथ ही द्वारका लाइम लाइट में आ गया। 
अभी भी द्वारका के बड़े बड़े ग्रुप ,संस्थाएं द्वारका से निकासी की कितनी ही योजनाओं के लिए डी डी ए के आला अधिकारियों से मिलते हुए, फ़ोटो शेयर करते है। 
बात पालम फ्लाई ओवर की हो रही थी। कॉलोनी के बीच से निकला और को लोग बिल्कुल सटे हुए रहते है, उनके जीवन में शोर और न रुकने वाला शोर स्थाई हो गया है ।कभी किसी छोटे से रेलवे स्टेशन की रेलवे कॉलोनी में बाहर सो कर इसका आनंद लो। ट्रैन सरपट निकल जाती है, लेकिन जो पहली बार सोते है, उन्हें लगता है कि ट्रैन ऊपर तो नही आ रही। 1995 में महारष्ट्र के किसी छोटे से स्टेशन की कॉलोनी में बाहर सो कर मैंने ये अनुभव लिया था । लेकिन जो रहते है, उनको आदत पड़ जाती है।
विकास की आधुनिक अवधारणा एक का विकास और दूसरे के विनाश से ही सम्भव है।नांगल के पुल से नांगल की सारी कॉलोनी दिन रात के शोर में रम गए होंगे ,शायद। अब दूसरा उपाए भी क्या होगा? आजकल को लोग द्वारका एक्सप्रेसवे में रहते है, उनको भी सरकार और डीलर कहते रहते है कि बस थोड़ा सा रह गया ,फिर द्वारका से जुड़ जाएगा। 10 मिनट लगेंगे। ये हर प्रोजेक्ट की कहानी है। अब ये बात केवल चंडू खाने की ख़बर है कि सच, डाबड़ी नाले को कवर करने में जानबूझ कर देरी की गई, ताकि गुरुग्राम का तेजी से विकास हो। ऐसा बहुत बार होता है। एक समय था कि दिल्ली के गांव वाले डरते थे कि उनकी जमीन पर जे जे कॉलोनी न आ जाये। अभी पशुओं के शमशान घाट की चर्चा हो रही थी। द्वारका में आवाज उठी कि द्वारका में नही कहीं और ले जाओ। बामडोली गांव के पास की बात हुई ,तो वहां पर भी विरोध होना ही था। ये इसलिए होता है ,क्योंकि जनता से सरकार संवाद नही करती। सब गोल दूसरे के पाले में सरका दो, हम बच जाए। ये लालच और दूसरे की परवाह न करना , विकास की आधुनिक सोच का अभिन्न अंग है।
लेकिन जिन कॉलोनी में रसूखदार  लोग रहते है, वो अपने हिसाब से प्रोजेक्ट तैयार करवा लेते है। आप सभी बसंत गांव के आधे अधूरे पुल को झेल ही चुके होंगे। असल में वेस्ट एंड के रसूखदार  लोगों,  ने अपनी ओर पुल बनने ही नही दिया, जिससे एक मूर्खतापूर्ण प्रोजेक्ट बना और वर्षों सभी ने झेला। आई आई टी दिल्ली ने भी कई उपाए बताए ,लेकिन सब जनता के पैसों की बर्बादी ही थी। आई आई टी जैसे संस्थान बहुत बार जैसा सरकार चाहे अध्ययन कर लेते है। अभी फिर उस पुल को बनाना ही  पड़ा। जहाँ पर प्रभावित करनें वाले लोग रहते है, वहां पर मेट्रों जमीन के भीतर से गई। कभी कभी एक व्यक्ति ही पूरे प्रोजेक्ट को प्रभावित कर देता है।
अक्सर मैंने देखा कि प्रोटेस्ट करने में ये ख्याल रखा जाता है कि माइक किसके हाथ में रहेगा। सीधी बात है कि कौन उस दिन का नेता  होगा। मुझे याद है, एक वर्षपूर्व   गुरुग्राम में अंडरपास को लेकर प्रोटेस्ट था। मुझे भी कुछ मित्र  वाले ले गए। काफी लोग थे, नारे लग रहे थे। मेरे भीतर भी चिपको का नारा कुलांचे भरने लगा। सुंदरलाल बहुगुणा जी एवं चंडी प्रसाद भट्ट जी ने पेड़ बचाने के लिए इस नारे का शंखनाद पैदल चल के वर्षों तक किया ,जिसका परिणाम वन अधिनियम और न जाने कितने कानून और एक अलग से पर्यावरण विभाग और बाद में मंत्रालय की स्थापना हुई। स्वर्गीय एन डी जुयाल ,जिनकी 93 वें वर्ष 18 मार्च  को ,उनके ट्रस्ट  "द हिमालयन ट्रस्ट"  की स्थापना के दिन हुई। उन्होंने ही पर्यावरण विभाग की स्थापना की , जुयाल जी IMF ,भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन , के अध्य्क्ष और त्रिशुल   चोटी पर पहले भारतीय पर्वतारोहण दल की अगुवाई भी की। उनके भीतर चिपको और टेहरी बांध आंदोलन से हिमालय संरक्षण की बात स्थापित हो गई। इन आंदोलनों में शामिल होने वाले लोग विकास और विनाश की अवधारणा के मर्म को समझते थे। बहुत बार प्रोटेस्ट बहुत कुछ न  समझे ही होता है। बस अधिक लोग चाहिए।
इसलिए प्रोटेस्ट करने से पहले गहन अध्ययन और उसका विकल्प क्या है, ये जानना ,जरूरी और पहली शर्त है।
बात गुरुग्राम के प्रोटेस्ट की है।चिपको का नारा दिल से निकलता है। मीडिया की निगह तो जानी ही थी।  उन्होंने अधिक जगह दे दी तक  कुछ लोग मीडिया में कवरेज कम होने पर व्याकुल हो उठते है। शायद वो प्रोटेस्ट नारों में उलझ कर रह गया। 
जहां तक सरकारों का संबंध है, अभी भी गुप  चुप ही सब काम करती है।किसी प्रोजेक्ट की चर्चा अगर वहां पर रहने वालों से कर ली जाए और उनसे भी फीड बैक लिया जाए तो कितनी बातें साफ हो जाये ।  हालांकि कुछ लोग अपने स्वार्थ ,नाम और कितनी बार लाभ के लिए भी प्रोटेस्ट आदि का सहारा ले लेते है। इसलिए प्रोटेस्ट के लिए एक सतत सिलसिला चलना जरूरी है। 
किसी परियोजना का विरोध क्यों किया जाए ,इसका एक तुलनात्मक अध्ययन हो और संभव हो तो एक विकल्प भी दिया जाए तो बेहतर हो। सरकार को प्रोजेक्ट करना है । जो विरोध करते है, वो भी बहुत बार जिद कर देते है। दोनों का विरोध कितनी बार नाक का विषय बन जाता है। द्वारका में ही भारत वंदना पार्क को सरकार प्लाट कहती है। कुछ लोग जंगल कहते है। सरकार इसका लाभ के लिए उपयोग करना चाहती है, कुछ लोग कहते है,इसको पड़े रहने दो। दोनों किसी  भी बिंन्दू पर एक साथ नही आ सकते। 
सरकार ने DPR में लिखा है कि यहां पर सैंकड़ों गाड़ियों की पार्किंग होगी ,इसका अर्थ है कि भीड़ बढ़ेगी। इस पर चर्चा होनी चाहिए। सरकार और लोगों के बीच कोई बिंन्दू साफ नही हो पाते। फिर प्रोटेस्ट लगातार नही हो सकते। लेकिन इन पर गहन अध्ययन करके ही किसी बिंन्दू पर विस्तार से विरोध होना चाहिए। इसका पता ही नही चलता। अचानक कॉल होती है, कल सुबह किसी पॉइंट पर आना है। किसलिए , विरोध के लिए। अक्सर प्रोजेक्ट आरम्भ होने के साथ ही विरोध होने से सरकार उलझा देती है। 
दुनियां भर के लोग नजफगढ़ झील में आने वाले , विदेशी मूल के पक्षी देखने जाते है। उन सब का कहना है कि इस झील को सरकार वेटलैंड बना दें। लेकिन ताज्जुब है,उसके बगल में रह रहे गांव वाले इस झील में गुरुग्राम से निकलने वाले सीवर के पानी को करीब 20 वर्षों से झेल रहे है। पानी गांव की जमीन पर इकट्ठा रहता है। ये कभी साबी और साहिबी नदी थी। ये एक बड़ा गेप है, जिसका बिल्डर लॉबी लाभ उठा लेती है। जो प्रभावित होगा , उसको लाभ समझ आता है,  भले भविष्य के लिए विनाशकारी ही क्यों न हों। 
हम कोशिश करते है कि एक हमारे यहाँ से प्रोजेक्ट हेट और कहीं ओर ले जाया जाए। कहाँ पर ले जाया जाए ,इसका भी खाका हो तो प्रोटेस्ट में वजन रहता है।  
सरकार को हर बिंन्दू पर चर्चा के लिए तैयार रहना चाहिए। प्रोजेक्ट की सभी डिटेल ऑनलाइन डाल देनी चाहिए। प्रभावित लोगों से लंबा संवाद करना चाहिए। प्रोजेक्ट में पेड़ आदि को कैसे बचाया जा सकें, इस पर लंबी चर्चा की जा सकती है। वर्षो पहले भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के अतिरिक्त भूमि अधिग्रण पर कोई नीति नही थी। उस समय कितने ही लोगों ने सरकार को सुझाव दिए। मुझे भी अवसर मिला और बहुत से सुझाव के साथ एक बिंदु था कि प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ही कई गुणा अधिक पेड़ लगने चाहिए। पेड़ लगने के बाद ही प्रोजेक्ट शुरू हो। लेकिन आज भी एक साथ ही सब कुछ शुरू होता है। 
अंत में द्वारका उप नगर एक योजनाबद्ध तरीक़े से बनाया गया है। सरकार को चाहिए कि कोई भी प्रोजेक्ट जो भीड़ बढ़ाये , हवा दूषित करें, ध्वनि प्रदूषण बढ़ाये, पानी की किल्लत करें ,नही लाना चाहिए। मैँ तक कहता हूँ, दिल्ली में अभी किसी नए प्रोजेक्ट की जरूरत नही है। दिल्ली की carrying capacity (वहन क्षमता) करीब समाप्त हो चुकी है। लेकिन सेंट्रल विस्टा जैसे 20000 करोड़ के प्रोजेक्ट लगाना अभी उचित नही,लेकिन सरकार के तरकस में बहुत से तर्क वितर्क से लैस तीर होते है।जेब में नही दाने अम्मा चली भुनाने ,अब सरकार तो सरकार है। किस की सुनेगी। लेकिन ठोस आधार पर बात रखी जाए तो क़ुछ प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है। पर्यावरण संरक्षण, पेड़ बचाओ की समझ बहुत गहरी न होने पर बात को मजबूती से नही रखा जा सकता है।   लेकिन इन सब पॉइंट्स पर चर्चा हो और हो सकें तो जनता की टास्क फोर्स बने जो उपरोक्त बिंदु पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करें ताकि सरकार के सामने रखा जा सकें। लेकिन एक बात मैं जरूर कहूंगा  कि अनाधिकृत कब्जे और निर्माण रेसिडेंट्स की कमजोरी है। इसका लाभ सरकार उठा रहती है। श्री चंडी प्रसाद भट्ट जी ने द्वारका में ही कहा था कि आंदोलन अंर्तप्रेरित ,स्वस्फूर्त और शांतिपूर्ण ठोस अध्ययन के साथ ही किया जाए।द्वारका में बहुत जानकर और अनुभवी लोगों से उनके अनुभव का लाभ उठाया जाए। किसी प्रोजेक्ट का विरोध करें और कहें कि यहां पर नही ,दूसरी जगह ले जाया जाए ,ये भी बिना विकल्प और ठोस आधार के कहने से प्रोटेस्ट कमजोर पड़ता है। द्वारका के लिए एयरपोर्ट के कारण भी प्रदूषण होता है, इस पर भी हमको फ़ोकस करना ही चाहिए। मुझे याद है  कि श्री एस के मालिक और अखिलेश पांडेय ने इस बात को उठाया तो इनका ही विरोध होने लगा। लेकिन अभी इस बात को स्वीकार किया जा रहा है।  इस लिए सभी विकल्पों पर बिंदुबार चर्चा और गहन अध्ययन करना जरुरी है। जो भी ऊपर लिखा है,ये हम सभी जानते है। लेकिन फिर भी इन सब पर अगर गहन चर्चा कर ली जाए तो उचित ही हो और एक आधार द्वारकावासियों के लिए तैयार रहे, जिससे द्वारका को हमेशा ही संरक्षित किया सकें । द्वारका में भीड़, प्रदूषण बढ़ाने, जल संकट को गहराने वाले प्रोजेक्ट नही चाहिए, ये केवल कभी कभी प्रोटेस्ट करने के साथ एक वैकल्पिक दस्तावेज और प्रोजेक्ट की बारीक से बारीक जानकारी हाथ में रहे तो ही सफलता की थोड़ी उम्मीद है। इस बात से इंकार नही किया जा सकता है।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष ,हिमाल 
9810610400
14.7.2020
ramesh_mumukshu@yahoo.com

Friday, 10 July 2020

चिंतन करना होगा कि कैसे पनपते है,ये डॉन

चिंतन करना होगा कि कैसे पनपते है,ये डॉन
विकास दुबे जैसे लोग पनप कैसे जाते है?  
कौन है ,जो इनको शरण देते है? 
कैसे ये AK 47 रखते है ? 
इसको पकड़ने पुलिस आई तो ,पुलिस वालों ने ही दुबे को सूचित किया। 
जो पुलिस वाले मारे गए ,वो उनके ही सहकर्मियों द्वारा मारे गए। पुलिस कभी एनकाउंटर करने नही जाती, वो हो जाता है। 
इसके माध्यम से हम सभी को अपने आस पास ऐसे कौन से लोग है, जो पुलिस और किसी विभाग से नही डरता। किस नेता और बाहुबली का उसको संरक्षण होता है। 
बेहतर हो कि केस बने और कोर्ट  से सजा मिले। बहुत से ऐसे लोगों को विगत में भी सजा मिली है,जो रसूख वाले लोग रहे है।
ऐसे लोगों का पनपना कानून की कमजोरी ही होती है। ताकतवर आदमी कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करता है।
ऐसे लोग धीरे धीरे ताकतवर बनते चले जाते है। जब व्यवस्था तय करने लगे कि कौन डॉन बनेगा और कब उसका खत्मा होगा तो समझो व्यवस्था न्याय पूर्ण काम नही कर सकेगी। ऐसे लोगों से बहुत से राज खोले जा सकते है। लेकिन ,जो लोग 8 पुलिस कर्मी को मार दें और सीना ठोक कर सामने आ जाये। उसको कोई डर नही है। सम्भव है, उसको ट्रेप में लिया हो। लेकिन ऐसा विगत में भी होता रहा है। होना नही ,चाहिए ,लेकिन ऐसा कदम उठ जाता है,या हो जाता है। 
पुलिस और व्यवस्था ,नेता आदि को ऐसे बदमाशों को पनपने ही न दिया जाए। इस पर हम सब को गहन चिंतन करना ही होगा। हमारे आंखों के सामने जो लोग गैरकानूनी काम सीना ठोक कर लेते है। ऐसे लोग ही दुबे बनने लगते है। आजकल ट्रेंड चला है कि गैरकानूनी निर्माण आदि के ठेके के पैकेज में सभी विभागों को मैनेज करना भी शामिल है। मेरे इस आशय को सभी संमझ गए होंगे। ये ही लोग विभाग और नेता द्वारा संरक्षण प्राप्त करता करता ताकतवर बन जाता है। सभी दलों और विचार धारा के अलग अलग डॉन होते है। जिसका  अवसर मिले वो रास्ता साफ करता रहता है। अगर हम अपने चारों और नज़र दौड़ाए तो बहुत कुछ सामने आता जाएगा। बहुत से लोग ऐसे होते है, जिनको लोग डॉन कहते है, लेकिन उनकी शिकायत करने की किसी की हिम्मत नही होती क्योंकि विभाग वाले उनके पास आते जाते है। इसलिए विकास दुबे जैसों को पनपने ही नही देना चाहिए।
*नोट* एक बात तय है कि बिना किसी वरदहस्त और संरक्षण के बदमाश इतना बड़ा नही बन सकता।
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल 
9810610400

Sunday, 14 June 2020

हम नही सुधरेंगें चाहे कुछ भी हो कोरोना संकट पर एक विचार

हम नही सुधरेंगें चाहे कुछ भी हो कोरोना संकट पर एक विचार
# बाइक पर दो से तीन कितनी बार बिना मास्क चलेंगे।
# भीड़ करेंगे ,गप्प करेंगे मास्क के बिना
# हम प्याला होंगे , किसी के घर मास्क को दुर रख ,बच्चों की  परवाह किये बिना, मधुशाला गाएंगे।
# दुकान पर डिस्टेंस किसको याद है, अब कोई पुलिस वाला हूटर नही बाजयेगा।
#गली मोहल्ले में मेला लगा है।
# रात के पंछी अभी भी रात को 9 बजे के बाद निकल जाते है,बेरोकटोक। 
# कर्फ्यू पास चस्पा करके कितने तो मार्च से ही आंखों में धूल झोंक रहे है। 
# इतने ही केस आते जा रहे है,उतना ही लोग फ्री घूम रहे है। पार्क सेहत बनाने के लिए भरे जा रहे है। किसी को फिक्र नही।
# मौत का तांडव होने को है,लेकिन राजनीति अभी भी गर्म है। कोरोना कभी केजरी, कही मोदी कभी योगी, कभी उद्धव , कभी फलाना ढिमकना हो रहा है। 
# अफसोस  है , देश केअस्पताल में  1लाख पर 58 बेड 
बंगला देश 87 बेड
चीन         434
रूस          805
भारत कुल बेड 7 लाख 14000
ICU  35700 कुल सरकारी अस्पताल में।
इसमें किसी  पार्टी की सरकार नही ,सभी बराबर के जिम्मेदार है।सभी  पार्टी वर्णसंकर है, मतलब *कहीं की ईंट कहीं को रोड़ा भागमती ने कुनबा जोड़ा।*  कभी किसी ने  पार्टी और  संघटन द्वारा  स्वास्थ्य पर आंदोलन और चक्का जाम की बात सुनी है। इसमें सभी कसूरवार है। हम सोचते हीनही इस बारे में। 
# दुनियां में 10 लाख पर टेस्ट की स्थिति 
भारत         3462
USA          64335
स्पेन            95308
रूस            119793
ब्रिटेन           82299
 इटली           70063     
पेरू              36185
जर्मनी           51916
चीन के यूहान में एक दिन में 14 लाख जांच करवाई थी।
ये देश भारत से 20 गुणा अधिक टेस्ट करवा रहे है। अब खुद ही हिसाब लगा ले कि अगर 20 गुणा टेस्ट हम करते तो आज कितने पॉजिटिव केस हो सकते थे। कितनों की मौत हो सकती थी। 
# ये हमारी हकीकत है। ये किसी भी पार्टी की प्राथमिकता नही रही। अगर किसी पार्टी की सरकार ने काम नही किया तो दूसरी पार्टी ने कौन सा झंडा गाड़ दिया। कभी उपरोक्त बातों पर आंदोलन और चक्का जाम नही हुआ।
# देश में मेडिको इन्शुरन्स , सरकारी स्वास्थ्य कार्ड धारक बहुत कम होंगे। करीब 80% लोग भगवान भरोसे है। खुद ही नीम हकीम से इलाज़ करवाते है। सभी किस्म की दवा में मिलावट और स्टेरॉइड मिला कर देने वाले पिचास खूब मिलते है। अभी भी देश में  20  से 50  किलोमीटर से दूर डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल है,जहां पर भी इलाज़ की उम्मीद नही होती।  
# अब बताओ कोरोना से कैसे बचें । पहले दूसरे लॉक डाउन में पुलिस का  हूटर सुन दौड़ जाते थे। पिछवाड़ा सेक दिया मशहूर हुआ था। अब ऐसे निकलते है, जैसे कोरोना है ही नही। 
# बुरा न मानों बहुत से लोग केवल लठ के ही यार है। हम लोग मार्च से ही पॉकेट के गेट पर पहरा देते है। अभी तक लड़ाई का अंदेशा रहता है। हमारे यहां पर गेट पर ड्यूटी देने के लिए दो हमले भी हो गए। लेकिन अभी भी कुछ लोगों पर अंतर नही पड़ा। 
# खुद ही हम नही मानते कानून और जो बताया जाता है। आदत ही नही। 
# शराब की दुकान में भीड़ ने रिकॉर्ड तोड़ दिया ,ट्रैफिक जाम आम हो गया। 

# जब मरीज एक न था 
लक्षण रेखा खींची गई
अब मरीज चहुं ओर है
रोक टोक कछु न भई 
कैसा गड़बड़ झाला रे 
ये कैसा गड़बड़ झाला 
कोरोना ने कैसे भैय्या
सबको जाल में डाला
सबको जाल में डाला 
किस पर दोष मढ़े 
इस हमाम में भैय्या 
सभी औंधे पड़े ,औंधे पड़े। 
# इसलिए अपनी जान खुद ही बचाएं।
सावधानी हटी दुघर्टना घटी।
#अगर 15 लाख खींसे में है और किसी नेता के करीबी है ,तो भी बच के रहो,ये कोरोना है,जिसने अमेरिका चीन नही बख्शे , परमाणु बम भी इसका बाल बांका भी नही ,तो किसी को नही बख्शेगा। 
*ये हेकड़ी मूछों पर मरोड़ , सीना फुला के चलना, ऐंठ के घूरना सब धरा रह जायेगा। इसलिए सभी भेद भाव भूल कर साथ में आकर खुद बचो और औरों को बचाओं। ये ही मूल मंत्र है।जिंदा रहे तो भिड़ते रहेंगे,पूरा जीवन ,यहीं करते आ रहे है, सदियों से ,अब हो सकता है ,कुछ ऐंठन कम हो जाये ,कोरोना के कारण। ये तो देखना ही है।
विनीत
रमेश मुमुक्षु
अध्यक्ष, हिमाल 
9810610400
13.6.2020